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मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

कॉन्फिडेंट कैप्टन का कूल व्यवहार


किसी ने पूछा, "वर्ल्ड कप की जीत पर कोई पोस्ट लिख रही हैं ??" ...और मैने कह दिया...."बचा क्या है लिखने को??..एक एक मिनट की सचित्र खबर तो अखबार..टी.वी...नेट ...ब्लॉग हर जगह छाई हुई है." कोई इरादा भी नहीं था, कुछ लिखने का पर जैसी कि आदत है...कहीं कुछ अच्छा पढ़ती हूँ तो परिवार वालों को वो आर्टिकल पढ़ने को कहती  हूँ...दोस्तों को एस.एम.एस. करती हूँ...फिर  अपने ब्लॉग पर शेयर करना, उस पूरे आर्टिकल को दुबारा  पढ़ने के सामान ही है.

Mumbai Mirror 
में प्रसिद्द मनोचिकित्सक हरीश शेट्टी ने धोनी की फाइनल में खेली पारी का बहुत ही अच्छा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है....जो सबके लिए उदाहरणस्वरुप है कि संकट के समय, अपना व्यवहार कैसे संयत रखें.

आलोचना को अपनी प्रेरणा बना लें -----  20-20 वर्ल्ड कप के प्रेजेंटेशन सेरेमनी में धोनी ने रवि शास्त्री  से एक मुस्कराहट के साथ कहा, " I remember u called us underdogs and so we have won the cup for you."  यहाँ एक खिलाड़ी, वरिष्ठ खिलाड़ी के कटाक्ष  के वजन के नीचे धराशायी नहीं  हुआ बल्कि उसे सकारात्मक तरीके से लिया और कुछ कर दिखाने के लिए कमर कस ली. अगर कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति, आपकी काबिलियत नहीं समझें और आपकी सफलता पर शक करे. तो अपने अंदर के डर, गुस्सा, दुख और उदासी पर विचार करें(get in touch with your feelings of fear, dread,anger or sadness and convert these into greater resolve)  और उनपर विजय प्राप्त कर सकारात्मक परिणाम की कोशिश करें. बचपन में सचिन तेंडुलकर भी तब तक बेचैन रहते थे..जब तक वे टेबल टेनिस में अपनी हार का बदला  अपने दोस्तों से नहीं ले लेते थे. युवराज के बारे में भी एक कार्यक्रम में उनके एक दोस्त ने बताया कि एक बार गर्मी की  छुट्टियों में आए उनके चचेरे भाई ने उन्हें टेबल-टेनिस में हरा दिया...युवराज ने पूरे साल  मेहनत की और अगली छुट्टियों में जैसे ही उस भाई से मिले...उसे एक मैच का न्योता दे   डाला और उसे हरा कर ही दम लिया.

बीती ताहि बिसार दे..आगे की सुधि ले
  --- जब भी भारत कोई मैच हारता है...धोनी पब्लिक में उस हार की जिम्मेवारी खुद ले लेते हैं पर फिर वे तुरंत ही आगे की सोचने लगते हैं. एक मैच हारने के बाद पत्रकारों को उनका जबाब था, " ये मैच तो ख़त्म हो गया...अब अगले मैच का प्लान करें ?" पहले के कैप्टन....कोई मैच हारने  पर हार के कारणों की मीमांसा करते थे...कहाँ गलती हुई...इन्ही पर सोचते रहते  थे और कई बार पिच और मौसम को दोषी ठहरा देते थे पर  धोनी....अगले  मैच की  सोचते हैं और हार और निराशा को अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने  देते .अगली मंजिल पर फ्रेश दिमाग और फ्रेश निगाहों से कदम बढाते हैं. जब चीज़ें सही ना हों तो खुद की या दुसरो की बहुत ज्यादा आलोचना नहीं करनी चाहिए, इस से शिथिलता आती है.

मैं नहीं हम
---- जीत के दिन वर्ल्ड कप सबके हाथों  में था...सिवाय धोनी के . कुछ साल  पहले एक टेस्ट सिरीज़ में जीत के बाद धोनी ने अनिल कुंबले से विजयी  कप ग्रहण करने का आग्रह किया था. विश्व कप में भी शरद पवार के हाथों से कप लेते ही धोनी ने सचिन के हाथों में थमा दिया...और किनारे चले गए. हर  फोटो  में  वे किनारे ही खड़े हैं..केंद्र में नहीं. स्टेडियम  का चक्कर लगाते हुए भी वे पीछे-पीछे ही थे. पर जब टीम  मेट्स की कोई बात अच्छी नहीं लगती तो उसे कहने से भी नहीं हिचकते.... जैसे  कि गौतम का शतक  के इतने पास आकर एक ख़राब शॉट के कारण चूक जाना उन्हें अच्छा नहीं लगा तो कहने में नहीं हिचके.." he was himself to blame for this "
  प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा है .."मिडिल ऑर्डर को परफॉर्म करना चाहिए " या " श्रीसंत  को अपने व्यवहार पर काबू रखना चाहिए " और यह सब वही कह सकता है जो अपने टीम मेट्स को भरपूर प्यार भी दे. तभी उनके साथी  उनकी बातों का बुरा नहीं मानकर ,अपनी गलतियाँ सुधारने की कोशिश करते हैं.

दिमाग शांत रखें
---- सब जानते हैं धोनी कभी गालियाँ नहीं देते...या फील्ड पर अपना आपा नहीं खोते . धोनी को खुद से बातें करते देखना रोचक होगा. शायद वे खुद से मन ही मन कहते हों, 'calm down.' focus now', 'let me try something new ' इस तरह के इमोशंस उनके मन के स्क्रीन पर आते-जाते रहते होंगे.  जब बुरा समय हो तो बस अपनी भावनाओं को observe  करना चाहिए. अगर आप चिल्लाते हैं और गुस्सा दिखाते हैं..इसका अर्थ है आपके इमोशंस ने आपको हाइजैक कर लिया है और अपने दिमाग पर आपका वश नहीं है. आप अपनी लड़ाई और अपना मित्र, शुभचिंतक  सब हार सकते हैं. और अगर अपनी भावनाओं  पर काबू रखते हैं तो परिणाम हमेशा अच्छे ही होते हैं. 
जीत पर सबकी प्रशंसा पाकर भी, उन्हें याद रहता है कि अगर हार गए होते तो उनके प्रशंसक क्या कह रहे होते. अभी हाल की पकिस्तान से मिली जीत पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, "सुना है मेरे घर के सामने लोग आतिशबाजी छोड़ रहे थे....यही लोग कुछ साल  पहले हमारी टीम की  हार पर मेरे गेट पर कालिख पोत गए थे "

खुद पर भरोसा करें
----- धोनी ने रवि शास्त्री को जैसे टीज़ करते हुए कहा...""अभी अगर हम हार गए होते तो सवाल होते, "श्रीसंत  क्यूँ..."युवराज के पहले बैटिंग क्यूँ की ...??"  ख़राब फॉर्म के बावजूद धोनी का युवराज के पहले बैटिंग के लिए आना यह दिखाता  है कि वे चुनौती स्वीकार करते हैं और दूसरों की सलाह की  या लोगो की प्रतिक्रिया क्या होगी...ये सोचने के बजाय अपने फैसले पर ज्यादा भरोसा करते हैं. अनिल कुंबले ने भी कहा था..."जब उनका फॉर्म अच्छा नहीं होता तो उन्हें कई सारी सलाह दी जाती थी पर वे सबको इग्नोर कर अपने फैसले के ऊपर ही मजबूती से डटे रहते थे."   
शायद धोनी का मन्त्र भी है...'रिस्क लो..अपने मन की सुनो और शांत रहो..'.

आभार ---  धोनी खुले दिल से किसी का भी आभार  प्रकट करते हैं. वे चाहते तो सारा क्रेडिट खुद ले सकते थे. कि युवराज से पहले बैटिंग का फैसला सिर्फ उनका था  पर उन्होंने कहा, गैरी क्रिस्टिन  ने मेरे युवराज के पहले बैटिंग करने के निर्णय में हामी भरी ..' और उन्होंने गैरी और पैडी  को दिल से धन्यवाद दिया. आभार प्रगट करने से उनका क्रेडिट तो उनके साथ रहा ही...पर उनकी दरियादिली और विनम्रता ने सबके दिलो में उनकी थोड़ी इज्जत और बढ़ा दी.


यह सब कोई अनोखी बात नहीं है...और ना ही किसी ने पहली बार सुनी है..पर आँखों के सामने किसी को इन सबका  सहारा लेकर सफलता के सर्वोच्च  शिखर पर देखना एक अलग ही अनुभव है.


Garry Paddy  जो टीम के मेंटल  कंडिशनिंग कोच थे...उन्होंने भी गौतम गंभीर...लक्ष्मण और धोनी का नाम लिया कि ये लोग संकट में ज्यादा मजबूत होकर उभरते हैं.

शोभा डे ने हमेशा की तरह चटपटे अंदाज़ में अपने ब्लॉग पर लिखा है..."MSD का नशा LSD के नशे से कही  बेहतर है. धोनी के सुपरस्टार का रुतबा सारे बॉलिवुड के हीरो के रुतबे को मिलाने के बाद भी  उनसे बड़ा है. हमें कोई बॉलिवुड सुपरस्टार क्यूँ चाहिए अगर हमारे पास Red Hot Dhoni  है. Dhoni has everything going for him – good looks, a cool head, sex appeal, and exceptional leadership qualities. धोनी को कप ग्रहण करते हुए सब याद रखेंगे...पर उस से ज्यादा ये याद करेंगे  कि कैसे  उन्होंने  वो कप सचिन तेंडुलकर को सौंप  दिया और खुद जाकर किनारे खड़े हो गए,  जैसे कोई बारहवें खिलाड़ी हों. जबकि शायद दूसरा कोई अभिमानी व्यक्ति होता तो पूरे समय केंद्र में खुद होता और दरियादिली दिखाते हुए , कहता  कि "मैं यह सब अपने टीम के बगैर नहीं पा सकता था..." लेकिन धोनी ने शब्दों की बजाय अपने एक्शन पर ज्यादा ध्यान दिया. और बिना बोले ही जता दिया कि अपनी टीम से कितना प्यार है और कितना भरोसा था. यह क्षण  धोनी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण था पर इसका रसास्वादन उन्होंने अकेले नहीं...अपने दोस्तों के साथ करना ज्यादा जरूरी समझा. और उनकी यही दरियादिली सारे क्रिकेट प्रेमी का चहेता बना देती है."

विदेशी अखबारों ने भी धोनी की प्रशंसा की  है...लंदन के
The Telegraph ने लिखा है " Dhoni is Mr. confident. But even more so he is cool. He exudes a kind of Karma under the most intense stress. You see it everywhere ,behind the stumps, in press conference, at the crease"

ऑस्ट्रेलिया के अखबार 
The Age में छपा है , " In the critical  hour, and despite modest returns, Dhoni dared to back himself.That is leading from the front.Even in the toughest time,too he managed to convey composure. Throughout, his players felt that captain remained on the bridges and the situation was under control.

ये सब लिखते वक्त
'अदा' याद आ रही है....जब भी बात होती है जरूर कहती है...."रांची के पानी में ही कोई बात है" (अदा का घर रांची है और मेरा ननिहाल भी रांची ही है...जहाँ मेरा जन्म और प्रारंभिक शिक्षा  हुई है  )

हाँ!! अदा...रांची के पानी में ही कोई बात है :):)

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