Sunday, October 7, 2012

कहीं देखा है,आपको...



ऐसा सबके साथ  ही होता है...कोई अनजान चहरा देखते ही लगता है....ये चेहरा  कहीं देखा है..जाना-पहचाना सा है. या फिर किसी को देखकर लोग कहें..'आपको कहीं देखा है' . अब ऐसे वाकये एकाध बार हों  तो वो सामान्य सी बात है...पर अगर बार-बार हो तो  फिर थोड़ा असहज लगता  है या  फिर आदत पड़ जाती है. 
 अभी हाल में ही गणपति पूजा के लिए एक नए पंडित जी घर आए. उन्होंने पूजा की तैयारियाँ करते हुए पूछा, "आप उस साईं मंदिर में हमेशा आती हैं ना? "
"कौन सा मंदिर ?"
"वही ब्रिज के पास जो  है..."
मैं समझ गयी उनकी ग़लतफ़हमी, पर हामी भरी.." हाँ..जाती हूँ."
वे खुश होकर बोले.."हां, मैने कई बार देखा है,आपको  "
जबकि सच ये है कि मुझे पता भी नहीं  वो मंदिर किधर है.
ये हामी भरनी अब सीखी है ,मैने...वरना पहले सीधा 'ना' कह देती थी. और अपना अंदाजा यूँ गलत होते देख लोगों की भृकुटी पर बल पड़ जाते थे.

कभी लोगो के इस मुगालते से मुझे फायदा भी होता था तो कभी लोगों की नाराज़गी भी झेलनी पड़ती थी. 

मुझे थोड़ा सा आश्चर्य होता था, जब मेरे बेटे के स्कूल के प्रिंसिपल मुझसे बड़ी आत्मीयता से बात करते. वरना प्रिंसिपल लोग कहाँ...स्टुडेंट्स के पैरेंट्स को इतनी तवज्जो देते हैं. पर मुझे हमेशा अच्छा ख़ासा समय देते और बात करते. बच्चों के बारे में भी बड़े विस्तार से पूछते . आखिर एक बार उन्होंने पूछ ही लिया.."आप नागपुर की रहने वाली हैं ना?"
"ना.."
"आप वहाँ.... रहती थीं ना..??" (किसी कॉलोनी का नाम लिया...जो मैं दूसरे पल ही भूल गयी..अब तक कहाँ याद रहेगा )
मेरे ये कहने पर कि 'मैं तो नागपुर कभी गयी भी  नहीं'.... बड़े आश्चर्य से भर कर उन्होंने सर हिलाया. कुछ सोचते रहे पर सज्जन व्यक्ति हैं..बाद में भी वही आत्मीयता बनाए रखी.  

पर मेरे दूसरे  अनुभव इतने अच्छे  नहीं रहे. ट्रेन में एक मोहतरमा मिलीं.परिचय का आदान-प्रदान हुआ...कुछ देर  बातचीत करने  के बाद.उन्होंने पूछा.."आप गोरखपुर की हैं..?"
मैने समझ गयी..थोड़ा हंस कर ही कहा.."नहीं."
"फिर आपके रिश्तेदार होंगे वहाँ...आप उनसे मिलने आयीं होंगी क्यूंकि आपको मैने वहाँ देखा है." 
मैने फिर जोर देकर कहा.."मैं कभी गोरखपुर नहीं गयी "
इस पर उस महिला ने मुहँ फुला लिया...और खिड़की से बाहर देखने लगीं...शेष यात्रा चुप्पी में कटी. उन्हें लगा, मैं झूठ बोल रही हूँ. 
ये तो फिर भी ठीक था..वे अजनबी थीं. कुछ देर का ही साथ था. एक बार तो एक 'ब्रैंड न्यू ' रिश्तेदार ही नाराज़ हो गए.
मेरी कजिन की शादी थी. दूल्हा-दुल्हन मंडप में बैठे रस्मे कर रहे थे. मैं बहनों में सबसे बड़ी हूँ..तो थोड़ा सब पर रौब जमा रही थी. फोटो वोटो  खींच रही थी. दुल्हे महाशय अक्सर मेरी तरफ देख लेते. मुझे यही लगता..'मैं शायद इतनी बातें कर रही हूँ..इसलिए वे कयास लगा रहे होंगे कि  मैं रिश्ते में कौन हूँ ?"

शादी के दूसरे दिन...जब इत्मीनान से सबलोग बैठे..परिचय का दौर शुरू हुआ..तो उन्होंने झट से पूछा.."आप दिल्ली में रहती हैं ना..?"
"ना मुंबई में...पर पहले दिल्ली में रहती थी.."
"हाँ, वही तो..मैने आपको दिल्ली में देखा है.."
फिर थोड़ी बातचीत के बाद चला...वे दिल्ली तब आए थे, जब मैने दिल्ली छोड़ दी थी.
वे फिर उलझन में पड़े,पूछा.."..आपके ममी -पापा कहाँ रहते हैं ?? " ये बताने पर कि  'पटना में,रहते हैं'....उनका चेहरा खिल गया.." अच्छाss...फिर  मैने आपको पटना में देखा होगा"
कुछ और बातें करने पर पता चला..रिटायरमेंट के बाद पापा  ने जब पटना में घर लिया तब तक वे जनाब पटना छोड़ 
दिल्ली जा चुके थे.
 पर अपने सारे कयास  गलत होते देख वे बुरी तरह झुंझला गए. रात भर जागने की थकान भी थी. और मेरे साथ इस तरह के वाकये कई बार  होने से मुझे हंसी भी आ गयी. जिसने उनके मूड को खुशनुमा बनाने में कोई योगदान नहीं दिया. वे भी मुहँ फिरा कर दूसरों से बातें करने में व्यस्त हो गए. 

पर इन दो वाकयों से मैंने सीख  लिया...कोई ऐसा कहे..तो हंस कर हामी भर दो.'.अपना क्या जाने वाला है'.:)

पटना साल में एक बार ही जाती हूँ..एक दिन सब्जी लेने गयी...सब्जी वाले को कहा.."अच्छी सब्जी देना."
 कहने लगा.."रोज ही तो मुझसे लेकर जाती हैं...मैने कभी खराब सब्जी दी है,आपको.?." मैं बस मुस्कुरा कर चुप हो गयी...कुछ नहीं कहा.

एक बार मुंबई में भी..मेरी सहेली...समुद्री मछली खरीद रही थी. उसे देने के बाद मछली वाले ने  मुझसे कहा .."आप नहीं लेंगी..आप भी लीजिये.."
सहेली के कहने पर कि ये तो मछली खाती ही नहीं...वो बोला.."क्या भाभी...हमेशा तो ये मुझसे मच्छी लेकर जाती हैं...हैं ना भाभी ? ."
मैने हामी भरी और कहा..'आज नहीं लेना है '
सहेली आश्चर्य से मुझे देख रही थी..मैने उसे चलने का इशारा किया...और फिर सबकुछ एक्सप्लेन किया.

पर ये सब देख कर मेरा मन बहुत रुआंसा हो जाता था, "मेरी इतनी साधारण शक्ल सूरत है...सबको लगता है..कहीं देखा हुआ है." फिर मन को समझाती रंग-रूप तो भगवान की देन  है,उसका क्या गिला करना....जो मिली है उस पर ही  संतोष करके अपने कर्म अच्छे रखो.

पर एक बार एक कहानी में कुछ पंक्तियाँ  पढ़ीं...और दिल सुकून से भर गया.उसमे कहानी के किसी एक पात्र का वर्णन करते हए लिखा था, .."कभी कभी भीड़  में भी कोई चेहरा अपना सा लगता है...देखते ही लगता है...इसे कहीं देखा है ..जाना पहचान चेहरा है. उस चेहरे से अपनापन झलकता है , कुछ ऐसा ही चेहरा था उसका. " (पता नहीं था..कभी ब्लॉग पर ये सब लिखूंगी..वरना..कहानी  और कहानी-लेखक का नाम जरूर याद रखती ) 

और जैसे मेरे खिन्न मन पर शीतल फुहारें पड़ गयीं. इस कथन में कितनी सच्चाई है, नहीं पता..पर मैने अपने दिल को बहलाने के लिए इसे बिलकुल सच मान लिया..:):)

51 comments:

  1. होता है ऐसा अक्सर रश्मि कुछ चेहरे अपने से लगते हैं मुझे तो कभी कभी ऐसा लगता है कि यदि किसी पिछले जन्म मे हम उस से मिलें हो्गे तभी आज अपनेपन का अहसास दे रहा है यदि पिछला जन्म होता है तो :))))))))))

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    1. एक बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक Brian L.Weiss की पुस्तक है Many Lives Many Masters

      उसमे उन्होंने लिखा है...हर जनम में आत्माओं का समूह एक साथ जनम लेता है. उनका कहना है कि एक ही व्यक्ति..अलग अलग जनम में पिता, भाई, दोस्त..गुरु की भूमिका में होता है..

      तो हम भी मान लेते हैं...जिसने भी कहा कि चेहरा जाना-पहचान है...वो जरूर पिछले जनम में मेरे मोहल्ले का वासी होगा/होगी. :):):)

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  2. चेहरे धोखा देते हैं

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  3. पर ये सब देख कर मेरा मन बहुत रुआंसा हो जाता था, "मेरी इतनी साधारण शक्ल सूरत है...सबको लगता है..कहीं देखा हुआ है." फिर मन को समझाती रंग-रूप तो भगवान की देन है,उसका क्या गिला करना....जो मिली है उस पर ही संतोष करके अपने कर्म अच्छे रखो.
    मुझे ऐसा क्यूँ लगता है ..... जज्बात मेरे हैं जिन्हें शब्द आपने दिया हो ...... !!

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  4. जाने-पहचाने से अजनबियों की दुनिया.

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  5. जब इतने लोग पहचानने लगें तो मन रखने के लिये मान जाईये।

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  6. सच्ची..............
    कित्ती कॉमन सी सूरत है रश्मि !!!
    :-)

    नहीं दोस्त....उस कहानी में सही लिखा है...कुछ चेहरे कुदरती तौर पर अपनापन लिए होते हैं...
    जैसे तुम्हारा..
    सो खुश रहो ♥♥
    अनु

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  7. aisa mere saath bhi hota tha aksar jab school- college me thi :) vaise ....kahin padaha tha bhagwan ek shakl ke 7 insaan banata hai ...magar ek hi desh me ye pata nhin ...kahin suna nahin...:P

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  8. फिल्म "आनंद" के काल्पनिक चरित्र "मुरारीलाल " को याद करें जिसने आनंद को क़ुतुब मीनार पर बीयर पिला कर आउट करा दिया था.खिन्नता की जगह आनंद ले लेगा

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  9. tumhari ye chir parichit muskan dekhkar shayad log aisa sochte hain kyonki jo bhi chehra muskan liye hue hota hai wo sab ko apna-apna sa lagta hi hai
    Allah kare tumhare honton par ye muskan hamesha khelti rahe (ameen)

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    1. बस तुम जैसे दोस्तों की दुआ साथ है...इस्मत...:):)

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  10. अब तो आपसे मिलना पड़ेगा। मिलकर देखें कि अपन को कैसा फील होता है देखें भगवान यह अवसर कब और कहाँ देता है

    यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। ऐसा होना स्वाभाविक है। शायर ने सही लिखा है। कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन्हें देखकर लगता है कि इसे पहले कहीं देखा है। मुझे भी कई बार ऐसा हुआ है। हर सूरत में तू ही तू नज़र आती है..उसी तरह कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो जाने पहचाने लगते हैं।
    कभी-कभी कुछ उल्टा भी होता है। एक मजेदार बात बताऊँ..

    एक बार बारिष से बचने के लिए मैं अपने मित्र के साथ एक मिठाई की दुकान पर रूका हुआ था। एक व्यक्ति आया जो मुझे जानता था। यह भी कि मेरा घर सारनाथ में है। उसे यह नहीं पता था कि अब मैं सारनाथ से 20 किमी दूर लंका बीएचयू के पास रह रहा हूँ। मुझे देखकर कुछ समय बाद बोला..."आपके भाई साहब लंका में रहते हैं न? मैं उन्हें देखता हूँ। रोज सुबह घूमने आते हैं।" उसकी बात सुनकर मुझे मजाक सूझा.."हाँ, वो मेरे बड़े भाई साहब हैं।" जबकि वह मुझे ही रोज देखता था। फिर उसने मेरे बारे में बहुत सी बातें बताईं। आपके भाई साहब यह करते हैं। वह करते हैं। बड़े भले व्यक्ति हैं। मैने कहा, "वे भी यहीं आये हुए हैं।" उसने आश्चर्य से कहा..कहाँ हैं? मैने कहा, "मिठाई खिलाइये तो मिलवाऊँ।" उन्होने मिठाई खिलाई और बोले, "अरे! भाई साहब को भी बुला लीजिए, कहाँ हैं? वे भी खा लें।" तब तक मेरे साथ के दोस्त से न रहा गया, बोल उठा, "अरे! यही तो हैं बड़े भाई साहब। आप भी पहचान नहीं पाते हैं!" अब उनकी हालत देखने लायक थी।

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  11. कभी कभी भीड़ में भी कोई चेहरा अपना सा लगता है... उस चेहरे से अपनापन झलकता है

    दिल बहलाने की बात नहीं है ....आपके बारे में ये बात मुझे सही लगती है

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  12. शायद हंसकर मान लेना ही हल है.....

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  13. तीन बातें:
    पहली बात तो एक ऐसा ही जवाब आपने पलट कर मुझे भी दिया था...
    दूसरी बात, 'गर्ल नेक्स्ट डोर' जैसे मुहावरे यूं ही नहीं बने!!
    तीसरी बात, फिल्म आनंद का मुरारीलाल भी कोई चीज़ है!! भले ही फिल्म में वो नहीं था (था भी)मगर लाइफ में होता है!!

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    1. @पहली बात तो एक ऐसा ही जवाब आपने पलट कर मुझे भी दिया था...

      कौन सा जवाब ??.... .किस सवाल का ??

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  14. उल्लेखनीय पोस्ट....रश्मि जी...
    ऐसे प्रसंग जीवन्तता लिए होते हैं...मजेदार होते हैं...उनमें नाविन्य
    भी बहुत होता है और होती है तत्काल जिज्ञासा... भले ही पहले मिले हों,
    न मिले हों...पर ऐसे प्रसंग दोनो पक्ष को खुशी देते हैं जो रुटिन से हटकर
    होती हैं...(सकारात्मक प्रसंग ही, नकारात्मक हो तो चिंता में भी डाले)

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  15. अइसा अक्सर होता है। मेरी सुरत माशाअल्लाह इतनी प्यारी है अक्सर लोग कहते मिलते हैं कहीं देखा है। इसका मतलब ये है कि अपुन खालिस हिंदुस्तानी हैं। तभी तो इतने आम है कि हर जगह दिख जाते हैं। दूजा मतलब ये कि भगवान के अंश हैं अपुन..(वइसे भी भगवान हर जगह मौजूद हैं) तो लोग भाई को एक साथ कई जगहों पर भी दिख जाते हैं। कल ही रात में ऑफिस से लौटते हुए मैं किनारे वाली सीट पर टेक लगाए गहरी नींद में जाग गया। गंत्व्य में अभी 6 स्टेशन बाकी थे..कि एक सरदार ने अपुन को हिलाया..डुलाया....कंधे पर थपकी दी....भाई साहब उतरना नहीं है क्या..सोते ही रहेंगे क्या..पहले तो अपुन को लगा कि शुरु से ही साथ था और गहरी नींद में देखकर जाने से पहले उठा रहा है। फिर उसे हंसते औऱ बात करते हुए समझ में आया कि वो मुझे कोई और समझ रहा है। मैंने मुस्कुराते हुए उसे तीन-चार बार थैंक्स कहा औऱ अखबार खोल कर बैठ गया ताकि दूबारा नींद नहीं आए। उसे शायद तब गलती का अहसास हुआ फिर वो किनारे हो लिया औऱ अपने स्टेशन पर उतर गया।

    वैसे इसमें सीधे न कहना में ही भला होता है। अक्सर अपुन तो आदरणीय किशोर कुमार जी का गीत दोहराते रहते हैं....कुछ इधर उधर शब्दों मे हेरफेर हो जाता है...
    "कभी-कभी इत्तफाक से
    ..कोई मिल जाता है
    उनमें कोई याद रह जाता है
    कोई भूल जाता है..।

    वैसे इक बात कहूं ..आपको ऑफर स्वीकार कर लेना चाहिए ..

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    1. ऑफर??
      इस पोस्ट में तो किसी ऑफर की बात नहीं है..कौन सा ऑफर??

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  16. बहुत अलग ढंग का अनुभव और जानकारी मिली हालांकि कई बार ऐसा सबके साथ होता है ,कई बार तो हम किसी व्यक्ति को कोई अपना समझकर नमस्ते भी कर बैठते हैं |आभार शेयर करने हेतु |

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  17. बहुत सुंदर, काफी हद तक हकीकत

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  18. actually हँसता-मुस्कुराता चेहरा हर समय अपना सा लगता है.. शायद ऐसा ही कुछ आपसे मिलने वालों के साथ होता हो... है न :)
    याद पर उस दिन, आप हमसे भी मिल चुकी...:-D

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  19. कई बार तो कई दृश्य भी पहले से देखे लगते हैं ... पर जो भी हो,अच्छा लगता है

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  20. haan aksar aesa hota ai ...:)aapko kahin pehle bhi hamne dekha hai waali traz par :)

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  21. होता है रश्मि..बहुत बार ऐसा होता है. मेरे साथ भी कई बार हुआ है, और मैं भी मुस्कुरा के कह देती हूँ " जी ज़रूर देखा होगा आपने....."

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  22. सामने के दो-चार दांत तुड़वा लीजिये, शकल अलग हो जायेगी.. :P
    अब मारिएगा मत दीदी.. :)

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    1. PD,
      इतने ओरिजिनल आइडियाज़ तुम्हे आते कहाँ से हैं? ऐसा जो भी आइडिया आए..तुरंत पेटेंट करवा लो...और मेरा कमीशन अलग कर देना...सलाह तो हमने ही दी है ,ना

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    2. बस आ जाते हैं.. अब हम हैं ही इतने बुद्धिमान क्या कीजियेगा!! :D

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    3. बुद्धिमान बहन का बुद्धिमान भाई :):)

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  23. दीदी मुझे तो कभी कोई लड़की अगर दिखती है जानी पहचानी शक्ल की तो मैं तो पूछता भी नहीं हूँ की "लगता है आपको पहले भी कहीं देखा है"...जाने क्या समझे... :P

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    1. अभी,
      तुमने अभी ध्यान दिलाया तो ध्यान आया...जब तक लड़की थी...मुझसे भी किसी ने नहीं पूछा....:):)

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  24. ये पोस्ट पढ़ते हुए जेहन में जनाब मुरारीलाल ही आ रहे थे और टिप्पणियों में भी देखा लोगों ने मुरारीलाल का जिक्र किया है :)

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  25. लो जी ये तो सोच मिलने ही हद है , आप यहाँ शकल मिलने की बात कर रही है , मै कई बार आप की फोटो देख चूँकि हूं और आप मुझे पहली ही बार में मेरी ननद जैसी दिखती थी मैंने सोचा की कह दू पर लगा की पता नहीं आप क्या सोचेंगी , थोडा फर्क था बस आयु के अंतर के कारण वो आप से थोडा कम आयु की है , लेकिन अभी कुछ दिन पहले आप की एक फोटो एक ब्लॉग पर देखी जो पुरानी थी आप अपने छोटे बच्चो के साथ खड़ी थी उसमे तो आप इतनी ज्यादा मिलती जुलती थी की फोटो मैंने पतिदेव को दिखाई उन्होंने तुरंत कहा की अरे सरिता ( बेशर्म पतिदेव अपने दीदी को दीदी नहीं कहते ) की फोटो ब्लॉग पर किसने लगाई ये बच्चे कौन है तब मैंने बताया की ये उनकी बहन नहीं आप है , एक बार सोचा की उस पर लिख दू टिप्पणी के रूप में फिर लगा की ये ब्लॉग तो किसी और का है कभी आप के ब्लॉग पर जरुर इस बात का जिक्र करुँगी और लो जी आप ने तो आज ये पूरी पोस्ट ही लगा दी उसी विषय पर :)) |
    @जाना पहचान चेहरा है. उस चेहरे से अपनापन झलकता है
    बिल्कुल सहमत ना केवल आप का चेहरा बल्कि आप की बाते भी अपनेपन की झलक लिए होती है , और हा मुझे झूठी तारीफ करनी नहीं आती है :)

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    1. अब क्या कहूँ अंशुमाला...बस ढेर सारा स्नेह...प्यार और आशीर्वाद...{अब छोटी हो..दोस्त हो.. पर कभी कभार blessings भी चलेगी :):) }

      और शायद टेलीपैथी ने ही यह पोस्ट लिखवा ली वरना कभी सोचा नहीं था,ऐसी कोई पोस्ट लिखने की .
      मेरी टेलीपैथी भी बड़ी strong है...शायद कभी उस पर भी कुछ लिख मारूँ...
      और बेकार संकोच कर गयी, बता दिया होता तो पोस्ट की शुरुआत तुम्हारी बात से ही करती..:)

      सरिता को स्नेह..और एक मजेदार बात...मेरी एक कहानी की नायिका का नाम 'सरिता' है और वो कहानी भी कुछ सच्ची सी है....फ़िक्र ना करो...सरिता एक पॉजीटिव कैरेक्टर ही है.

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  26. कई चेहरे ऐसे ही होते हैं।मुझे भी कई बार ऐसा लगता है कि इस व्यक्ति को कहीं देखा है पर मैं किसीसे पूछ नहीं पाता कि कहीं ये मेरा भ्रम तो नहीं।
    कुछ चेहरे ऐसे भी होते है जिन्हें देखकर ऐसा लगता है इन्हें कभी गुस्सा ही नहीं आता होगा।आपका फोटो देखकर भी ऐसा ही लगता है।मुझे लगता है तभी लोग आपसे बेझिझक कह भी देते होंगे कि आपको कही देखा है...

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    1. @कुछ चेहरे ऐसे भी होते है जिन्हें देखकर ऐसा लगता है इन्हें कभी गुस्सा ही नहीं आता होगा।आपका फोटो देखकर भी ऐसा ही लगता है

      राजन,
      ये पंक्तियाँ अपने ब्लॉग के ऊपर टांक दूँ..:):)

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  27. कई बार ऐसा होता है कि आपका चेहरा किसी से मिलता-जुलता होता है, लेकिन उत्तर नकारात्‍मक होने पर बुरा मानने वाली तो कोई बात नहीं होती। खैर अपने-अपने अनुभव हैं।

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  28. कहते हैं की हर व्यक्ति के कम से कम सात हमशक्ल होते हैं , इसलिए ऐसा हो जाना लाजिमी है .
    हमारी तस्वीर किस किससे मिलती है , अब अपनी तारीफ़ में खुद क्या कहें , दूसरों से सुनते हैं तो मुस्कुरा कर चुप रह जाते हैं :):)

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  29. कुछ चेहरे बहुत आत्मीय होते हैं और अपने से लगते हैं... मुझसे कभी किसी ने नहीं कहा..लेकिन मुझे अक्सर लोग जाने पहचाने लगते हैं... कई बार पूछ भी देता हूँ.... कुछ ऐसे अनजाने लोग अब दोस्त हैं...

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  30. रोचक पोस्ट..अब अगर ऐसा वाकया हुआ तो आपके अनुभव का फ़ायदा मिलेगा।

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  31. मैंने भी आपको कहीं देखा है. :)
    घुघूतीबासूती

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  32. ब्लॉग वर्ल्ड मे पहला पोस्ट है I कल पेड़ मे अमरूद देख रहा था तो हर डाली मे नज़र घुमाते एक पका सा अमरूद आखिर मे मिल ही गया I ऐसे ही ब्लॉग वर्ल्ड मे विचरते आप के ब्लॉग पर नज़र गयी तो लगा कुछ और मिला I बहुत हद मैं भी सहमत हू, मेरे साथ भी कई बार ऐसा ही हुआ है और मैने भी अपने वजूद को सार्वजनिक संपति के रूप मे मानते हुए कई अजनबी लोगो की यादों की छाप सहर्ष स्वीकारी है, मगर मेरे कुछ अनुभव अलग से भी है I कई बार अपनों की बीच मे मुझे पहचाना नहीं गया है है I वो मुझे मेरी शक्ल से तो पहचान लेते हैं मगर किसी की पहचान उसका चेहरा ही हो ऐसा शायद नहीं है, ऐसे मे देखने मे और पहचानने मे कुछ अंतर पाता हूँ I खैर अब ऐसा है तो है Iहद तो तब है जब आईने के सामने होने पर भी कहीं से आवाज़ आती है " पहचान कौन "

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  33. इसे 'वेन डाइग्राम' अथवा 'सेट थेयरी' से आसानी से समझा जा सकता है | प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में एक सेट है अथवा एक वृत्त है और सभी सेट ईश्वर के सबसेट हैं , इश्वर का सेट युनिवर्सल सेट कहलाता है | जब दो सेट या अधिक सेटों को आपस में इंटर सेक्ट कराते हैं तब एक कामन सबसेट बनता है | आपका स्वयं का सेट जब बहुत बड़ा होता है अर्थात व्यक्तित्व का स्पेक्ट्रम बहुत व्यापक होता है तब अन्य तमाम लोगों में व्याप्त थोड़े थोड़े गुण आप से कामन हो जाते हैं | स्वभाविक तौर पर उन सब लोगों को अपना एक हिस्सा आपके सेट में कामन दिखता है और वे बरबस कह उठते हैं 'आपको कहीं देखा है " |

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  34. द गर्ल नेक्स्ट डोर..:)

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  35. रश्मि मन करता है तुम्हारे लेख ख़त्म ही न हों .बस पढ़ती जाऊं..जैसे बहता हुआ पानी ....और तुम्हारा व्यक्तितिव किसी को भी अपना बना ले ...जैसे मुझे ...कितने दिन हुए हैं तुम्हे जाने हुए,, लेकिन लगता है पहचान वर्षों पुरानी है ...बस ऐसा ही होना चाहिए इन्सान को ..पापा कहते थे ...जबकोई तुमसे मिलकर हटे ...तो उसे यह अहसास हो ..की आज किसी अच्छे इंसान से मिला ...अफ़सोस न हो ...

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  36. ऐसी रचना बार बार पढने को मन करता है ......

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  37. चलो अपन को अब तक ऐसा कोई नहीं मिला। उम्‍मीद है कि आप जब मिलेंगी तो जरूर ही कहेंगी,' आपको पहले भी कहीं देखा है।'
    *
    पूरे लेख की जान तो ."कभी कभी भीड़ में भी कोई चेहरा अपना सा लगता है...देखते ही लगता है...इसे कहीं देखा है ..जाना पहचान चेहरा है. उस चेहरे से अपनापन झलकता है , कुछ ऐसा ही चेहरा था उसका. " यही पंक्तियां हैं। भले ही आपकी न हों।
    *
    आपको ऐसा चेहरा मोहरा मिला, जो सबको पहचाना सा लगे, इससे अच्‍छी बात क्‍या हो सकती है।

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