Tuesday, June 19, 2012

मानसिक विकलांगता से कहीं बेहतर है,शारीरिक विकलांगता


सत्यमेव जयते प्रोग्राम में जब differently abled (जब अंग्रेजी में disabled शब्द की जगह इस शब्द का प्रयोग होने लगा है तो हमें भी हिंदी में 'विकलांग' की जगह किसी दूसरे उपयुक्त शब्द की खोज और उसका प्रयोग शुरू कर देना चाहिए.) लोगों से सम्बंधित 
प्रोग्राम देखा तो करीब तीन साल पहले ब्लोगिंग की शुरुआत  में ही लिखी ..अपनी ये पोस्ट याद आ गयी .

पर SMJ के उक्त एपिसोड के प्रसारण के समय ही  कहानी की समापन किस्त लिखी थी....और किसी भी गंभीर विषय से मन भाग रहा था सो एक हल्की-फुलकी पोस्ट लिख डाली..पर यह विषय मन में उथल-पुथल मचाता ही रहा. विकलांग लोगों की समस्या को  उक्त प्रोग्राम में काफी संजीदगी से उठाया गया.

उस प्रोग्राम में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही गयी कि हम ऐसे लोगों को  किसी पब्लिक प्लेस पर या अपने आस-पास भी  बहुत कम देखते हैं..और इसीलिए सहजता से उनकी उपस्थिति स्वीकार को नहीं कर पाते. और वे भी सामन्य लोगों की भीड़ में खुद को असहज महसूस करते हैं. 
हालांकि एक स्कूल के प्रिंसिपल की कही बात बहुत ही नागवार लगी कि "दूसरे बच्चों के पैरेंट्स आपत्ति जताते हैं..इसलिए हम विकलांग बच्चों को अपने स्कूल में एडमिशन नहीं दे पाते ." इच्छा तो हो रही थी कि आमिर खान उन्हें ये क्यूँ नहीं कहते.."जो पैरेंट्स ऐसे बच्चों के एडमिशन पर आपत्ति जताएं...उनके बच्चों को स्कूल में लेने से मना कर देना चाहिए" पर शायद स्कूल के प्रिंसिपल्स को उस प्रोग्राम में निमंत्रित किया गया होगा..इसलिए उनसे रुखाई से पेश आना गलत होता. पर सच तो यह है कि इस निर्णय का अधिकार स्कूल के पास होना चाहिए.  मेरे बच्चों के स्कूल में कई विकलांग बच्चे भी पढ़ते थे और अक्सर मैने बच्चों को ख़ुशी-ख़ुशी उन बच्चों की व्हील चेयर इधर उधर ले जाते हुए और उन्हें हर तरह की मदद करते हुए देखा है. अगर बचपन से ही वे उनके साथ बड़े होंगे तो जीवन में कभी भी उन्हें असामान्य या अपने से अलग नहीं समझेंगे. 

एक बात और बहुत दिल दुखाती है...किसी विकलांग बच्चे के साथ उसकी माँ की जिंदगी भी एकदम सिमट कर रह जाती है. पहली बात तो उन्हें बच्चे की देखभाल में काफी समय देना पड़ता है...अपने लिए वक़्त नहीं मिल पाता. और वे वक़्त निकाल भी लें तो  भी समाज में घुलने-मिलने से कतराने लगती हैं.
एक फ्रेंड की कजिन से एक बार मुलाकात हुई..जिनसे जल्द ही अच्छी दोस्ती हो गयी. वे जिंदगी से भरपूर थीं..किताबें पढ़ने..फिल्मे देखने.. घूमने का उन्हें बहुत शौक है...पर उनका बेटा एक स्पेशल चाइल्ड  है. यूँ तो वह सामान्य है..पर  उसे फिट्स पड़ते हैं...देश-विदेश में उसका इलाज करा चुकी हैं..पर पूरी तरह वह ठीक नहीं हो पाया. वे बताने लगीं..कि उनका लोगों से मिलना-जुलना ना के बराबर  है क्यूंकि सबलोग अपने बच्चों...उनके स्कूल..उनकी पढ़ाई..उनकी शरारतों की बातें करते हैं. जिनमे वे भाग नहीं ले पातीं. और ज्यादातर लोग उत्सुकता में ऐसी बातें पूछ डालते हैं.,.और ऐसी ऐसी सलाह दे जाते हैं..जो उनका दिल दुखा जाती है. 

यह तो सच है कि हमारा समाज ..इन लोगों के प्रति बहुत ही असंवेदनशील है. मेरी इस पुरानी पोस्ट में एक ऐसी ही घटना का जिक्र है...जिसमे शिक्षित और अपनी एक पहचान बना लिए लोगों की कमअक्ली और  ह्रदयहीनता अचरज में डाल देती है.


आज टी.वी.पर एक दृश्य देख मन परेशान हो गया.यूँ ही चैनल फ्लिप  कर रही थी तो देखा सोनी चैनल पर IPL के तर्ज़ पर DPL यानि 'डांस प्रीमियर लीग' का ऑडिशन चल रहा था.म्यूजिक और डांस प्रोग्राम मुझे हमेशा अच्छे लगते हैं.ऑडिशन भी अक्सर रियल प्रोग्राम से ज्यादा मजेदार होते हैं,इसलिए देखती रही.


भुवनेश्वर शहर से एक विकलांग युवक ऑडिशन के लिए आया था. दरअसल मैं यह सोच रही थी,इसे विकलांग क्यूँ कह रहें हैं या किसी को भी विकलांग कहते ही क्यूँ हैं? क्यूंकि अक्सर मैं देखती हूँ,वे लोग भी वे सारे काम कर सकते हैं,जो हमलोग करते हैं. और कई बार तो ज्यादा अच्छा करते है और वो इसलिए क्यूंकि वे जो भी काम करते हैं पूरी दृढ़ता और  दुगुनी लगन से करते हैं. साधारण भाषा में जिन्हें नॉर्मल या पूर्ण कहा जाता है,उनका ज़िन्दगी के प्रति एक लापरवाह रवैया रहता है. वे सोचते हैं,हम तो सक्षम हैं, हम सारे काम कर सकते हैं इसलिए ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं समझते जबकि जिन्हें हम विकलांग कहते हैं, वे अपनी एक कमी को पूरी करने के लिए पूरा  जी जान लगाकर किसी काम को अंजाम देते हैं और हमलोगों से आगे निकल जाते हैं.

अभी हाल ही में ,अखबार में एक खबर पढ़ी कि एक मूक बधिर युवक ने
वह केस जीत लिया है,जो पिछले 8 साल से सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था. उसने 8 साल पहले UPSC की परीक्षा पास की थी पर उसे नियुक्ति पत्र नहीं मिला था. अब उसे एक अच्छी पोस्ट पर नियुक्त कर दिया गया है. कितने ही हाथ,पैर,आँख,कान,से सलामत लोग आँखों में IAS का सपना लिए PRELIMS भी क्वालीफाई नहीं कर पाते. रोज सैकडों उदाहरण हम अपने आस पास देखते हैं या फिर अखबारों या टी.वी. में देखते हैं कि कैसे उनलोगों ने अपने में कोई कमी रहते हुए भी ज़िन्दगी की  लड़ाई पर विजय हासिल की.

पर उनलोगों के प्रति हमारा रवैया कैसा है?हमलोग हमेशा उन्हें हीन दृष्टि से देखते हैं और कभी यह ख्याल नहीं रखते कि हमारे व्यवहार या हमारी बातों से उन्हें कितनी चोट पहुँचती है.
आज ही टी.वी. पर देखा,उस लड़के के दोनों हाथ बहुत छोटे थे.पर वह पूरे लय और ताल में पूरे जोश के साथ नृत्य कर रहा था. नृत्य गुरु 'शाईमक डावर' भी जोश में उसके हर स्टेप पर सर हिलाकर दाद दे रहे थे. पर जब चुनाव करने का वक़्त आया तो दूसरे जज 'अरशद वारसी' ने जो कहा, उसे सुन शर्म से आँखें झुक गयीं. 
उनका कहना था ''अगर भगवान कहीं मिले तो मैं उस से पूछूँगा,उसने आपको ऐसा क्यूँ बनाया ??(अगर कहीं हमें भगवान मिले तो हम पूछना चाहेंगे ,उसने 'अरशद वारसी' को इतना कमअक्ल क्यूँ बनाया.??)तुम हमलोगों से अलग हो और यह हकीकत है,इसलिए तुम्हे दूसरे राउंड के लिए सेलेक्ट नहीं कर सकते." बाकी दोनों जजों की भी यही राय थी. शाईमक ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर नाकामयाब रहे.

सबसे अच्छा लगा मुझे,अरशद से उसका सवाल करना. उसने मासूमियत से पूछा-- "मैं साईकल,स्कूटी,कार,चला लेता हूँ,पढ़ा लिखा हूँ,एक डांस स्कूल चलाता हूँ,लोगों को डांस सिखाता हूँ,फिर आपलोगों से अलग कैसे हूँ?" अरशद के पास कोई जबाब नहीं था. वे वही पुराना राग अलापते रहें--"तुम इस प्रतियोगिता में आगे नहीं बढ़ सकते,इसलिए तरस खाकर तुम्हे नहीं चुन सकता"...किस दिव्यदृष्टि से उन्होंने देख लिया की वह आगे नहीं बढ़ सकता,जबकि शाईमक को उसमे संभावनाएं दिख रही थीं. और उन्हें तरस खाने की जरूरत भी नहीं थी क्यूंकि वह जिस कला को पेश करने आया था,उसमे माहिर था,अरशद ने एक और लचर सी दलील दी कि 'मैं नाटे कद का हूँ तो मैं ६ फीट वाले लोगों की प्रतियोगिता में नहीं जाऊंगा.इसलिए तुम भी प्रतोयोगिता में भाग मत लो...डांस सिखाते हो वही जारी रखो"..तो क्या उसे आगे बढ़ने का कोई हक़ नहीं? उसकी दुनिया भुवनेश्वर तक ही सीमित रहनी चाहिए?  
अरशद वारसी ऐसी कोई हस्ती नहीं जिनका उल्लेख किया जाए.पर वह एक नेशनल चैनल के प्रोग्राम में जज की कुर्सी पर बैठे थे. इसकी मर्यादा का तो ख्याल रखना था. करोडों दर्शक उन्हें देख रहे  थे.ज्यादातर ये प्रोग्राम बच्चे देखते हैं,उन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? वो भी यहो सोचेंगे,ये लोग हमलोगों से हीन हैं,और ये हमारे समाज में शामिल नहीं हो सकते .
 
मुझे तो लगता है किसी विकलांग और नॉर्मल व्यक्ति में वही अंतर होना चाहिए जो किसी गोरे-काले, मोटे-पतले, छोटे-लम्बे, में होता है.जिनके पैर में थोडी खराबी रहती है वह ठीक से चल नहीं पाते. कई,बहुत मोटे लोग भी ठीक से चल नहीं पाते तो हम उन्हें विकलांग तो नहीं कहते? 
अगर हम इनमे भेदभाव करते हैं और इन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं तो ये हमारी 'मानसिक विकलांगता' दर्शाती है

43 comments:

  1. नेशनल टीवी पर जितने भी इस तरह के कार्यक्रम होते हैं उनमे से अधिकतर जज वैसे होते हैं जिन्हें शायद उस कुर्सी पर बैठना ही नहीं चाहिए..और अरशद वारसी का वो बयान जब मुझे ये पढ़ते वक्त बुरा लग रहा है तो उन्हें कैसा लगा होगा, यही सोच रहा हूँ...

    और दीदी सत्यमेव जयते का वो एपिसोड को देख कर ख्याल आया - हैट्स ऑफ टू यु आमिर, ऐसे मुद्दों को सामने लाने के लिए!

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    1. बिलकुल अभी,
      हम जैसे जाने कितने लोग इन विषयों पर लिख चुके हैं...(इसी ब्लॉग पर मैने भी...domestic violence ,child sexual abuse जैसे सामाजिक मुद्दों पर लिखा है ) कितने बड़े बड़े लेखक इन मुद्दों पर कलम चला चुके हैं...टी.वी. पर भी कार्यक्रम प्रसारित किए जाते रहे हैं.पर आमलोग या तो पढ़ते/देखते नहीं...या फिर भूल जाते हैं और इन्हें आत्मसात नहीं करते. पर आमिर की बात पूरा देश सुन रहा है...और यह सहज स्वाभाविक है...अभिनेता..हमेशा से हमारे प्रिय होते हैं.

      एक बात और कहना चाहूंगी..'आमिर' इस प्रोग्राम के तहत कोई समाज-सेवा नहीं कर रहे. वे अच्छे पैसे ले रहे हैं...पर यही बात है कि वो सही तरीके से पैसे कमा रहे हैं...पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं. वे एक अभिनेता हैं...और उसका पूरा लाभ उठा..बहुत अच्छी तरह इन मुद्दों को
      जनता के समक्ष प्रेजेंट कर रहे हैं. और उनके और उनकी टीम की इस प्रेजेंटेशन की जितनी भी तारीफ़ की जाए ,कम है.

      एक घटना याद आ गयी. मेरे बच्चों के स्कूल के एक वार्षिक कार्यक्रम में 'गोविंदा' को बुलाया गया था. हमलोगों को बुरा भी लगा...एक शिक्षण संस्थान में किसी लेखक-विचारक को बुलाना चाहिए. पर जब गोविंदा ने अपने भाषण में कहा, "बच्चों तुमने भगवान को नहीं देखा है...इसलिए अपने माता-पिता को ही भगवान समझो और उनका कहना मानो.: और जब उनके इस कथन पर सारे बच्चों ने देर तक तालियाँ बजायीं.तब मुझे समझ में आया कि यही बात कोई लेखक/विचारक् कह रहा होता तो बच्चे ताली बजाना तो दूर शायद सुनते भी नहीं...पर गोविंदा की बात याद रखेंगे.

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    2. जो लोग इस कार्यक्रम का विरोध कर रहे हैं उन्हें यही बात मैं भी कहता हूँ...की एक बड़ा सेलिब्रिटी जब किसी बड़े मंच से वैसी बात कहता है तो उसका समाज के एक बड़े वर्ग पर सीधा असर पड़ता है....लेकिन कुछ कमअक्ल लोग ये बात समझ ही नहीं सकते..समझने के लिए अक्ल का होना जरूरी है, जो उनके पास नहीं...

      और आपने सही कहा दीदी..ब्लॉग पर, पत्रिकाओं में,अख़बारों में इन मुद्दों पर बहुत बात हो चुकी है और टी.वी पर भी इसे कई बार दिखाया गया, लेकिन आमिर का शो आम लोगों तक पहुँच रही है, वहीँ पहले ये बातें भी आम लोग थोड़ा इग्नोर करते थे, और अगर नहीं भी करते थे इग्नोर तो सोचने पर विवश तो नहीं ही होते थे..कम से कम आमिर के कार्यक्रम से लोगों में जागरूकता तो आई ही है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता..

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    3. @अभी,
      मैने भी आमिर की आलोचना करते फेसबुक पर कई लोगों के स्टेटस देखे हैं..पर लोगों को ये समझना चाहिए....यहाँ भी आमिर एक रोल अदा कर रहे हैं..एक अच्छे कार्यक्रम-निर्माता और एक अच्छे प्रेजेंटर का. ये उनका काम है...अगर वे अपना काम अच्छी तरह निभा रहे है..तो उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए. कार्यक्रम में कोई कमी होती है, तो भले ही उसकी आलोचना करे.

      लेकिन आमिर की निजी जिंदगी से उनके इस कार्यक्रम के निर्माण को जोड़ कर देखना मुझे सही नहीं लगता . आखिर उन्होंने फ़िल्में भी बनाई हैं...तब
      उनकी फ्लिमों की तो आलोचना इस बात पर नहीं की गयी कि...'उन्हें 'तारे ज़मीन पर' बनाने का क्या हक़ है..जबकि उन्होंने दूसरी शादी कर ली है?'

      कई बार उन्होंने समाज के किसी ज्वलंत मुद्दे पर सामाजिक कार्यकर्ताओं का साथ दिया है....तब भी ये सवाल किए जा सकते थे.."उन्हें क्या हक़ है...वे तो निजी जिंदगी में अपनी पत्नी को धोखा दे चुके हैं' पर जब ये सारे सवाल नहीं किए गए तो अब इस कार्यक्रम के निर्माण पर क्यूँ किए जा रहे हैं.

      ना तो आमिर खान कोई मसीहा हैं...ना ही कोई निकृष्ट व्यक्ति. वे एक अच्छे कलाकार और एक अच्छे निर्माता हैं और अपने इस रूप को भलीभांति निभा रहे हैं.उनके बनाए कार्यक्रम का लेखा-जोखा एक कार्यक्रम की गुणवत्ता के आधार पर ही करना चाहिए .

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  2. देखा था वो अरशद वाला एपिसोड............
    कमअक्ली की मिसाल दी थी उसने.....मानसिक विकलांगता का तो कोई इलाज नहीं है न....
    आपको इस सार्थक लेखन के लिए बधाई.

    अनु

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  3. रश्मि जी
    कई बार हम ऐसे लोगों का अनजाने में भी दिल दुखा देते है जबकि हमारा इरादा ऐसा नहीं होता है और हम समझ नहीं पाते है | हमारे घर के नीचे से कई नेत्रहीन आते जाते रहते है और उन्हें अच्छे से रास्ता पता होता है किन्तु एक दिन एक अकेले से गलती हो गई और वो किनारे पे खड़ी करो के पीछे बंद रास्ते पर चले गये अचानक मैंने अपनी दूसरी मंजिल से उन्हें देखा वो परेशान हो रहे थे उन्हें रास्ता नहीं मिल रहा था जिधर भी जाते उधर ही रास्ता बंद मिलता वहा कबाड़ भी पड़ा था जिनसे उन्हें चोट लग सकती थी उस समय मेरी बेटी काफी छोटी थी मैंने सोचा ताला बंद कर नीचे जा कर उनकी क्या मदद करना मै यही से नीचे जा रहे किसी व्यक्ति को बोल देती हूं मैंने कई लोगों को ऊपर से आवाज दी दो तीन लोगों ने सुना नहीं तभी एक उम्र दराज और देखने में कम बढ़े लिखे व्यक्ति ने ऊपर देखा मुझे लगा की मै यदि कुछ और शब्द कहूँ तो वो समझा नहीं पायेंगे इसलिए तुरंत ही हड़बड़ी में कह दिया " अरे देखीये वो अंधे है देख नहीं पा रहे है गलती से कार पार्किंग के पीछे चले गये है उन्हें रास्ता बता दे " बस मुँह से कहा ही था की अपनी गलती का एहसास भी हो गया पर बात जुबान से निकल चुकि थी दूसरी मंजिल से थोडा तेज आवाज में मैंने कहा था तुरंत ही लगा की शायद अँधा शब्द की जरुरत नहीं थी उन्होंने सुना होगा तो शायद उन्हें बुरा लगा होगा और हो सकता हो ये भी सोचे की उन्हें किसी मदद की जरुरत ही नहीं थी वो खुद ही देर से ही सही बाहर आ जाते , किन्तु हम सभी की जैसे आदत होती है की हम जिन्हें लाचार ही समझते है उसे आगे बढ़ तुरंत मदद कर देते है चाहे उसे उसकी जरुरत हो या ना हम बच्चो को भी अपने काम में परेशान देखते है तो आगे बढ़ कर उसे आसान कर देते है | टिप्पणी में आमिर के शो के लिए कही गई आप की बात से बिल्कुल सहमत हूं |

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    1. अंशुमाला जी,
      आपने कोई उन्हें चोट पहुंचाने..या मखौल उड़ाने या किसी लापरवाही से उस शब्द का प्रयोग नहीं किया...आपकी मंशा सही थी.
      बुरा तो तब लगता है...जब नीची नज़र से देखते हुए कोई ऐसा कह डाले.

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  4. मैंने वो कार्यक्रम तो नहीं देखा जिसकी आप बात कर रही है और ना ये जानती हूं की प्रतियोगी किस तरह का विकलांग था फिर भी एक सामान्य बात कहना चाहूंगी | अरशद ने जो कहा मुझे उसमे सब कुछ गलत नहीं लगता है पहले तो उन्हें कार्यक्रम बनाने वालो की तरफ से ही निर्देश मिला होता है की वो उन्हें शामिल ना करे बल्कि विकलांगो को प्रतियोगिता तक लाया ही टी आर पी के लिए जाता है दूसरे अरशद ने वही कहा जो ज्यादातर लोग सोचते है और उसका एक अंश सच भी है एक कार्यक्रम में मैंने देख था पैरो से विकलांग लड़की योग करने आई और उसकी प्रतियोगिता सामान्य लड़की से थी उसने आते ही जज से कहा की आप मुझे सामान्य मान कर जज कीजियेगा किसी दया के तहत नहीं वो प्रतियोगिता हार गई क्योकि सामान्य लड़की ने अपने पैरो की शक्ति के कारण ज्यादा कठिन योग किये जबकि दूसरे के पैर ठीक नहीं थी वो बस कुछ खास योग ही कर सकी जो शरीर के ऊपरी हिस्से से कर सकते है | इसे ऐसे समझिये की जिसे हाथ नहीं है वो अपने पैरो से, अपने मुँह से ब्रश पकड़ कर भी शानदार चित्रकारी कर सकता है और किसी भी सामान्य व्यक्ति से प्रतियोगिता कर सकता है, सिर्फ बोलने की शक्ति रखने वाला बहुत ही अच्छा गा सकता है और किसी भी सामान्य व्यक्ति से प्रतियोगिता कर सकता है किन्तु जिसके पैर ही नहीं है वो दौड़ में कैसे भाग ले सकता है अपने पहिये वाली कुर्सी से वो ऐसा नहीं कर सकता है क्योकि ये दो अलग चीजे है वो जीत सकता है अपने हाथ की शक्ति के बल पर पर बात बराबरी वाली नहीं होगी और जिसे हाथ नहीं है वो पंजा लड़ने की प्रतियोगिता नहीं कर सकता किन्तु वो बड़े आराम से किसी सामान्य व्यक्ति को दौड़ाने में हरा सकता है | योग करने या डांस करने में हमें शरीर के लगभग हर अंग का सही प्रयोग करना होता है यदि कही भी कोई कमी है तो आप प्रतियोगिता में आगे नहीं बढ़ सकते है और बिल्कुल यही बात सामान्य व्यक्ति पर भी लागु होता है जिसके पूरे शरीरत का तालमेल नहीं है वो आगे नहीं बढ़ सकता है उसे पहले ही दौर में बाहर कर दिया जाता है भले कहा जाये की आप ने अच्छा किया है |

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    1. आपका कहना सही है कि शायद TRP के लिए विकलांग लोगों को शामिल किया जाता हो...जज-प्रतिभागियों की बातें भी अधिकतर स्क्रिप्टेड रहती हैं. पर कोई लिखी हुई बात भी जज को सही ना लगे तो वो बोलने से इनकार कर सकता है. 'अरशद ' ने चाहे सच्ची बात कही हो...पर उनके कहने का अंदाज़ बिलकुल गलत और अपमानजनक था.

      और वहाँ 'शाईमक डावर' भी थे....जिनका 'नृत्य-सम्बन्धी ज्ञान' निश्चय ही 'अरशद वारसी' से अधिक होगा..और वे बार-बार अरशद वारसी को कन्विंस करने की कोशिश कर रहे थे...पर अरशद वारसी की दलील सिर्फ यही थी..." तुम अलग हो,इसलिए आगे नहीं बढ़ सकते "..अगर वे उसके नृत्य पर टिप्पणी करते कि ये स्टेप सही नहीं किया..वगैरह..तो उनकी बात समझी जा सकती थी.

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  5. हम कहते हैं कि किसी की कमी को इन्गित मत करो , पर करते जाते हैं ....

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  6. "जो पैरेंट्स ऐसे बच्चों के एडमिशन पर आपत्ति जताएं...उनके बच्चों को स्कूल में लेने से मना कर देना चाहिए"
    कि आपके बच्चे हमारे स्कूल के लायक नहीं हैं।
    उपरोक्त पंक्तियां कही गई थी जी उस एपिसोड में

    एक और एपीसोड में सुश्री रश्मि आनंद जी (लेखिका और सलाहकार) ने आपकी अभी पूर्ण हूई कहानी से मिलती-जुलती आपबीती सुनाई है।

    प्रणाम

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    1. अंतर जी,
      बाद में डिस्कशन के समय वे बातें कहीं गयीं. पर जब उन प्रिंसिपल महोदया ने मुस्कुराते हुए सारा दोष पैरेंट्स के मत्थे मढ़ते हुए ऐसे बच्चों को एडमिशन देने में असमर्थता जताई तो उस वक़्त उन्हें कोई जबाब नहीं दिया गया.
      'सत्यमेव जयते' में कुछ महिलाओं की आपबीती सुन मुझे भी लगा...'लोग अब मेरी कहानी पर आपत्ति जताना छोड़ देंगे कि कहानी में सब अतिशयोक्ति या कपोल कल्पना है.'

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  7. दुनिया में खूबसूरती का एक पैमाना बना रखा है जो भी उसमें फिट होता है वह दुनिया के लायक बन जाता है और जो नहीं होता वह बेचारा बनकर रह जाता है। विकलांग के अलावा भी न जाने कितने भेद है इस दुनिया में।

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    1. सही कहा..अजित जी आपने.

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    2. (१)
      दुनिया में ख़ूबसूरती का कोई एक पैमाना नहीं होता ! हो भी नहीं सकता ! हो ही नहीं सकता ! यदि आपके संज्ञान में कोई पैमाना है तो कृपा कर मुझे ज़रूर बताइयेगा ?

      (२)
      इस मुद्दे को ख़ूबसूरत होने या नहीं होने के चश्में से नहीं देखा जा सकता !

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  8. आपकी पोस्‍ट पता नहीं क्‍यों खुल नहीं रही है, किसी दूसरे प्रकार से खोलकर टिप्‍पणी कर पा रही हूं।

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    1. पता नहीं क्या प्रॉब्लम है...सॉरी ही कह सकती हूँ,इस असुविधा के लिए.

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  9. बहुत संवेदनशील विषय है . इस विषय पर लोगों की सोच भिन्न भिन्न हो सकती है . लेकिन सही सोच बनाना और उसे अपनाने के लिए लोगों का जागरूक होना आवश्यक है .विकलांग होना व्यक्ति विशेष की लिए भले ही कष्टदायक हो , लेकिन ऐसे लोग अतिरिक्त साहस और साधना का प्रयोग कर स्वयं को कुशल बना लेते हैं . इनके साथ पक्षपात करना अत्यंत दुखद और भर्त्सनीय है .

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  10. सार्थक लेख और सार्थक चिंतन ... ये संवेदनशील न होने की समस्या अपने देश में ज्यादा होती जा रही है .. कई बार लगता है की अपने देश में हर कोई अंधी दौड़ में दौड़ रहा है ... दुबई और इसके अलावा कई जगहों में इंसान की कद्र देखी है मैंने ... लोग संवेदनशील हैं इंसानियत के मुद्दे पे ...

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  11. बहुत सही कहा है आपने ... सार्थकता लिए सटीक प्रस्‍तुति

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  12. सत्यमेव जयते प्रोग्राम में जब differently able (जब अंग्रेजी में disable शब्द की जगह इस शब्द का प्रयोग होने लगा है तो हमें भी हिंदी में 'विकलांग' की जगह किसी दूसरे उपयुक्त शब्द की खोज और उसका प्रयोग शुरू कर देना चाहिए.....
    @ 'राजीव गांधी फाउंडेशन' शरीर से विकलांगों के लिये प्रति वर्ष 'मोटर साइकिल' देने का कार्यक्रम करता है. हजारों की संख्या में आवेदन आते हैं... जिसमें कम-से-कम ६० प्रतिशत विकलांगता वालों के आवेदनों पर विचार किया जाता है. कई तरह के अनुभव हैं जो आपसे बांटते हुए मुझे प्रसन्नता होगी :
    — हमारे वरिष्ठों ने और इस प्रोग्राम से जुड़े सदस्यों ने 'विकलांग' शब्द को इतना घृणास्पद मान लिया है कि उसके स्थान पर .. स्पेशल नीड, फिजिकल चैलेञज़्ड, डिसेबल, डिफरेन्टली एबल जैसे संबोधनों को प्रतिष्ठित किया जा रहा है. मेरा मानना है कि 'यह सोच ही संकीर्ण है'.
    — जब से अंग्रेज़ी शब्दों की आम बोलचाल में बाढ़ सी आयी है... तब से ही हमें हिंदी के बहुत से शब्दों से शिकायत होने लगी है. यथा कई शब्द हमें अत्यधिक उत्तेजक और आक्रामक प्रतीत होते हैं. कई शब्दों से इतनी एलर्जी हो गई है कि उनका उच्चारण करने से ही बचते हैं. कई गाली-गलौज के शब्द अंग्रेजी में तो स्वीकार हैं लेकिन हिंदी के बर्दाश्त नहीं होते. उदाहरण *....
    — *इग्नू के पाठ्क्रम के बनते समय कई प्रोफ़ेसर और रीडर अंग्रेजी शब्दों के हिन्दी अनुदित रूपों को हज़म नहीं कर पा रहे थे...
    'सेक्स' या 'जेंडर' जैसे शब्दों के लिये वे 'लिंग' शब्द को पचा नहीं पा रहे थे... उस शब्द को लेकर उनके मानस में न जाने कैसे आकार-प्रकार उभर रहे थे... वे उसके लिये

    'जेंडर भेद' ही करने को कहते थे... मैंने उनसे कहा.... फिर तो पुर्लिंग, स्त्रीलिंग, और शिवलिंग जैसे शब्दों को भी नया रूप दिया जाना चाहिए. :)



    — विकलांगता के लिये समुचित शब्द लाने के लिये वरिष्ठों के कहने पर हमारी बुद्धि के घोड़े भी दौडाए गये.... '

    'स्पेशल नीड' के लिये ---- जरूरत विशेष वाले

    फिजिकल चैलेञज़्ड के लिये ---- शारीरिक चुनौतीग्रस्त(ता)

    डिसेबल के लिये ----- '........ अक्षम'

    डिफरेन्टली एबल ----- अलग क्षमता वाले'



    हिन्दी के 'विकलांग' शब्द के प्रति समस्त दुराग्रह समाप्त करने होंगे.... यदि इसका अर्थ भलीभाँति हम समझ पाये तो यह 'बेचारगी' वाला अनुभव नहीं कराएगा. हम ऐसे शब्द संबोधन क्यों गढ़ते हैं? क्या केवल इसलिये कि किसी को अपमानित कैसे किया जा सकता है? या इसलिये कि वह अन्यों से कमतर की अनुभूति कराने के लिये यह सम्पूर्ण अंगों वालों की साजिश है.

    मुझे नहीं लगता कि यह सच है.... पिछले दिनों एक विकलांग अपने क्षेत्र के किसी विधायक की सिफारिश लेकर हमारे कार्यालय आया.... उसने अपना नाम 'राजेन्द्र सिंह विकलांग' बताया. उसे खुद को 'विकलांग' कहने में हिचक नहीं थी... क्योंकि वह उसे अपनी पूरी पहचान बताने में सहायक 'विशेषण' मान रहा था.

    — हम जब पिछले वर्षों में दी गई मोटर साइकिल्स के चालकों से उनके घर-घर जाकर सर्वेक्षण कर रहे थे.... 'प्रश्नावली' भरते हुए 'चुनौतीग्रस्त' शब्दों को समझाने के लिये उन्हें उसका अर्थ 'विकलांग' ही बताना पड़ रहा था.... वे अपने लिये नये संबोधन को पाकर मुस्कुरा रहे थे... और हम भी.

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  13. विकलांग = अंग (के अभाव) से दुखी.

    अंग (पार्ट्स) की क्षमता कमतर होने के कारण जब कार्य सुविधा से नहीं हो पाता अथवा पूर्णता के साथ नहीं होता... तब यह दुःख मन को सालता है....

    यह विकलता (दुःख) बहुत कष्ट देती है. शब्द से उतना कष्ट नहीं होता जितना अंग की क्षमता में कमी से होता है.

    शब्द तो पहचान सूचक मात्र हैं....

    काले को कल्लू, लंगड़े को पंगु, नेत्रहीन को अंधा या सूरदास.... कहना केवल अन्यों को सही-सही अर्थ की प्रतीति करना है.

    सूरदास जी अपने एक पद में कहते हैं

    "चरण कमल बंदौ हरि राई.

    जा की कृपा पंगु गिरी लंघे, अंधे को सब कुछ दरसाई."

    ........ यहाँ सूरदास जी पंगु और अंधे संबोधनों को त्याज्य नहीं मानते... शब्द वही बोले जाने चाहिए जो बहुतों के समझ में सरलता से आ जाएँ...

    कम-से-कम भाषा में तो राजनीति नहीं होनी चाहिए..... हिन्दी का हर शब्द 'चमार' की तरह ही यदि तिरिस्कार पाता रहा तो हमारी रोजमर्रा की बोलचाल में हिन्दी के शब्दों का बेहद अभाव हो जायेगा.

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    1. प्रतुल जी,
      बहुत ख़ुशी हुई जानकर कि आप इतने अच्छे कार्यों से जुड़े हुए हैं...और यह सहायता सही जगह पहुँच रही है.

      मैने विकलांग की जगह 'disable ' के प्रयोग की बात नहीं कही..(जैसा अपने अपनी टिप्पणी में लिखा है ) disable और विकलांग से नकारात्मकता का बोध होता है....इसीलिए किसी दूसरे शब्द की बात कही.

      पर आपकी बात भी सही है...जो शब्द उपलब्ध हैं वही हमारी बोलचाल का हिस्सा नहीं हैं तो नए शब्द कहाँ से अपनाए जायेंगे

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  14. सत्यमेव जयते की जितनी तारीफ़ की जाये कम ही है ! इसमें कोई संदेह नहीं लेखक, विचारक और दार्शनिकों से अधिक विश्वसनीयता आम लोग अभिनेता अभिनेत्रियों की कही बातों में ढूंढ पाते हैं क्योंकि उनके व्यक्तित्व का प्रभाव हर पल उनके दिलो दिमाग पर छाया होता है ! इसीलिये उनकी कही बातें उन्हें गहराई तक आंदोलित करती हैं ! आमिर भले ही इस प्रोग्राम से पैसे कमा रहे हों लेकिन जिस निष्ठा, ईमानदारी और गंभीरता के साथ इस कार्यक्रम में उठाये गये मुद्दों को वे गहन शोध के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं और एक सामाजिक चेतना जगाने का प्रयास कर रहे हैं वह काबिले तारीफ़ है !

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    1. सही कह रहीं हैं,साधना जी
      कार्यक्रम बहुत ही अच्छा बना है...

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  15. इस बात से मैं भी सहमत हूं कि जो शब्द प्रचलित हैं, उन्हें बदलने की कोशिश करने की बजाय हमें उन लोगों के प्रति अपनी मानसिकता बदलने की कोशिश करनी चाहिए। वे हमसे कहीं भी कम नहीं हैं और जैसे सामान्य लोगों में अलग अलग आईक्यू यानी बुद्धिमत्ता वाले लोग होते हैं, वैसे ही उनमें एक चीज थोड़ी कम तो कुछ चीजें अधिक होती हैं। कोई भी इनसान पूर्ण नहीं होता। हमारे अपने अंदर सौ खामियां होती हैं, तो हम सिर्फ अपने अंग सही-सलामत होने के कारण खुद को सामान्य क्यों मानते हैं? उन्हें विशेष या differently abled मानने की जरूरत नहीं है, बस उनसे सामान्य व्यवहार कीजिए, जहां मदद की जरूरत हो, मदद कीजिए। लेकिन तरस न खाइए। वे हमसे एक चीज में कमतर तो बहुत चीजों में बेहतर हो सकते हैं...

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    1. सही कहा,जरूरत है,सामान्य व्यवहार की...या तो लोग तरस खाते हैं..या फिर उपेक्षा दिखाते हैं.

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  16. आया तो था मैं कहानी पढना शुरू करने, पर ये पोस्ट दिख गई।
    मैं आमिर को कितना पसंद (नहीं) करता ये अलग बात है, पर आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ - असंवेदनशीलता बिकुल भी ठीक नहीं।

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    1. कहानी तो बहुत लम्बी है...और संभवतः आप युवाओं की रूचि वाली भी नहीं...
      पर मुझे लगा था..पिछली कॉफी वाली पोस्ट आपको पसंद आएगी...पर शायद आपकी नज़र नहीं पड़ी. :):)

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    2. पड़ी न, और कहानी पर भी है।
      मैं सफाई नहीं दे रहा, पर आजकल लैपटॉप खोलने तक का एकमुश्त समय नहीं निकाल पा रहा।
      खैर, आएगा, समय कैसे नहीं आएगा :)
      और रुचियाँ, हम्म! युवाओं वाली रुचियाँ कितनी हैं पता नहीं, लेकिन कहानी तो पढनी है मुझे! :):)

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  17. वे हमारे ही हिस्से हैं, भला अलग कैसे हुये..

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  18. आपने लिखा है, 'एक बात और कहना चाहूंगी..'आमिर' इस प्रोग्राम के तहत कोई समाज-सेवा नहीं कर रहे. वे अच्छे पैसे ले रहे हैं...पर यही बात है कि वो सही तरीके से पैसे कमा रहे हैं...पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं. वे एक अभिनेता हैं.'


    यह तो रही आमिर की बात‍। लेकिन रश्मि जी मेरे ख्‍याल से समाज सेवा की सही परिभाषा यही है कि अपना काम पूरी निष्‍ठा और ईमानदारी से करो। चाहे पैसे लेकर करो,चाहे बिना पैसे के। आखिरकार समाज सेवा करने वालों को भी अपना जीवन चलाना होता है।

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  19. वैचरिक स्टार पर बदलाव लाना ही होगा ..... कथनी अ लग और करनी अलग की सोच का दायरा अब तो टूटे....

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  20. रश्मि बिलकुल सच ...मैं सौ फीसदी तुमसे इतेफाक रखती हूँ .....मेरा तो यह मानना है ..की उन्हें कोई भी विशेषण क्यों दिया जाये...क्यों....differently disabled, ..या कुछ और ..क्यों ....यही "शब्द" इन्हें एक अलग category में खड़ा कर देते हैं...क्या ज़रुरत है उसकी ....

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  21. सुंदर रचना एवं अभिव्यक्ति  "सैलानी की कलम से" ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा है।

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  22. सत्यमेव जयते देखने के बाद ...लेख की सार्थकता बढ़ जाती हैं ...

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  23. इंसानी फितरत के मुताबिक ...सोच और समाज को बदलना बहुत कठिन हैं ...पर अब बदलाव जरुरी हैं ...

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  24. सही कहा तुमने रश्मि अब 'विकलांग' शब्द बदलना चाहिए...
    आमीर खान की तारीफ़ होनी ही चाहिए, और कुछ नहीं तो कम से कम इन मुद्दों को उठाने से कई अच्छी बातें सामने आ रहीं हैं, जैसे किसी कंपनी ने ७०% विकलांग लोगों को हायर किया हुआ है, जैसे एक स्कूल जहाँ ऐसे बच्चों को शिक्षा मिल रही है..जिन्होंने ने ऐसे काम कीये हैं उन 'हीरोज' को हम देख पा रहे हैं...
    भारत के सन्दर्भ में मैं ज्यादा नहीं बता पाऊँगी, लेकिन कनाडा में ऐसे स्पेशिअल नीड वाले बच्चों और बुजुर्गों के लिए बहुत सुविधाएं हैं...समाज में इनको दया या तिरस्कार से नहीं बिल्कुल ऐसे ही देखा जाता है, जैसा एक इन्सान दूसरे इन्सान को देखता है...प्रेमभाव से..

    अभी जो मैंने प्रोजेक्ट किया है जिसमें २००० से ऊपर मैंने फिल्में बनायीं, मुझे हर फिल्म का मूक-बधिर वर्जन भी बनाना था, जिस साइन लैंगुएज इन्टरप्रेटर को मैंने हायर किया, वो मूक भी है और बधिर भी, उसके साथ मुझे एक और व्यक्ति हायर करना पड़ा जो उसकी मदद कर सके, क्यूंकि हम अगर कुछ बोले तो वो सुन नहीं सकता और वो जो साइन करेगा हम समझ नहीं पायेंगे...ऐसे लोगों के साथ हमेशा कोई न कोई इन्टरप्रेटर रहता है...किसी भी पब्लिक प्लेस, मीटिंग, ऑफिस, कोर्ट, या कहीं भी इनकी सहायता के लिए लोग रहते हैं...
    हमारे यहाँ की सभी बसें, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पब्लिक प्लेसेस, इनकी सुविधा के हिसाब से बनी हुई है, इनके लिए पार्किंग की व्यवस्था हर जगह है, इनको मासिक भत्ता (Disability Benefit) इतना मिल जाता है की अपना जीवन यापन बहुत अच्छे से कर सकते हैं, सारी मेडिकल सुविधायें मुफ्त हैं, जो नौकरी करना चाहते हैं उनको नौकरी दी जाती है, इनको अगर शोपिंग करनी है तो सिर्फ़ बताना है, गाड़ी आती है, मॉल में लेकर जाती है, फिर घर पर भी छोड़ कर जाती है...ये सारी की सारी सुविधाएं बुजुर्गों के लिए भी उपलब्ध हैं...हमारे टैक्स के पैसों से मिनिस्टर अपना घर नहीं भरते, सही काम में खर्च करते हैं..
    बहुत ही अच्छा आलेख...हमेशा की तरह..


    अभी जो मैंने प्रोजेक्ट किया है जिसमें २००० से ऊपर मैंने फिल्में बनायीं, मुझे हर फिल्म का मूक-बधिर वर्जन भी बनाना था, जिस साइन लैंगुएज इन्टरप्रेटर को मैंने हायर किया, वो मूक भी है और बधिर भी, उसके साथ मुझे एक और व्यक्ति हायर करना पड़ा जो उसकी मदद कर सके, क्यूंकि हम अगर कुछ बोले तो वो सुन नहीं सकता और वो जो साइन करेगा हम समझ नहीं पायेंगे...ऐसे लोगों के साथ हमेशा कोई न कोई इन्टरप्रेटर रहता है...किसी भी पब्लिक प्लेस, मीटिंग, ऑफिस, कोर्ट, या कहीं भी इनकी सहायता के लिए लोग रहते हैं...
    हमारे यहाँ की सभी बसें, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पब्लिक प्लेसेस, इनकी सुविधा के हिसाब से बनी हुई है, इनके लिए पार्किंग की व्यवस्था हर जगह है, इनको मासिक भत्ता (Disability Benefit) इतना मिल जाता है की अपना जीवन यापन बहुत अच्छे से कर सकते हैं, सारी मेडिकल सुविधायें मुफ्त हैं, जो नौकरी करना चाहते हैं उनको नौकरी दी जाती है, इनको अगर शोपिंग करनी है तो सिर्फ़ बताना है, गाड़ी आती है, मॉल में लेकर जाती है, फिर घर पर भी छोड़ कर जाती है...ये सारी की सारी सुविधाएं बुजुर्गों के लिए भी उपलब्ध हैं...हमारे टैक्स के पैसों से मिनिस्टर अपना घर नहीं भरते, सही काम में खर्च करते हैं..
    बहुत ही अच्छा आलेख...हमेशा की तरह..

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  25. शारीरिक विकलांगता से बदतर है मानसिक विकलांगता ...सही है . ऐसे बहुत लोगो के हौसले को देखकर कई बार अफ़सोस होता है उन लोगो पर जो हर तरह से स्वस्थ होने के बावजूद अपना रोना नहीं छोड़ते .

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  26. सही है.. मानसिक विकलांगता से कहीं बेहतर है शारीरिक विकलांगता।

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  27. बेहतरीन विमर्श। अच्छा लगा पढ़कर।

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  28. वक्त कुछ ऐसा था कि एक बार फिर 18 महीनें ब्लॉग जगत से दूर रही... 2012 के 12 महीने इधर आने की राह न सूझी..संयोग से यह पोस्ट खुल गई ... गुज़रा वक्त चलचित्र की तरह उतर आया सामने....

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