Tuesday, June 15, 2010

भोपाल गैस त्रासदी और फिल्म एरिन ब्रोकोविच


"एरिन ब्रोकोविच' मेरी पसंदीदा फिल्म है. पर जब जब इसे देखती हूँ (और Zee Studio n Star Movies की कृपा से कई बार देखी है ) मुझे 'भोपाल गैस त्रासदी ' याद आ जाती है और लगता है कोई मिस्टर या मिस ब्रोकोविच यहाँ क्यूँ नहीं हुए? जो इस बड़ी कम्पनी को घुटने टेकने पर मजबूर कर देते और पीड़ितों को सही कम्पेंसेशन तो हासिल होता. इस बार पुनः पीड़ितों के साथ हुए इस अन्याय ने इस फिल्म की फिर से याद दिला दी.

यह फिल्म 'एरिन ब्रोकोविच' की ज़िन्दगी पर आधारित है और यह दर्शाती है कि कैसे सिर्फ स्कूली शिक्षा प्राप्त तीन बच्चों की तलाकशुदा माँ ने सिर्फ अपने जीवट और लगन के सहारे अकेले दम पर 1996 में PG & E कम्पनी को अमेरिका के साउथ कैलिफोर्निया में बसे एक छोटे से शहर 'हीन्क्ले' के लोगों को 333 करोड़ यू.एस.डॉलर की क्षतिपूर्ति करने को मजबूर कर दिया,जो कि अमेरिकी इतिहास में अब तक कम्पेंसेशन की सबसे बड़ी रकम है.

फिल्म में एरिन ब्रोकोविच की भूमिका जूलिया रॉबर्ट ने निभाई है और उन्हें इसके लिए,ऑसकर, गोल्डेन ग्लोब, एकेडमी अवार्ड,बाफ्टा, स्टार्स गिल्ड ,या यूँ कहें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का प्रत्येक पुरस्कार मिला .रोल ही बहुत शानदार था और जूलिया रॉबर्ट ने इसे बखूबी निभाया है.

स्कूली शिक्षा प्राप्त 'एरिन' एक सौन्दर्य प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीतती है. उसके बाद ही एक लड़के के प्यार में पड़कर शादी कर लेती है और दो बच्चों के जन्म के बाद उसका तलाक भी हो जाता है. वह छोटी मोटी नौकरी करने लगती है,फिर से किसी के प्यार में पड़ती है,पर फिर से धोखा खाती है और एक बच्चे के जन्म के बाद दुबारा तलाक हो जाता है. अब वह, ६ साल का बेटा और ४ साल और नौ महीने की बेटी के साथ अकेली है और अब उसके पास कोई नौकरी भी नहीं है. वह नौकरी की तलाश में है,उसी दौरान एक दिन एक कार दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो जाती है, कम्पेंसेशन के लिए वह एक वकील की सहायता लेती है जिनक एक छोटा सा लौ फर्म है. लेकिन वो यह मुकदमा हार जाती है क्यूंकि विपक्षी वकील दलील देता है कि "उस कार को एक डॉक्टर चला रहा था,वह लोगों को जीवन देता है,किसी का जीवन ले कैसे सकता है? और एरिन के पास नौकरी नहीं है इसलिए वह इस तरह से पैसे पाना चाहती है.यह दुर्घटना उसकी गलती की वजह से हुई"


नौकरी के लिए हज़ारो फोन करने के बाद हताश होकर वह उसी Law Firm में जाती है और जोर देती है कि वे उसका केस हार गए हैं,इसलिए उन्हें एरिन को नौकरी पर रख लेना चाहिए. बहुत ही अनिच्छा से वह बहुत ही कम वेतन पर , उसे 'फ़ाइल क्लर्क' की नौकरी दे देते हैं. फिर भी उसे ताकीद करते हैं कि वह अपने फैशनेबल कपड़े पहनना छोड़ दे.इस पर एरिन ढीठता से कहती है कि "उसे लगता है वह इसमें सुन्दर दिखती है" .एरिन की भाषा भी युवाओं वाली भाषा है,एक पंक्ति में तीन गालियाँ,जरा सा गुस्सा आता है और उसके मुहँ से गालियों की झड़ी लग जाती है. बॉस उसे हमेशा डांटा करता है पर एक बार गुस्से आने पर बॉस के मुहँ से भी गाली निकल जाती है और दोनों एक दूसरे को देखकर हँसते हैं.बॉस और एरिन में बॉस और कर्मचारी के अलावा कोई और रिश्ता नहीं दिखाया गया है.

एक दिन फ़ाइल संभालते समय एक फ़ाइल पर उसकी नज़र पड़ती है,जिसमे एक घर को बेचने सम्बन्धी कागजातों में घर में रहने वालों की बीमारी का भी जिक्र था. उत्सुक्तता वश वह उस परिवार से जाकर मिलती है.और उस पर यह राज जाहिर होता है कि उस इलाके में हर घर के लोग खतरनाक बीमारियों से ग्रस्त हैं क्यूंकि pG & E कम्पनी अपने Industrial waste वहाँ के तालाबों में डालते हैं ,जिस से वहाँ का पानी दूषित हो जाता है. और वहाँ के वासी उसी पानी का उपयोग करते हैं. पानी में chrome 6 का लेवल बहुत ही ज्यादा होता है,जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही खतरनाक है.एरिन उस इलाके के हर घर मे जाकर लोगों से मिलती है,उसके आत्मीयतापूर्ण व्यवहार से लोग, अपने दिल का हाल बता देते हैं.किसी का बच्चा बीमार है,किसी के पांच गर्भपात हो चुके हैं. किसी के पति को कैंसर है. वह डॉक्टर से भी मिलती है और उनसे विस्तृत जानकारी देने का अनुरोध करती है.

जब वह ऑफिस लौटती है ,तब पता चलता है इतने दिन अनुपस्थित रहने के कारण उसे नौकरी से निकाल दिया गया है. वह कहती है, मैने मेसेज दिया था,फिर भी बॉस नहीं पिघलते.घर आकर फिर वह अखबारों में नौकरी के विज्ञापन देखने लगती है,इसी दरम्यान उस हॉस्पिटल से सारी जानकारीयुक्त एक पत्र कम्पनी में आता है और उसके बॉस को स्थिति की गंभीरता का अंदाजा होता है.वे खुद 'एरिन' के घर जाकर उसकी investigation की पूरी कहानी सुनते हैं और उसे नौकरी दुबारा ऑफर करते हैं.इस बार 'एरिन' मनमानी तनख्वाह मांगती है,जो उन्हें माननी पड़ती है.

अब एरिन पूरी तरह इस investigation में लग जाती है.वह आंख बचा कर वहाँ का पानी परीक्षण के लिए लेकर आती है,मरे हुए मेढक, मिटटी सब इकट्ठा करके लाती है.और जाँच से पता चल जाता है,कि poisonous chromium का लेवल बहुत ही ज्यादा है. और यह बात कम्पनी को भी पता है,इसलिए वह लोगों के घर खरीदने का ऑफर दे रही है.

एरिन पूरी तरह काम में डूबी रहती है पर उसके तीन छोटे बच्चे भी हैं...शायद किसी अच्छे काम में लगे रहो तो बाकी छोटे छोटे कामों का जिम्मा ईश्वर ले लेता है, वैसे ही उसका एक पड़ोसी 'एड ' बच्चों की देखभाल करने लगता है और 'एरिन' के करीब भी आ जाता है. एरिन का बड़ा बेटा कुछ उपेक्षित महसूस करता है और उस से नाराज़ रहता है पर जब एक दिन वह 'एरिन' के फ़ाइल में अपने ही उम्र के एक बच्चे की बीमारी के विषय में पढता है और उसे पता चलता है की 'एरिन' उसकी सहायता कर रही है. तो उसे अपनी माँ पर गर्व होता है.

एरिन की पीड़ितों का दर्द समझने की क्षमता और उन्हें न्याय दिलाने का संकल्प और उसके बॉस 'एड' की क़ानून की समझ और उनका उपयोग करने की योग्यता ने PG & E को 333 करोड़ डॉलर क्षतिपूर्ति के रूप में देने को बाध्य कर देती है .

इस फिल्म का निर्देशन अभिनय,पटकथा तो काबिल-ए-तारीफ़ है ही. सबसे अच्छी बात है.कि नायिका कोई महान शख्सियत नहीं है,बिलकुल एक आम औरत है,सारी अच्छाइयों और बुराइयों से ग्रसित.

इस फिल्म के रिलीज़ होने के बाद 'एरिन ब्रोकोविच' अमेरिका में एक जाना माना नाम हो गयीं उन्होंने 'ABC पर Challenge America with Erin Brockovich Lifetime. में Final Justice नामक प्रोग्राम का संचालन किया.आजकल वे कई law firm से जुडी हुई हैं. जहाँ पीड़ितों को न्याय दिलाने के कार्य को अंजाम दिया जाता है.

38 comments:

चण्डीदत्त शुक्ल said...

प्रेरणादायक. अच्छी स्टोरी.

रेखा श्रीवास्तव said...

अपने देश में न्याय की बात कर रही हो, जहाँ से नेताओं ने आरोपी को भागने में खुद मदद की हो. आज भी भोपाल काण्ड के लोग उसके परिणाम को भुगत रहे हैं. तुमने जो फ़िल्म की कहानी बयान की वह काबिले तारीफ है और ऐसी जानकारी रखने की अपेक्षा मैं तुमसे ही कर सकती हूँ.
बहुत अच्छा लगा फ़िल्म के बारे में जानकर . यहाँ तो न्यायतंत्र सिर्फ सोता है और चलता है नेताओं की मर्जी से. दशकों लग जाते हैं एक निर्णय आने में और तब तक आरोपी या पीड़ित में से कोई चल तकबसता है.

shikha varshney said...

ये फिल्म मैंने भी देखी थी बहुत पहले काफी शसक्त पात्र है ..पर फिल्म तो फिल्म होती है .और फिर हमारे देश में तो कानून वैसे भी अंधा है ..
जागरूक पोस्ट.

ashish said...

रश्मि जी , मेरा ये मानना है की हमारे देश में एरिन ब्रोकोविच जैसी शख्सियतो की कमी नहीं है . लेकिन हमारे देश का लचीला कानून, कदम कदम पर अनुचित मुश्किलात , भोपाल गैस कांड जैसे भयावह दुर्घटना पर राजनीतिक हस्तक्षेप , किसी के लिए कटु अनुभव होता है, जो की हमारे देश का दुर्भाग्य है. मै भोपाल गैस कांड के तह में ना जाते हुए बस इतना कहूँगा की हमारे देश में तो मुवावजे की भी बन्दर बाट होतीहै जो शर्म का विषय है. आपकी नजर सचमुच बहुत तीव्र है जो आपने ऐसे भीषण घटना को एक फिल्म के माध्यम से जोड़ दिया. साधुवाद आपको

shikha varshney said...

सशक्त * टाइपिंग मिस्टेक sorry

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सशक्त पोस्ट...लेकिन हमारे देश में कौन सुनाने वाला है....जब बाड़ खेत को खाने लगे तो क्या किया जा सकता है....फिर भी जागरूक करने वाला लेख

rashmi ravija said...

@रेखा जी एवं आशीष जी...सच कहा,न्यायव्यवस्था ही सड़ी-गली है और चींटी की रफ़्तार से चलती है..और इतने लूप होल्स हैं कि अपराधी बच ही निकलता है..
पर जैसा कि मैने लिखा है...यह फिल्म हमेशा मुझे भोपाल गैस त्रासदी की याद दिला देती है...और मन कहता है...काश!!...

rashmi ravija said...

शुक्रिया,शिखा,संगीता जी एवं चंडीदत्त जी...इस त्वरित टिप्पणी के लिए :)

दिलीप said...

baat sahi kahi hai...film maine dekhi hai ek damdaar charitr hai juliya roberts ka....lekin yahan bhrashtachaar ki jo aparimit seema hai...uska kya karenge...varna yahan bhi na jaane kitni hi aisi erin aayi hongi...par fir bhi kuch thos hal nahi nikla...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अच्छी पोस्ट लेकिन मैं अन्य टिप्पणीकर्ताओं के इस मंतव्य से सहमत हूँ कि यहाँ की न्यायव्यवस्था और कानून दोनों ही किसी को ब्रोकोविच नहीं बनने दे सकते। हमारा जनतंत्र फर्जी है। लेकिन इस को बदलने की कोशिश तो की जा सकती है।

नीरज गोस्वामी said...

एक महान फिल्म की याद ताज़ा करने के लिए आपका धन्यवाद...सच हमारे पास एक भी एरिन नहीं है...
नीरज

दिगम्बर नासवा said...

जो कहानी इस फिल्म नें है वो अमेरिका या बाहर के किसी देश में तो हो सकती है ... पर शायद अपने देश में नामुमकिन है .. अच्छी कहानी है .. प्रेरणा देती है .... आशा है हमारे देश में भी इतनी संवेदना जीवित होगी ....

दीपक 'मशाल' said...

यल्लो आधी फिल्म पहले ही दिखी थी आधी आपने दिखा दी... :)

H P SHARMA said...

फ़िल्म की कहानी बढिया है और उसे बहुत सलीके से परोस है आपने. इस देश मै भी अब हम पढ सुन य देखकर ऐसे न्याय के सपने तो देख ही सकते है

डॉ टी एस दराल said...

आपने विस्तार से फिल्म की कहानी सुनाई । न देखने का ग़म जाता रहा । काश कि इस तरह का पात्र यहाँ भी कोई होता !

mukti said...

बहुत अच्छी कहानी है फिल्म की... जूलिया वैसे भी मेरी फेवरेट ऐक्ट्रेस हैं... उनका अभिनय कायल कर देता है...
अपना देश एक संसदीय प्रणाली वाला देश है जहाँ बहुमत में ताकत होती है और बड़े लोगों की बात सुनी जाती है. भोपाल मामले में ऐसे कई राजनीतिक पेंच हैं, और कई राज़, जो खुलेंगे तो बड़े-बडों को जवाब देना मुश्किल हो जायेगा...
पर कभी-कभी आश्चर्य होता है कि राजनीतिज्ञ तो स्वार्थी होते वोट के भी... और धन के भी... पर उन लोगों को क्या हो जाता है, जो गुजरात दंगों के मामले पर तो बोलते हैं... पर भोपाल मामले पर नहीं... कभी-कभी तो कुछ समझ में नहीं आता... क्या इस देश में न्याय के लिए किसी एक समुदाय या क्षेत्र से जुड़े होना ज़रूरी है?

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यह फिल्म मैने नहीं देखी थी…आपके सजीव वर्णन ने इसका अनुभव कर दिया है

काश ऐसे चरित्र हर जगह होते

वन्दना said...

ये शायद बाहर के देशों मे ही हो सकता है भारत मे नही ………………………यहाँ तो इसके लिये आवाज़ उठाने वाले की आवाज़ ही दबा दी जायेगी ।यहाँ तो अन्धेर नगरी चौपट राजा वाली कहावत चरितार्थ होती है।

Mired Mirage said...

जब हमारे वकील साहिब ही कहें कि भारत में यह सम्भव नहीं तो क्या आशा की जा सकती है? जिस देशकी सरकार स्वयं दोषियों को वी आई पी का व्यवहार कर देश से बाहर भेज दे वहाँ क्या आशा की जा सकती है? हाँ यह फिल्म बहुत बढ़िया थी।
घुघूती बासूती

Rangnath Singh said...

यह एक शानदार फिल्म है। जब मैंने इसे देखा तो शुरू के कुछ देर यही सोचता रहा कि किसी फेमिली ड्रामा में न फंस जाऊँ ! जब फिल्म खत्म हुई तो मैं स्वयं को एक रीयल हिरो के तसव्वुर के साथ मनुष्य और उसकी जीजिविषा में बढ़े हुए विश्वास से भरा हुआ पा रहा था। आपने बिल्कुल सही समय पर इस फिल्म की याद दिलायी है। ऐसे हीरो हमारे देश में हैं भी तो उन पर फिल्म नहीं बनती। खैर उम्मीद पर दुनिया कायम है !

Arvind Mishra said...

Thanks for sharing this important info!

वाणी गीत said...

मुझे गिरिजेश जी की टिप्पणी याद आ रही है .." टोटल सिस्टम फेलियर "..
अपने लोकतंत्र में मुझे भोंक पाने (वह भी सीमित मात्र में ही ) के अलावा और कोई खूबी नजर नहीं आती है ...
लचर न्याय व्यवस्था ने हर अपराधी के मन से डर को निकाल दिया है जबकि बेकसूर के मन में भय पैदा किया है ...
फिल्म की कहानी अच्छी लगी और यही सोच रही हूँ कि काश ...!!

main... ratnakar said...

nice choice, this is one of my most favourite movie also. hope u must have watched pappilon, step mom, courage under fire also. I belongs to bhoapl and had witnessed gas tragedy very closely, by comparing our struggle with erin u have showed a great favour for all the bhopal residents. thanks

आभा said...

यह फिल्म मैंने नही देखी पर आप ने यहाँ दिखा दिया , पर भोपाल कांड के इतने होल यह बता रहे हैं कि हम आजाद देश के गुलाम नागरिक है,जो गोरो के दबाव में जी रही है बस...

Sanjeet Tripathi said...

film nahi dekhi maine, lekin aapke is vivaran ke bad dekhni hi hogi.

jab ek vakil sahab khud hi yahan kah rahe hain ki यहाँ की न्यायव्यवस्था और कानून दोनों ही किसी को ब्रोकोविच नहीं बनने दे सकते। हमारा जनतंत्र फर्जी है। लेकिन इस को बदलने की कोशिश तो की जा सकती है।"

to mai nishchit taur par unke antim vaky se sehmat hu..

सारिका सक्सेना said...

ये फिल्म पहले देखी हुई है, फिर भी आपके द्वारा लिखी हुई समीक्षा बहुत बढिया लगी।
सभी कमेंट्स भी पढे। सही है कि हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है पर कुछ हो नहीं पाता कारण चाहें जो भी रहे हों।

निर्मला कपिला said...

गस्ली सडी न्यायव्यवस्था से ऐसी उमीद करना बेकार है। अच्छी जानकारी है फिल्म के बारे मे धन्यवाद शुभकामनायें

प्रवीण पाण्डेय said...

फिल्म देखी है, बहुत अच्छी है ।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत मौके से इस फ़िल्म की समीक्षा की तुमने. आज जबकि देश में भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े तमाम तथ्य सामने आ रहे हैं, ऐसे में इस फ़िल्म को देखते हुए गैस त्रासदी की याद तो ताज़ा होनी ही थी. हमारे देश का लचीला कानून कभी कोई फ़ैसला समय से नहीं करता वो एंडरसन का मामला हो या कसाब का.

महफूज़ अली said...

मैंने अभी पोस्ट पढ़ी नहीं है.... टाइम नहीं मिला है.... इत्मीनान से अब पढ़ता हूँ.....

शोभना चौरे said...

film ki khani sshkt hai ,kintu hmare desh se tulna karna aur ye ho hi nhi skta ?uchit nahi jan padta .

महफूज़ अली said...

पढ़ रहा हूँ अभी....

शरद कोकास said...

फ़िल्म और उससे जुड़े हुए मन्तव्य को बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत किया है आपने ।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

’एरिन ब्रोकोविच’ होलीवुड की कुछ बेहतरीन फ़िल्मो मे से एक है... मुझे याद है कि दूरदर्शन पर काफ़ी समय पहले एक धारावाहिक आता था जो इसी कहानी से इन्सपायर्ड था..

यहाँ हमे भूलने की बीमारी भी ज्यादा है इसलिये अगर यहाँ कोई ब्रोकोविच होते य होती तो हम उन्हे भी भूल चुके होते.. कुछ समय पहले ही कोल्ड ड्रिन्क्स मे पेस्टीसाईड पाये गये थे.. एक जेपीसी भी बैठी थी और उसने भी इस पर सहमति जतायी थी.. फ़िर क्या हुआ? हम भूल गये.. मै भी भूल गया.. हम सब भूल गये..

http://www.indiaenvironmentportal.org.in/node/36091

हरकीरत ' हीर' said...

यह फिल्म 'एरिन ब्रोकोविच' की ज़िन्दगी पर आधारित है और यह दर्शाती है कि कैसे सिर्फ स्कूली शिक्षा प्राप्त तीन बच्चों की तलाकशुदा माँ ने सिर्फ अपने जीवट और लगन के सहारे अकेले दम पर 1996 में PG & E कम्पनी को अमेरिका के साउथ कैलिफोर्निया में बसे एक छोटे से शहर 'हीन्क्ले' के लोगों को 333 करोड़ यू.एस.डॉलर की क्षतिपूर्ति करने को मजबूर कर दिया,जो कि अमेरिकी इतिहास में अब तक कम्पेंसेशन की सबसे बड़ी रकम है....

आपसे मिली इस फिल्म की जानकारी ..अद्भुत कहानी है फिल्म की ....
.आप .बहुत मेहनत करती हैं अपनी हर पोस्ट पर ......

ajit gupta said...

मैं इस बारे में कई बार टिप्‍पणी भी कर चुकी हूँ कि भारत की न्‍याय व्‍यवस्‍था अंग्रेजों के कानून को हूबहू लेने का परिणाम है। इस कारण राजा और प्रजा के लिए अलग-अलग कानून हैं। जब तक इस देश में लोकपाल विधेयक नहीं आएगा तब तक किसी भी राजनेता, नौकरशाह या इन जैसे ही सम्‍पन्‍न व्‍यक्तियों को सजा मिल ही नहीं सकती। लेकिन जनता यह समझने को तैयार ही नहीं है और वो भावुकता में बहने लगती है कि हमें न्‍याय मिलेगा। फिल्‍म की कहानी बहुत सशक्‍त लगी।

शहरोज़ said...

अपने देश में न्याय की बात !!!!!! नेताओं ने की आरोपी को भागने में खुद मदद !!!
nice post !

हिमान्शु मोहन said...

मुझे सबसे अच्छा लगा आपका प्रस्तुतीकरण।
अपने यहाँ ऐसे विषयों पर नज़र गयी ज़रूर है फ़िल्मकारों की, मगर हश्र होता है राज़-2 जैसा, या फिर मुन्नाभाई-2 जैसा।
मुझे यह भी लगता है कि जूलिया ने बहुत समझदारी भरा निर्णय लिया था इस फ़िल्म में काम करके अमेरिका'ज़ स्वीटहार्ट बने रह पाने के लिए, जैसे अमिताभ ने अपनी पारी समझ-बूझ से खेली है और अपना बैटिंग ऑर्डर अपनी उम्र के हिसाब से बदलते हुए आज भी वह फ़िल्म की रीढ़ बने रहते हैं।
अब अगर कथानक से आगे बात करें तो कुछ भावनात्मक शॉट्स इस फ़िल्म की ख़ास जान हैं-जिनका आपने ज़िक्र बख़ूबी किया है।
जैसे बॉस का - एरिन की ओर देखकर - गाली पर - एक स्पॉण्टेनियस रिएक्शन, जैसे बड़े बेटे का दस्तावेज़ देखना और समझना कि माँ की व्यस्तता क्या है…
इन दृश्यों का ज़िक्र आपकी फ़िल्म-दर्शक की समझ को भी उजागर करता है।
बधाई, सार्थक आलेख के लिए। भोपाल के तवे पर तो सब कुछ न कुछ सेंक रहे हैं - मगर आपने बड़े सार्थक ढंग से बात कही - जो उद्देश्य, कथ्य और अनुभूति - सबमें अलग है चलन से।