पंचगनी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पंचगनी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 4 जनवरी 2012

स्ट्राबेरीज़ के शहर में


मुंबई आने से पहले...पंचगनी के विषय में इतना ही पता था कि वहाँ फिल्मो की शूटिंग होती है...फिल्म कलाकारों के बड़े बड़े बंगले हैं...और उनके बच्चे वहाँ के बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते हैं. यहाँ आने के बाद पता चला....बड़ा ख़ूबसूरत सा हिल स्टेशन है...जहाँ की स्ट्राबेरीज  बहुत मशहूर हैं.

इस बार नए साल का स्वागत पंचगनी में करने की ही योजना बनी. अब बच्चे बड़े हो गए हैं...और अब नई चीज़ें उन्हें  आकर्षित करती हैं. उनका सबसे बड़ा आकर्षण था, 'पैरा ग्लाइडिंग' . मेरे मन में कशमकश चल रही थी...मन भी हो रहा था...और थोड़ा डर भी लग रहा था...फिर ये ख्याल भी आ रहा था कि अब नई चीज़ें जल्दी जल्दी ट्राई कर ली जाएँ..वरना आगे उम्र इजाज़त नहीं देने वाली. उस पर से एक सहेली का  उदाहरण  सामने था..जो हाल में ही ऋषिकेश में एक  ऊँची चोटी से पानी में छलांग लगाने का अनुभव ले चुकी थी...मन में बीसियों बार कल्पना करती कि 'यूँ दौड़ते हुए जाना है और पहाड़ी से कूद जाना है..बस इतना ही करना है'...एक बार कूद गए फिर तो जो होना है, होकर रहेगा...अपना वश छूट जाएगा. बस दौड़ने के लिए हिम्मत जुटानी है...और अगर डर लगा..तो ZNMD के फरहान अख्तर की तरह इंस्ट्रक्टर को कह दूंगी..'पुश मी ' . इसमें झिझक कैसी.... सामान संभालते ..रास्ते में भी बस पूरे समय दिमाग में यही चलता रहता. पर  घर वालों से  ये सारा कुछ शेयर नहीं किया..वहाँ तो हिम्मत ही दिखाती रही. :) पर पंचगनी पहुँचने पर पता चला...कुछ दुर्घटनाएं हो चुकी हैं...जिसकी वजह से सरकार ने 'पैरा ग्लाइडिंग' बंद कर दी है...पैसे के लालच में प्रबंधक अब भी चोरी छुपे करवाते हैं...(शायद पुलिस वालों को पैसे खिलाकर )  ..पर यह ना मेरे पतिदेव को गवारा था और ना मुझे...बच्चे तो ऐसे  निराश  हुए ..मानो उनके लिए सारी ट्रिप ही व्यर्थ हो गयी....पर मुझे जैसे सुकून आ गया..चलो अब अगली बार तक के लिए ये कशमकश टली...और अब जाकर मेरा दिमाग कुछ और देखने-समझने लायक हुआ....इतने ख़ूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से बेखबर मैं 'पैरा ग्लाइडिंग' की कल्पना  में ही उलझी थी.

पंचगनी...का वास्तविक नाम पांचगनी  है... क्यूंकि यह  'सह्याद्री पर्वत श्रृंखला' के मध्य में स्थित , पांच  पहाड़ियों से घिरा हुआ है. ब्रिटिश राज्य के समय गर्मी से निजात पाने के लिए एक 'हिल स्टेशन' के  रूप में इसे विकसित किया गया.1860 में 'जौन चेसन' ने पांच गाँवों से घिरे इस क्षेत्र के विकास में अहम् भूमिका निभाई. बारहों महीने यहाँ का मौसम बहुत ही सुहाना रहता है..इसी वजह से ज्यादातर ,पुणे मुंबई से पूरे साल लोग पौल्युशन से दो घड़ी ब्रेक लेने को यहाँ का रुख करते हैं. मुंबई से यह १०० किलोमीटर की दूरी  पर है. पंचगनी  से अठारह किलोमीटर की दूरी पर महाबलेश्वर है....टूरिस्ट पंचगनी में रूकें या महाबलेश्वर में..दोनों ही जगह की सैर का आनंद जरूर लेते हैं. 

सिडनी पॉइंट..मंकी पॉइंट...विल्सन पॉइंट..एलिफैंट पॉइंट..आर्थर सीट जैसे कई ख़ूबसूरत पॉइंट्स हैं जहाँ से इस शहर के बीचोबीच बहती कृष्णा नदी और सहयाद्री पर्वत श्रृंखला का अलग-अलग कोण से नज़ारा लिया जा सकता है. 

यहाँ तिब्बत के बाद...एशिया का दूसरा सबसे लम्बा पठार है, 'टेबल लैंड' . पहाड़ी के ऊपर इतनी  समतल जगह है कि जहाँ एक छोटा सा प्लेन लैंड कर सकता है.

, एलिफैंट पॉइंट
डेविल्स किचन नाम की गुफाएं हैं...मान्यता है कि, पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इन गुफाओं में छुप कर गुजारा था. 'टेबल लैंड'  पर पत्थरों पर एक बड़े से पंजे के निशान हैं...कहा जाता है कि यह भीम के पैरों के निशान  हैं.

1980 तक पंचगनी सिर्फ बोर्डिंग स्कूल...और स्वास्थ्य सुधारने के स्थान के रूप में ही विख्यात था..पर अब पूरे साल टूरिस्ट का जमघट लगा रहता है.
पर यह जमघट मिक्स्ड क्राउड का होता  है.. शिमला-मसूरी की तरह सिर्फ हनीमून कपल्स नहीं होते . {शिमला में हमने हाथों में पहने चूड़े देख  सिर्फ मालरोड पर  ११२ कपल्स गिने थे. :)}

अच्छा लग रहा था देख...कुछ लोग अपने उम्रदराज़ माता-पिता को लेकर भी आए थे और वे लोग भी पूरी गर्मजोशी से पहाड़ियां चढ़-उतर रहे थे. छोटे बच्चों के माता-पिता की परेशानी  देख...हमें अपने दिन याद आ  रहे थे...जब एक बेटा किसी  चीज़ के लिए हाथ पकड़ कर एक तरफ खींचता तो दूसरा दूसरी तरफ....पर एक चीज़ बड़े जोरों से खटक रही थी..बिरला ही कोई था...जो उन सुन्दर  दृश्यों का अवलोकन कर रहा था...सबलोग बस एक दूसरे की फोटो उतारने में ही व्यस्त थे...किस एंगल से दृश्य ख़ूबसूरत लग रहा है की जगह किस दृश्य के साथ खुद अच्छे लग रहे हैं...इसकी अहमियत ज्यादा थी. इतनी मेहनत से 'टेबल लैंड ' पर सबलोग सूर्यास्त देखने आए थे...पर उस दृश्य को कैमरे में कैद करने की कवायद ही अहम्  थी. {हमलोग कोई अपवाद नहीं थे..पर मैं बार-बार आगाह कर रही थी(खुद को भी :))..पहले कुछ देर देखने के बाद कैमरे को हाथ लगाएं}. सूर्यास्त की किरणों ने तालाब के पानी को दो रंगों में विभक्त कर दिया था...एक हिस्सा सिन्दूरी लाल था तो दूसरा गहरा नीला..जैसे किसी ने बीच से एक लकीर खींच दी हो......इस तरह की पेंटिंग करते वक्त हाथ कितने बार रुकते थे... कि कहीं नकली ना लगे...और बीच के हिस्से में मैं लाल और नीले को स्मज करने की कोशिश करती थी..जबकि यहाँ प्रकृति ने पूरे ठसक से बिना रंग वाले पानी को दो गहरे रंगों में बाँट रखा था .

किसी भी पहाड़ी शहर  की तरह..ख़ूबसूरत घाटियाँ...हरे-भरे पहाड़...झील.....पुराने मंदिर पंचगनी के मुख्य आकर्षण है. एक मंदिर जो कृष्णा नदी के उद्गम पर बना है...कहते हैं चार हज़ार वर्ष पुराना है. मंदिर के परिसर में एक नंदी बैल की मूर्ति रखी है. जिसके सामने और पीछे एक सूराख  है...उस सूराख से आँख लगा कर देखने पर...मूर्ति बिलकुल स्पष्ट  नज़र आती है. शायद यह जाति व्यवस्था का ही नतीजा हो. कुछ विशेष जाति के लोगो को मंदिर में जाने की इजाज़त नहीं होगी . मंदिर का निर्माण करने वाले किसी कारीगर ने ही यह युक्ति निकाली होगी क्यूंकि मंदिर का निर्माण भले ही उसके हाथों हुआ हो...पर उसके अंदर तो उसका जाना भी वर्जित ही होगा.


महाराष्ट्र के हर शहर की तरह यहाँ भी गणपति के विशाल मंदिर हैं...जिनका काफी महात्म्य है.
भीम के पैरों के निशान (कथित)


पंचगनी की आर्थिक व्यवस्था...टूरिस्ट पर ही निर्भर है. बारिश के दिनों में चार महीने टूरिस्ट का अकाल रहता है....इसलिए वहाँ के लोग बाकी बचे महीनो में दुगुनी मेहनत करते हैं. हमने जिसकी गाड़ी किराए पर ली थी ..वह ड्राइवर  अपनी दिनचर्या बता रहा था...दिन भर वह टूरिस्ट को पंचगनी-महाबलेश्वर घुमाता है. रात के नौ बजे..लम्बी दूरी की बस लेकर जाता है...सुबह चार बजे वापस लौटता है. और फिर नौ बजे से टूरिस्ट को घुमाने का रूटीन शुरू. जब मैने पूछा.."नींद कैसे पूरी होती है..?" तो कहने लगा....'जब टूरिस्ट खाने-पीने के लिए..या कोई पॉइंट देखने जाते हैं...बीच -बीच में  सो लेता हूँ'.. मैने अपनी आशंका जता दी.."ऐसे में एक्सीडेंट हो सकते हैं" लेकिन उसका कहना था..पिछले बीस साल से उसका यही रूटीन है. कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ...और अब अपनी मेहनत से उसने दो ट्रक और चार गाड़ियां कर ली हैं....फिर भी उसने अपनी मेहनत  में कमी नहीं की..बच्चे बारहवीं और दसवीं में हैं...उन्हें एक अच्छा भविष्य देना है..बस अब .वे बच्चे पिता की इस मेहनत को निष्फल ना जाने दें.  पंचगनी की खास बात है कि यहाँ के 82% लोग साक्षर है..जो भारत के औसत 65% साक्षर से ज्यादा है. 


नमी से बचाने के लिए प्लास्टिक से ढकी स्ट्राबेरी  की  क्यारियाँ 
मुंबई के ट्रैफिक जैम से त्रस्त लोगों को सबसे अच्छी वहाँ की लॉंग ड्राइव लगनी  चाहिए . दोनो तरफ  पेडों से घिरा संकरा  सा रास्ता. कई जगह दोनों तरफ की पेडों की शाखाएं आपस में मिल गयी थीं और रास्ते पर दूर तक एक  लम्बी कनात सी तन गयी थी. रास्ते  में जगह जगह.. छोटी  छोटी मेजों पर  सजे स्ट्राबेरीज   अपने ग्राहकों का इंतज़ार कर रहे थे. स्ट्राबेरी पंचगनी का मुख्य उत्पादन है और २०११ में इसके उत्पादन का टर्न ओवर सौ करोड़ था. इसे एक्सपोर्ट भी किया जाता है. पूरे भातर में स्ट्राबेरी की खपत का 87% पंचगनी से ही पूरा होता है. इसका 80%फ्रेश फ्रूट के रूप में ही खाया जाता है..और बीस प्रतिशत का  जैम और सिरप बनाने में उपयोग होता है. मैप्रो गार्डन भी एक दर्शनीय स्थल ही बन गया है..जहाँ स्ट्राबेरी के जैम सिरप कैसे बनते हैं...देखा जा सकता है. पंचगनी -महाबलेश्वर आए और कोई फ्रेश क्रीम के साथ स्ट्राबेरी का स्वाद ना ले..ये नामुमकिन है. पेश करने का अंदाज़ भी इतना  दिलकश रहता है कि कैलोरी की चिंता भूलनी ही पड़ती है. कई दुकानों पर  दुकान के मालिक के साथ...शाहरुख खान..जौन अब्राहम..अक्षय कुमार जैसे सितारों की तस्वीरें लगी हुई थीं...अक्सर यहाँ शूटिंग होती रहती है..

स्ट्राबेरी विद फ्रेश क्रीम (कैलोरीज़  कौन याद रखे )
करीब चालीस बोर्डिंग स्कूल है वहाँ...इन दिनों स्कूल बंद थे...पर कुछ स्कूली, लडकियाँ..गंदे से एक ठेले पर चाट खाते हुए दिख गयीं...(या तो वे घर नहीं गयी होंगी या...पैरेंट्स भी छुट्टियाँ मनाने यहीं आ गए होंगे ) पैरेंट्स शायद हाथ भी बिसलरी से धुलवाते होंगे...पर यहाँ बेफिक्री से वे चटखारे लेकर गोलगप्पे खा रही थीं...पहनावे और बातचीत का लहज़ा अत्याधुनिक था....पर अच्छा लगा, देख.....वे ठेले वाले को बड़े अदब से भैया कह कर संबोधित कर रही थीं....बाकी तो आम लड़कियों सी ही एक दूसरे पर हँसते हुए गिरना और क्लास के हैंडसम लडको की बातें ...किसने किसे देखा..और किसने किसे इग्नोर  मारा...

सारे होटल्स दुल्हन से सजे थे...कहीं 'ओपन एयर डिस्को' था तो कहीं 'पूल साइड पार्टी'...ग्राहकों को आकर्षित करने के एक से एक बढ़ कर पैंतरे...जो अमूमन हर पर्यटन स्थल पर होते हैं...

लौटते हुए लगा..जैसे सारा पुणे, मुंबई ही छुट्टियाँ मनाने गया हुआ था..एक एक इंच गाड़ी सरक रही थी...घर पहुँचने में नियत समय से दो घंटे ज्यादा लग गए...हम..उसी शोर शराबे से भरपूर... भीड़ भरी दुनिया में वापस लौट आए थे..जो हकीकत भी था और अपना सा भी...आदत में जो शामिल है...                     






फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...