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रविवार, 20 फ़रवरी 2011

वे ठिठके पल...

देर तक  मुट्ठी  में बंद, उस 
चिपचिपी चॉकलेट का स्वाद
गेट से लौटती  नज़र
घड़ी की टिकटिक और 
कदमों तले चरमराते 
सूखे पत्तों की आवाज़

वो बेख्याली में आ जाना
परेशान करती,
सूरज की किरणों के बीच
और मेरे चेहरे से उछल कर
तुम्हारे काँधे पर जा बैठना 
खरगोश के छौने सा
उस  धूप के टुकड़े का
जरा सी तेज आवाज
और हडबडा कर,  उड़ जाना
उस पतली डाल से
झूलती बुलबुल का

नामालूम सा
अटका....पीला पत्ता
निकाल  देना बालों से
अनजाने ही,ले लेना
भारी बैग...हाथों से 

ठिठका पड़ा है वहीँ, वैसा ही  सब

अंजुरी में उठा, 
ले आऊं उन लमहों   को
पास  रखूँ
बतियाऊं उनसे, दुलराऊ उन्हें
पर वे उँगलियों  से फिसल 
पसर  जाते हैं, फिर से
उन्हीं लाइब्रेरी  की सीढियों पर

नहीं आना उन्हें,
इस सांस लेने को 

ठौर तलाशती
सुबह-ओ-शाम में
नहीं,बनना हिस्सा
कल के सच का
झूठे  आज में

सिर्फ
आती है,खिड़की से, हवा की लहर
लाती है
अपने साथ
हमारी हंसी की खनक
नल से झरझर बहते पानी में
गूंज जाता  है,
अपनी बहस का स्वर 

गैस की नीली लपट से 
झाँक जाती है, 
आँखों की शरारती चमक
 

सब कुछ तो है,साथ
वो हंसी..वो बहस...वो शरारतें
फिर क्या रह गया वहाँ..
अनकहा,अनजाना,अनछुआ सा
किस इंतज़ार में....

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