शनिवार, 13 नवंबर 2010

दिल तो बच्चा है,जी....किसका??..हमारे नामचीन ब्लॉगर्स का...खुद देख लें

इस बार बाल-दिवस पर एक ख़याल आया, क्यूँ ना अपने साथी  ब्लॉगर्स  से पूछा जाए , क्या उनका दिल  जिद कर कभी कभी बच्चा बन जाता है?? इसी आशय का एक मेल भेज दिया सबको कि आपलोगों ने बड़े होने के बाद कोई बच्चों जैसा काम किया हो..जिसे कर के ख़ुशी मिली हो , मजा आया हो..और थोड़ा एम्बैरेसिंग भी लगा हो...तो भेज दें अपने संस्मरण.  पर हमारे साथियों के तो नखरे...स्टार से कम थोड़े ही  हैं. और अब पता चला, हम अखबारों- पत्रिकाओं में जो परिचर्चा पढ़ते हैं, उनके पीछे कितनी मशक्कत की जाती है. पहले तो मेल भेजो...फिर रीमाइंडर...उसके बाद बहलाना-फुसलाना...अगर दोस्ती हो तो 'धमकी भी' :) ...पर इसके बाद भी   कुछ लोंग तो सुपर-स्टार निकले....कन्नी काट गए. पर समझ सकती हूँ..हर बार एकदम से कुछ याद भी नहीं आता. जबकि  कुछ ब्लॉगर्स  ने तो बहुत जल्दी ही भेज दिया...शुक्रिया सबका .

अब दूसरी उलझन  थी पोस्ट किस क्रम में की जाए?....इस बच्चे जैसे दिल वाली पोस्ट पर कोई कंट्रोवर्सी नहीं चाहती थी. कौन वरिष्ठ ब्लोगर है कौन कनिष्ठ तय करना मुश्किल.alphabetically भी करूँ तो एक ही अक्षर से कई नेम और सरनेम हैं. वंदना दुबे ने सुझाव दिया, 'जिस क्रम से मेल आते गए हैं...उसी क्रम में पोस्ट करो" यहं सही लगा...तो सबसे पहले ज्ञानदत्त जी के संस्मरण, जिन्होंने मेल करने के कुछ घंटो के भीतर ही भेज दिए थे.

 
 एक फोटो लेने के लिए ज्ञानदत्त जी ने बीच- बाजार दौड़ लगा दी.  
I won't be able to write much, but I will send a photo (attached) of a child vendor. Saw him from a distance. Almost ran like a child to take his photo. Stopped just short so that he was not distracted.
He was a child and I also behaved like a child! 

 


कंचे खेलते कैसे दिखते  होंगे ,राज भाटिया जी,



जिस बर्ष मेरी शादी हुयी यह किस्सा उस वर्ष का हे, शादी से पहले जब मे यहां से घर गया तो सारी दुनिया ही मेरे लिये बदली थी, बहुत से नये घर, सभी मित्र , यार लोग भी बिछुड गये कोई कही तो कोई कही, उन सब का अता पता कुछ भी नही, अब मै निठ्ठाला सारा दिन घर मे बोर होता, तभी मैने देखा कि एक जगह कुछ बच्चे कंच्चे( कांच की गोलियां) खेल रहे हे, मै भी उन के पास चला गया, पहले तो उन बच्चो को देखता रहा, फ़िर मैने बच्चो को बतलाना शुरु किया कि तुम ऎसे मारो तो जीत जाओ गे, बच्चे ठहरे बच्चे थोडी देर तक तो मुझे सहते रहे फ़िर बोले अंकल एक बार खेल कर देखो, बताने ओर खेलने मै फ़र्क हे, ओर उन्होने मुझे चार कंचे उधार दे दिये, मैने उन से कहा कि बेटा सब अपने अपने कंचे अब मुझे दे दो, क्योकि तुम सब हारने वाले हो, ओर उन्हे मैने दस मिंट मे हरा दिया, अब मेरे पास बहुत से कंचे हो गये, तो वो मुझ से ही खरीद कर, फ़िर खेले, फ़िर खरीदे फ़िर खेले, मुझे बहुत अच्छा लगा, ओर समय भी जल्द ही कट जाता, ओर जो पेसे आते वो सब मे बरतन मांजने वाली माई की बच्ची को दे देता.
 एक बच्चा बोला अंकल अंकल कंचे खेलना तो बुरी बात हे, मैने कहा बेटे तुम्हे किस ने कहा? तो बोला पापा ने, मेरे पुछने पर उस ने अपने पापा का नाम बताया तो मैने उसे कहा तेरा पापा भी मेरे से हारता था, अगर घर मे हे तो अपने पापा को बुलाओ..... आप माने ना माने दो दिन के अंदर वहां सब बडे बडे भी कंचने खेलने लग गये, ओर बच्चे एक तरफ़ बेठे हम सब को देखते थे, ओर जब हमारी शादी हो गई तो तीसरे दिन वही बच्चे आये ओर बोले अंकल आओ ना कंचे खेले आप के संग खेल कर अच्छा लगता हे, ओर हमारी बीबी हमे हेरानगी से देखती थी कि आप आज भी कंचे खेलते हे, ओर जब फ़ोटो धुल कर आई तो देखा कि हम ने अपने डा० मित्रो से भी कंचे खिलबा दिये, ओर आज भी यह सब याद आता हे तो बहुत अच्छा लगता हे, कहिये केसे लगे हमारे कंचे:)
 

चीटर कॉक ,इंदु आंटी 


मेरा एक दिन ऐसा नही बिताता जब मैंने  बच्चे के साथ उधम पट्टी ना की हो.कोलोनी के छोटे छोटे बच्चे अक्सर किसी भी प्रोग्राम में मिलने पर मुझे घेर लेते हैं.स्कूल में??? वाओ मजा जाता  है.कल ही मैंने बच्चियों के साथ खूब 'पल्ले' खेले.पल्ले यानी सात या नौ तराशे हुए कंकडों से खेलना .फिर खेला टक्कु  छांटनी.जिसमे ढेर सारे कंकड़ ले के खेलते हैं,सबको जिस हाथ से कंकड़ उठाते है उसी में इकठ्ठा करते जाते है.हाथ से गिर जाये तो आउट माना जाता है,हाथ के सभी कक्दों को अगले खिलाडी को देना होता है.उठाये गये इन कंकडों को छंटते हैं पहले दो दो एक साथ,फिर तीन इसी तरह चार ...पांच..   सुविधि,गरिमा,ध्यान कुंवर मेम भी शामिल हो गई मैंने उन्हें बताया कि देखो बच्चे जोड़ना और गुना करना सीख रहे हैं और इन्हें मालूम ही नही कि मैं इन्हें पढ़ा रही हूँ.ऐसे ही ताश हो या लंगड़ी टांग ...मैंने सारी गणितीय आकृतियाँ इसी तरह सिखाई.
बड़ा मजा आता है मुझे शरारत करने में भी.कंकड़  ऊपर उछलते समय गिर जाता है तो मैं चिल्लाती हूँ 'नीचे नही गिरा देखो गोद में गिरा है.ये तो मामा की गोद है,मामा की गोद में गिरे तो आउट थोड़े ही होते हैं?'कल भी खूब चिल्लाई.मेरी क्लीग्ज़ बोली-'मेम! आप ऩे दूर गिरे कंकड़ को गोदी में डाला उठा कर'
'झूठ.मैंने नही डाला वो तो खुद गिरा,इतना तो खेल में चलता है'
'मेम! हमारा कंकड़ गिर गया तो? तो हमारे भी मामा की गोद मानोगे?' एक लडके ऩे पूछा.
'बिलकुल मानेंगे' और जब उनका दुबारा गिरा मैंने झट कंकड़ झपट लिए.और बोली-'तेरे एक मामा है इसलिए एक बार मौका मिला मेरे छ मामा है इसलिए छ बार गिर जाए तो भी मैं आउट नही.'
मासूम बच्चे कई बार हाँ में हाँ मिलाते है और कई बार चिल्लाते है 'चीटिंग ..चीटिंग'
हा हा हा आप लोग वहां होते तो शायद खुद को नही रोक पाते और हमारे साथ शामिल हो जाते.
 मेरे अब तक जवान रहने का कारण भी शायद ये बच्चे ही हैं जिनके साथ इतना इंजॉय करने के कारण ही मैं दिल और दिमाग से अब तक जवान हूँ.और मेरे भीतर का बच्चा अब तक जीवित है.

 

अनुराग शर्मा जी कैसे लगते हैं , पाईरेट  के वेश में 

 

पिछले कई सालों में स्थानीय भारतीय बच्चों (और वयस्कों) के लिये

छोटे-छोटे नाटक तैयार किये हैं कई बार लिखे भी हैं परंतु निर्देशन लगभग
सदैव ही किया है

हैलोवीन से बेटी के साथ मिलकर उसके मिनी-नगर बनाने में साथ देता हूँ जो

कि नव-वर्ष तक कई आकार प्रकार ले चुकता है

पिछले हैलोवीन पर बच्चों के साथ मैं भी कुछ क्षणों के लिये पाइरेट बनकर

बैठ गया था शायद उसे शामिल किया जा सके - 

 

डा. दराल साब को अपनी सादगी पर किसी के मरने का ,अब तक इंतज़ार है...



बात उस समय की है जब मेडिकल कालिज में दाखिला लेने से पहले हम एक साल का प्री मेडिकल कर रहे थे हमारे बैच में ६० छात्र थे जिनमे १२ लड़कियां थीं वही एक साल था जब हम को-एड में पढ़े थे वर्ना स्कूल और कालिज में हमारी कक्षा में कोई लड़की थी लड़की की जात  
इन १२ लड़कियों में लड़कियां बड़ी हाई फाई परिवारों से थी जबकि बाकि हम जैसे साधारण मिडल क्लास परिवारों की थी अब हम तो गोरमेंट ब्वाइज हायर सेकंडरी स्कूल से निकल कर आये थे भले ही इंग्लिश में टॉपर थे , लेकिन इंग्लिश बोलनी बिल्कुल नहीं आती थी

हमारी क्लास में एक लड़का था --बड़ा खुरापाती इत्तेफाकन , मेरा दोस्त बन गया था अक्सर खुरापात वो करता और फंस जाता मैं
एक दिन वो कहने लगा --यार देख ये जो लड़कियां हैं , ये तो अपने बल बूते से बाहर की हैं लेकिन ये जो लड़कियां हैं , ये अपनी औकात की हैं इनमे से एक तेरी और एक मेरी
बस अपने तो ज़ेहन में ये बात बैठ गई और हमने उनमे से एक को अपना मान लिया दिल से
अब तो हम रोज उसको कनंखियों से देखते और मन ही मन उसका पूरा ख्याल रखते लेकिन बात कभी नहीं हुई
एक दिन इत्तेफाक से हम दोनों लेट हो गए और एक ही बस से सुबह एक ही समय कॉलिज पहुंचे बस स्टॉप से चलकर करीब ३०० मीटर पर हमारा क्लास रूम था सारे रास्ते हम दोनों साथ साथ चलते रहे , चुपचाप वो बोली , मैं मन में गुदगुदी होती रही रास्ते भर आखिर वहां पहुंचे जहाँ से क्लास के लिए दायें मुड़ना था अचानक मैंने पूछा --क्लास में चलना है क्या ? इतना सुनते ही उसने क्लास की तरफ दौड़ लगा दी , बिना कोई ज़वाब दिए और मैं खड़ा खड़ा अपना सा मूंह लिए उसे जाते हुए देखता रहा
आखिर सर झुकाए बायीं ओर मुड़कर, मैं कैंटीन चला गया , चाय के साथ ग़म ग़लत करने
उस दिन आशिकी का भूत सर से उतर गया , जो फिर कभी नहीं चढ़ा
आज भी कभी जब सोचता हूँ तो मनोज कुमार की एक फिल्म का ये गाना याद आता है --
आया ना हमको प्यार जताना
प्यार सभी से हम करते हैं
बस आज तक किसी ने यह नहीं कहा --
भोलापन तेरा भा गया हमको
सादगी पर तेरी मरते हैं
वैसे १८ साल की उम्र से पहले बचपन ही तो था 

   देखिए समीर जी को बारिश में भीग कर गाना गाते हुए

पिछले सप्ताह रोज की भांति टहलने निकला शाम अभी जवान ही थी कुछ धूप से संगत बांटती कि एकाएक बादल छा गये और तेज बारिश होने लगी. सुनसान वाकिंग ट्रेल. न सर ढकने को कोई छप्पर और न घर पास. भीगने से बचने का कोई उपाय नहीं. तब एक शुद्ध भारतीय की तरह सोच कि कुऎँ में तो गिर ही गये हैं, पहले नहा लो फिर बचाने को आवाज देंगे, मैने सोचा कि आज तबीयत से भीग ही लिया जाये. भीगते भीगते घर की ओर रुख किया.

जाने क्यूँ बरसों बाद घनघोर बारिश में भीगते मन मचल उठा और मैं बच्चों की तरह आसमान में दोनों हाथ और चेहरा उठाये आँख बंद किये गोल गोल घूमने लगा मानो नाच रहा हूँ. शायद तीन चार मिनट से ज्यादा समय तक. ऐसा लगा जैसे ध्यान की स्थिति में चला गया हूँ. अपनी ही एक कविता जोर जोर से गाता. मालूम तो था ही कि इस सुनसान में न कोई सुनने वाला है और नही कोई देखने वाला.

जब आँख खोली तो पाया तीन लड़कियाँ और दो लड़के मुझे घेरे खड़े भीगते हुए मुस्करा रहे हैं. मैं उन्हें देख कर झेंप गया और जैसे ही मैने गाना और गोल गोल घूमना बंद किया, उन लोगों ने ताली बजाना शुरु कर दिया.

मैं किसी तरह अपनी झेंप मिटाता, थैन्क्यू थैन्क्यू कहता घर की तरफ बढ़ चला.
हो जाता है ऐसा भी कभी कभी




अली सैयद जी से सीखी जा सकती है लड़कियों को इम्प्रेस करने की तरकीब


अपना कस्बा तालाबों से मालामाल था !  उन दिनों नगरपालिका घर घर पानी की
सप्लाई नहीं करती थी तो पीने का पानी कुंवों से और नहाने के लिए घर के
पास का तालाब , बस यही विकल्प मयस्सर हुआ करते !  अपना स्कूल भी तालाब के
पाट पर घने फलदार दरख्तों के बीचो बीच लगता !  ठीक नीचे नहाने के पक्के
घाट !  कभी लगा ही नहीं कि घर , स्कूल या तालाब में कोई  फर्क भी है !
पास ही खेल का मैदान , तो  फिर अपनी पूरी दुनिया ही वहीं बसती थी !
१२ - १६  साल की उम्र के दोस्त , एक गिरोह जैसे , हरदम साथ रहते !  तालाब
में कूदना तैरना और बहुत कुछ !  हममें से एक , जाहिद सिद्दीकी पानी में
बिना हिले डुले घंटो चित  पड़े रहने का हुनरमंद , हम सब की ईर्ष्या का
पात्र  !  खासकर तब , जबकि कुछ दिनों पहले ही लड़कियों का एक स्कूल भी घाट
से जुडी एक बिल्डिंग में शिफ्ट हुआ था :) सब दोस्तों ने उससे चिरौरी की ,
चुपके से हमें भी सिखा दो , उसे लगा , उसकी बादशाहत पे खतरा है , सो मुकर
गया !  जाहिद से पिछड़ने और असफल नायकत्व के अंदेशे वाली खीज़ में भरकर
मैंने कहा...दोस्तो कल तुम सब ये सब कर पाओगे बशर्ते मुझसे सीखो ! मामला
संगीन था इसलिए सब सहमत हुए ,बस एक जाहिद हिकारत से देखता रहा !

उस्ताद ने अपने शागिर्दों को पहला लेसन ये दिया कि जनाब आप सब के पैर ठोस

होने की वज़ह से पानी में सबसे पहले डूबते हैं और सीना बाद में क्योंकि
वहां पर हवा यानि कि सांसे मौजूद हैं तो अगर आप लोग अपने पैरों का वज़न
सीने की तरफ ट्रांसमिट कर पायें तो काम आसान हो जाएगा !  शागिर्दों ने
कहा ये तो अभ्यास का मामला है कई दिन लगेंगे !  उस्ताद ने कहा मुझ पर
भरोसा रखो , कल ही कामयाबी हमारे कदम चूमेगी...और अगली ही सुबह सारे के
सारे शागिर्द पानी में चित लेटे आराम फर्माते हुए पाए गये !  लड़कियों के
सामने शिकस्त खाया , सल्तनत लुटाया सा , जाहिद सिर झुकाए और मैं यानि कि
उस्ताद विजय गर्व से सीना ताने !   कि अचानक...मेरी उस्तादी का जुलूस
निकल गया !  हुआ ये कि...

काफी देर से पानी में चमत्कार करता एक दोस्त अपनी हंसी ना रोक सका और

उसकी जांघों के नीचे छुपा छोटा सा बैलून पानी में ऊपर आ गया !  उस वक़्त
जाहिद के चेहरे पर तसल्ली और मुझे बेशर्मी के साथ शर्मिन्दा होना ही था ...

ये बात अलग है कि वो दोस्त अब भी जाहिद के मुकाबले मेरी ही सुनते हैं !




(लगता है यह बाल दिवस नहीं ...बाल सप्ताह ही मन जाएगा....कल दूसरे ब्लोगर्स के अनुभव....अपना भी लिखूंगी,वहीँ से तो यह आइडिया आया था परन्तु मेज़बान  तो अंत में ना...इसलिए  इंतज़ार करें...
और आमंत्रण अब भी खुला है....जिन लोगों को मेल नहीं भेज पायी वे उन्हें भी कोई मजेदार किस्सा याद आ रहा हो..तो बस लिख भेजें )



 










फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...