Sunday, July 14, 2013

क़ानून को बदला लेने का हथियार न बनाएं


हाल में ही  एक ऐसी खबर पढ़ी जिसे पढ़कर सुकून आया . आजकल कई केस ऐसे देखने में आ रहे हैं जहां लड़के लडकियां लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते हैं. और झगडे, ग़लतफ़हमी किसी भी वजह से आपसी अफेयर  ख़त्म हो जाता है तो लड़की, लड़के के ऊपर रेप का केस दर्ज कर देती है. पुलिस तो नियम के तहत बंधी है, वो लड़के को गिरफ्तार कर लेती  है और इस अपराध में जमानत भी नहीं होती . लड़के को जेल जाना पड़ता है. 

बॉम्बे हाई कोर्ट की जज साधना जाधव ने  ३९ वर्षीय मनेश कोटियन को उनपर तीन साल पहले लगे रेप  चार्ज से विमुक्त कर दिया है ...और तीन साल के बाद उन्हें जेल से रिहा करने के आदेश दे दिए गए हैं. महेश कोटियन का एक लड़की के साथ अफेयर था ,लड़की प्रेग्नेंट भी हो गयी पर फिर उनका सम्बन्ध टूट गया और लड़की ने मनेश पर केस कर दिया, और वे गिरफ्तार हो गए. 

मनेश पर धोखाधड़ी का मुकदमा कायम है क्यूंकि उन्होंने अपने शादी-शुदा और तीन बच्चे होने की बात छुपाई थी. लड़की से पूरी सहानुभूति होते हुए भी उसे दोषमुक्त नहीं कहा जा सकता .गलती उसकी भी बराबर की है क्यूंकि अदालत ने भी इस बात का उल्लेख किया है कि वह चीखी चिल्लाई नहीं और तुरंत उस पर रेप चार्ज नहीं लगाया बल्कि आपसी सम्बन्ध बिगड़ने के बाद  लगाया ,इसलिए लड़के को दोषी नहीं माना जा सकता.

ज़िया खान की ख़ुदकुशी से बहुत दुःख हुआ. एक उभरती हुई ज़िन्दगी असमय ही कालग्रसित  हो गए. पर जिया की  आत्महत्या के  लिए 'सूरज पंचोली' को दोषी ठहराना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता.  कच्ची  सी उम्र में उन्हें बीस दिन जेल  की सलाखों के पीछे रहना पड़ा. किस अपराध के तहत ?? अगर प्यार करने का अपराध  था तो ये दोनों ही भागीदार थे. सूरज ने अपनी ज़िन्दगी, जिया के नाम नहीं लिख दी थी कि उसके इशारों पर चले. क़ानून दोषियों को सजा देने के लिए बनाए जाते हैं न कि निरपराधों को परेशान करने के लिए.


एक लड़के और उसके परिवार की पीड़ा बहुत पास से देखी  है, मेरी एक परिचिता के छोटे भाई की शादी हुई पर दोनों की आपस में  नहीं बनी .दोनों ने  डिवोर्स का फैसला ले लिया पर केस तो सालों चलते हैं. इस बीच लड़के ने एक लड़की के साथ मिलकर कोई बिजनेस शुरू किया . दोनों के बीच  प्यार हुआ पर वह लड़की से शादी नहीं कर सकता था क्यूंकि डिवोर्स की कार्यवाई पूरी नहीं हुई थी और उसे अभी डिवोर्स नहीं मिला था. दोनों लिव-इन रिलेशन में रहने लगे . चार साल साथ रहने के बाद उनके आपसी  सम्बन्ध खराब हुए और उस लड़की ने लड़के के ऊपर रेप चार्ज लगा दिया. पुलिस ने लड़के को गिरफ्तार कर लिया. उस लड़की ने मेरी परिचिता ,उसके पति और  और उनके  बच्चों  का नाम भी पुलिस में दे दिया था (डोमेस्टिक वायलेंस या ऐसा ही कुछ चार्ज होगा ) परिचिता  के पति ने पुलिस को पचास हज़ार रिश्वत देकर अपने परिवार का नाम हटवाया. और इस बीच दस दिन तक एक अपराधी की तरह पूरा परिवार पुलिस से छुपता रहा . महीनों जेल में रहा वो लड़का. उसके क्लास वन ऑफिसर पिता जिन्हें रिटायरमेंट के बाद जहां सुकून से अपनी ज़िन्दगी बितानी चाहिए थी. नियमित रूप से बेटे से जेल में मिलने जाते. उनके घर में मातम का माहौल था . फिर आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट हुआ. उस लड़की को अच्छे खासे पैसे दिए गए .तब उसने अपना चार्ज वापस लिया और लड़का जेल से रिहा हुआ .

अगर लडकियां लिव-इन-रिलेशन में रहना स्वीकार करती हैं या फिर प्यार में सारी  सीमाएं तोड़ देती हैं तो उन्हें इस सम्बन्ध के टूटने के अंदेशे  के लिए भी मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए. मात्र अफेयर में होने से  या लिव-इन -रिलेशनशिप  शिप में होने से वे शादी के लिए दबाव नहीं डाल सकतीं . और अफेयर ख़त्म हो जाने कि दशा में लड़के को सजा देने के लिए इस कानून को हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकतीं. 

यह एक बहुत ही जरूरी क़ानून है और हज़ारों लडकियां जो रेप का शिकार होती हैं ,उनके अपराधी को इस क़ानून के सहारे सजा दिलवाई जा सकती है. इस क़ानून को और सख्त बना कर इसका आतंक पैदा किया जा सकता है. लेकिन इसे बदला लेने का हथियार बना ,क़ानून का माखौल नहीं उड़ाने दिया जा सकता. बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला  स्वागतयोग्य है.

44 comments:

  1. बढ़िया उचित आलेख।

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  2. स्वागत योग्य पोस्ट है।

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    1. बहुत दिनों बाद मेरे ब्लॉग का रुख करने के लिए आपका भी स्वागत है

      पर शायद आपको इसलिए यह पोस्ट अच्छी लगी क्यूंकि यह लड़कों/पुरुषों के पक्ष में है.लड्कियों /स्त्रियों के पक्ष में जो पोस्ट लिखी जाती हैं, उन्हें भी उतने ही खुले मन से स्वीकार करना चाहिए.

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    2. जी हाँ, ये सच है कि आपके ब्लॉग पर टिप्पणी बहुत दिन के बाद की है। स्वागत(?) के लिये हार्दिक धन्यवाद।

      मेरे हिसाब से यह लड़कों\पुरुषों के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। मुझे यह पोस्ट अच्छी लगी क्योंकि यह एक बहुत संतुलित पोस्ट थी।
      अंतिम पैराग्राफ़ में आपने लिखा है कि
      ’यह एक बहुत ही जरूरी क़ानून है और हज़ारों लडकियां जो रेप का शिकार होती हैं ,उनके अपराधी को इस क़ानून के सहारे सजा दिलवाई जा सकती है. इस क़ानून को और सख्त बना कर इसका आतंक पैदा किया जा सकता है. लेकिन इसे बदला लेने का हथियार बना ,क़ानून का माखौल नहीं उड़ाने दिया जा सकता. बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला स्वागतयोग्य है’
      यह विशेषरूप से मुझे अच्छा लगा था कि इस लेख में ठीकरा किसी एक पक्ष पर नहीं फ़ोड़ा गया है।
      तदापि यह मानते हुये कि मेरा हिसाब गलत हो सकता है और यह पोस्ट लड़कों\पुरुषों के हक में ही है, अब भी यह एक स्वागत योग्य पोस्ट ही लग रही है।
      ब्लॉगिंग में खुले मन वालों की कोई कमी नहीं है, दो-चार बंद मन वाले रहेंगे भी तो कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। आपने सलाह देने के काबिल समझा, इसके लिये विशेष धन्यवाद।

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    3. ख़ुशी हुई जानकार कि मैंने कोई स्वागत योग्य पोस्ट लिखी और आपको टिपण्णी करने की इच्छा हुई .
      आपका आभार

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  3. samayik aalekh ...sahi kaha aapne logo ne kanoon ko hathiyar bana liya hai jo sarvatha galat hai .
    http://kahanikahani27.blogspot.in/2013/07/blog-post.html

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  4. कानून के बढ़ते दुरूपयोग के कारण वास्तविक पीड़ित न्याय और सहानुभूति से वंचित हो जाते हैं . मैंने अनगिनत बार लिखा है ब्लॉग पर या टिप्पणी में भी , अपने आस पास ऐसे अनगिनत किस्से देखें हैं जहाँ जरा सी कहा सुनी , ग़लतफ़हमी या लालच के कारण पूरे परिवार को घरेलु हिंसा जैसे प्रकरणों में फंसाया गया और पूरा परिवार ही त्रासदी का शिकार हुआ !
    न्याय की आस बनी रहे , इसके लिए दुरूपयोग रोकना आवश्यक है !

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  5. हमेशा अंधे होकर एक ही पक्ष की वकालात करना घातक होता है।

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  6. सबसे पहले जरुरी हैं कानून को समझना
    सूरज पंचोली को सजा क्यूँ हुई इस लिये नहीं क्युकी वो जिया खान और उनका प्रेम का सम्बन्ध था बल्कि इसलिये क्युकी उस प्रेम सम्बन्ध के चलते जिया को गर्भ रह गया और गर्भपात करवाना पडा जिसकी वजह से उसका करियर ख़तम हो गया लेकिन सूरज का करियर शुरू हो रहा था तो उनको इस सम्बन्ध को ख़तम करना बेहतर लगा और उनके रुखे व्यवहार के चलते जिया खुदखुशी के लिये मजबूर हुई यानी abetment to suicide का केस बना जिया की माँ के कहने पर .

    प्रेम करने की सजा समाज हमेशा से स्त्री को ही देता रहा हैं क्युकी गर्भवती स्त्री ही होती हैं . अब कानून प्रेम करने की सजा में पुरुष को "भी" दोषी मानता हैं

    आप की पिछली पोस्ट पर मैने कहा था की "समस्या हैं
    लड़कियों के लिये शादी उनकी "नियति " हैं और जब तक ये रहेगा लडकियां आय अर्जित करने के पश्चात शादी की बाध्यता से बंधी हैं"
    और आप ने कहा था "ये नियति न हो...बाध्यता न हो, लड़के लड़की दोनों की ही अच्छी आय हो फिर भी शादियाँ होती रहेंगी .बस दोनों पार्टनर एक दुसरे की जरूरतों को समझें ,साथ दें तो शादी सफल होगी, वरना टूटती भी रहेंगी या फिर घिसट घिसट कर चलती भी रहेंगी. पर ये वैवाहिक संस्था ख़त्म होने वाली तो नहीं."

    उसी पोस्ट पर एक बहुत अच्छा कमेन्ट था की You all are old in age as well as experience than me.I am looking that you all understanding and admitted marriage as a "sanstha". is it "sanstha"? It is a part of sixteen sanskar which is necessary for completion of life as a household.

    जिस का सीधा अर्थ था की जो लोग गृहस्थ आश्रम भोगना चाहते हैं उनके लिये शादी १६ संस्कारों में से एक हैं . शादी संस्था नहीं हैं .

    लिव इन रिलेशन शिप में अगर पुरुष स्त्री को " शादी " करने का "वादा " करके लाता हैं तो वो अब कानून अपराध ही हैं . भारतीये समाज में स्त्री के लिये शादी जरुरी मानी जाती हैं और इस लिये लिव इन के बाद भी स्त्री उस पुरुष में पति ही देखती हैं और इस लिये वो रेप का चार्ज लगाने के लिये बाध्य हो जाती हैं .

    लिव इन कानून के तहत शीघ्र ही लिव इन पार्टनर को पति पत्नी ही मना जाने वाला हैं यानी पत्नी के सारे अधिकार उस स्त्री के भी होंगे उसके बच्चो का अधिकार भी होगा

    अभी कुछ दिन पहले एक अदालत ने कहा हैं की अगर शारीरिक सम्बन्ध बना हो तो जिन्होने भी बनाया हैं वो पति पत्नी ही हुए अब इस पर बड़ा विवाद हैं .

    रेप की परिभाषा को बहुत विस्तृत कर दिया गया हैं इस लिये जरुरी हैं की अपने आस पास के पुरुष वर्ग को सचेत करे की घुन पिसने से पहले अपने को बचा ले .

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    1. चाहे जिस भी वजह से सूरज पंचोली ने सम्बन्ध ख़त्म किया हो या बेरुखी दिखाई हो,उनपर इस सम्बन्ध को सदा निभाने की कोई बाध्यता नहीं थी .आये दिन रिश्ते बनते हैं और टूटते हैं,कभी लड़की का कुसूर होता है कभी लड़के का पर यहाँ जिया अपनी प्रेगेनेंसी और अबौर्शन के लिए खुद जिम्मेवार थीं. उनकी सहमति के बिना जबरदस्ती की गयी होती तो उसी वक़्त उन्हें पुलिस में रिपोर्ट करनी चाहिए थी और सूरज पंचोली शत प्रतिशत दोषी होते.

      @जिस का सीधा अर्थ था की जो लोग गृहस्थ आश्रम भोगना चाहते हैं उनके लिये शादी १६ संस्कारों में से एक हैं . शादी संस्था नहीं हैं .

      १६ संस्कार क्या क्या हैं यह तो मुझे पता भी नहीं. न ही मैं किसी शब्द के सिर्फ शब्दार्थ पर चर्चा करती हूँ , मेरा मंतव्य उनमें निहित भावार्थ से होता है. आज भी मैं अपनी बात पर कायम हूँ कि शादी करने का रिवाज़ (अब संस्था शब्द का प्रयोग नहीं किया ) पहले भी था (आदिम युग को छोड़कर ) आज भी है और आने वाले दिनों में भी बना रहेगा .

      लिव इन रिलेशन शिप में कोई वादा करके किसी को नहीं लाया जा सकता. न स्त्री को न पुरुष को. दोनों अपनी सहमति से इस रिलेशनशिप में आते हैं. अगर लड़की, लड़के को अपने पति के रूप में देखती है तो यह उनकी बेवकूफी है और उसकी सजा भी वे भुगतती हैं.
      @लिव इन कानून के तहत शीघ्र ही लिव इन पार्टनर को पति पत्नी ही मना जाने वाला हैं

      जब ये क़ानून लागू हो जाएगा तो उसके परिणाम दुष्परिणाम सोच कर ही लोग इस रिश्ते में जायेंगे और अगर नहीं सोचेंगे तो फिर झेलेंगे .


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  7. बात कानून के दुरूपयोग की हैं ही नहीं बात हैं बात सिर्फ इतनी हैं की स्त्री पुरुष समानता को लोग स्वीकार नहीं कर रहे हैं . विदेश में इस तरह के लिव इन बनाने से पहले बाकायदा कॉन्ट्रैक्ट बनता हैं ताकि ना तो रेप का चार्ज हो , ना दौलत का बटवारा . वहाँ स्त्री भी उतनी ही स्वतंत्र हैं ये कॉन्ट्रैक्ट साइन करने के लिये जितना पुरुष क्युकी दोनों के लिये विवाह "संस्था " नहीं हैं और वो विवाह को एक "रिचुअल " मानते हैं यानी एक संस्कार जो आप को गृहस्थ आश्रम में जाने के लिये पूरा करना होता हैं

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  8. अक्सर ऐसा तभी होता है जब दिल और दिमाग के बीच का संतुलन गड़बड़ा जाए.. वैसे आने वाले हर खतरे के लिए तैयार तो नहीं रहा जा सकता लेकिन खुद को मजबूत बनाना भी जरूरी है, बाद में खम्भा नोचना बेकार ही है...

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  9. बडी मुश्किल है. अगर क़ानून लचीला है तो अपराधी किसी न किसी धारा के बहाने छूट जाते हैं . क़ानून कठोर हो तो उसका गलत इस्तेमाल होता है और पुलिस की कमाई का एक अच्छा जरिया.

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  10. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन बेचारा रुपया - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  11. सलाम इस पोस्ट को रश्मि....और हाई कोर्ट के फैसले को भी...
    लड़कियों ने ऐसी बकवास हरकते करके समाज में खुद अपना ओहदा गिराया है.
    न्याय निष्पक्ष होना चाहिए इसमें कोई दो राय नहीं.

    अनु

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  12. @ हमेशा अंधे होकर एक ही पक्ष की वकालत करना घातक होता है।
    अजित जी की इस बात से सहमत हूँ । मुझे लगता है की चुकी आप के परिचित के साथ ऐसा हुआ इस लिए बातो को आप एक ही नजरिये से देख रही है , हम सभी का नजरिया निष्पक्ष नहीं रह जाता जब बात अपने करीबी की हो , हमारी सहानभूति अपने आप अपने परचितो के प्रति हो जाता है और दुसरे हमें हमेसा गलत ही लगते है , क्या आप ने कभी उस लड़की का पक्ष जाना की उसके साथ क्या हुआ था , ज्यादातर हम सभी को दुसरे पक्ष की बात का पता ही नहीं चलता है ।
    सिर्फ ऊपर दिए केस की बात करे तो वो बलात्कार की श्रेणी में क्यों नहीं आ सकता है , बहला कर फुसला कर झूठ बोल कर , डरा कर या विवाह का वादा कर या अन्य तरीके से सहमती ले कर लड़की के साथ जो सम्बन्ध बनाये जाते है उसे बलात्कार क्यों न माना जाये , क्योकि उन सभी में एक मात्र लक्ष्य होता है किसी भी तरीके से लड़की से शारीरिक सम्बन्ध बनाना , यहाँ तो ये साबित है की लडके ने अपने विवाह और बच्चे की बात छुपाई और लड़की को गर्भवती भी कर दिया , यदि लड़की को ये पता होता की वो व्यक्ति पहले से शादी शुदा है उसके बाद सम्बन्ध बनाती तो पूरी गलती लड़की की ही होती । हा लिव इन में ये बात सही है की जब लड़किया लिव इन में रह रही है तो उसे उनके कायदे भी समझने चाहिए लिव इन कभी भी विवाह का वादा नहीं होता है , दोनों में से कोई भी कभी भी वो रिश्ता ख़त्म करके जा सकता है , हा यदि लडके ने खुद इस विवाह करने की बात को बोल न हो तो ,( अब इसके पहले एक जज ने लिव इन के एक केस में लड़की के ये साबित करने पर की लडके ने उससे विवहा का वादा किया था और बाद में मुकर गया , उसे बलात्कार माना था , अब. दूसरा जज दूसरा आदेश दे रहा है, कानून किसे माना जाये ) । इसलिए धोखा खाने के बाद बदले की कार्यवाही का कोई मतलब नहीं है , याद होगा नारी ब्लॉग के ऐसे ही किस्से पर हम सभी ने यही कहा था की बदले की भावना और उसे सबक सिखाने का इरादा छोड़ अपने लिए नया जीवन साथी खोजिये ।
    वैसे सच कहूँ तो कभी कभी ये किस्से भी ठीक ही लगता है एक तरह का न्याय , सदियों तक इस तरह के संबंधो को लेकर हमेसा ही लड़कियों को दोष दिया जाता रहा उन्हें ही डराया गया उन्हें ही संभलने की सिख दी जाती रही और लडके बड़े आराम से ऐसे सम्बन्ध बिना किसी डर के बनाते रहे , अब लगता है की समाज का नहीं कम से कम कानून का थोडा डर तो अब पुरुषो में भी आना चाहिए की केवल टाइम पास के लिए शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए और मौज मस्ती के लिए बनाये गए इस तरह के सम्बन्ध उन्हें भी बैक फायर कर सकते है इसलिए उन्हें भी ऐसा करने से पहले अब हजार बार सोच लेना चाहिए ।

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    1. @ हमेशा अंधे होकर एक ही पक्ष की वकालत करना घातक होता है।

      सच कहा गया है कि एक ही वाक्य को दो लोग अलग अलग नज़रिए से देखते हैं. मुझे लगा कि अजित जी ने क़ानून की बात की है कि अंधे होकर सिर्फ एक ही पक्ष की बात करना घातक है...:)

      खैर परिचितों से सहानुभूति तो जरूर होती है. पर यहाँ सूरज पंचोली-जिया खान या मधुर भंडारकर -प्रीति जैन मेरे परिचित नहीं हैं (पोस्ट में मधुर भंडारकर वाले एपिसोड को लिख कर फिर मैंने इरेज़ कर दिया,लगा वो अनावश्यक होगा )पर मुझे प्रीति जैन से कभी भी सहानुभूति नहीं हुई. अगर मधुर भंडारकर ने उन्हें फिल्मों में रोल का लालच देकर उनसे सम्बन्ध बनाए भी तो उन्होंने इसकी सहमती क्यूँ दी?? और अगर सहमति दी तो फिर अब शिकायत क्यूँ ?? रेप चार्ज का केस क्यूँ दर्ज किया ?केस तो अपनी रफ़्तार से चल रहा है पर शायद इस केस के फैसले के बाद मधुर भंडारकर भी सुकून की सांस लेंगे. अपने शरीर पर सिर्फ और सिर्फ आपका अधिकार होता है,और अगर आपकी सहमति है तो किसी भी दुष्परिणाम के लिए जिम्मेवार आप ही होंगे कोई दूसरा नहीं.


      @बहला कर फुसला कर झूठ बोल कर , डरा कर या विवाह का वादा कर या अन्य तरीके से सहमती ले कर लड़की के साथ जो सम्बन्ध बनाये जाते है उसे बलात्कार क्यों न माना जाये , क्योकि उन सभी में एक मात्र लक्ष्य होता है किसी भी तरीके से लड़की से शारीरिक सम्बन्ध बनाना .

      यह हम आप जानते हैं, सारी दुनिया जानती हैं तो सम्बन्ध बनाने की सहमति देने वाली व्यस्क लडकियां क्या इस से वाकिफ नहीं ?? वे इस सच को नहीं जानतीं ?? फिर क्यूँ सहभागी बनती हैं ? अब जब लडकियां घर से निकल कर काम कर रही हैं, दोस्ती कर रही हैं, लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रही हैं तो फिर उन्हें अपनी उस छुई मुई छवि से निकलना होगा. उन्हें इमोशनली भी उतना ही स्ट्रौंग होना पड़ेगा.या तो सख्ती से 'ना ' कहना सीखना होगा या फिर अपनी कमजोरी की सजा भुगतनी होगी. प्रकृति ने इस मामले में उन्हें ही जिम्मेवार बनाया है तो अपने शरीर की जिम्मेवारी उन्हें ही लेनी पड़ेगी.

      उपरोक्त केस की ही बात करें तो उस लड़की से लड़के ने अपनी शादी की बात छुपाई थी .अगर न भी छुपाई होती और शादी से मना कर देता, तो ? लड़के का जन्मदिन मनाने लड़की अपनी मर्जी से उसके साथ एक कॉटेज में गयी थी. परिणाम के लिए उसे मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए था.

      आपकी टिपण्णी के अंतिम पैराग्राफ से मेरी पूरी सहमति है .मुझे भी कभी कभी ऐसा ही लगता है.

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    2. @अगर न भी छुपाई होती और शादी से मना कर देता,
      correction --
      अगर वो शादी शुदा न होता, अकेला होता उसके बावजूद शादी से मना कर देता

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    3. रश्मि जी
      मेरे आखरी पैर से सहमती जताने के लिए धन्यावाद , बस उसी बात को ध्यान में रख कर अब बातो को सोचे , हम क्यों हमेसा लड़कियों को सिख देते है की उन्हें संभालना चाहिए , समय बदल गया है जैसा आप ने कहा की लड़किया अब बाहर निकल रही है काम कर रही है अपने भले बुरे के बारे में सोच सकती है तो ऐसा करते समय कई बार सोच ले , यही बात पुरुषो पर भी लागु होती है की अब लड़किया बदल गई है आप उनके शरीर और भावनाओं से पहले की तरह नहीं खेल कर बच सकते है, अब आप को "भी " इस तरह के रिश्ते बनाने से पहले सोच लेना चाहिए । जब आप भी पश्चिम की नक़ल कर रहे है तो जेब में रबर भी रख कर चलिए किसी को राह चलते गर्भवती न बनाइये , ये प्रकृति समाज का न्याय है की भुगतना लड़की को पड़ता है तो अब ये कानून का भी न्याय है की जो गलती दोनों ने की है उसको आप को भी भुगतना होगा , जो आज तक नहीं हो रहा था , क्यों नहीं हो रहा था क्योकि हम समाज के लोग ऐसे मामले में लड़कियों को ही सीधा दोष दे देते है प्रकृति का न्याय कह करके , इसलिए पुरुषो के मन में ये भर गया की हम कुछ भी करे दोष तो लड़की को दिया जायेगा जो भुगतना होगा लड़की भुगतेगी हम बचा जायेंगे , उसने दुनिया के सामने पोल खोली तो उसकी बदनामी होगी मेरी नहीं , तो उन्हें समझाना चाहिए की अब धोखे पर प्रकृति और समाज के अलावा कानून का भी न्याय होगा । जैसा रचना जी ने कहा की समय के साथ बलात्कार और इस तरह के कई कानूनों में समय समय पर बदलाव किये जाते है जरुरत के हिसाब से जैसे अब घरेलु हिंसा में लिव इन रिलेशन को भी ला दिया गया है , ऊपर मैंने भी बताया की एक जज ने कहा है की आप शादी का वादा करके लड़की से रिश्ता रखने के बाद मुकर नहीं सकते है , जज का वो फैसला ही कानून बना गया , आगे और भी बनेगे , इसलिए जिम्मेदारी दोनों ही पक्षों की है की कोई भी रिश्ता दोनों ही सोच समझ कर बनाये , और जरुरत पड़ने पर साफ " ना" कहना सीखे ।

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    4. सूरज रेप केस में अन्दर नहीं थे वो किसी को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने के केस में अन्दर थे , ये हमारा कानून है , और यहाँ कोई भी कानून का दुरुपयोग नहीं हुआ है , दिल्ली में एयर होस्टेज केस में भी नेता जी को जेल में दिन बिताने पड रहे है उन पर भी यही केस लगा है , बंगलौर में लड़की ने आत्महत्या कर ली क्योकि उसके पुरुष मित्र ने उससे रिश्ता टूटने पर उसे फेसबुक पर बुरा भला कहा , उस पर भी ये केस चल रहा है । देश में हजारो लोग आत्महत्या करते है किसी के मालिक ने दबाव बनाया किसी के पति ने जिन हराम किया तो किसी की पत्नी ने या कर्ज देने वालो ने हर किसी पर केस चलता है , आप अपनी बातो से या काम से किसी का जीना हराम नहीं कर सकते है , यदि आप को लगता है की जिस व्यक्ति के साथ आप रिश्ते में है वो जरुरत से ज्यादा ही संवेदनशील है तो आप को पहले से ही उस रिश्ते से हट जाना चाहिए या आप को प्रोफेशनल की मदद लेनी चाहिए ( पुलिस से ले कर मनोवैज्ञानिक और कॉमन दोस्तों की भी ) वैसे कहने के लिए तो हम सब बड़े आराम से कह सकते है की ये सब तो हजारो के साथ होता है सभी आत्महत्या नहीं कर लेते है गलती आत्महत्या करने वाले की है , किन्तु कानून ऐसा नहीं मनाता है इसलिए इस बारे में कानून है। उस केस में कुछ भी गलत नहीं हो रहा है सब कानून के अनुसार हो रहा है । दुसरे याद रखियेगा वो केस जिया ने नहीं उनकी माँ ने किया है अपनी बेटी को किसी के कारण खोने वाली माँ यही करेगी । प्रीती जैन ने कभी लोगो से सहानभूति नहीं मांगी ( मेरी भी सहानभूति उनके साथ नहीं है ) उन्होंने साफ कहा की मै बेचारी बलात्कार पीड़ित नहीं हूँ मेरा शारीरिक शोषण किया गया झूठा वादा करके , वो कास्टिंग काउच की शिकार थी और हमारे देश में कास्टिंग काउच करना क़ानूनी नहीं है , वो गलत थी तो मधुर भी मासूम नहीं थे सजा उन्हें भी उनके किये की मिलनी ही चाहिए , जबकि ऐसा हुआ नहीं सजा प्रीटी को ज्यादा मिली और मधुर को एक तरह से कुछ भी नहीं ( हा वो बदला लेना चाहती थी और उन्होंने तो मधुर की सुपारी तक दे दी थी , और उस चक्कर में वो जेल में भी थी )
      और पहले वाले केस में एक व्यक्ति जो पहले से ही शादीशुदा और बच्चो वाला है क्या वो किसी लड़की के साथ अफेयर करता है तो वो मासूम है , वो जन्मदिन के बहाने शहर के इन काम के लिए सबसे बदनाम इलाके के काटेज में ले जाता है वो मासूम है , उसका कोई इरादा नहीं था , और लड़की को प्रेगनेंट भी कर देता है वो मासूम है क्या उसके इस किये की कोई सजा उसे नहीं मिलनी चाहिए , कानून जो कहता है कहे किन्तु व्यक्ति की नियत क्या है वो तो समझ आ ही रही है ना , सजाए व्यक्ति के नियत के हिसाब से भी होती है
      @ और अगर सहमति दी तो फिर अब शिकायत क्यूँ
      ये बात कहना बिलकुल वैसा ही है जैसे ठगे जाने या लुटे जाने पर हम किसी से कहे की तुमने लालच में ठगे गए , या तुम इतने गहने पैसे ले कर ही क्यों चल रहे थे गलती तुम्हारी है अब तुमको ठग के अपराधी के खिलाफ किसी तरह का भी केस दायर करने अधिकार नहीं है । आप के प्रति अपराध कई बार आप की गलती से ही होता है किन्तु इसका ये मतलब नहीं होता है की अपराधी के खिलाफ कुछ किया ही नहीं जाये

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    5. आपकी यह बात बिलकुल सही लगी कि "ये प्रकृति समाज का न्याय है की भुगतना लड़की को पड़ता है तो अब ये कानून का भी न्याय है की जो गलती दोनों ने की है उसको आप को भी भुगतना होगा "

      समाज के दोषारोपण की बात जाने भी दें फिर भी लड़की को शारीरिक रूप से बहुत कष्ट झेलने पड़ते हैं. आगामी खतरों के लिए लड़कियों को भी एलर्ट तो रहना ही चाहिए. अगर वे बच्चे के लिए तैयार नहीं हैं तो इसका ख्याल भी उन्हें रखना चाहिए .गलती भी कर ली और उससे उबरने की कोशिश भी नहीं की , अब इतनी मासूमियत भी ठीक नहीं. अगर समाज स्वीकार कर भी ले ,लड़का उन्हें धोखा न दे ,उनसे शादी भी कर ले पर अगर लड़की को आगे कैरियर बनाना है या पढाई करनी है तो परेशानी उसे ही होगी .

      वैसे हाल में ही 'शोभा डे'का एक आलेख पढ़ा जिसमें फिल्म 'सिक्सटीन 'के सन्दर्भ में उन्होंने आज के युवा वर्ग की चर्चा की थी. जहां दो लडकियां बात करती हैं "बॉयज जस्ट वांट वन थिंग "तो दूसरी लड़की कहती है 'एंड गर्ल्ज़ टू वांट द सेम" हमारा समाज बहुत तेजी से बदल रहा है .अब लड़का या लड़की किसी के भी मासूम रहने का वक़्त नहीं रह गया है.

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    6. इसमे कोई दो राय है ही नहीं की लड़कियों को ज्यादा सावधान रहना चाहिए , तब तो और भी जब की प्राकृतिक रूप से वो ज्यादा संवेदनशील होती है , शरीरी तो है ही मन भी पुरुषो से अलग होता है , लिव इन में चले गए और उसके बाद उसी से दिल लगा बैठे , आप कमिटमेंट को तैयार और लडके के लिए आप से रिश्ता केवल टाइम पास , शरीर की जो दुर्गत होती है वो तो ठीक मन की जो दुर्गत होती है , वो लड़कियों को हमेसा के लिए बदल देती है जीवन बदल देती है उसके सोचने का तरीका बदल देती है । हा देखना है की इन किस्सों से लड़कियों के इस पलट वार से पुरुष कितने सावधान होते है , और सिख लेते है , इसे मै लड़कियों की हिम्मत मानती हूँ , बेशर्मी या गलती नहीं ।
      फिल्म तो मैंने नहीं देखि हैकिन्तु जिस डायलौग की बात आप कर रही है वो टेलर में दिखाया जाता है जहा तक मैंने सूना है दूसरी लड़की कहती है की " 'एंड गर्ल्ज़ ऑल सो वांट वन थिंग " न की " सेम थिंग " कहा नहीं जा सकता की फिल्म में लड़की की चाहत क्या दिखाई गई है ।

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    7. @ दूसरी लड़की कहती है की " 'एंड गर्ल्ज़ ऑल सो वांट वन थिंग " न की " सेम थिंग " कहा नहीं जा सकता की फिल्म में लड़की की चाहत क्या दिखाई गई है.

      फिल्म नहीं देखी थी न ही promo ,शोभा डे का आर्टिकल पढ़ा था और याद रह गया सो जिक्र कर दिया. पर शोभा डे ने जो जिक्र किया और आपने जो कहा..दोनों के अर्थ बिलकुल अलग हो जाते हैं. अब ब्लॉग लिखाई भी क्या क्या न कराये :(..you tube पर इस फिल्म का promo देखा और उसमे दूसरी लड़की कहती है ,"एंड गर्ल्ज़ आल्सो वांट दैट वन थिंग "..शोभा डे का कथन ही सही है.

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  13. सामयिक लेख है .. एक तरफ जहां समाज बदल रहा है ... नियम बदल यहे हैं ... क़ानून बदल रहे हैं ... ऐसी मानसिकता भी बदलेगी ... शायद पूरी तरह से परिपक्वता नहीं आई है समाज में ...

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  14. http://news.oneindia.in/2013/06/18/consummation-of-relationship-is-a-ground-for-marriage-1239871.html

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  15. ताली एक हाथ से नहीं बजती। फिर सज़ा एक को क्यों ?


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  16. बिना भय की सहमति तो सहमति ही होगी

    लेख की मूल भावना से सहमत

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  17. Ma'm Aapne mere pahle ke comment par response diya vo bilkul bi meri aasha ke anukul nahi tha.. ye sahi h ki meri english week h lakin me es baat par jyada dhyan bi nahi deta kyonki mujhe to apni baat kahne se kaam hota h ... aaj jab logo ke response pad raha tha to mere comment ka jikra aaya ..mujhe acha laga ki kisi ne to meri bat ka matlab samjha... aapne kaha ki mujhe hindi me hi likhna chahiye ..vese ye sahi bi h esliye ek bar phir likh raha hu .. """es bar bi aapke ache response ko janane ke liye"""" !!!!!!!!!!!!!!

    Aajkal sabi log kah rahe h ki hum "badal" rahe h ..samaaj "badal"
    raha h ..log "advance" ho rahe h ... samaaj "advance" ho raha h .. lakin me jab es bat par sochta hu to muje mahsus hota h ki hum advance nahi ho rahe hum to rasatal me girte jaa rahe h ..aajkal logo me socide case bad rahe h ..logo me helping nature kam ho raha h .. logo me selfish bad rahi h .. samaaj ko koi fikra nahi ki koi pyasa hi ho lakin sayad hi koi pani ke liye puche.. samaaj me "parivaar" ki samajh khatm ho gayi h ... ab to log shadi ko bi "jarurat" samjhne lage h .... sayad aapke "advance" samaaj or "aadhunikta" ki yahi paribhasa hogi. kya yahi aage badne ki nisani h ? Me modernization, technology en sabka samarthak hu kyonki ye sare product to me hi banata hu lakin me us modernization ko kabi sahmati nahi deta jo sanskaro,mulyo,natikta ko dekar prapt kiye jate ho. bahar hum bi rahte h or bahar mere dusre friends or colleagues be rahte h .. kya sabhi ek jaise jivan ji rahe hote h?
    aisa kya fark aa jata h hamare or bakiyo me? sayad aap jante hi honge...
    Aapne likha ki aap solah sanskaro ke naam tak bi nahi janti....mujhe ascharya hota h.. vesse me es baat par kuch kahna bi nahi chahta kyonki me to abhi apne ko es layak samjhata bi nahi hu.. lakin samaj ko dekhte hue ek baat me jaroor share karna chahuga ---manav ke four element hote h (1) body(sarir) (2) man (3) budhi(mind) (4) soul (aatma) {for detail refer shrimadbhagvat gita chapter 3 and 4 } en sabki sahi siksha hi ensaan ko ensaan banati h ..aajkal ki education sarir(body) or budhi ki siksha to de deti h lakin man or aatma ke bare me koi education nahi mil pati ..es karan pade likhe log bi murkho ki tarah ka vayvhar karte h ...
    mera motivation sirf education policy ko sahi karna h taki har bacha ensaan ban sake ..use quality of living life ki samaj aaye.............
    may be i hurt you but i am sorry for it....

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  18. सर्वप्रथम तो शुभम,हिंदी में लिखने का शुक्रिया, रोमन लिपि ही सही ,आपकी बात समझने में सुविधा होगी.

    @ sayad aapke "advance" samaaj or "aadhunikta" ki yahi paribhasa hogi.

    इस ब्लॉग पर मैं अब तक २७७ पोस्ट लिख चुकी हूँ. मेरे किस पोस्ट में या मेरे लेखन में कहाँ एडवांस और आधुनिक समाज की ऐसी परिभाषा दी गयी है ??

    हाँ, पूरे के पूरे सोलह संस्कार के नाम तो मुझे नहीं याद (अन्नप्राशन, मुंडन, अक्षरज्ञान , शिक्षा, विवाहसंस्कार, गृहस्थ जीवन, वानप्रस्थ, अंतिमसंस्कार जैसे कुछ मुख्य संस्कार ही पता हैं )....और मैंने यह बात लिख ही दी है, मुझे इसमें कोई शर्म भी नहीं महसूस होती...हाँ , ये पता करने में मेरी रूचि नहीं है पर दुनिया में और भी कई विषय हैं ,जिनमे मेरी रूचि है.

    इस समाज को लेकर आपकी अपनी सोच है, और सबको अपनी तरह से सोचने का अधिकार है.

    @ mera motivation sirf education policy ko sahi karna h taki har bacha ensaan ban sake

    आपको अपने कार्य के लिए शुभकामनाएं .

    और आपने मुझे बिलकुल भी hurt नहीं किया है .इसलिए सॉरी की कोई जरूरत नहीं.
    पोस्ट पर प्रत्येक व्यक्ति अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र है और सबके विचारों का स्वागत है.

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  19. रश्मि जी आपने बात सही कही लेकिन उदाहरण गलत रखे इसलिए सब गलत हो गया।इस फैसले के बारे में मै अंशुमाला जी से सहमत हूँ कि यह रेप का ही मामला बनता है और इसमें न कोई एकतरफा न्याय वाली बात है और न कानून के गलत इस्तेमाल की।यदि रेप की जगह धोखा शब्द करना है तो करे पर उसे सजा उतनी ही होनी चाहिए जितनी रेपिस्ट को होती।वैसे धोखा तो इसने अपनी पत्नी को भी दिया ही है।इसे तो दुगुनी सजा मिलनी चाहिए।हालाँकि मेरा वो तर्क नहीं है कि सदियों से पुरुष क्या करते आ रहे है।सदियो पहले न आप थे न हम थे।आज क्या हो रहा है वो देखा जाएगा यदि पुरुष गलत है तो उसे सजा मिले।और मैं ऐसी सजा का समर्थन केवल इसलिए कर रहा हूँ कि इससे कम से कम वो लडका किसी और लडकी की जिंदगी खराब न कर पाए बाकी इससे ऐसे केसेज में कोई कमी नही आएगी न लडके इससे डरेंगे।सब ऐसा ही चलता रहेगा अतः सावधानी ही बचाव है।

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    1. राजन ,
      अब क्या पता, क्या सही हो गया...क्या गलत..यह तो अपना अपना नज़रिया है.जैसे जज साधना जाधव ने ही अलग तरह से देखा इस केस को .

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  20. हाँ बहुत से लड़के लड़किया सावधानी रखते है पर सिर्फ अपने संबंधो को छिपाने व असुविधा से बचने के लिए।और इसीलिए मुझे लगता है कि कोई लड़की कोर्ट तक जा रही है तो जरूर उसके साथ शादी के नाम पर धोखा ही हुआ है।गर्भनिरोधक का इस्तेमाल पहले नहीं तो बाद मे किया जाता है (हाँ कुछ केस में फेल हो जाता हो तो बात अलग है)।वर्ना मेरा मानना है कि भारत में कुँआरी माँओ और पिताओं की संख्या अमेरीका से तो चार गुना होती।पर ऐसे मामले कम हो जाएँगे मुझे नहीं लगता।इसके लिए तो कुछ ऐसा करना पडेगा कि लड़के लड़की आपस में मिल ही न पाएँ जो कि संभव नहीं है।आज तक लडकियों पर तो बहुत पाबंदी रही घर घर में खाप पंचायत बैठी थी ऑनर किलिंग हो रही थी लेकिन तब भी उन्होने प्यार करना या शारीरिक संबध बनाना बंद नहीं किया न औरतो ने नाजायज संबध बंद किये तो आपको ऐसा क्यो लगता है कि पुरुष कानून के डर से तोबा कर लेगे?हा बाद में थोडे सावधान हो जाएगे वो एक बात है पर प्यार या सेक्स वाले मामले ऐसे ही होते है।अब ये बात चाहे पुरानी ही लगे पर सही यह है कि लडकियाँ खुद सावधानी बरते बजाए ये सोचने के कि अब कानून बन गया तो पुरुष साथी सतर्क होगा और धोखा नही देगा।

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    1. पोस्ट में और कमेन्ट में भी मैंने यही कहा है कि परेशानी में लडकियां पड़ती हैं,इसलिए सावधना उन्हें ही रहना होगा .
      आपके कथन से सहमत कि लडकियाँ खुद सावधानी बरते बजाए ये सोचने के कि अब कानून बन गया तो पुरुष साथी सतर्क होगा और धोखा नही देगा।

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  21. सूरज के केस में केवल जिया के अलगाव के गम में सुसाइड कर लेने भर से इसे सजा नही होगी कोर्ट ये देखेगी कि इसका व्यवहार जिया के प्रति कैसा था और ये कहीं उनकी अनदेखी तो नहीं कर रहा था लेकिन जितनी बातें सामने आई उनसे ये तो लगता है कि सूरज इसके लिए पूरी तरह दोषी है और यही नहीं जिया की माँ की बातें सच निकली तो बेटा ही नही बाप भी फंसेगा।मधुर प्रीति केस मे ठीक है कि भंडारकर को सजा नही मिली लेकिन उसमें थोडा दिमाग तो है पर प्रीति ने तो खुद अपने पैर पर कुल्हाडी मारी।मधुर को जो नोटिस भिजवाया उसमे ये लिखवा दिया कि या तो मुझे फिल्म मे ले वर्ना मै तुझ पर रेप केस लगाउँगी।तभी वो बच गया होगा इस नोटिस की भाषा को देख मधुर खुश हो गया होगा क्योकि इसमें कोई आरोप ही नही था ऐसे ही शादी का झाँसा देने की भी बात की तो ये आरोप भी मधुर की शादी के ठीक पहले या बाद लगाना चाहिए था लेकिन ऐसा नही हुआ और इसके बाद भी प्रीति किसी संगीतकार के झाँसे में आ गई उसने भी धोखा दिया और उसे भी नोटिस भेजा कि तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ चाहे तो डीएनए टेस्ट करा लो।पर इस केस में क्या हुआ पता नही।

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    1. जिया खान अब इस दुनिया में नहीं हैं ,उनपर बातें करना अच्छा नहीं लग रहा पर जब जिक्र आया है तो आगे भी बात करनी ही होगी.
      @ कोर्ट ये देखेगी कि इसका व्यवहार जिया के प्रति कैसा था और ये कहीं उनकी अनदेखी तो नहीं कर रहा था

      कोर्ट ये भी देखेगी कि जिया डिप्रेशन में तो नहीं थीं...उनका इलाज चल रहा था..उनमे सुसाइडल टेंडेंसी तो नहीं थी...वे अपने कैरियर को लेकर असंतुष्ट तो नहीं थीं आदि आदि .किसी को दोषी ठहराने से पहले कई पक्ष देखे जाते हैं.

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  22. सटीक प्रश्न उठाता सामयिक आलेख..

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  23. फ़ेसबुक के लिंक से दोबारा आया हूं बस इतना कहने ... प्रेम सा कुछ नहीं

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  24. विचारपरक आलेख आज की सोच को इंगित करता हुआ

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  25. समय इतनी तेजी से बदल रहा है सब कुछ कहीं जैसे भागता सा लगता है ..रिश्ते .प्रेम अब सिर्फ अपनी सुविधा नुसार होते हैं ..सामयिक लेख ....

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  26. विचारणीय आलेख है रश्मि जी ! मेरी बातें शायद सभीको पुरातनपंथी लगेंगी लेकिन वास्विकता यही है कि मैं लिव इन रिलेशनशिप की इस कंसेप्ट को कभी स्वीकार नहीं कर पाई ना ही इसका अनुमोदन करती हूँ ! मेरे ख्याल से जो लडकियां स्वेच्छा से लिव इन रिलेशनशिप की व्यवस्था को अपना रही हैं और बालिग हैं उन्हें अपने साथी पर रेप का चार्ज लगाने का कोई हक नहीं होना चाहिये ! इतनी इनोसेंट तो वे भी नहीं हो सकतीं कि पति पत्नी की तरह साथ में रहना भी चाहती हैं और इसके क्या नतीजे हो सकते हैं उनके प्रति बिलकुल अनजान होने का दिखावा भी करती हैं ! आपकी परिचिता के बेटे के साथ चार साल लिव इन रिलेशनशिप में रहने के बाद मनमुटाव होने पर लडकी ने रेप का मुकदमा कर दिया यह सर्वथा अनुचित है ! चार साल तक वही दोस्त बड़ा अच्छा लगता था और उसके साथ रहने में कोई परेशानी नहीं थी ! अचानक एक दिन वही दोस्त रेपिस्ट बन जाता है क्योंकि शायद लडकी से किसी बात पर अनबन हो गयी है ! यह कैसे कुतर्क हैं ! युवा लडके लड़कियों के माता पिता या अभिभावकों को भी ध्यान देना चाहिये कि उनके बच्चे जिस राह पर चल रहे हैं वह नैतिकता के मानदंडों पर कितनी उचित है और कितनी सुरक्षित ! बालिग़ हो जाने भर से वैचारिक परिपक्वता नहीं आ जाती ! आज के युवाओं को सही मार्गदर्शन की बड़ी ज़रूरत है और समाज शास्त्रियों को इस पर ध्यान देना चाहिये कि सही मूल्यों की स्थापना समाज में कैसे की जाये ! सार्थक आलेख के लिये शुक्रिया रश्मि जी !

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  27. aapka kahna sahi hai rashmi di..ki ladkiyon ke liye jo kanoon banaye ja rahe hain aksar ladkiyan unka galat fayda uthati dikh rahi hain..jo ki sahi nahi hai..kyunki in sab karnon se kai baar sahi case bhi uljhe lagte hain.aur kanoon ka galat fayda uthana kisi ke liye bhi chahe wo ladka ho ya ladki sahi nahi hai...jiya khan wale case mein mujhe bhi suraj pancholi ka jail jana samjh nahi aaya(mujhe unse koi hamdardi bhi nahi hai phir bhi)
    apni zindagi khatm karne aur jeene ka faisla karne ka haq khud ka hi hona chahiye..aur ye us waqt me liya unka faisla tha.

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  28. इतना शानदार विमर्श पढ के ही आनन्द आ गया.. तमाम टिप्पणियों में मेरा अपना मत भी दिखाई दे रहा है. मसलन वाणी जी का कमेंट. मैने भी ऐसे कई मामले देखे हैं, जिसमें नाहक पूरे परिवार को शर्मिंदा होना पड़ा, जेल की हवा खानी पड़ी. निश्चित रूप से ये कानून का दुरुपयोग है. लेकिन वास्तविक पीड़ित की पहचान कैसे हो?

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