Saturday, November 10, 2012

दुःख सबके मश्तरक हैं पर हौसले जुदा (कहानी )

मौसम बदल रहा था, ठंढ के दिन शुरू होने वाले थे .हलकी सी खुनक थी हवा में। मालती हाथों में चाय का कप लिए बालकनी में खड़ी  थी। सूरज डूबने वाला था। आकाश सिंदूरी रंग से नहाया हुआ था। आकाश में अपने घोसलों की तरफ लौटती चिड़ियों की चहचाहट और नीचे मैदान में खेल रहे बच्चों का शोर मिलकर एक हो रहे थे। बहुत ही ख़ूबसूरत दृश्य था . मालती को ऐसे दृश्य बहुत ही पसंद थे  और वह रोज शाम को नियम से चाय का कप लेकर बालकनी में आ खड़ी  होती । 

थोड़ी देर में हल्का हल्का अँधेरा घिरने लगा।  बच्चों की माएं आवाजें , लगाने लगीं बच्चे घर की तरफ चल पड़े, पक्षी भी अपने घोसलों में दुबक गए। वातावरण बिलकुल शांत हो गया।
और मालती को अपना बचपन याद आ गया, अंधियारा घिरते ही उसकी गली में आवाजें ही आवाजें होतीं . महिलायें -पुरुष काम से लौटते और उनके बीच झगडा शुरू हो जाता . चारो तरफ शोर ही शोर होता .  उसका अतीत रह रह कर उसकी आँखों  के समक्ष  घूम जाता। कभी सपने में भी नहीं सोचा था उसने, यूँ एक अच्छी सी सभ्य कॉलोनी में अकेली पूरी इज्जत के साथ रह पाएगी वह।
एक बजबजाती खुली नाली के पास उसका उसके बचपन का घर था  घर क्या  एक छोटा सा गन्दा सा कमरा , जिसमे मालती अपने माता-पिता और दो छोटे भाइयों  के साथ रहती थी । एक कोने में खाना बनता,...दुसरे कोने में थोड़ी सी पक्की जगह थी, जहाँ पानी भरी बाल्टी रखी  होती, वहाँ बर्तन धुलते और उसकी माँ स्नान करती। मालती और उसके दोनों भाई तो गली में लगे नल के नीचे ही नहा लिया करते और बापू तो हफ्ते दस दिन में एक दिन नहाया करता।  एक तरफ  टीन  के पुराने बक्से रखे थे जो आधे से ज्यादा खाली ही रहते। बीच में माँ की फटी हुई साडी बिछा वे तीनो भाई बहन सो जाते। सो क्या जाते सहमे से पड़े रहते . क्यूंकि थोड़ी रात बीतते  ही उसका पिता शाराब पीकर गालियाँ देते  हुए घर में आता। कभी खाना उठा कर फेंक देता , कभी माँ के लम्बे बाल घसीट कर उसे पीटता। एकाध बार मालती और उसके छोटे भाई माँ  को बचाने गए तो उन्हें भी पीट दिया। माँ भी बापू को जोर जोर से गालियाँ देती । पर उस गली के हर मकान का यही  किस्सा था। माएं दिन भर घर घर में बर्तन मांज कर पैसे कमा कर  लातीं , बच्चों को पालतीं, खाना बनातीं और फिर शाम को पति से पिटतीं । माँ के पैसे भी बापू छीन कर ले  जाता। 

ऐसे ही  माहौल में वो बड़ी हो रही थी। माँ की ज्यादा से ज्यादा मदद करने की कोशिश करती। पांच साल की उम्र से ही, घर में झाड़ू लगा देती। कच्ची -पक्की रोटी बनाने की कोशिश करती। माँ  के साथ काम पर भी चली जाती। उनके छोटे मोटे काम कर देती। वे लोग कुछ खाने को देतीं तो छुपा कर भाइयों के लिए ले आती। भाई सारा दिन धूल धूसरित गलियों में कंचे खेला करते या फिर साइकिल की टायर को पूरी गली में घुमाते रहते। 

जैसे तैसे दिन कट रहे थे वह आठ या नौ साल की थी जब कहर टूट पड़ा उस पर। एक दिन बापू माँ को पीट रहे थे, माँ भी गालियाँ दे रही थी। बस उस दिन पता नहीं बापू को क्या हो गया, उसने बगल में रखा केरोसिन तेल का डब्बा उठाया और माँ  के ऊपर डाल  कर आग लगा दी। माँ  चिल्लाने लगी, वो छोटे छोटे कटोरे से पानी डालकर आग बुझाने की कोशिश  करने लगी। गली के लोग भी आ गए। किसी ने दरी  डाला, किसी ने पानी और आग बुझा दिया। बापू बाहर भाग गया। बगल वाली  काकी माँ को अस्पताल ले गयी। कुछ दिन अस्पताल में रहकर माँ  वापस घर आ गयी। पर बेहद कमजोर हो गयी थी। वह ठीक  से चल भी नहीं पाती। नौ साल की उम्र  में घर का सारा भार उस पर आ पड़ा । माँ  जिनके यहाँ काम करती थीं वो शर्मा मालकिन एक दयालु महिला थीं। उन्होंने छोटे छोटे कामों के लिए मालती को रख लिया 

अब मालती सुबह उठती , घर का सारा काम करती। घर में जो भी राशन पड़ा होता आटा , चावल  बना कर रख देती। , कभी कभी कुछ भी नहीं होता। तो बगल के बनिए की दूकान से उधार डबल रोटी लाकर रख देती। उसमे से थोडा सा निकाल कर माँ के तकिये के पास छुपा देती .वरना पता था, दोनों भाई ,माँ   के लिए कुछ नहीं छोड़ेंगे। बाहर से बाल्टी में पानी भर भर कर लाती, माँ  को नहलाती,स्टूल पर खड़े होकर उनके लम्बे बाल धो देती  उनके कपडे साफ़ कर देती।  कुछ ही दिनों में छलांग लगा कर एक लम्बी उम्र पार कर ली थी, मालती ने। .माँ  आंसू पोंछती रहती। मैं किसी काम की नहीं, मर जाती तो अच्छा होता .वो भी साथ में रोने लगती तो माँ  चुप हो जातीं। इतना काम करने के बावजूद भी वो खुश रहती क्यूंकि घर में शान्ति थी। बापू पुलिस के डर  से उन्हें छोड़कर भाग गया था . मालती ,भगवान  से मनाती, वो कभी लौट कर ही  न आये।

लेकिन भगवान् ने उसकी नहीं सुनी।
करीब  एक साल के बाद एक रात बापू धड़धडाता हुआ घर में  घुस आया, "बहुत मजे कर रहे हो, तुमलोग मेरे बिना ?? तू मरी नहीं, अब तक ?? कितना कमाती है तेरी बेटी, ला पैसा ला। "

" इतनी छोटी उम्र में इतना काम  कर रही है, पूरा घर संभाल रही है, उसे तो छोड़ दे, " माँ  ने कराहते हुए कहा। 

"जुबान लड़ाती है।" कहता वो माँ की तरफ बढ़ा ही था कि वो बीच में आ गयी, "बापू बस बीस रूपया है, ले लो पर माँ को मत मारो।।"
" ला, जल्दी ला और वो थोड़ी सी जमा पूंजी बापू लेकर चलता बना 

माँ जो थोड़ी ठीक होने लगी थी, सब्जी काट देतीं, चावल बीन देतीं। किसी तरह खिसक कर दरवाजे के पास  बैठने लगी थी। बापू के आने के बाद ही फिर से  बीमार पड़ गयी। 

शर्मा मालकिन को बताया तो वे कहने लगीं, "सदमा लग गया है तेरी माँ को, डर गयी है बापू को  देखकर ।"
माँ  की सेहत दिन ब दिन गिरती गयी, उसने खाना -पीना छोड़ दिया और एक दिन उसकी मौत हो गयी। 

***

वह छोटे भाइयों को गले लगाकर बहुत रोई। बापू से उसे बहुत डर  लगता था। पर अच्छा था  
 बापू दिन भर गायब रहता,देर रात घर आता और थोड़ी बक झक के बाद शराब के नशे में सो
 जाता। उसने अब एक दो और घरों में काम करना शुरू कर दिया। वह मन लगाकर मेहनत  से काम करती। कभी किसी का कोई सामना नहीं छूती। साफ़ सुथरी रहती। सलीके से कपडे पहनती बाल बनाती, सभी मालकिन उसके काम से बहुत खुश रहतीं। अपनी बेटियों के चप्पल, कपडे, उसके भाइयों के लिए भी पुराने शर्ट -पैंट दे देतीं। 

दिन गुजर रहे थे। कुछ दिन से बापू बड़े प्यार से बातें करता  घर में डांट डपट नहीं करता। उस से पैसे भी नहीं मांगता। उसे थोडा आश्चर्य हो रहा था। एक दिन बापू दो आदमियों के साथ आया।
 उस से कहा, "पानी ला ..चाय बना।"
 उसने डरते डरते चाय बना कर दे दिया। पर गौर कर रही थी, चाय बनाते हुए भी वे दोनों आदमी  उसे गौर  से देख रखे थे। दुपट्टे से उसने खुद को जितना हो सकता था, ढक लिया। उसे लगा बापू शायद उसकी शादी करने की सोच रहा है। वो तो कभी नहीं करेगी शादी। उसे कमा कर पैसे नहीं लाने और पति से मार नहीं खानी । उसकी बिरादरी में सब ऐसा ही करते हैं।

चाय पीने के बाद, बापू उन आदमियों के साथ बाहर चला गया। थोड़ी ही देर बाद उसका छोटा भाई  दौड़ता हुआ घर में  आया। 

"दीदी, बापू तुझे उन आदमियों के हाथों बेच रहा है"

"क्या  "आश्चर्य से उसका मुहं  खुला रह गया।

"हाँ .. दीदी, उस आदमी ने बापू को बड़े बड़े नोट दिए हैं। मैं अँधेरे में से छुप कर सब देख रहा था। और उसने कहा कि  बाकी पैसे लड़की को ले जाने आऊंगा तब दूंगा।"
अब  वो क्या करे  उसका दिमाग तेजी से चलने लगा। उसने दोनों भाइयों को पास बिठाया और कहा," देखो शर्मा मालकिन की बहन आयी थी  बम्बई से वे मुझसे कह  रही थीं, साथ चलने को, उनके यहाँ बम्बई में काम करने के लिए। मैं नहीं गयी कि  तुमलोगों का ख्याल कौन रखेगा। पर अब अगर नहीं गयी तो बापू मुझे बेच देगा, तुम दोनों बड़े हो गए हो , अब अपना ध्यान रख सकते हो .मैं शर्मा मालकिन को हाँ बोल देती हूँ।"

दोनों भाई रुआंसे हो गए। छोटा भाई तो डर कर उस से लिपट गया, 'ना दीदी मुझे भी अपने साथ लेती जाओ।।"

चौदह साल के बड़े भाई ने बड़े-बुजुर्ग सा समझाया , "नहीं दीदी को जाने दे छोटे। जब हम और बड़े हो  जायेंगे अच्छा कमाने लगेंगे तो अलग घर में रहेंगे फिर दीदी को बुला लेंगे। "


उसका मन भर आया। पर यह कमजोर पड़ने का समय नहीं था। उसने तेजी से अपनी चीज़ें इकट्ठी करनी शुरू कर दीं। बापू का क्या ठिकाना , उसे सुबह सुबह ही निकल जाना होगा, शर्मा मालकिन बहुत भली हैं।जबतक बम्बई  जाने का इंतजाम नहीं हो पाता । वे उसे अपने घर में  रहने की इजाज़त दे देंगीं। काम में देर हो जाने पर कितनी बार तो कहती हैं, "रुक जा रात को यहीं।' वो उसकी मुश्किल जरूर समझेंगी।
शर्मा मालकिन तो बापू की बात सुनते ही आग बबूला हो गयीं। उसके कुछ कहने से  पहले ही कहा, " अब तू उस घर में पैर मत रखा रखना, यहीं रह मेरे पास। पीछे आँगन  में जो कमरा है, उसे साफ़-सूफ करके उसी  में रह जा। अब उस राक्षस के घर में मत जा "

उसने बताया कि यहाँ  रहना ठीक नहीं होगा । बापू शायद आपसे भी झगडा करे। मुझे शेफाली दीदी के यहाँ बम्बई  भेज दीजिये। वो जब यहाँ आयी थीं तो बार बार कहती थीं  न , "दीदी इसे मुझे दे दो।।"
"हम्म ये ठीक रहेगा, शेफाली के पास रहेगी तो मुझे भी चिंता नहीं होगी। वो तो कई बार कह चुकी है। आज ही उसे फ़ोन करती हूँ। पर तुम चिंता मत करो।" "
शर्मा मालकिन का माँ का सा स्नेह देखकर उसका मन पिघल गया। अगर भगवान एक  तरफ से कष्ट देता है तो दूसरी तरफ से कई हाथ उस कष्ट से बचाने के लिए भी देता है। 

दो दिन बाद ही शेफाली दीदी के यहाँ जाने के लिए शर्मा मालकिन ने उसे बम्बई  की ट्रेन में लेडीज़ कूपे में  बिठा दिया। आस-पास वालों को उसका ख्याल रखने को कह दिया अपना फोन नंबर भी दे दिया ताकि वो जब चाहे भाइयों से बात करती रहे। 

शेफाली  दीदी उसे स्टेशन  पर लेने आयी थीं। शेफाली  दीदी भी शर्मा मालकिन की तरह ही दिल की बहुत अच्छी थीं। उसका बहुत ख्याल रखतीं पर उसे उनके घर का माहौल रास नहीं आता। शेफाली दीदी के पति फिल्मो में कुछ करते थे। हमेशा उनके यहाँ लोगों की भीड़ लगी होती। देर रात तक पार्टियां होतीं। दिन- रात  का कोई भेद ही नहीं होता। अजीब अजीब से लोग उनके घर आते, फटी जींस वाले ,लम्बे बालों वाले, लगातार सिगरेट फूंकते हुए। सबलोग शराब पीते, देर रात तक उनके ठहाके गूंजते। उसे बहुत अजीब सा लगता . कई लोग कभी-कभी उसे घूर कर भी देखते, उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगता। वो इस माहौल  से निकल जाना चाहती थी। 
वो जब सब्जियां लेने जाती तो पास की एक आंटी भी अक्सर मिलतीं  . वो उस से बड़े प्यार से बातें करतीं और एक दिन उसने अपने मन की उलझन उनके सामने रख दी और पूछ लिया , "आप मुझे कहीं और काम दिलवा दीजियेगा ?" 

उन्होंने उसकी समस्या समझी और कहा, "कोशिश करेंगे " 

और एक हफ्ते बाद ही वे रास्ते में उसके इंतज़ार में ही खड़ीं  थीं। उनकी एक सहेली को पूरे दिन के लिए एक लड़की चाहिए थी। सहेली और उसके पति दोनों नौकरी करते थे , उनकी एक छोटी सात साल की बेटी थी , जिसकी देखभाल के लिए उन्हें कोई अच्छी सी लड़की चाहिए थी। आंटी बार बार अपनी सहेली के अच्छे  स्वभाव की बात कर रही थीं। 

मालती को भी ऐसा ही शांत माहौल चाहिए था। इस घर में आकर उसे बहुत अच्छा लगा। शालिनी प्यारी सी शांत सी लड़की थी। लड़की की माँ  जिन्हें वो शोभा दीदी कहा करती थी। वे भी मीठा बोलने वाली थीं। किसी बात पर डांटती नहीं। घर का सारा  भार उसे सौंप दिया था। वे सुबह सुबह ऑफिस चली जातीं, शाम में घर वापस आतीं, पूरे घर की जिम्मेवारी मालती की ही थी अब । वह भी बहुत मन लगाकर काम करती। शोभा दी भी उसके काम में मीन-मेख नहीं निकालतीं। उसे अपनी बेटी जैसा ही मानती .  बेटी के लिए चॉकलेट , आइसक्रीम  लातीं  तो उसके लिए भी लातीं । शनिवार रविवार जब उनकी छुट्टी रहती तो  घर के  कामों में भी हाथ  बटाती । शोभा दी के पति अपने काम से मतलब रखते अखबार पढ़ते, फोन पर बात करते या फिर कंप्यूटर पर कम करते रहते । वे अक्सर टूर पर भी जाया करते . 

दो साल के बाद शोभा  दी का ट्रांसफर एक छोटी सी जगह पर हो गया। वहां उनकी बेटी शालिनी के लिए अच्छे स्कूल नहीं थे। शोभा  दी नयी जगह पर चली गयीं। उनके पति भी अक्सर टूर पर चले जाते . पूरा घर मालती अकेले संभालती। सीमा दी पूरे घर के खर्च के पैसे उसके हाथों में दे देतीं . मालती एक एक पैसे का हिसाब रखती । घर की देखभाल करती । शालिनी का ख्याल रखती .

मालती बहुत निडर और हिम्मती भी थी। किसी से नहीं डरती .  एक बार बिल्डिंग के वाचमैन ने कुछ छींटाकशी की उसपर, मालती ने वहीँ चप्पल निकाली और दो चप्पल लगा दिए। पूरे इलाके में यह बात फ़ैल गयी । अब आस-पास की बिल्डिंग के वाचमैन , ड्राइवर सब उस से डर कर रहते। वो नीचे सब्जी भी  लेने भी जाती तो सब उस से सहम कर नज़रें नीची कर के बात करते। मालती भी यह  दिखाने के लिए कि वह किसी से नहीं डरती , सबसे बहुत रूखे स्वर में बात करती। मुश्किल ये हो गयी कि यह उसकी आदत में शुमार हो गया।
अब वह घरवालों से भी रुखा ही बोलती। खुद को घर की मालकिन समझती, क्यूंकि शोभा दी महीने में एक बार ही आतीं। घर के  सारे निर्णय वही लेती, कौन से परदे लगेंगे, कौन सी चादर बिछेगी, कौन सी चीज़ कहाँ कहाँ रखी जायेगी शोभा दी को ये सब अच्छा नहीं लगता। पर उसकी ईमानदारी , काम के प्रति लगन, अपना घर समझकर काम करना , पूरी जिम्मेवारी उठाना, शालिनी को बहुत सारा प्यार देना, ये सब देखकर वे चुप रहतीं।

अब मालती के पास काफी समय रहता। शालिनी ने उसे पढना-लिखना सिखाना शुरू किया। उसे भी पढने में बहुत दिलचस्पी हो गयी। जरा सा भी खाली वक़्त मिलता तो वह किताबें लेकर बैठ  जाती। शालिनी भी अच्छी टीचर थी, उसे बहुत मन से पढ़ाती। स्कूल जाती तो उसे होमवर्क  देकर जाती। और अगर वो होमवर्क नहीं करती तो उसे सजा देने के लिए शालिनी  खुद खाना नहीं खाती। फिर उसे शालिनी का घंटों मनुहार करना पड़ता। अब वो जल्दी से घर का  काम ख़त्म कर होमवर्क करने लगी। धीरे धीरे वह अंग्रेजी के कॉमिक्स, चंदा मामा , चम्पक से शुरुआत कर , पत्रिकाएं , अखबार सब पढने लगी। शालिनी के साथ अंग्रेजी के प्रोग्राम देखते हुए वो अच्छी तरह अंग्रेजी समझने लगी। शालिनी भी उसे सिखाने के लिए ,उस से ज्यादातर अंग्रेजी में ही बात करती। अब मालती बाहर जाती तो अंग्रेजी में ही बोलने की कोशिश करने लगती। शोभा  दी की सहेलियां, या उनके पति के दोस्त घर आते तो उसे देख दांग रह जाते। कई लोग तो उसे घर का सदस्य ही समझ लेते। 

जब तीन साल बाद शोभा दी का ट्रांसफर वापस इस शहर में हो गया तो शोभा दी ने मालती  से कहा कि  'अब वो उसकी शादी कर देना  चाहती हैं '. उसकी रूह काँप गयी। उसके  अपने माता-पिता का जीवन आँखों के सामने आ गया और गली के और लोगों का जीवन भी। महिलायें हाड तोड़ कर कमाती और उनके पति शराब के नशे में उन्हें मारते भी और उनके पैसे भी छीन कर ले जाते। उसे नहीं चाहिए थी ऐसी ज़िन्दगी। और उसने शोभा  दी से साफ़ कह दिया, उसे शादी नहीं करनी ,अगर वे उसे नहीं रखना चाहतीं तो वह दूसरी जगह कोई काम देख लेगी पर आजीवन शादी नहीं करेगी  । ये उसका अंतिम फैसला है।


शोभा दी ने उसकी बात मान ली । मालती बीच बीच में अपनी  शर्मा मालकिन के यहाँ फोन करके भाइयों का हालचाल लेती रहती। पता चला दोनों भाई एक कारखाने में नौकरी करने लगे हैं और पिता से अलग रहते हैं। दोनों ने शादी भी कर ली। उसे बहुत बुला रहे थे, 'एक बार आकर मिल जा'। शोभा दी ने भी ख़ुशी ख़ुशी उसे छुट्टी दे दी और  भाइयों के लिए ढेर सारे उपहार भी खरीद कर दे दिए। अब तक का उसका सारा वेतन भी जोड़ कर दे  दिया।

वहां जाकर उसने सारे पैसे भाइयों को दे दिए। उपहार तो दिए ही,  भाभियों को उसके जो भी कपडे पसंद आते, वो दे देती। जब लौटने का समय आया तो उसने पाया उसके पास बस दो जोड़ी कपडे बचे हैं। फिर भी उसने सोचा, उसके लिए काफी हैं। अभी जायेगी तो शोभा दी खरीद ही देंगीं और दो महीने के बाद उसके पास भी उसके वेतन के काफी पैसे जमा हो जायेंगे . वह जो चाहे खरीद लेगी। पर जब वापस काम पर आयी उसके दस दिन बाद ही उसकी भाभी ने एक पत्र भेजा अब  खुद लिखा या किसी और से लिखवा कर भेजा पर पत्र   का मजमून था कि  "'आप इतने दिन यहाँ रहीं, आपको अच्छा खिलाने-पिलाने के लिए हमें क़र्ज़ लेना पड़ा। अब उनके पैसे लौटाने हैं। आप पैसे भेज दो।" उसने वो पत्र  फाड़ कर फेंक दिया और फिर भाइयों के घर कभी  नहीं गयी। शोभा दी का घर ही ,अब उसका घर था।

 शालिनी बड़ी होती गयी। उसने कॉलेज पास किया और नौकरी भी करने लगी। उसकी शादी हो गयी। मालती बहुत अकेलापन महसूस करने लगी और उसी दरम्यान एक हादसा हो गया . सीढियों से फिसल कर उसने अपनी कमर की  हड्डी तुडवा बैठी। शोभा दी ने उसके इलाज़ का पूरा खर्च उठाया। हॉस्पिटल में उसके साथ रहीं। शालिनी ने भी ऑफिस से छुट्टी लेकर ,उसकी अच्छी देखभाल की . घर पर भी उसे पूरा आराम दिया। पर पूरी तरह ठीक होने के बाद भी अब वह पहले की तरह काम नहीं कर पाती। झुक नहीं पाती। जल्दी जल्दी काम नहीं निबटा पाती । मालती को बहुत बुरा लगने लगा। उसे लगने लगा , वो शोभा दी पर बोझ बन गयी है। मालती बार-बार उनसे मिन्नतें करने लगी  कि अब उसे छुट्टी दे दें . अब वो पहले की तरह उनके काम नहीं आ पाती। उसकी इलाज़ पर भी इतना खर्च हो गया है। वो कहीं और काम  करके अपना जीवन गुजार लेगी। उनपर बोझ  नहीं बनना चाहती  

पर उसने नाजुक वक़्त में शोभा दी की गृहस्थी संभाली थी ,उनकी अनुपस्थिति में उनकी बच्ची की प्यार से देखभाल की थी।  ये वो नहीं भूल पायीं थीं और उन्होंने एक छोटा सा फ़्लैट खरीद कर मालती को रहने के लिए दे दिया। शालिनी और शोभा दी ने फ़्लैट में सारा सामान भी जुटा दिया। उसे हर महीने खर्च के पैसे भी देतीं। शालिनी की गोद में एक नन्हा मुन्ना भी आ गया। मालती रोज शालिनी के घर जाकार उसके बच्चे की देखभाल करती  , घर के कामों में हाथ बंटाती। पर यह सब वह अपनी ख़ुशी से करती । उस पर किसी किस्म की बाध्यता नहीं थी।  इस छोटे से घर में वो अब अपनी मर्जी की मालकिन थी। 

चाय कब की ख़त्म हो चुकी थी। बाहर अँधेरा घिर चुका था। मालती सोचने लगी, कितने भी कष्ट आयें जीवन में अगर अपने कर्म अच्छे रखो तो अच्छे लोगों का साथ मिल ही जाता है।  अगर उसने सही समय पर सही निर्णय लेने की हिम्मत नहीं दिखाई होती अपना काम  मेहनत ,लगन और ईमानदारी  से नहीं किया होता तो आज वह इस शांतिपूर्ण जीवन की हक़दार नहीं होती।

उस दिन मालती को पार्क में रोज आ कर बैठने  वाले एक उम्रदराज़ अंकल ने एक शेर सुनाया था ,उसे पूरा समझ तो नहीं आया पर अपने पर सही लगा 

"दुःख  सबके मश्तरक हैं पर हौसले  जुदा 
कोई बिखर गया तो कोई मुस्करा दिया "

{दीपावली के मौके पर आशा और विश्वास भरी, नैराश्य से आस की ओर , अंधियारे से उजाले की ओर कदम बढ़ाती ये कहानी (पता नहीं अपनी लिखी कहानी के लिए ऐसा कहना चाहिए या नहीं पर अब तो कह दी :) )पोस्ट कर खुद ही अच्छा लग रहा है जबकि ये महज संयोग ही है ...

ये कहानी आकाशवाणी के लिए लिखी थी, जहाँ 9 मिनट में कहानी समेटनी पड़ती है। शायद आप सबकी अपेक्षाओं पर खरी न उतरे, 
पर वापस दुबारा लिखूंगी, इस चक्कर में कई बार लिखने का वक़्त भी नहीं मिला और स्क्रिप्ट भी खो गयी, कुछ कहानियाँ गुम  हो गयी हैं, इसलिए इसे वैसे का वैसा ही बिना कोई सुधार किये ब्लॉग पर डाल  दिया, आप सब तो झेल ही लेते हैं मेरा कुछ भी लिखा :):)



आप सबको दीपावली की असीम शुभकामनाएं 

14 comments:

  1. कहानी हकीकत के काफी करीब है।
    बहुत सुंदर प्रस्तुति

    दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएं

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  2. समाज में अच्‍छाई बहुत है, बस उसे प्रसारित नहीं किया जाता।

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  3. अच्छे लोग भी हैं पर बहुत कम ...।

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  4. आप और आपके पूरे परिवार को मेरी तरफ से दिवाली मुबारक | पूरा साल खुशिओं की गोद में बसर हो और आपकी कलम और ज्यादा रचनाएँ प्रस्तुत करे.. .. !!!!!

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  5. haatho me chai ke cup ke saath iss kahani ke saath judna achchha laga:)
    har achchhe ke saath lastly achchha hi hota hai:)
    deewali ki shubhkamnyaen!

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  6. चूँकि कहानी फ्लैश बैक में है, इसलिए आश्वस्त था कि उसके साथ कुछ भी बुरा नहीं हुआ होगा!! दुनिया भरी पड़ी है ऐसे राक्षसों से... कल ही टीवी पर एक सत्यकथा पर आधारित धारावाहिक पर ऐसी ही कहानी देखकर दिल दहल गया!!
    बहुत अच्छी है आपकी किस्सागोई भी!!

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  7. दिशा मिलती है यदि चाह हो तो .... मालती को जो लोग मिले, वैसे लोग कम होते हैं - पर होते हैं . मालती ने जिस तरह खुद में सिमटकर सम्मान की ज़िन्दगी बिताई - वह प्रशंसनीय है

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  8. dunia me achchhe log bhi hai is vishvas ko pukhta karti sundar kahani...

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  9. बहुत सुंदर ..... दीपावली की शुभकामनायें

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  10. कहानी बहुत प्रेरणादायी लगी। ऐसी घटना घट चुकी है हमारे सामने, इसलिए कोई आश्चर्य भी नहीं हुआ।
    मानना पड़ेगा कि कहानी लिखने में तुम महा-माहिर हो, जीवन के किस-किस कोने से क्या-क्या निकाल लाती हो ...गज़ब हो तुम भी :)

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  11. दिवाली के अवसर पर एक उजली सी छोटी कहानी लिखने के लिए शुक्रिया !

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  12. बहुत बड़ा सच बयान करती कहानी बेहद सुन्दर है
    यह एक आम जिंदगी की कहानी है |दीपावली पर हार्दिक शुभ कामनाएं |
    आशा

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  13. कहानी अँधेरे से उजाले की ओर बढ़ते क़दमों की है ह, जैसा की तुमने लिखा . हताश बच्चियों और मालकिनों , दोनों के लिए ही प्रेरणास्पद है . अच्छा लग रहा है की शालिनी और शोभा ने मालती की मदद की , वर्ना हम जैसे लोग मुसीबत सर पर पड़ने के नाम से मुंह फेर लेते हैं .
    ऐसी कहानियां साधन संपन्न लोगो के लिए एक अनुकरणीय उदहारण है .
    बहुत बढ़िया !
    त्यौहार की व्यस्तता में जाने कैसे पढना रह गया था!

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  14. अच्छा...कहानी....पढता हूँ आराम से

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भावना शेखर की नजर में "काँच के शामियाने "

भावना शेखर एक प्रतिष्ठित कवयित्री , कहानीकार और शिक्षिका हैं । शहर दर शहर विभिन्न साहित्यिक आयोजनों में शिरकत करती हैं यानि कि अति व्यस्...