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मंगलवार, 8 नवंबर 2011

परकटे नन्हे परिंदे

रचना जी ने अपनी पोस्ट में 'बाल मजदूरी' के मुद्दे पर चर्चा की है...पहले भी मैने इस विषय पर लिखा है...और आज भी  मन में कुछ सवाल सर उठा रहे हैं...आखिर, बच्चे अपने खेलने-कूदने ..पढ़ने-लिखने के दिनों में ये सोलह घंटे का श्रम और अमानवीय स्थिति में जिंदगी गुजारने को क्यूँ मजबूर हो जाते हैं?

उन्हें काम पर रखने वाले दोषी हैं...तो क्या उनके माता-पिता का कोई दोष नहीं जो उन्हें इस कच्ची सी उम्र में काम के बोझ तले दब जाने को मजबूर कर देते हैं?? गरीबी एक बहुत बड़ा कारण तो है ही...पर उस से भी ज्यादा मुझे लगता है...उनके बीच जागरूकता की कमी...और पढ़ने-लिखने की सुविधा का अभाव भी एक वजह  है.

कई बार गाँव के गरीब लोग अपने बच्चों को नौकर के रूप में इसलिए रखवाते  हैं कि वो एक अच्छे परिवार के संसर्ग में रहेगा. मैने खुद देखा है...कितनी ही बार लोग खुद अपने बच्चे को लेकर आते थे और कहते थे..'सारा दिन सडकों पर  बाग़-बगीचों में घूमता रहता है...आपलोगों के साथ रहकर कुछ सीख जाएगा" खैर, मैं ये नहीं कहती कि इसके पीछे पैसों का लालच नहीं होगा...लेकिन माता-पिता की ये चिंता भी रहती है कि...ये गाँव में खाली बैठा अपना समय बर्बाद कर रहा है. अगर गाँवों में बच्चों के स्कूल जाने की व्यवस्था हो....स्कूल में शिक्षक हों..और वहाँ सचमुच पढ़ाई होती हो. बच्चों के माता-पिता को ये विश्वास दिलाया जाए कि बच्चा-पढ़ लिख कर आपसे बेहतर जिंदगी जी सकेगा..उनके सामने ऐसा कोई उदाहरण भी हो ..जहाँ उनके बीच का कोई बच्चा पढ़-लिख कर अच्छी जिंदगी बसर कर रहा हो  तो ये तस्वीर बदल सकती है. और अगर सरकार की mid day meal की व्यवस्था सुचारू रूप से कार्यान्वित की जाए तो इस समस्या का शत प्रतिशत हल निकल सकता  है.

गरीब लोग सिर्फ गाँव में ही नहीं..शहर में भी हैं. मुंबई की झुग्गी झोपड़ियों में गाँव से आकर ही बसे हुए हैं . मानव-स्वभाव की तरह लालच इनमे भी होगा...ये भी अपने बच्चे को काम पर लगा पैसे पाने की सोचते होंगे. पर इनकी सोच में बदलाव आ चुका है. यहाँ, ज्यादातर सब अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ाने की कोशिश करते हैं. बच्चों के लिए ट्यूशन रखते हैं...अगर उनकी पढ़ने में रूचि रही और उन्होंने अच्छा रिजल्ट लाया तो उन्हें कॉलेज में भी पढ़ाते हैं. क्यूंकि उनमे ये जागरूकता आ चुकी है कि बच्चे अगर पढ़-लिख गए तो उनकी जिंदगी संवर जायेगी . यहाँ ,बच्चों को स्कूल की सुविधा है....जहाँ पढ़ाई भी होती है.

मनुष्य गरीब हो या अमीर..हमेशा अपनी संतान के लिए एक अच्छी जिंदगी का सपना देखता है..अपवाद हो सकते हैं..पर हर गरीब अपने बच्चों को सिर्फ धनोपार्जन का एक जरिया नहीं समझता. अगर उनके सामने बेहतर विकल्प रखे जाएँ तो वे कभी अपने बच्चों से किसी भी किस्म  की मजदूरी करवाने को तैयार नहीं होंगे.

लेकिन सारी सरकारी योजनायें कागजों पर ही रह जाती हैं या फिर सिर्फ नाम के लिए इनका कार्यान्वयन होता है. कितने ही स्कूल कागज़ पर ही हैं...उस स्कूल में बच्चों का भी जिक्र रहता है और शिक्षक हर महीने तनख्वाह भी ले जाते हैं. 'मिड डे मील' की व्यवस्था है..पर बच्चों को खाने में कंकड़-पत्थर..कीड़ों से भरे चावल दिए जाते हैं.छात्रवृत्ति की भी योजना है पर पता नहीं सही पात्रों को वो मिलती भी है या समर्थ लोग तिकड़म लगा..वो भी हड़प कर जाते हैं. 

आंकड़े बताते हैं...हमारे देश में,  एक करोड़ से भी ज्यादा बाल श्रमिक हैं. करीब पच्चीस साल पहले ही 'बाल श्रम 'के विरुद्ध कानून बन चुका है...पर उस समय से बाल श्रमिकों की संख्या में  १५% की वृद्धि ही हुई है. बाल श्रम के विरुद्ध कानून बना कर कुछ नहीं किया जा सकता...जब तक गाँवों को विकसित नहीं किया जाएगा...वहाँ भरण-पोषण और पढ़ने -लिखने की सुविधा नहीं मुहैया करवाई जायेगी...ये बाल मजदूरी का कलंक हमारे समाज के माथे पर विद्यमान रहेगा.


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