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गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

पश्चिमी देशों के अभिभावकों को 'टाइगर मॉम' की सीख


आजकल एक किताब बहुत चर्चा  में है...Amy Chua  की  लिखी  'Battle Hymn of The Tiger Mom',  'एमी चुआ' अमेरिका में  Yale Law School, में  law professor हैं. वे चीनी हैं पर उनका पालन-पोषण अमेरिका में ही हुआ है और उन्होंने एक अमेरिकन से शादी की है. इस पुस्तक में  'एमी चुआ'  ने अपनी दोनों बेटियों का  किस तरह कड़े अनुशान के तहत पालन-पोषण किया है...इसका पूरा वर्णन  है. वे सख्त अनुशासन को ही सही मानती हैं. और उनका मानना है कि पश्चिमी देशो में बच्चों को पालने का तरीका सही नहीं है. और यही वजह है कि भारत..चीन के बच्चे ज्यादा मेधावी होते हैं और अपनी लगन और अभिभावकों के मार्गदर्शन से किसी भी क्षेत्र में ऊँची पायदान पर पहुँचने का माद्दा रखते हैं.

'एमी चुआ' ने विस्तार से चीन और पश्चिमी देशो के बच्चों के पालन-पोषण के तरीके की तुलना की है. और चीन के तरीके को ज्यादा बेहतर  बताया है....

उनका कहना है कि उन्होंने अपनी बेटियों सोफिया और लुइज़ा के 
लिए कुछ नियम बनाए थे 

दोस्तों के घर पर रात में नहीं रुकना है
स्कूल में नाटकों में भाग नहीं लेना है
नाटक में भाग नहीं लेने देने के लिए शिकायत नहीं करनी है. 
टी.वी. नहीं देखना है...कंप्यूटर गेम्स नहीं खेलने हैं.
खुद से अपने लिए कोई एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज़ का नहीं चुनाव नहीं करना है (अभिभावक ही ये निश्चित करेंगे)
A ग्रेड से कम बिलकुल नहीं आना चाहिए.
पियानो या वायलिन छोड़कर दूसरा म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट नहीं बजाना है

उनका कहना है कि पश्चिमी देशों के अभिभावक अगर बहुत सख्त हुए तो अपने बच्चों को आधा या एक घंटा रोज, प्रैक्टिस  करने के लिए कहेंगे लेकिन चीनी अभिभावक तीन घंटे से कम में बिलकुल नहीं मानेंगे. 
पश्चिमी देशों के लोग..बच्चों पर अच्छे नंबर के लिए दबाव नहीं डालते परन्तु चीनी अभिभावक के बच्चे अगर अच्छे नंबर नहीं लाए तो उन्हें बहुत डांट पड़ती है और इसका सारा दोष अभिभावकों को दिया  जाता है कि उन्होंने ध्यान नहीं दिया.

चीनी अभिभावकों का मानना है कि जबतक किसी भी विधा में पारंगत ना हो  जाएँ  उसे करने में मजा नहीं आता. और बच्चे कभी भी अपने मन से अभ्यास करने के लिए नहीं मानते. माता-पिता को ही जोर डालना पड़ता है. शुरुआत में हर बच्चा विरोध करता है और पश्चिमी देश के अभिभावक उनका विरोध मान लेते हैं और उनपर जोर नहीं डालते जबकि चीनी अभिभावक उन पर बार-बार अभ्यास करने के लिए जोर डालते हैं. और जब बच्चा गणित..पियानो..बैले में अच्छा करने लगता है तो उसे तारीफ़ मिलती है जिस से उसे संतोष मिलता है, उसका आत्मविश्वास बढ़ता है  और फिर उसे उस काम में मजा आने लगता है. 

चीनी अभिभावक अपने बच्चों को गुस्से में कुछ भी कह देते हैं..जबकि पश्चिमी देश के लोग बच्चों को कुछ कहने से पहले ये ख्याल रखते हैं कि उनके आत्मसम्मान को कोई चोट ना लगे. 
एमी ने अपने बचपन की घटना लिखी है कि उनके पिता ने माँ के साथ बहस करने पर एमी को 'कूड़ा-करकट' कहा. पर इस से एमी के दिल को कोई चोट नहीं लगी बल्कि उन्हें अहसास हुआ कि उन्होंने गलत किया है.
और एक बार अपनी बेटियों  को भी उन्हीने गुस्से में 'कूड़ा-करकट' कह दिया...बेटी पर भी इसका विपरीत असर नहीं हुआ.

 एमी  चुआ ने अपनी छोटी बेटी के विषय में लिखा है कि लुइज़ा पियानो पर एक धुन सही  तरीके से नहीं बजा पा रही थी. और उसने छोड़ दिया..एमी ने उसे जबरदस्ती बजाने के लिए कहा...लुइज़ा का रोना-धोना..रूठना-मचलना...गुस्सा करना कुछ नहीं सुना..उसका डॉल  हाउस फेंकने की धमकी दी...और आखिर में उसका खाना-पीना..बाथरूम जाना भी बंद कर दिया....कुछ घंटो के बाद लुइज़ा ने वो धुन बिलकुल सही तरीके से बजायी...और सब कुछ भूल कर खुश हो कर चिल्लाई..."मॉम कितना आसान था यह "  और जब उसने स्कूल के स्टेज पर वह धुन बजायी  तो उसे पुरस्कार भी मिला..सबने तारीफ़ भी की और आश्चर्य किया की इतनी छोटी लड़की ने इतनी अच्छी धुन कैसे बजायी. एमी चुआ का कहना है कि पैरेंट्स बच्चों पर जबरदस्ती नहीं करके उनका ही अहित करते हैं.

पुस्तक में तमाम ऐसी बातें हैं...जो हम अपने देश में हम देखते सुनते आए हैं...पर अब हम सब भी इन्हें गलत  मानते हैं...बच्चों की इच्छा..उनकी आज़ादी को ही सर्वोपरि  मानते हैं..और उनपर सख्ती के खिलाफ है. पर एक सच यह भी है कि हमारे यहाँ भी नृत्य-संगीत-पढाई में जिन्होंने उंचाई हासिल की है...उनका बचपन भी ऐसी ही कठिनाइयों से गुजरा है. गायक 'अमीर खाँ' ने कहा था 'उनके अब्बा कड़कती ठंढ में भी सुबह चार बजे रियाज़ करने के लिए उठा देते थे'. हर संगीतसाधक के पास ऐसे ही अनुभव हैं. हेमा मालिनी ने भी एक इंटरव्यू में कहा कि जब शाम को सारे बच्चे पार्क में खेलते तो वे नृत्य का अभ्यास करती थीं..वे कभी भी और बच्चों की तरह बेफिक्र होकर खेल नहीं पायीं और उन्हें इसका आज भी अफ़सोस है.

एमी चुआ की इस पुस्तक को एक सनकी माँ का क्रिया-कलाप सोचकर खारिज नहीं किया जा रहा बल्कि इस पुस्तक की समीक्षा अमेरिका के अखबारों में छप रही है. इस पर बहस की जा रही है.   Wall Street Journal   में इस पुस्तक पर छपे आलेख के पक्ष और विपक्ष में काफी प्रतिक्रियाएँ आयीं. Wall Street Journal   ने एक  poll करवाया जिसमे दो तिहाई लोगो का मत था कि '  “Demanding Eastern” parenting model is better than the “Permissive Western” model.
American Enterprise Institute के  Charles Murray का कहना है.." "बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली बच्चे एमी चुआ के इस तरीके से लाभान्वित होंगे. वे अच्छे बच्चे हैं...पर वे अपनी प्रतिभा को गंभीरता से नहीं लेते और ईश्वर का दिया हुआ वरदान यूँ ही गँवा देते हैं. "

The Daily Telegraph: का कहना है कि एमी चुआ के तरीके बहुत ही क्रूर लगते हैं पर बच्चे टी.वी. देखकर जो समय बर्बाद करते हैं क्या वह ठीक है??
Times  और Psychology Today   ने भी एमी चुआ के तरीके को सही ठहराया है ...

कई अखबारों ने इसकी आलोचना भी की है. New York Times और Washington post ने लिखा है कि पंद्रह साल की लड़की के अचीवमेंट्स को देख कर कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी. कई अखबारों ने इसकी आलोचना की है और उन बच्चियों से सहानुभूति जताई है. इसके प्रत्युत्तर में एमी चुआ की बेटी 'सोफिया 'ने Washington post   में एक खुला पत्र लिखा जिसमे लिखा है..."I love the relationship I have with my mother; she's one of my best friends, and I respect her. And when I grow up, I'll probably be a Tiger Mom too. If I died tomorrow, I would die feeling I’ve lived my whole life at 110 percent. And for that, Tiger Mom, thank you.”

भारत में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भी 'एमी चुआ को आमंत्रित  किया  गया था...मधु त्रेहन ने उनसे बातचीत की थी...जब एमी चुआ ने दर्शकों से पूछा कि हाथ उठाएँ कितने लोगो ने अपने माता-पिता के हाथों मार खाई है तो ज्यादातर लोगो ने हाथ उठा दिए. एमी चुआ के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी. निश्चय ही अपने तरीके का  प्रचलन देख कर अवश्य उन्हें बहुत ख़ुशी हुई होगी. .परन्तु  दोनों ही तरीके अति सख्ती और बिलकुल स्वच्छंद  छोड़ देना...पर अमल करना बेहद आसान है. मुश्किल तब आती है जब दोनों में सामंजस्य स्थापित करने की बात आती है. कितनी ढील दी जाए और कहाँ पर सख्ती बरती जाए...ऐसी पैरेंटिंग बिलकुल तलवार की धार  पर चलने के सामान है. 

पर यह विडंबना ही है कि एक तरफ अपने बच्चों पर इतनी सख्ती किए जाने की बात खुलेआम स्वीकार करने पर बड़े बड़े अखबारों में उसपर बहस होती है ..लोग उसके पक्ष और विपक्ष में प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करते हैं. और दूसरी तरफ नार्वे में बसे एक भारतीय दंपत्ति के बच्चे इसलिए उनसे दूर कर दिए जाते हैं कि वे एक साल की  बच्ची को अपने हाथ से खिलाकर force feeding  कर रहे हैं...और तीन साल के बच्चे को अपने साथ सुलाकर उनके स्वाभाविक विकास में बाधा पहुंचा रहे हैं.

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