Saturday, May 7, 2011

सज़ा-ए-मौत भी नाकाफ़ी!

बाल यौन शोषण एक ऐसा विषय है....जो सबको बहुत चुभता है..पर  उस पर चर्चा करने से सब बचते हैं...अगर कहीं इस तरह की घटना देखने को मिलती  है तो...बहुत ही extreme  reaction होता है, लोगो का... 'ऐसे व्यक्ति को फांसी चढ़ा देना  चाहिए....कोड़े लगाने चाहिए.'.वगैरह वगैरह...और कर्त्तव्य की इतिश्री  हो गयी. पर इस पर संयत रूप से विचार-विमर्श बहुत कम होता है.

फिल्म I am में इस समस्या पर दृष्टिपात किया गया है...और बहुत ही संयमित तरीके से...कहीं कोई अवांछनीय दृश्य नहीं हैं...सबकुछ संकेतों में ही बताया गया है. अभिमन्यु (संजय सूरी )
एक हंसमुख लड़का है...डोक्यूमेंट्री फिल्म्स बनाता है....गिटार बजाता है...लड़कियों से फ्लर्ट करता है...पब-डिस्को जाता है...आज के जमाने का एक cool dude . पर जब वह अकेला होता है...तो उदासी में सिगरेट के धुएं उडाता रहता है और उस धुएं में उसका अतीत चलचित्र की तरह उसने सामने से गुजरने लगता है. जब वह सात-आठ साल का था तो उसके सौतेले पिता ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया...और यह सिलसिला सालो तक चलता रहा. अक्सर ऐसे निकृष्ट लोग...बच्चो को यही धमकी देते हैं कि "माँ को बताया तो तुम्हारी माँ को जान से मार दूंगा " और नन्ही सी जान मुहँ नहीं खोलते.
 
अभिमन्यु को  ये ग्लानि भी होती है कि बाद में उसने अपने पिता की इस कमजोरी का इस्तेमाल भी करना शुरू किया और गियर वाली साइकिल...महंगे खिलौनों की मांग करता रहा...यहाँ  तक कि 'फिल्म्स डिविज़न' में पढ़ने की महंगी फीस भी उसके पिता को देनी पड़ी...और यही अभिमन्यु के लिए उसके चंगुल से निकलने का जरिया भी बना. (पर अभिमन्यु को आज ग्लानि हो रही है,जब वह पच्चीस-छब्बीस साल का है...तेरह वर्ष के बच्चे की सोचने की क्षमता क्या होगी?)

अभिमन्यु की एक फ्रेंड है...उसे बहुत चाहती है..उसका ख्याल रखती है...पर अभिमन्यु अपने अतीत की वजह से उस से कोई भावात्मक सम्बन्ध नहीं बना पाता. बचपन की उस घटना ने उसका पूरा व्यक्तित्व छिन्न-भिन्न कर दिया है....वह ऊपर से सामान्य दिखता है..पर भीतर से है नहीं. उसके पिता अब मृत्यु शैय्या पर हैं....और माँ बार-बार फोन कर रही है.."एक बार आ कर मिल जा...तुम्हारे लिए इतना किया है उन्होंने" वो खुद को तैयार नहीं कर पाता,जाने के लिए और जब जाता है..तब उनकी मृत्यु हो चुकी  होती है. माँ के शिकायत करने पर वह माँ को उनकी असलियत  बताता है...हर माँ की तरह जब वो विश्वास नहीं करती...तब पूछता है,
"माँ ...तुम्हे दस सालों में कुछ भी नहीं पता चला...???"
ऐसा लगता है..ये सवाल दुनिया की हर माँ से किया गया है...माँ भी एक सामान्य प्राणी ही है..सौ उलझने हैं जिंदगी की...पर एक बच्चे को दुनिया में लाए तो फिर अपने जिस्म पर सौ आँखे उगा ले कि अपने बच्चे के साथ किसी ऐसे दुर्व्यवहार  का तुरंत ही पता चल जाए उसे.

पर माँ भी किस किस पर अविश्वास करे , मामा-चाचा सब तो अपने ही होते हैं और कई जगह तो पिता ही ऐसे निकृष्ट कर्म में लिप्त होते हैं...एक फ्रेंड की परिचित है....वो विदेश की अपनी बढ़िया नौकरी....ऐशो आराम सब छोड़ कर अपनी बेटी को ले स्वदेश वापस लौट आई .जब उसे पता चला कि उसका पति ही....
आज उसका भविष्य बिलकुल अनिश्चित है....लेकिन अपनी बेटी को उस नरक से निकाल लाई. पर उस दोषी पिता का क्या??...वो तो निर्द्वंद्व घूम रहा है...उक्त महिला के पास ना इतना धन है ना साधन कि वो केस लड़ सके...फिर वो अपनी बेटी को भी वकीलों के प्रश्नोत्तर से बचाना चाहती है...उसे अपने लिए नौकरी भी ढूंढनी है....बस इसे एक दुस्वप्न  समझ कर छोड़ दिया है....

दो महिलाए बेस्ट फ्रेंड्स थी...पारिवारिक समबन्ध थे....एक फ्रेंड के पति ने दूसरे फ्रेंड की बेटी के साथ दुर्व्यवहार की कोशिश की.बेटी ने विरोध किया और माँ को बता दिया...लेकिन जब बेटी की माँ ने अपनी सहेली  से उसके पति की शिकायत की तो सहेली ने अपने पति का विश्वास किया और सहेली से नाता तोड़ लिया. यही होता है हमेशा और ऐसी विकृत मनोवृत्ति वालों को खुली छूट मिल जाती है.


संयोग से ये फिल्म देखी और दूसरे ही दिन...अखबार में एक खबर पर नज़र पड़ी...

A Delhi court has recommended to the central government to explore the possibility of castrating rape and molestation convicts. Sentencing a man to 10-year imprisonment for raping his stepdaughter for four years, additional sessions judge Kamini Lau called for a “public debate” on the possibility of surgical and chemical castration as punishment for rape.
Lau said countries like the US, UK and Germany have imposed chemical and surgical castration as an alternate to contain the growing menace of rape and molestation. Indian legislatures should with seriously explore this possibility too, particularly in cases involving the rape of minors, serial offenders and child molesters, the court said.

ये तो अभी एक सुझाव मात्र था पर विरोध अभी से शुरू हो गए,


Advocate Mukul Rohatgi., said “It would lead to Talibanisation of the Indian criminal justice system,”



Law Commission vice-chairman KTS Tulsi said: “It takes us back to the stone age. I wholly disagree with it.”

तो फिर आखिर क्या सजा दी जाए दोषियों को...जो किसी का पूरा जीवन बर्बाद कर देते हैं...मनोवैज्ञानिको को ही ये रिसर्च करना चाहिए कि इस तरह की विकृतियाँ उत्पन्न ही क्यूँ होती है...आधे केस में तो ऐसे दुराचार करनेवाले खुद भी बचपन में शिकार हुए होते हैं.

यह एक बहुत ही गंभीर समस्या है...जिसके अधिकाँश केस, आवरण के भीतर ही दबे रह जाते हैं
..(वैसे फिल्म में बताया गया है कि...ये अभिमन्यु का किरदार
सत्य घटना पर आधारित है )

पिंकी  वीरानी ने "कोमा में पड़ी अरुणा शानबाग' की कहानी दुनिया के सामने लाई...उन्होंने बाल यौन  शोषण पर एक किताब भी लिखी है,"Bitter   Chocolate " इस किताब में भी कोई  sleazy details नहीं हैं...बल्कि बहुत गंभीरता से इस समस्या पर विचार किया गया है. करीब १०० केस का जिक्र है..जहाँ पिंकी खुद पीड़ित बच्चों से मिली हैं. वे प्रकरण...आपके रोंगटे खड़े कर देंगे.....और किसी अपने जैसे मानव द्वारा ऐसे कर्म के लिए शर्मसार कर के नज़रें झुकाने को बाध्य कर देंगे.

एक बारह वर्षीया पीड़िता द्वारा लिखी ये कविता भी उस किताब में दी गयी है

I asked you for help, and you told me you would

If I told you the things he did to me.

You asked me to trust you, and you made me

Repeat them to fourteen different strangers


I asked you for protection

And you gave me a social worker.

Do you know what it is like

I have more social workers than friends?


I asked you for help

And you forced my mother to choose between us.

She chose him, of course.

She was scared, she had a lot to lose.


I had a lot to lose too.

The difference is, you never told me how much.

I asked you to put an end to the abuse

You put an end to my whole family.

You took away my nights of hell

And gave me days of hell instead.

You have changed my private nightmare

Into a very public one.

53 comments:

  1. इस तरह के मामले जब सामने आते हैं तो मन एकदम से खिन्न हो जाता है कि जाने कैसे लोग होते हैं जो इस हद तक गिर जाते हैं।

    इस विषय को लेकर काफी कुछ लेख, फिल्म आदि सामने आने लगे हैं। लोग अब खुल कर इन विषयों पर बहस करते हैं जो कि ऐसे मामलों पर लगाम लगाने में एक तरह से सहायक ही है।

    एक अलग विषय को लेकर बेहद संजीदगी से लिखी पोस्ट।

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  2. बहुत सशक्त,रोचक एवम प्रवाहपूर्ण ढंग से प्रस्तुति की है आपने, जो सोचने को मजबूर करती है.

    मेरे ब्लॉग पर आईये,मेरी नई पोस्ट आपके सुविचारों की आनंद वृष्टि की इंतजार कर रही है.

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  3. हमारे समाज और घर परिवार में आँखों तले फ़ैल रही भयानक बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए एक अच्छा प्रयास... और वो कविता तो बस आत्मा को घायल कर देती है!!

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  4. sach aap ne bahut bariki se sach ko darsaya hae

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  5. ’लटका देना चाहिये’...आदि आदि तात्कालिक क्रोध - वाक्य से अलग यह विषय गहरे चिन्तन की माँग करता है।

    दोष मानसिकता का है, मानसिक विश्लेषण आवश्यक है, क्योंकि यह भी अधिकांश का स्त्य है कि जो बचपन में इस शोषण की प्रक्रिया से गुजरे हैं वे यौन शोषक में परिणित हो जाते हैं, अगर ज्ञान-विवेक-बोध का स्तर न प्राप्त कर सके। सो सरासर दोषीकरण से भी बचना चाहिये!

    अधिक वय या युवा वय की महिलाओं द्वारा कम उम्र के बच्चों को शिकार बनाने की घटनाएँ - कम ही सही पर - हैं। विश्लेषण आवश्यक है घटनाओं का।

    एक लड़का था, करीबियों से नकारात्मक अनुभव रहे उसके, बाद में वह भी लिप्त हुआ इन कर्मों में यानी वह दूसरे के साथ भी वैसा ही। फिर संयोग से उसे विवेक-बोध का परिवेश मिला, और फिर वह उबरा/सुधरा। उसका निष्कर्ष यही है कि जहाँ परिवार संस्था प्यार और नैतिक मूल्य सिखा पाने में/ महसूस करा पाने में विफल हो वहाँ ऐर्सी घटनाओं की संभावनाएँ सर्वाधिक होती हैं।

    मैं तो कहूँगा कि जो ऐसे रोगी/गुनाहगार हों और उन्हें अपने अपराध का एहसास हो गया हो, उनसे ऐसी घटनाओं के जानने/विश्लेषण में मदद लेनी चाहिये। क्योंकि जब घटनाएँ खुल जाएँगी, तो निदान के वस्तुपरक होने की संभावनाएँ अधिकतम होंगी। सिर्फ दमन ही इलाज नहीं है।

    कुछ गाँधीवादी जैसा बक गया हूऊँ तो क्षमा चाहूँगा! एक गंभीर विषय पर लिखी उपयोगी पोस्ट के लिये आभार !!

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  6. aapne sach salike se rakhaa hai........

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  7. @amrendra ji...yahaan tark-kutark karne ki zarurat nhin hai! aapke ye
    दोष मानसिकता का है, मानसिक विश्लेषण आवश्यक है, क्योंकि यह भी अधिकांश का स्त्य है कि जो बचपन में इस शोषण की प्रक्रिया से गुजरे हैं वे यौन शोषक में परिणित हो जाते हैं, अगर ज्ञान-विवेक-बोध का स्तर न प्राप्त कर सके। सो सरासर दोषीकरण से भी बचना चाहिये!

    अधिक वय या युवा वय की महिलाओं द्वारा कम उम्र के बच्चों को शिकार बनाने की घटनाएँ - कम ही सही पर - हैं। विश्लेषण आवश्यक है घटनाओं का।
    shabd gandhitv prabhaavit to kadaapi nhin hai!

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  8. क्या कहें कि कैसे कैसे लोग हैं इसी दुनिया में...क्या सजा हो..यह तो नहीं जानता मगर हो ऐसी कि उसे देखकर ही आगे से कोई ऐसी हरकत न करे.. मन दुखी हो गया...देखो, शायद कभी यह किताब भी पढ़ें और फिल्म तो खैर देखेंगे ही,

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  9. सामाजिक ढांचे के कारण कई प्रश्‍न खड़े हो गए हैं। वर्जनाएं है और उन्‍हें तोड़कर निर्बाध गति से असंयमित हुआ पुरुष बाहर निकल आता है। लोग कहते हैं कि जितनी वर्जनाएं हैं और यौन-सम्‍बंधों को लेकर जितना परहेज है उसी का परिणाम है ऐसे विकृत कर्म। लेकिन जब समाज के बंधन नही थे, व्‍यक्ति वर्जनाओं से घिरा नहीं था तब शायद आवश्‍यकता पड़ी थी सामाजिक बंधनों की और विवाह संस्‍था की। लेकिन इन सबके मूल में है पुरुष का असंस्‍कारी होना। पहले समाज में पुरुष को संस्‍कारित और मर्यादित करने का सतत आग्रह रहता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। सब कुछ इतने विद्रूप ढंग से सामने आ रहा है कि कम समझ वाले व्‍यक्ति को भ्रमित करता है। पूर्व में पुरुष के काम भाव को शान्‍त करने का प्रयास रहता था लेकिन अब महिला के काम-भाव को जागृत करने का प्रयास है। फिल्‍म में बेटे का प्रश्‍न जायज है, कि कैसी माँ है जिसे बेटे का दर्द ही समझ नहीं आ रहा?

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  10. @ कई जगह तो पिता ही ऐसे निकृष्ट कर्म में लिप्त होते हैं.
    *** ऐसे लोगों के लिए आपने बहुत सोच-विचार कर ही पोस्ट का शीर्षक रखा है "सज़ा-ए-मौत भी नाकाफ़ी!"

    मन को उद्वेलित करने वाली पोस्ट।

    आपसे पूरी तरह सहमत हूं।

    और ये श्रीमान जी जो काला कोट पहनते हैं और कहते हैं “It takes us back to the stone age. I wholly disagree with it.”
    की बात पर यही कहूंगा कि जब US, UK और Germany अगर इसे implment करता है तो बेहतर है कि हम पाषाण युग में चले जाएं।

    शायद इस तरह के लोग उस युग में नहीं रहे होंगे।

    ऐसा विकृत प्राणी बच्चों को मारता तो नहीं, पर उन्हें सारा जीवन मरते रहने के लिए छोड़ देता है, और दुख तो ये है कि वह उसके परिवार का सदस्य है, जिससे उसका वास्ता दिन-रात का है।

    इसलिए ऐसे मनोविकार वालों का यदि castration कर दिया जाए तो वह मुझे उसित ही दीखता है क्योंकि इनके लिए "सज़ा-ए-मौत भी नाकाफ़ी!"

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  11. रश्मि जी.. जितना संजीदा मसला है उतनी ही संजीदगी से इसको संभालने या हल करने की ज़रूरत है... इस तरह की प्रवृत्ति वास्तव में एक साइकिल का हिस्सा होती है,जो कहीं न कहीं अतीत से निकलकर वर्त्तमान में विकृति के रूप में सामने आ जाती है.. खैर जो भी हो जब अतीत में हुई तो भी यह घटना एक विकृति थी और पुनरावृत्ति होने पर वर्त्तमान में भी इसे विकृति ही कहा जाएगा. मजबूरियाँ बताना भूल पर पर्दा नहीं डाल सकता..
    आपकी सम्वेदनशीलता पूरी पोस्ट में दिखती है. और इस विषय ने आपको कितना आहात किया है, वह भी पोस्ट से पता चलता है!!

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  12. प्रभावी प्रस्‍तुति.

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  13. बहुत गंभीर मसला उठाया है... बेहद संवेदनशील मुद्दा है यह.. अनुसन्धान बताते हैं कि आध से अधिक बच्चे कभी ना कभी किसी ना किसी तरह के शोषण के शिकार होते हैं.. घर और अपने आस पास ही.... इसका हल सामाजिक स्तर पर ही हो सकता है... सौ में से निन्यानवे मामले दबे ही रह जाते हैं....

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  14. @ V!Vs जी, अगर पूरी खोट शब्दों में दिख रही तो आपकी बात सही हो सकती है। वैसे भी मैने गाँधीवादी टाइप ( जैसे ) की बात की, गाँधीवादी होने की न तो मेरी कोई प्रतिबद्धता है न ही शौक। अतः बकौल आपके ‘ahaan tark-kutark karne ki zarurat nhin hai!’

    धन्यवाद!

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  15. "सज़ा-ए-मौत भी नाकाफ़ी!"…………सच कहा ।

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  16. झकझोर देने वाला आलेख!

    सादर

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  17. बहुत गम्भीर मसला है ये. फिल्म के ज़रिये उसे उठाना एक सशक्त कदम हो सकता है, क्योंकि फिल्में जनमानस पर अधिक असर करतीं हैं. बढिया, और विस्तृत रपट के लिये शुक्रिया तो कहना ही होगा.

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  18. कई बार इस तरह के बच्चो और महिलाओ के साथ यौन दुर्व्यवहार करने वालो को विकृत मानसिकता वाला समाज से अलग या ऐसे तो कुछ ही लोग है कह कर टाल दिया जाता है पर मै नहीं मानती की इन्हें कोई मानसिक समस्या होती है या ये कुछ मानसिक विकृति वाले होते ही (एकाध अपवाद हो सकते है) या इस तरह के ही कुछ होते है ये भी हमारे समाज के सामान्य लोग है और हम सभी की तरह सामान्य जीवन जीते है | ये सोच समझ कर चालाकी से मौके का फायदा उठाते है कुछ घर में करते है तो कुछ घर के बहार जा कर करते है | फर्क बस ये होता है की किसके हाथ कौन आसानी से लग जाता है | वजह मानसिक विकृति से ज्यादा समाज की विकृति से है जहा पर ऐसे मामलों में पीड़ित को ज्यादा सामाजीक सजा दी जाती है और कई बार तो उसे ही दोषी मान लिया जाता है | इन्ही कारणों से भी कई बार बच्चे ये सब सह लेते है और किसी को कुछ बताते नहीं क्योकि उन्हें डर होता है उन्हें ही दोषी मान लिया जायेगा |

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  19. एक ऐसी समस्‍या जो हमेशा रही है और शायद रहेगी। एक ही उपाय है कि सब सर्तक रहें।

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  20. शायद उसकी टीचर ने लिखी हैं या फिर नेट से ली गयी कोई कोटेशन है ........

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  21. कास्त्रेशन जैसे विचार भारत में ही आ सकते हैं!यह कोई 'बाहरी' समस्या नहीं है -अंदरुनी जड़े हैं इसकी !
    यह सायिकात्रिस्ट ,न्यूरोलोजी या उससे भी बढ़कर जेनेटिक ट्रीटमेंट का मामला है -एक कहानी में ऐसे लोगों के ब्रेन के जिम्मेदार भाग के सर्जिकल रिमूवल की भी बात कही गयी है !

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  22. apne bahut sahi aalekh likha hai...

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  23. इस तरह की विकृतियां हर दौर में रही हैं...पाशविक मानसिकता के शिकार इज़ी टारगेट ढूंढते हैं...ये ज़रूरी नहीं कि सौतेले रिश्तों में ही ऐसे अपराध किए जाते हों...सगे रिश्तों में भी इस तरह की दरिंदगी देखने को मिल जाती है...किसी भी सज़ा से पहले अपराधी का गहन मानसिक विश्लेषण आवश्यक है...इसका एजुकेशन से भी कोई संबंध नहीं है...अगर ऐसा होता तो खुला समाज माने जाने वाले पश्चिमी देशों में ऐसी घटनाएं न देखने को मिलतीं...इस तरह की प्रवृत्तियों पर पार पाने में मॉरल एजुकेशन, चित्त को शुद्ध करने वाले भारतीय संस्कार बड़े मायने रखते हैं...लेकिन पश्चिम का खुलापन भारत में आने के साथ ये सब गायब होता जा रहा है...

    ऐसे में मेरा मन रेड लाइट एरिया की आबादी को लेकर और द्रवित हो जाता है...अगर ये एरिया न हों तो समाज किस तरह निरंकुश जंगलों में बदल जाते, समझा जा सकता है...न जाने कितने कुंठितों के लिए आउटलेट बन कर ये रेड लाइट एरिया समाज का जो उपकार कर रहे हैं, उसके लिए मैं नतमस्तक हूं...और क्या बच्चे वहां नहीं होते होंगे...ये सोचना ही कंपकंपा देने वाला है...

    जय हिंद...

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  24. बाल यौन शोषण की घटनाएँ बहुत आम हैं । अक्सर परिचित लोग ही इस कुकर्म में शामिल होते हैं । इससे बच्चे के मानसिक विकास पर विपरीत प्रभाव तो पड़ता ही है , बड़ा होकर वह स्वयं भी इसी रास्ते पर चलने लगता है ।
    इस विषय पर जागरूक होने के बहुत ज़रुरत है ।

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  25. फिल्म में यह विषय यूँ ही नहीं उठाया गया है ..मैंने भी अपनी पोस्ट में महिला एवं बाल आयोग द्वारा पेश किये गए बाल शोषण के पूरे आंकड़ों के साथ इसके बारे में लिखा था ...जब बाड़ ही खेत को खाए तो फरियादी कहाँ जाए ...तमाम आधुनिकता और प्रगतिशीलता के बावजूद मैं मानती हूँ कि इन मामलों में माँ की जागरूकता बहुत महत्व रखती है ...बच्चों को दिए अच्छे संस्कार ही इस तरह के अपराधों को रोकने पर कारगर हो सकते हैं , सिर्फ कानून नहीं !

    बेहद उपयोगी पोस्ट !

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  26. यह मुद्दा तो किसी के भी मन को उद्वेलित कर देता है। किन्तु यह काफ़ी नहीं है। इस विषय पर समाज में चर्चा होनी चाहिए व कोई हल निकालना चाहिए। अपराध के कारण समझकर भविष्य में लोग अपराधी न बनें यह कोशिश तो की जा सकती है किन्तु आज के अपराधियों को कैसे रोका जाए और बच्चों को शिकार बनने से बचाने के रास्ते भी सोचे जाने चाहिए।
    फ्रान्स के साठ वर्ष से भी अधिक उम्र के एक बाल शोषक ने स्वयं अपने लिए बंधियाकरण की सजा माँगी थी। उसे स्वयं लगा कि उसके लिए यही एक इलाज बचा है। जेल से निकलते ही वह फिर यह जघन्य अपराध कर देता था।
    एक पोस्ट लिखी थी क्या इन्हें पितृत्व या मातृत्व का अधिकार होना चाहिए? इसमें भी इसी तरह का मुद्दा उठाया था।
    घुघूती बासूती

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  27. @अमरेन्द्र जी,
    यह सही कहा आपने...
    मैं तो कहूँगा कि जो ऐसे रोगी/गुनाहगार हों और उन्हें अपने अपराध का एहसास हो गया हो, उनसे ऐसी घटनाओं के जानने/विश्लेषण में मदद लेनी चाहिये।
    उनकी मानसिकता में पैठकर ही विश्लेषण करना चाहिए कि आखिर ऐसी प्रवृत्ति होती ही क्यूँ है??

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  28. @अंशु जी
    मुझे भी लगता है,...ये कौन सी मानसिक समस्या है...जिसमे व्यक्ति, नौकरी...दोस्ती..रिश्तेदारी...सामाजिकता...सब कुछ सामान्य ढंग से निभाता है..परन्तु ऐसे कृत्यों के लिए मानसिक रोगी बन जाता है....
    सारे मनोचिकित्सकों को...ऐसी मानसिकता को प्राथमिक रूप से सुलझाने का प्रयत्न करना चाहिए.

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  29. @मोनिका जी,
    ये बारह साल की एक पीड़ीत लड़की ने लिखी है....ना कि उसने टीचर ने...
    बच्चे भी अपनी भावनाएं व्यक्त करने में सक्षम होते हैं...और ऐसे हादसे से गुजरे बच्चे तो खासकर.

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  30. @खुशदीप भाई..
    आपने कहा...".इसका एजुकेशन से भी कोई संबंध नहीं है...अगर ऐसा होता तो खुला समाज माने जाने वाले पश्चिमी देशों में ऐसी घटनाएं न देखने को मिलतीं...इस तरह की प्रवृत्तियों पर पार पाने में मॉरल एजुकेशन, चित्त को शुद्ध करने वाले भारतीय संस्कार बड़े मायने रखते हैं...लेकिन पश्चिम का खुलापन भारत में आने के साथ ये सब गायब होता जा रहा है..."

    कब तक हम अपने समाज के हर दोष के लिए..पश्चिम से आई हवा को दोषी ठहराते रहेंगे. इसमें पश्चिम से सीखने जैसा क्या हो गया...??
    इस तरह के अमानवीय कृत्य...झुग्गी झोपडी से लेकर....आलिशान बंगले तक में देखे गए हैं. अब झुग्गी झोपडी में रहने वालो पर पश्चिम का कितना प्रभाव है??.
    और पश्चिम में इस तरह के प्रकरण सामने आने में देर नहीं लगते...जबकि अपने यहाँ सौ में से एक केस की ही रिपोर्ट शायद पुलिस में की जाती हो.

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  31. @घुघूती जी,
    ख़ुशी है कि आजकल स्कूल की तरफ से इस तरह की घटनाओं की रोकथाम के लिए कई कदम उठाये जा रहे हैं....सेमीनार आयोजित किए जा रहे हैं...उसमे बच्चों के पैरेंट्स...को बुलाकर...सचेत किया जा रहा है कि कैसे वे अपने बच्चों को...इस तरह की हरकतों का सामना करने के लिए तैयार करें. बच्चों को भी शिक्षित किया जाता है.....पर सवाल यही है कि देश के कितने स्कूल??...महानगरों के मुश्किल से गिने-चुने स्कूल...जबकि ये समस्या पूरे देश में व्याप्त है.

    दरअसल एक साथी ब्लॉगर "शुभम जैन" काफी पहले इस तरह का एक सेमीनार अटेंड कर के आई थीं....और मुझसे आग्रह किया था,इस विषय पर लिखने का...मैने उनसे कहा..था कि "आपने सेमिनार अटेंड की है...आप अच्छी तरह इस पर लिख सकती हैं...परन्तु शायद व्यस्तता की वजह से उन्होंने नहीं लिखी....उनसे अनुरोध किया है कि...वे अपने विचार यहाँ जरूर रखें .

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  32. क्या ब्लॉगर मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं अगर मुझे थोडा-सा साथ(धर्म और जाति से ऊपर उठकर"इंसानियत" के फर्ज के चलते ब्लॉगर भाइयों का ही)और तकनीकी जानकारी मिल जाए तो मैं इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के साथ ही अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार हूँ. आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें

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  33. ह्म्म्म.... गंभीर विमर्श होनी जरूरी है और निष्कर्ष निकालना भी..
    उधर कमेन्ट में भी आपने सही कहा कि हर बात को लेकरर पश्चिम को गलत नहीं कह सकते, उसी के माथे ठीकरा नहीं फोड़ सकते. हम अपने संस्कार की बात करते हैं.. क्या महर्षि गौतम ने अपनी ही पुत्री अहिल्या से विवाह नहीं किया था??

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  34. बहुत ही सशक्त रोंगटे खड़े कर देने वाली पोस्ट..एक गहन विचारणीय विषय पर बहुत संजीदगी से लिखी गयी ..कुछ तो हम को करना ही होगा.

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  35. बड़ा मुश्किल है इन सच्चाइयों को सामना करना

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  36. दी बहुत अच्छा लगा ये देख कर की फिल्म के बहाने ही सही कम से कम ऐसे विषयों पर अब खुल कर बाते तो होने लगी है...जब बाते होगी बहस होगी तो ज़रूर कुछ ना कुछ हल भी निकलेगा...यहाँ तो कई सेमिनार और कॅंप्स के थ्रू लोगो को खास कर पेरेंट्स को अवेर किया जा रहा है...बच्चो को अपनी प्रोटेक्स्न कैसे करे ये सब सिखाया जा रहा है...मेरे अनुरोध पर ये पोस्ट लिखने के लिए आपका बहुत शुक्रिया.

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  37. प्रभावपूर्ण प्रस्तुति. अच्छा और अलग विषय चुना. बहुत शुभकामनाएँ.

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  38. झंझोड़ने वाला है आपका लेख ... दिल खट्टा हो जाता है ऐसा कुछ पढ़ कर ...पर ये सच्चाई है समाज की ... वीभत्स सचाई .... कड़े नियमों का प्रावधान होना ज़रूरी है ... कड़े से भी ज़्यादा उनको लागू करना ज़रूरी है ...

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  39. बाल यौन शोषण एक मुश्किल विषय है। कुछ देशों में सजा मौत है। लेकिन इतिहास कहता है कि जब सजा कठोर होती है तब न्यायालय सजा देने बचते हैं। इसलिये कड़ी सजा कर देना इसका उपाय नहीं। शायद बेहतर यौन शिक्षा इसके उचित उपाय हों।

    लेकिन यह सच नहीं है कि लोग उस पर चर्चा करने से बचते हैं। इस विषय के कुछ पहलुओं पर मैंने यौन शिक्षा और उफ, क्या मैं कभी चैन से सो सकूंगी शीर्षक से लिखा है।

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  40. @उन्मुक्त जी एवं घुघूती जी
    आप लोगो की पोस्ट पढ़ आई....लिंक देने का शुक्रिया...बहुत ही विचारोत्तोजक पोस्ट हैं...और सबको इन्हें जरूर पढना चाहिए.
    आप दोनों से अनुरोध है....कृपया इन्हें पुनः प्रकाशित करें. लोगो में ऐसे विषयों के सम्बन्ध में जागरूकता बहुत जरूरी है.

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  41. मैंने पश्चिम को दोष नहीं दिया...

    मैंने ये कहा है कि ये विकृतियां बिना एजुकेशन, बिना रहन-सहन के स्तर का भेद किए दुनिया के किसी भी देश में
    पाई जा सकती हैं...

    मुझे अपने पेशे की वजह से वक्त-वक्त पर ऐसी रिपोर्ट देखनी पड़ती हैं...इनमें किसी फिल्म या टीवी पर उलटे-सीधे दृश्य देखकर यौन-अपराध करने की बात कहने वालों का भी पता चलता है...और तो और कई जगह बच्चों का कच्चा मन भी प्रभावित होता दिखा...

    विकास की अंधी दौड़ में पश्चिम के खुलेपन को रोका नहीं जा सकता...लेकिन जहां तक संभव हो सकें मॉरल एजुकेशन, सांस्कारिक मूल्यों का प्रचार-प्रसार कर उन्हें काउंटर ज़रूर किया जा सकता है...

    जय हिंद...

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  42. "एक माँ जब बच्चे को दुनिया में लाए तो फिर अपने जिस्म पर सौ आँखे उगा ले कि अपने बच्चे के साथ किसी ऐसे दुर्व्यवहार का तुरंत ही पता चल जाए उसे."

    अपने हाथ में जो उपाय सबसे पहला है,वह यही है...

    इसके अलावे तीन जो कारगर उपाय हो सकते हैं वे हैं -

    न्याय में कठोर दंड की व्यवस्था होना कि भय मनुष्य की पाशविकता रो रोके..
    माहौल ऐसा बनाया जाय कि इस विषय पर बात करने, न्यायलय तक पहुँचाने में पीड़ितों की झिझक समाप्त हो जाए..

    और तीसरा सबसे आवश्यक यह है कि प्रत्येक परिवार परवरिश में नैतिकता /सुसंस्कारों को सर्वाधिक महत्त्व दे...

    ऐसी घटनाएं आज की नहीं है..बल्कि यदि कहा जाय कि आज स्थति पहले से बेहतर है तो अधिक उचित होगा...

    बाल यौन शोषण परदे के अन्दर शताब्दियों से फल फूल रहा है...और चूँकि इसमें बदनामी और हानि सर्वाधिक पीड़ित की ही होती है,लोग ऐसे प्रकरण प्रकाश में नहीं लाते...यह बहुत अच्छा है कि इस विषय पर चर्चा हो रही है और लोगों की झिझक टूट रही है...

    अत्यंत दुखद है पर जिस तरह इस सार्थक विषय को उठाया है आपने.....साधुवाद !!!!

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  43. रश्मिजी, आपके जरिए आई एम की कहानियां पढ़ रही थीं और उनके विश्लेषण का आपका तरीका। मैंने अभी तक मूवी देखी नहीं है लेकिन जिस तरह से आपने समीक्षा की है तो कहना होगा कि फिल्म बेहद संवेदनशील और भीतर तक झकझोर कर रख देने वाली है। सही कहूं तो मैं इसी कहानी का इंतजार कर रही थी, मुझे लगता है कि अब इस बात पर डिबेट शुरू करनी ही चाहिए कि यौन शोषण करने वालों के लिए कस्ट्रेशन जैसी सजा हो या नहीं।

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  44. बहुत गंभीर, कठिन और पेचीदा समस्या है ये.
    फिल्म अभी तक देख नहीं पाया, यहाँ लगी ही नहीं. बहुत अच्छा किया आपने ये श्रृंखला लिखकर. लोगों की प्रतिक्रियाएं भी पढने लायक हैं. ऐसी समस्याएं हैं जिन पर कोई बात ही नहीं करना चाहता. फिर समाधान भी हो तो कैसे !

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  45. देर से आने का एक लाभ तो यह होता है कि लेख के साथ साथ टिप्पणियाँ पढ़ने को भी मिल जाती हैं...
    रंजनाजी की टिप्पणी की इस पंक्ति से सौ फ़ीसदी सहमत ... "एक माँ जब बच्चे को दुनिया में लाए तो फिर अपने जिस्म पर सौ आँखे उगा ले कि अपने बच्चे के साथ किसी ऐसे दुर्व्यवहार का तुरंत ही पता चल जाए उसे."
    इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह कितनी ही मनहूस घटनाओं को होने से रोका जा सकता है...बदकिस्मती से हो भी जाए तो संयम से बातचीत के माध्यम से बच्चों को फिर से नॉर्मल होने में मदद की जा सकती है...बहुत से तरीकों में एक उपाय यह जो अपने वश में है...

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  46. बहुत सशक्त, तरीके से इस विषय को उठाया है। मुझे तो लगता है जैसे जैसे संस्कारों का अभाव होता ग्या ये समस्यायें बडःाती गयी जिस समाज मे एक इन्सान करोंडों की दौलत कमा रहा है दूसरे को रोटी भी नसीब नही वो अपने बच्चों को कब और क्या संस्कार देगा? क्षोभ , अविवेक ऐसे लोगों मे चिन्गारे बन कर फूटता है, और कुछ बेरुजगारी गरीबी सामाजिक अन्याय बहुत से कारण हो सकते हैं जिन पर किसी की नज़र नही जाती। अच्छा विषय और उसका विस्शलेशण अच्छे डःंग से किया है। आभार।

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  47. यह वाकई बहुत कठिन मसला है जो निस्संदेह विस्तृत चर्चा की माँग करता है, इस का विश्लेषण करना आवश्यक है। अच्छा हुआ आपने ये समीक्षा लिखी, फिल्म देखनी है।

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  48. .

    रश्मि जी , बहुत ही सुन्दर समीक्षा । एक से बढ़कर एक सार्थक टिप्पणियों के बाद कहने के लिए कुछ शेष नहीं बचा । फिर भी इतना ही कहूँगी , जो बच्चे माता-पिता से उचित संस्कार पाने से वंचित रह जाते हैं , चाहे किसी भी कारण वश , उनके अन्दर कुछ मानसिक दोष आ ही जाते हैं । ऐसे व्यक्तियों को इलाज की ज़रुरत है और सभी माता-पिता को जागरूक होकर अपने बच्चों की बेहतर परवरिश करने की । जिस घर में प्रेम भाव रहता है , संयुक्त परिवार के तहत दादा, दादी , चाचा चाची , बुआ आदि सभी के द्वारा अच्छे संस्कार मिलते हैं । ऐसे ही सुन्दर वातावरण में एक स्वस्थ व्यक्तित्व जन्म लेता है । अन्यथा घर में कलह-क्लेश का असर बढ़ते बच्चों की मानसिकता को विकृत करता ही है।

    .

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  49. रश्मिजी
    मन तो बहुत दुखी हो गया पोस्ट पढ़कर |ऐसी ही एक घटना जब हम मुम्बई में रहते थे तो हमारी ही बिल्डिंग में घटी थी किन्तु जिस बच्चे के साथ यह दुर्घटना हुई उसके माता पिता ने तुरं त पुलिस सहायता ली और उस आरोपी को जो खुद १८ साल का था उसे जेल भी हुई और इस घटना के मूल में एक ही फ़्लैट में चार भाइयो का परिवार था और आरोपी सबसे छोटा भाई |

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  50. आरोपी को अपराधी पढ़े |

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  51. हृदय विदारक विषय है यह ! इस विषय पर किसे कहें, कौन सुन रहा है, कौन पढ़ रहा है, किसे पढना चाहिये, किसे सुनना चाहिये ! पता नहीं ये सारी बातें हवाओं में विलीन हो जायेंगी या उन कानों में भी पड़ेंगी जिन्हें इनकी सबसे अधिक ज़रूरत है ! आपका आलेख मन दुखी कर गया लेकिन इस बात की खुशी भी है कि इस विषय पर से कुछ गर्द हटी तो शायद लोगों की इस समस्या पर भी नज़र पड़े और कुछ सार्थक कदम उठाये जा सकें ! फिल्म में इस गंभीर विषय को इतनी संवेदनशीलता से उठाया गया है इसके लिये फिल्मकार को बधाई ! और आपने इतनी संतुलित समीक्षा की है उसके लिये आपको दोहरी बधाई !

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