(पिछली पोस्ट में आप सबने लावण्या शाह जी, रंजू भाटिया, रचना आभा, स्वप्न मञ्जूषा 'अदा' एवं सरस दरबारी जी के रोचक संस्मरण पढ़े ...आज अपनी यादों के झरोखे खोल मीठी मीठी यादें समेट लाई हैं कविता एवं वन्दना .)
कविता वर्मा : किसने किसने खेली है, ये दो मिनट वाली होली :)
शादी के बाद पहली होली ,वैसे तो हमारी सगाई और शादी के बीच डेढ़ साल का फासला था इस बीच होली भी पड़ी .लिफाफे में गुलाल भेज कर मैंने पतिदेव को जता ही दिया था की मुझे होली खेलना बहुत पसंद है .उन्हें भी रंगों का ये त्यौहार बहुत पसंद है .
कविता वर्मा : किसने किसने खेली है, ये दो मिनट वाली होली :)
शादी के बाद पहली होली ,वैसे तो हमारी सगाई और शादी के बीच डेढ़ साल का फासला था इस बीच होली भी पड़ी .लिफाफे में गुलाल भेज कर मैंने पतिदेव को जता ही दिया था की मुझे होली खेलना बहुत पसंद है .उन्हें भी रंगों का ये त्यौहार बहुत पसंद है .
शादी के बाद पहली होली का हम दोनों को ही इंतज़ार था .उस समय हम इंदौर से बीस किलोमीटर दूर एक गाँव में थे जहाँ उनकी पोस्टिंग थी .बाकी पूरा परिवार इंदौर में था तो हर छुट्टी तीज त्यौहार पर इंदौर आना जाना लगा रहता था . होली भी इंदौर में ही मनानी थी इसलिए सुबह जल्दी ही बाइक से इंदौर जाना तय हुआ . हाँ जाने से पहले हमने एक दूसरे को गुलाल जरूर लगाईं ,और पहली होली के साथ प्यार का रंग गालों पर बिखर गया . लेकिन होली के शौकिनो के लिए इतनी होली तो काफी नहीं थी . लेकिन बाइक से जाना था इसलिए मन मसोस कर रह गए .
हमारे परिवार में होली का बहुत ज्यादा शौक किसी को नहीं है लेकिन फिर भी तय हुआ की पहले खाने की तैयारी कर ली जाये फिर होली खेलेंगे . मन तो होली खेलने के लिए मचल रहा था लेकिन फिर भी खाना बनाया गया .सिर्फ पूरी गर्म गर्म बनाने के लिए छोड़ दी गयी उसके लिए आटा लगा कर रख दिया . इस बीच "ये " अन्दर बाहर होते रहे और जैसे ही देखा खाने की तैयारी हो गयी होली शुरू हो गयी .दोनों ननद ,देवर ,जिठानी सभी को रंग लगाया तभी छोटी ननद ने पानी से मुंह धोया और आकर बोली देखो भाभी रंग तो चढ़ा ही नहीं .मैंने दूसरी बार उसे रंग लगाया जिसे उसने पानी से धो दिया और हंसने लगी .जब हम खाना बना रहे थे दोनों ननदों ने हाथ पैर चेहरे पर खूब सारा तेल लगा लिया था जिससे रंग चढ़ ही नहीं रहा था . जबकि रंग लगाने के चक्कर में मेरे हाथ ज्यादा रंग गए थे .
मैंने चुपके से अपने हाथ पर साबुन लगाया और पीछे से जाकर ननद के चेहरे पर मल दिया साथ ही हिदायत दी की साबुन लगा रही हूँ आँखें मत खोलना .साबुन से चेहरा धोकर अब मैंने पक्का रंग हाथ में लिया और उनके चेहरे पर लगा दिया .उसके बाद तो हमने पानी से खूब होली खेली ,लेकिन सबके बीच में भी हम दोनों ने एक दूसरे को तो रंग लगाया ही नहीं था .हम बस हसरत से एक दूसरे को देख रहे थे .एक बार रंग लगा कर गले लगने की इच्छा दोनों की ही आँखों में तैर रही थी .होली तो लगभग ख़त्म हो चुकी थी सब स्नान की तैयारी में लग गए .ऐसा लगा कि हमारी पहली होली ऐसे ही रह जायेगी .मैं उदास सी आँगन में खड़ी थी तभी इन्होने ने मुझे कमरे के पीछे के कोने में खींच लिया और ढेर सारा रंग लगा दिया मेरे पास रंग तो था नहीं तो अपने गाल से इनके गाल पर रंग लगा कर हम एक दूसरे के गले लग गए लेकिन कोई आ न जाए का डर भी था .दो मिनिट वाली उस होली के लिए हुए इंतज़ार ने पहली होली को यादगार बना दिया .
वंदना अवस्थी दुबे : जो रोगी को भाये, वही वैद्य फरमाए
रश्मि, तुम्हारा मेल मिला तो खूब खुश हुई. लगा खूब मज़े ले के लिखूंगी. झट पिछले चौबीस साल रिवाइंड कर डाले
आंखें बन्द कीं, और पच्चीस नवम्बर 1988 में पहुंच गयी. पन्ने पलटते गये, पलटते गये, लेकिन ये क्या? एक भी मज़ेदार घटना नहीं निकली?? 

ये कैसी ज़िन्दगी है, जिसमें देखा जाये तो आनन्द ही आनन्द है, लेकिन रोचक घटना एक भी नहीं!!! 
लड़कियों की शादी की बात चलती है, और कई दिनों तक घर में आने वाले रिश्तों पर सभा बैठती रहती है, जैसा मेरी दोनों दीदियों की शादी के समय हुआ, लेकिन मेरी शादी! मेरा रिश्ता ढूंढने पापा को कहीं जाना ही नहीं पड़ा. उमेश जी ( मेरे पतिदेव) के मामाजी मेरे पापा के सहकर्मी थे, और उनका रोज़ ही मेरे घर आना होता था. एक दिन उन्होंने ही अपने भांजे को मेरे लिये सुयोग्य वर घोषित कर दिया
और मैं तमाम तस्वीरों में से वर चुनने के सुख से वंचित रह गयी 
विदा हो के ससुराल आई तो यहां अलग ही आभिजात्य था. मेरा मायका साहित्य और संगीत का अखाड़ा था तो यहां पूरा का पूरा प्रशासनिक अमला था 

सबको अपने पद की गरिमा का पूरा खयाल था, या पद के मुताबिक अनुशासित रहने की आदत हो गयी थी. लोग मुस्कुराते भी होंठों की कोरों से. खुल के हंसना मना हो जैसे
. लगा कहां आ गयी मैं? सबने हाथोंहाथ लिया, जरूरत से ज़्यादा खयाल रखा गया नयी दुल्हन का, इतना खयाल की मैं उकता गयी
खैर, जब घर मेहमानों से खाली हुआ तो कुछ ताज़ा हवा भी आनी शुरु हुई. दो देवर, दोनों आज्ञाकारी . मेरे आगे-पीछे घूमते, केवल इसलिये, कि पता नहीं कब भाभी को उनकी जरूरत पड़ जाये. तीन महीने बाद ही होली थी. तमाम लोगों से उनकी होली के अनुभव सुने थे, सो मन डरा हुआ था. डर इसलिये भी था, कि मुझे होली खेलना एकदम पसन्द नहीं. लगा कि अगर यहां मेरे साथ होली हुई तो रंग कैसे छुड़ाउंगी?
घर का माहौल और दोनों देवरों के रवैये से हांलांकि मुझे किसी शैतानी की उम्मीद नहीं थी. छोटा कुक्कू मुझसे एक साल छोटा है, जबकि नीलू भैया मुझसे चार साल बड़े हैं. लेकिन रिश्ते में मैं बड़ी हूं, सो कभी पलट के मेरी बात का जवाब नहीं देते थे, आज भी नहीं देते.
तो मामला होली का था. जिस रात होलिकादहन था, उस दिन मैं बड़ी परेशान. कैसे पता लगाऊं कि यहां होली खेली जायेगी या नहीं? आखिरकार मैने ही बात शुरु की-
" नीलू भैया, आप लोग होली खेलते हैं क्या?"
नीलू भैया का गोरा चेहरा फीका पड़ने लगा, धीरे से पूछा- " आपको होली खेलना पसन्द है क्या?"
मैने तपाक से कहा- अरे न. एकदम नहीं. कोई मुझे रंग लगाये, ये मुझे पसन्द ही नहीं. अब क्या था! नीलू भैया की बांछे खिल गयीं. बोले- "भाभी मैं दो-तीन दिन से सोच रहा था, कि मुझे तो होली खेलना पसन्द ही नहीं. भैया भी नहीं खेलते. आपको पसन्द होगा तो आप क्या सोचेंगीं? अब मैं निश्चिंत हुआ. क्योंकि हम दोनों को ही होली पसन्द नहीं
मुझे तो लगा जैसे मुंह मांगी मुराद पूरी हो गयी. घर का आभिजात्य अचानक रास आने लगा
अगले दिन होली था, नीलू भैया, उमेश जी, कुक्कू, पापा सब फ़िल्मी स्टाइल में सफ़ेद कुर्ता-पज़ामा पहने घूम रहे थे, और मैं आराम से दूसरों की होली देख रही थी
रंगे-पुते लोगों को देख के मज़ा ले रही थी कि जाओ बेटा, जब नहाओगे तब नानी याद आयेगी 


(अगली पोस्ट में कुछ और मजेदार संस्मरण )