इसे कोई उपदेशात्मक पोस्ट ना समझ लीजियेगा....बस एक अच्छा आलेख पढ़ा तो हमेशा की तरह शेयर करने की इच्छा हो आई...और यह मौजूं भी था क्यूंकि विषय मेरी पिछली पोस्ट से मिलता-जुलता है.पिछली पोस्ट में मैने घरेलू हिंसा पर बात की थी. उसका सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है. खासकर लड़कों पर क्यूंकि उनके सबकॉन्शस में ही यह बात बैठ जाती है कि ऐसे सिचुएशन में इसी तरह रीएक्ट करना है. और पिता अपनी ज़िन्दगी के साथ साथ अपने बेटे की ज़िन्दगी को भी खुशहाल बनाने का रास्ता बंद कर देता है क्यूंकि दुनिया तेजी से बदल रही है...हमसे दो पीढ़ी पहले की औरतें पति को परमेश्वर मानती थीं और पति द्वारा किए गए ऐसे व्यवहार को सर-माथे लेती थीं. उसके बाद की पीढ़ी समझने लगी थी कि ये गलत है फिर भी प्रतिकार नहीं कर पाती थी. आज की पीढ़ी इसे बिलकुल गलत मानती है फिर भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ना होने के कारण यह पशुवत व्यवहार सहने को मजबूर हो जाती है लेकिन आनेवाली पीढियाँ , ना तो आर्थिक रूप से निर्भर होंगी किसी पर और ना ही चुपचाप ऐसा व्यवहार सहेंगी.इसलिए अनजाने में ही वैसे पिता ,अपने बेटे की ज़िन्दगी में भी कांटे बो रहें हैं.
शनिवार के बॉम्बे टाइम्स में छपे एक आलेख में, लिखा है कि अधिकांशतः बच्चे के पालन-पोषण में उसके माँ का हाथ होने की बात कही जाती है परन्तु हाल में ही कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी के एक मनोवैज्ञानिक Melanie Mallers ने एक सर्वेक्षण किया कि बेटे के चरित्र निर्माण में पिता की कितनी भूमिका होती है. Mallers ने कहा ,"हमारे सर्वेक्षण से यह बात पता चली कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य मेंटल हेल्थ) पर पिता की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रभावी होती है"
जिन पिताओं का अपने बेटे के साथ स्वस्थ और प्यार भरा रिश्ता होता है वे जीवन के संकटमय स्थिति को ज्यादा अच्छी तरह हैंडल कर सकते हैं.....जिनके रिश्ते में दूरी होती है. वे ऐसी परिस्थिति में बिखर जाते हैं.और कुशलतापूर्वक उस स्थिति का सामना नहीं कर पाते."
डॉक्टर बरखा चुलानी क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट भी कहती हैं कि बेटे हमेशा पिता की नक़ल करना चाहते हैं.पिता जितना ही स्नेहमय होंगे, उनके बेटे का जीवन उतना ही शांतिपूर्ण होगा और वे भी अपने बच्चे के साथ वैसा ही स्नेहभरा व्यवहार रखेंगे.
पिता से बेटे के रिश्ते का प्रभाव उसके इमोशनल प्रोग्रेस पर पड़ता है. प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक सीमा हिंगोरानी का कहना है ,पिता का प्यार भरा व्यवहार, उन्हें इमोशनली स्ट्रौंग बनता है और दूसरों से उनके रिश्ते बनाने की प्रक्रिया पर बहुत असर डालता है. एक अच्छे मानसिक विकास के लिए पिता के साथ सुन्दर रिश्ता बहुत जरूरी है" छोटे लड़के हर बात में अपने पिता की नक़ल करते हैं, शेव बनाने से लेकर, अखबार पढने के अंदाज तक और अनजाने ही वे उसके सारे गुण- अवगुण आत्मसात करते जाते हैं.
यह बात मैं अपने अनुभव से कह सकती हूँ, मेरे पति की एक अच्छी आदत है (बस एक ही..so sad :( ) वे खाना खा कर अपनी प्लेट जरूर उठा कर सिंक में रख देते हैं. मुझे अपने दोनों बेटों को एक बार भी यह नहीं कहना पड़ा. बल्कि जब वे बहुत छोटे थे, उनके हाथों से जबरदस्ती प्लेट ले लेनी पड़ती थी कि कहीं गिरा ना दें. लेकिन वही गीले टॉवेल बिस्तर, कुर्सी कहीं पर भी छोड़ जाने की आदत भी पिता से ही ग्रहण कर ली है.चाहे मैं ३६५ दिन में दो बार चिल्लाऊं. कोई असर नहीं होता :(
रोज सुबह मेरे सामने वाली बिल्डिंग के एक फ़्लैट की बालकनी में एक बड़ा ही प्यारा दृश्य देखने को मिलता है. एक युवक ने कपड़े फैलाने की जिम्मेवारी अपने ऊपर ले ली है. उसका दो साल का बेटा भी साथ लगा होता है. उसे उसके पिता "विंडो सिल' पे खड़ा कर देते हैं और वह भी अपने छोटे-छोटे हाथों से मोज़े, रुमाल फैलाने में अपने पिता की मदद करता है. उनकी पत्नी नौकरीपेशा नहीं है फिर भी सोचते होंगे, ऑफिस जाने से पहले काम का बोझ कुछ तो हल्का कर दूँ. अब ये बच्चा जब बड़ा होगा, उसे घर के छोटे-मोटे काम में हाथ बटाने कभी परहेज नहीं होगा. और जाहिर है ,घर वालों को ख़ुशी ही होगी.
इसलिए पिता लोगों को थोड़ा एक्स्ट्रा कॉन्शस रहना चाहिए.
अगर कोई बेटा अपने पिता से खुलकर बातें करता है और अपनी समस्याएं शेयर करता है तो वह अपनी किशोरावस्था में अपने भीतर आते परिवर्तनों से अच्छी तरह डील कर सकता है.
अक्सर कठिन समय में बच्चे अपने माता-पिता की तरफ देखते हैं. अगर वे देखते है कि पैरेंट्स , परेशानी को अच्छी तरह हैंडल नहीं कर पा रहें. खुद पर से नियंत्रण खो दे रहें हैं तो उनकी भी प्रेशर का सामना करने की क्षमता घट जाती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी युवक में डिप्रेशन, चिंता, सोशल स्किल्स की कमी पायी जाती है तो ज्यादातर इसकी वजह उनके पिता से खराब रिश्ते होते हैं. और वहीँ एक स्वस्थ रिश्ता जो बचपन की मधुर यादों से भरा हो, बेटों को इमोशनली स्ट्रौंग बनता है और जीवन की कठिन परिस्थितियों का कुशलता से सामना करने के लिए तैयार करता है.
इसलिए चिंता करने,, गुस्सा करने, किसी पर चिल्लाने से पहले यह देख लीजिये कि कहीं आपका छोटा बेटा ,आस-पास तो नहीं. पर महानगरों में बड़े होनेवाले बच्चे अपने पिता की सूरत तक देखने को तरस जाते हैं.वे जब सो रहें होते हैं तो पिता ऑफिस से आते हैं और जब सुबह बच्चे स्कूल जाते हैं तो पिता सो रहें होते हैं. पर वीकेंड्स में उसकी पूरी कसर निकाल लेनी चाहिए. इसके पहले कि टिप्पणीकर्ता इस तरफ ध्यान दिलाएं कि यही सारी बातें माँ के साथ भी लागू होती हैं...बिलकुल स्वीकार करती हूँ... उनके भी सारे गुण-अवगुण बेटियाँ ग्रहण करती चली जाती हैं. अक्सर पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं होता और इसके विपरीत माँ अपने बच्चों की ज़िन्दगी पर कुछ ज्यादा ही नियंत्रण की कोशिश करती है जिसकी वजह से कई बार,लडकियाँ अपने पति के साथ एडजस्ट नहीं कर पातीं. छोटी से छोटी बात माँ से शेयर करती हैं और उसकी सलाह पर ही कार्य करती हैं. माताओं को भी बेटियों को पूर्ण आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश करनी चाहिए.
इसलिए पैरेंट्स बनना कोई आसान कार्य नहीं. अपने व्यवहार के सबसे बड़े समीक्षक खुद ही होना पड़ता है. अपनी ज़िन्दगी तो जी ली (जैसी भी थी..). जब बच्चों को इस दुनिया में लेकर आए हैं तो उन्हें एक सुखमय, शांतिपूर्ण जीवन देने का वादा खुद से होना चाहिए.