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सोमवार, 23 मई 2011

रश्मि से रविजा तक

संस्मरण की श्रृंखला लिखने की कोई योजना नहीं थी...पर टिप्पणियों में कई  लोगो ने लिखा, संस्मरण- श्रृंखला अच्छी चल रही है...आपके संस्मरण के रेल में सवार हैं....तो हमने सोचा अब रेल में कुछ डब्बे और जोड़ ही दें. यूँ भी जब यादों की पोटली खुलती है तो कोने-कतरे में दबी यादें झाँक- झाँक  कर अपने अस्तित्व का अहसास कराने लगती हैं. ऐसा ही एक भूला  हुआ वाकया याद आ गया जो यदा-कदा दिल दुखा जाता है.
 

पत्रिकाओं में  प्रकाशित आलेखों को पढ़कर जो पत्र आते थे, उनमे से अधिकांशतः लड़कों के ही पत्र होते थे. कभी -कभार भूले-भटके एकाध ख़त लड़कियों के होते. ऐसा ही एक पत्र , औरंगाबाद से आया था. एक लड़की का था और उसने पत्र-मित्रता की इच्छा ज़ाहिर की थी. यूँ तो सहेलियों की कमी नहीं थी...पर पत्र मित्रता मैने नहीं आजमाई थी, अब तक.

एक अलग सा रोमांच हो आया...हमलोगों ने  एक दूसरे को देखा नहीं...जानते नहीं...सिर्फ पत्रों के सहारे जानेंगे .और मैने उसके पत्र का उत्तर दे दिया. नियमित पत्र व्यवहार होने लगा. एक दूसरे को अपनी -अपनी तस्वीर भी भेजी गयी. घर में  भी सबको मालूम था. निशा,( नाम  बदला  हुआ है ) बी.एड . कर चुकी थी और एक स्कूल में टीचर थी. हम किताबों..फिल्मों..अपने परिवार और दोस्तों के बारे में एक-दूसरे को लिखते.  वो  अक्सर जिक्र करती...उसे बिहार आने की बहुत इच्छा है. मैं भी रस्मी तौर पर उसे आमंत्रित कर देती. मुझे भी वो औरंगाबाद आने के लिए कहती, पर मुझे लगता ,ये सब रस्म अदायगी है...ना मैं अकेले औरंगाबाद जा सकती हूँ,ना वो कभी बिहार आएगी.


पर एक दिन मैं उसका पत्र पाकर चौंक गयी. उसने गर्मी की छुट्टियों में मेरे घर पर आने की इच्छा जताई थी. पत्र व्यवहार तक तो ठीक था पर पता नहीं...एक अकेली लड़की का इतनी दूर से अकेले आना , मम्मी-पापा को अच्छा लगेगा या नहीं...ये भी डर था.


फिर अगले पत्र में उसने अपने आने का करण बताया...जिसने  मुझे घोर असमंजस  में डाल दिया. निशा बी.एड. कर रही थी...उसका एक सहपाठी बिहार का था. जिस से दोस्ती  हुई और फिर दोस्ती प्यार में बदली. खूब कसमे वादे किए गए .  ट्रेनिंग पूरी होने के बाद, सात जन्मो तक  साथ निभाने की कसमे खा कर और वापस लौटने का वादा कर  वो लड़का...बिहार, वापस आ गया.


उसके बाद, उस लड़के ने , निशा के एकाध पत्र का जबाब दिया, फिर चुप्पी साध ली. अब निशा बिहार आकर उसे ढूंढ निकालना चाहती थी. मेरी उस समय इतनी परिपक्व सोच नहीं थी...फिर भी इतना तो मुझे भी लग रहा था...कि जब लड़का बेरुखी दिखा रहा है...तो इसे क्या  पड़ी है, उसकी खोज-खबर लेने की. आज का दिन होता तो मैं उसे समझा कर उसे उस लड़के को हमेशा के लिए भूल जाने पर बाध्य कर देती { मानो , कितनी बार समझाया हो किसी को....और प्यार में पड़े लोग...समझ जायेंगे जैसे :)}


उसके आने की योजना सुन मैं बहुत परेशान हो गयी. ममी-पापा के सामने 'प्यार' जैसे शब्द की चर्चा भी नहीं करते थे हमलोग...और यहाँ उस लड़की के बॉयफ्रेंड को ढूंढ निकालने की बात थी. इसका तो मैं जिक्र भी नहीं कर सकती थी,अपने पैरेंट्स से. और मैने भी  चुप्पी साध ली. बुरा तो बहुत लगा...एकाध पत्र आए उसके पर मैने जबाब नहीं दिया..मेरे पास और कोई चारा ही  नहीं था.


आज तक वो अपराध बोध मन को सालता है...क्या छवि होगी, उसके मन में बिहार वासियों की..एक ने प्यार में धोखा दिया...दूसरे ने दोस्ती में....


अब थोड़ा अपने नाम का कन्फ्यूज़न दूर कर दूँ. मेरे उपनाम 'रविजा' से कोई मुझे मुस्लिम समझते हैं...तो कोई पंजाबी....कोई सिन्धी तो कोई गुजराती . कुछ समय पहले किसी ने मंगलोरियन भी पूछ लिया ।जयपुर यात्रा में तो एक दुकानवाले ने पूछा, आर यू फ्रॉम साउथ अफ्रीका ' । पता चला साउथ अफ्रीका से बहित टूरिस्ट आते हैं। 

ज्यादातर लोग सोचते हैं ,'रविजा' मेरा सरनेम है. जब शोभना चौरे जी ने टिप्पणी में मेरे पतिदेव को 'मिस्टर रविजा' कहकर संबोधित किया तो बहुत ही मजा आया.सिर्फ महिलाएँ ही मिसेज..फलां...फलां क्यूँ कहलाती रहें :)

ये 'रविजा' उपनाम मैने स्कूल के दिनों में ही रखा था. लिखना शुरू करने से भी पहले. शायद पत्रिकाओं में लेखकों/ कवियों के नाम देख शौक चढ़ा हो. पर रविजा के पहले रखा था, '
रश्मि विधु'. मालती जोशी की कहानी में एक लड़की का नाम 'विधु' था जो बहुत पसंद आया था. और सिर्फ मुझे ही नहीं...वंदना अवस्थी दुबे ने भी वो कहानी पढ़ी थी और इतनी प्रभावित हुई थी कि ज़ेहन  में वो नाम छुपा कर रखा और अपनी बिटिया का नाम 'विधु' रखा है.

पर कुछ दिनों बाद मुझे कहीं
'रविजा' शब्द दिखाई दिया और ये मुझे ज्यादा उपयुक्त लगा. रवि + जा = रविजा. यानि सूर्य से निकली हुई . रश्मि का अर्थ तो किरण है ही. यानि सूर्य से निकली हुई किरण.
तो मेरा नाम  'चन्द्र किरण' से 'सूर्य किरण' में बदल गया. जो शायद ज्यादा उपयुक्त है.:)


अब शायद रश्मि को रविजा के साथ ने अपना पक्ष रखने की हिम्मत दे दी है.  अगर आज इस तरह का कोई वाकया सामने आता और किसी निशा ने मदद या सलाह मांगी होती तो मैं चुप्पी नहीं साध लेती. उसे चीज़ों को सही रूप में दिखाने का प्रयत्न जरूर करती. और अगर तब भी वो नहीं समझती तो जरूर किनारा कर लेती

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