Saturday, October 8, 2016

एम.एस.धोनी. - द अनटोल्ड स्टोरी

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"एम एस धोनी " फिल्म के विषय में हर जगह कहा गया है कि अगर आप धोनी के फैन हैं तभी ये फिल्म देखने जाएँ . पर धोनी का फैन होने के लिए पहले क्रिकेट में रूचि होनी चाहिए .लेकिन अगर क्रिकेट पसंद नहीं है तब भी इस फिल्म का फर्स्ट हाफ (और वो दो घंटे का है ) हर मध्यमवर्गीय परिवार को अपने जीवन से जुड़ा हुआ महसूस होगा. जब बच्चे स्कूल में होते हैं ,अक्सर उनकी रूचि खेल में होती है और पेरेंट्स के मन में रस्साकस्सी शुरू हो जाती है. खेल में कोई एकाध ही उभरता है जबकि पढ़ाई, डिग्री, एक अदद नौकरी दिलवा खाने पीने का जुगाड़ तो कर ही देती है. धोनी के परिवार में भी यही कशमकश है .पर धोनी के जिगरी दोस्त ,उसकी हर तरह से सहायता करते हैं .कितने ही लडकों को अपने स्कूल कॉलेज के दिन याद आ गए होंगे ,जब दोस्त ही सब कुछ हुआ करते थे और हर गम और ख़ुशी में बस उनके साथ की ही जरूरत होती थी .जब धोनी पंजाब के साथ मैच हार कर लौटते हैं, तो उनका एक दोस्त चिंटू, दूसरे दोस्त से कहता है, 'पता नहीं क्या हुआ है....अपने घर भी नहीं गया .मुझे कमरे से निकाल कर मेरे ही कमरे में बंद है...हमेशा ऐसा ही करता है, मेरे ही घर से मुझे निकाल कर कमरा बंद कर लेता है' हो सकता है ,यह सिर्फ फिल्म में ही डाला गया हो पर दोस्ती की गहराई कीझलक दिखाजाताहै. . धोनी के जीवन के सारे पन्ने सबके सामने खुले हुए हैं...पर उनके संघर्ष में उनके दोस्तों के सहयोग को यूँ सीन दर सीन देखना ,अंदर तक छू जाता है.

धोनी की टिकट कलेक्टर की नौकरी , उससे उपजा फ्रस्ट्रेशन अच्छे से व्यक्त हुआ है .पर जिंदगी में कुछ पाने की अदम्य इच्छा हो तो अपनी जिम्मेवारी पर कुछ कड़े निर्णय लेने पड़ते हैं .धोनी नौकरी छोड़कर फिर से भारतीय टीम में चयन के लिए संघर्ष शुरू कर देते हैं . मैंने सबसे पहले धोनी का नाम इन्हीं दिनों सुना था .'सहारा समय' पर एक प्रोग्राम आता था ,'सिली पॉइंट' पार्थिव पटेल उन दिनों बुरी तरह फेल हो रहे थे .पर सौरभ गांगुली का भरोसा उनपर बना हुआ था .सिली पॉइंट में अशोक मल्होत्रा हमेशा कहते, ' रांची के धोनी इतने अच्छे विकेट कीपर हैं, एग्रेसिव बैट्समैन भी हैं और उन्हें चांस नहीं मिल रहा .' 'रांची के धोनी' नाम ने ध्यान खींचा क्यूंकि बिहार के इक्का दुक्का खिलाड़ी ही भारतीय टीम में जगह बना पाये हैं और फिर इस नाम से कौन अपरिचित रहा .

फिल्म में पात्रों का चयन शानदार है. सारे सहकलाकार ,चाहे वे कोच हो ,क्रिकेट अधिकारी हों, धोनी के दोस्त हों या टीम के दूसरे खिलाड़ी हों .अपने कैरेक्टर में इतने फिट हैं कि लगता ही नहीं वे महज एक्टिंग कर रहे हैं . और सबसे बढ़कर 'युवराज सिंह ' . वो कानों में हेडफोन लगाये ,अपना बैग घसीटते ,अलमस्त अंदाज़ में एकदम किसी राजा की तरह युवराज़ का चलना ,वो एक सीन में ही एक्टर (और निर्देशक ) की काबिलियत बता देता है. युवराज एक क्रिकेट खिलाड़ी के बेटे , स्केटिंग के चैम्पियन , चंडीगढ़ के स्टार बैट्समैन जिन्हें रांची से आये ये खिलाड़ी आँखों में प्रशंसा लिए देखते रह जाते हैं. हमलोग हमेशा सुनते हैं, क्रिकेट एक माइंड गेम है .400 के स्कोर के सामने कई बार टीम में स्टार बैट्समैन होते हुए भी विरोधी टीम के विकेट पतझड़ से झड़ जाते हैं . यहाँ धोनी कहते हैं, 'मैच तो हम उस रात युवराज को देखते ही हार गए थे ' दुसरे दिन रांची का स्कोर होता है, 357 और युवराज अकेले 358 बनाते हैं. शायद यही सबक धोनी ने याद रखा और वे कभी पैनिक नहीं होते.

फिल्म के दूसरे हाफ में सब घालमेल है . धोनी का अपनी पहली प्रेमिका 'प्रियंका' से मिलना फिर उसका एक्सीडेंट, अपनी पत्नी साक्षी से मुलाक़ात, प्यार और शादी .पर ये सारे इमोशंस ,दर्शकों को छू नहीं पाते .क्यूंकि धोनी खुद कभी अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं करते .यह उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है , जब वे ख़ुशी, परेशानी, घबराहट खुल कर व्यक्त नहीं करते तो प्यार भी नहीं कर पाते ( निर्देशक ने इसका खास ख्याल रखा है) और जब फिल्म में दर्शक अपने नायक को प्यार में डूबे , विरह में तड़पते नहीं देखेंगे तो उसकी भावनाएं ,उनतक नहीं पहुंचेंगी और कोई संवेदना भी नहीं उपजेगी . आम लड़कों की तरह ही धोनी में भी घोर कमिटमेंट इशु था , यह भी सामने आया है. हिरोइन के साथ घूमना, गाना एक बॉलीवुड रूटीन सा ही लगा...कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाया.

क्रिकेट प्रेमियों को यह फिल्म देखने की सलाह है पर फिल्म में क्रिकेट नजर ही नहीं आया . बस कुछ मैच के खराब एडिटेड दृश्य थे . ना किसी मैच के पहले की मीटिंग ,खिलाड़ियों की आपसी बातचीत , ऑफ द फील्ड की निराशा, ख़ुशी ,चिंता ,हंसी मजाक, थोड़ी अनबन कुछ भी नहीं .नेट प्रैक्टिस , ड्रेसिंग रूम का एक भी सीन नहीं . कंट्रोवर्सी वाली किसी बात का जिक्र नहीं होता , ये अंदाजा तो था .पर जैसे फर्स्ट हाफ में धोनी के खेल से दर्शक जुड़ाव महसूस कर रहे थे दूसरे हाफ में ये सिरे से नदारद था .बस जैसे क्रम से उनके करियर ग्राफ को दिखा दिया गया .शायद इसलिए भी ख़ास महसूस नहीं हुआ कि यह सब तो हम सब लाइव देख चुके हैं .मुशर्रफ के कहने पर कि , “A lot of placards in the crowd have suggested that you should get a haircut, but if you take my advice, you look good in this hairstyle.” धोनी की वो शर्मीली हँसी भी अभी तक जेहन में है .यहाँ सुशांत अक्षरशः कॉपी नहीं कर पाए :)

सुशांत राजपूत ने इस फिल्म के लिए बहुत मेहनत की है .धोनी के टीनेज इयर में उन्हें देख हैरानी होती है ,इतने कमउम्र के कैसे लग रहे हैं . धोनी के खेलने का स्टाइल, बॉडी लैंग्वेज, चाल ढाल, संयमित व्यक्तित्व .सब बहुत अच्छी तरह अपनाया है.

फिल्म के छोटे छोटे डिटेल्स पर बहुत ध्यान दिया गया है...रांची के मध्यमवर्गीय परिवार का रहन सहन, कपडे लत्ते, भाषा, मच्छी मार्केट में मोल तोल . जब कोच की पत्नी उन्हें टेन्स देखकर अक्सर पूछती हैं, 'चा खाबे' तो बरबस मुस्कान आ जाती है.मध्यमवर्गीय दाम्पत्य जीवन में यूँ ही पत्नी ,पति का मूड भांप लेती है .

एक चीज़ बहुत अखरी...धोनी द्वारा किये गए ढेर सारे विज्ञापन के दृश्य ।एक से ही अंदाज़ा हो जाता पर इन प्रॉडक्ट्स निर्माताओं ने पैसे लगाए हैं
तो जम कर फुटेज भी खाया है
फ़िल्म की लम्बाई पांच दस मिनट तो बढ़ ही गई है ।

इसे धोनी का बायोपिक कहा गया है .पर काफी बातें काल्पनिक हैं . साक्षी से मुलाक़ात का वाकया भी सम्भवतः सिर्फ स्क्रिप्ट में ही है. धोनी के एक बड़े भाई भी हैं. उनका फिल्म में कोई जिक्र नहीं . एक बात ध्यान में आती है , अक्सर कोई बड़ा भाई हो तो छोटा भाई निर्द्वन्द्व रूप से अपने कैरियर पर ध्यान दे पाता है ।उसे परिवार की ज्यादा चिंता नहीं होती ।प्रत्यक्ष रूप से ना सही परोक्ष रूप से भी कैरियर के निर्माण में बड़े भाई का भी कुछ रोल होता है ।ना जिक्र करने की कोई वजहें रहीं होंगी।पर फिर बायोपिक क्यों कहना ।

फिर भी फर्स्ट हाफ के लिए ये फिल्म क्रिकेट के अप्रेमी भी देख सकते हैं .


3 comments:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल रविवार (09-10-2016) के चर्चा मंच "मातृ-शक्ति की छाँव" (चर्चा अंक-2490) पर भी होगी!
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत अच्छी रोचक समीक्षा।
    देखते हैं फुर्सत में

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  3. बहुत ही संतुलित और बारीकी से हर पहलू पर रोशनी डालती हुई समीक्षा. मेरा तो फ़िल्में देखना ही छूट गया है... कितनी फ़िल्में छूट गयीं.

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