Wednesday, June 9, 2010

जब हम बादलों पर चले





जब हम बादलों पर चले. जी हाँ सही पढ़ा आपने,बादलों पर भी और बादलों के बीच भी. एक सहेली ने अपने फ्रेंड के ऑर्कुट प्रोफाईल में किसी का स्क्रैप देखा ,जिसमे उसने अपने ट्रेकिंग के अनुभव लिखे थे, उसने जानकारी ली और पता चला, वह पहाड़ी हमारे घर से ज्यादा दूर नहीं. मुझसे चर्चा की...मैं तो ऐसे अनुभवों के लिए हमेशा तैयार रहती हूँ. पति और बेटे भी उत्साहित रहते हैं. पिछले साल, एक इतवार को,हम तीन परिवार मय बच्चों के ट्रेकिंग का पहला अनुभव लेने चल पड़े.

मुंबई में ,वसई के पास 'तुन्गरेश्वर' नामक एक पहाड़ी है, उस पहाड़ी पर थोड़ी चढ़ाई के बाद एक बड़ा सा शिव मंदिर है. और पहाड़ी की चोटी पर एक बाबा का आश्रम. अधिकाँश लोग मंदिर में दर्शन कर वापस लौट जाते हैं.हमलोग भी सुबह सुबह घर से निकल पड़े कि मंदिर में दर्शन करेंगे और फिर चोटी पर बने आश्रम तक जाएंगे. मंदिर तक का रास्ता भी कम रोमांचक नहीं. दो,तीन बरसाती नाले पड़ते हैं रास्ते में...और जंगल के बीच पगडण्डी से रास्ते. मुंबई की भीड़ भरी चौड़ी सड़कों के बाद इन पगडंडियों पर चलना एक अलग ही अनुभव था. हमलोगों ने भी दर्शन किए, वहीँ छोटे से दुकान में झमाझम बरसते पानी के बीच ,गरम गरम भजिये,बड़ा पाव और इलायची वाली मीठी चाय पी और ऊपर की चढ़ाई के लिए चल दिए.

लगातार बारिश हो रही थी. हम सबने रेन वियर पहन रखे थे पर इसके बावजूद पूरी तरह भीग चुके थे.सब बहुत एन्जॉय कर रहें थे, बच्चों को तो आवाज़ देनी पड़ती, साथ में चलने को. किसी पत्थर से फूटता पानी देखते और फिसलन की परवाह किए बिना, उसके नीचे जा खड़े होते. पास में कोई बहता सोता नज़र आता और पूरी मण्डली, छोटे छोटे पत्थरों पर किसी तरह बैलेंस करती, बीच धार में जाकर खड़ी हो जाती. कहीं कहीं सिर्फ पानी गिरने का शोर सुनायी देता और हम खोज में लग जाते, कहाँ से आवाज़ रही है? फिर ऊपर चढ़ाना भूल,उन चट्टानों से गिरते झरने का आनंद लेने लगते.

रास्ते में तरह तरह के पेड़ मिले ,जिनका नाम भी हम भूल चुके थे,बच्चों ने तो कभी देखे ही नहीं थे. हम उनका ज्ञानवर्धन करते और पेडों के अंग्रेजी,हिंदी,मलयालम और तुलु (ये कर्नाटक की भाषा है,ऐश्वर्या राय की भाषा और मेरी सहेली,वैशाली की) नाम भी सीखते जाते. ऐसे में ही मुझे कदम्ब का पेड़ दिखा...इसे बाकी और कोई नहीं पहचान पाया,शायद दक्षिण में ना होता हो या फिर आम ना हो. और इस पेड़ को देख मुझे चौथी कक्षा में पढ़ी वो कविता याद गयी,"यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ, होता यमुना तीरे
मैं भी उसपर बैठ कन्हैया बनता धीरे धीरे."..दरअसल ये दो पंक्तियाँ याद करने को भी बहुत मशक्कत करनी पड़ीं और कोई सहायता करने वाला भी नहीं. पर सबने मेरी याददाश्त की तारीफ की तो मैने थोड़ा डरा भी दिया उन्हें, "अच्छी -बुरी सारी ही चीज़ें याद रहती हैं मुझे ":)

वह फ्रेंडशिप डे भी था. कभी कभी बारिश थोड़ी कम होती तो किसी घने पेड़ के नीचे,बैग से फल,बिस्किट, निकाले जाते और साथ में एहतियात से प्लास्टिक में लिपटा मोबाइल भी. ढेरों मेसेज पड़े होते. पतिदेवों की चढ़ी भृकुटी और कटाक्ष कि 'ये लोग तो टीनेजर्स को भी मात कर रही हैं' को बिलकुल नज़र अंदाज़ कर इधर के मेसेज उधर फॉरवर्ड किए जाते और कारवां निकल पड़ता. रास्ते में कुछ लड़के 'हर हर महादेव का नारा लगा रहें थे' यह कोई धार्मिक यात्रा नहीं थी,पर हमारे बच्चे भी शुरू हो गए,शायद यूँ चिल्लाने से थोड़ा,जोश जाता .

जब चोटी पास आने लगी, तो नीचे देखा,पूरी मुंबई बादलों से ढंकी हुई थी. जहाँ रास्ता संकरा होता,वहाँ दोनों तरफ की खाइयाँ बादलों से ढंकी नज़र आतीं और ऐसा लगता हम बादलों के ऊपर चल रहें हैं.बड़ा ही अप्रतिम दृश्य था. दस फीट की दूरी की चीज़ें भी नज़र नहीं रही थीं. बस बादल ही बादल छाये थे. ग्रुप का कोई पीछे छूट जाता तो नज़र भी नहीं आता,और जब दिखता तो ऐसा लगता बादलों के मध्य अवतरित हो रहा है. रेशमी वस्र,मुकुट और आभूषणों की कमी थी,वरना लगता साक्षात इन्द्रदेव ही नज़र रहें हैं. पर जींस ,टी शर्ट में सजी आकृति हमारी कल्पना को उडान नहीं भरने देती.

प्रकृति के इस अनुपम सौन्दर्य को घूँट घूँट पीते,हम पहाड़ी की चोटी पर बने आश्रम में पहुँच गए..वहाँ एक बड़े से ड्रम में, हर्बल चाय रखी थी,जिसके दो घूँट ने ही सारी थकान मिटा डाली . आश्रम के कर्मचारियों ने बड़ी विनम्रता से सूचित किया कि भोजन का भी इंतजाम है.भोजन कक्ष में, एक तरफ करीने से लकड़ी के पटरे रखे थे. और एक तरफ साफ़-सुथरी थलियाँ.बड़े बड़े पात्रों में गरम गरम चावल और साम्भर रखे थे. आश्रम के दो कर्मचारी खड़े थे पर खाना खुद ही परोसना था और थाली भी धोकर रखनी थी. इतनी देर तक भीगे रहने के बाद यह गरम भोजन अति स्वादिष्ट लगा. बच्चे भी थाली धोने का अवसर पाकर बड़े खुश थे. आश्रम के पीछे सुन्दर सी वाटिका थी..जहाँ झकोरे की हवा चल रही थी,हमारे गीले कपड़े आधे सूख गए, सुन्दर सुन्दर लहराती फूलों की डाली मन मोह रही थी,पर हमें अभी नीचे उतरने का पूरा रास्ता तय करना था. आश्रम के अलग अलग हिस्सों में छिटके लोग, प्रांगण में इकट्ठे हुए और नीचे उतरने की यात्रा शुरू हुई.

नीचे का रास्ता और भी रोमांचकारी था. सारे बरसाती नालों में, जिनमे आते वक़्त कमर से भी नीचे पानी था,दिन भर की बारिश में पानी कंधे तक गया था. हमलोग ह्यूमन चेन बना पार करते रहें. एकाध जगह, पुलिया भी बनी थी, पर उस पर जाना किसी को गवारा नहीं था,बच्चों को भी नहीं.'राजी' कभी कॉलेज की तरफ से यहाँ पिकनिक के लिए आई थी और याद कर रही थी कि कैसे उसके मित्र ने उसकी लाल रंग की सुन्दर सी सैंडल खेल खेल में पानी में फेंक दी, और जब लेने की कोशिश की तबतक तेज धार उसे बहा कर ले गयी.फिर उसने दूसरी सैंडल भी निशाना लगा कर फेंक दी.पर उसकी रोनी सूरत देख ,उसे अपनी सैंडल दे दी. पर राजी कह रही थी,"मेरी फेवरेट सैंडल थी, वो और उसके सैंडल कितने बड़े और अनकम्फर्टेबल थे." हमलोगों ने डांटा ,एक तो उस बेचारे ने इस पथरीले रास्ते पर अपनी सैंडल दी और उसे गालियाँ दे रही हो.पर 'राजी' अब भी अपने लाल सैंडल का सोग मना रही थी और वे पल याद कर उस दोस्त को अब भी बुरा-भला कह रही थी..बेचारा ऑस्ट्रेलिया के किसी शहर में खांस रहा होगा.

 पूरे नौ घंटे तक लगातार चलने के बाद, फिर से हम उसी दुकान में भजिया, और चाय का लुत्फ़ ले रहें थे. घर पहुँचने में रात के नौ बज गए. मन में थोड़ा डर था इस तरह सारा दिन भीगने के बाद,कोई बीमार पड़े. लेकिन किसी को कुछ नहीं हुआ. हम महिलाओं को मॉर्निंग वाक की और बच्चों को खेलने कूदने की आदत थी,लिहाज़ा हमें तो कुछ महसूस नहीं हुआ पर पति लोगों को जिन्हें लिफ्ट,.सी.कार,केबिन और जिम की आदत है उन्हें संभलने में तीन दिन लग गए.

40 comments:

  1. आप शब्‍दों में भी रंग भर देती हैं. धन्‍यवाद.

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  2. silsilevaar ek rochak yatra ka ullekh kiya...laga ki main bhi wahin hun...

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  3. अरे क्या है जब देखो ललचाती रहती हो ..बड़ा पाव,इलायेची वाली चाय ,सांभर,चावल ओर ये मौसम ओर खूबसूरत नज़ारे.क्या क्या देखें क्या क्या रोकें ..वैसे पता है यहाँ भी एक मंदिर है जहाँ शुक्रवार को सांभर चावल मिलते हैं फ्री :) तो हमारा गैंग (मित्र मंडली ) शुक्रवार को ही अचानक धार्मिक हो उठता है ही ही ही ..
    बहुत रोचक वृतांत.अगली बार मुंबई आयेंगे तो वहीँ चलेंगे पिकनिक मानाने .

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  4. इस तरह की संक्षिप्त किन्तु महत्वपूर्ण यात्रा में तो आनन्द आता ही है। मजा आया... मुझे लगा आसपास मैं भी कहीं अपने परिवार के साथ हूं।
    काफी मजेदार वर्णन।

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  5. wahh fir yaad dila di woh safar jo humne saath kaati it was truely amazing trek ever and u had written each n evry thng without missng anythng ......all memories flash backd beautifully written rashmijee....chalo fir chalte hai trekng..

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  6. ohhoo...welcome vaishali ji :) welcome...so u decided to comment on my post finally ...Ahobhagy Hamaare :)....yeah will definitely make one trip again..n will write one more post about that exp.

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  7. वाह...बहुत बढ़िया संस्मरण....और सच ही तुम्हारी यादाश्त बहुत तेज है...तभी तो इतना मनमोहक लिख पाती हो....सुन्दर प्रस्तुति...हम तो सोच सोच कर ही आनंद ले रहे हैं...

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  8. मुंबई जैसे घनी आबादी वाले शहर में पर्वतों से बादलों तक का रास्ता निश्चित रूप से ऐसी यात्रा काफ़ी रोमांचकारी होती है...यात्रा का बढ़िया वर्णन....धन्यवाद रश्मि जी

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  9. वाह ! मज़ा आ गया. मुझे तो अपनी वैष्णो देवी की यात्रा याद आ गयी. हमलोग भी बरसात में गए थे और जगह-जगह पानी के झरनों को देखकर मुग्ध हुए जा रहे थे... पर वहाँ बारिश नहीं हो रही थी तब. सर्दी बहुत थी...और वहाँ भी हमने एक भंडारे में राजमा-चावल खाए थे. मुझे राजमा कुछ खास पसंद नहीं,पर उस दिन अच्छा लगा था.
    कदम्ब के पेड़ बड़े शहरों के बच्चे नहीं पहचान पाते.
    आपका यात्रा-वर्णन पढकर मेरा भी ट्रैकिंग पर जाने का मन होने लगा... दी मैं भी जाउंगी...बूहूहूहू !
    वैसे कोई बात नहीं ... ये पोस्ट पढकर घूमने जैसा ही आनंद आया.

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  10. rasmiji ap to apni mnmohk shaili se hme moh hi leti hai .bahut sundar yatra sansmarn .
    aur ye khane ki bar bar yad dilakar too abhi rat ke 12 bje bhookh jagrat ho gai hai .....

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  11. पहाडो पे पिकनिक मना ली.
    आपके लेखन से कभी कभी ऊब होने लगती है या तो बढिया लिखोगी या बहुत बढिया. और वेरायटी है ही नही आपको जैसे कभी साधारण या औसत लिखना आता ही नही.

    अब तो आदत हो गयी है आपको पढते पढते. कदम्ब के पेड की बात आयी तो हमारी ये पोस्ट भी पढिये.
    http://hariprasadsharma.blogspot.com/search/label/%E0%A4%95%E0%A4%A6%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC

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  12. na keval pasand aai yah post balki kahu to majaa aa gaya padhkar hi, aapke shabdi se aisa lagaa jaise mai khud tha vaha lekin bas bheegne ka ehsas nahi hua.....kynki chhattisgarh is still hot....

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  13. रश्मिजी, आज तो पूरा ही जी जला दिया। कहाँ हम अमेरिका के एकरस जीवन में बैठे हैं और कहाँ आप मुम्‍बई में बड़ा पाव, भजिए और चाय का आनन्‍द ले रही हैं। बस मन हो रहा है कि उस बारिश को देखने आज ही टिकट कटा लूं। यहाँ बारिश का किसी को इंतजार ही नहीं है बस धूप का इंतजार रहता है। लेकिन मेरा मन तो कर रहा है कि झमाझम बारिश हो जाए तो मैं भी पकोड़े बनाऊँ। बहुत ही प्रभावकारी पोस्‍ट, जी तो जला लेकिन आनन्‍द भी खूब आया।

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  14. आपकी पोस्ट पढकर तो इच्छा और बलवती हो गई है... किसी भी तरह से हमें भी अपने देश के उस हिस्से को देखना है...

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  15. बड़ा रोचक वृतांत रहा...मजा आ गया पढ़ कर. भजिया, चाय का स्वाद भी आ गया. :)

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  16. रोचक रोमांचक यात्रा वर्णन

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  17. @ पतिदेवों की चढ़ी भृकुटी और कटाक्ष कि 'ये लोग तो टीनेजर्स को भी मात कर रही हैं' ...
    कभी अदा का , पटना या दुबई से किसी सहेली का फ़ोन आ जाता है तो बेटियाँ भी ऐसा कटाक्ष करने से नहीं चूकती ...:):

    कई यादें साथ चल रही है तुम्हारे संस्मरण के साथ ...
    तुम्हारा लेखन बड़ा सरस मधुर है ...मजा आया ...!!

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  18. वाह वाह

    प्रस्तुति...प्रस्तुतिकरण के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

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  19. जब भी ऐसे संस्मरण सुनता हूं बस एक ही आह उपजती है-- या हुसैन हम न थे!!!

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  20. बढ़िया संस्मरण , आप एकदम वृतचित्र बना देती हो अपने संस्मरणों का . कदम्ब के पेड़ का बारे में सुनकर मुझे रसखान की वो पंक्तिया याद आ गयी."जो खग हो तो बसेरो करो मिली कालिंदी कूल कदम्ब की डारन "
    वैसे मै कई बार पहाड़ के नीचे जाकर उनकी ऊँचाई देखकर सर झुका लेता हूँ और ऊपर चढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. हा हा , लेकिन एक बार एवेरेस्ट के पास सोचा की थोडा चढ़ कर देखू . लेकिन 200-250 फिट के बाद ही हिम्मत जवाब दे गयी. ऊँचाई सबको अच्छी लगती है बस डर होता है ऊँचाई से गिर जाने का , हा हा .

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  21. आते-आते परिपक्वता आती है,और इधर की ढेरों पोस्ट इस बात की तस्दीक करती है कि रश्मि रविजा एक परिपक्व लेखन करती हैं.ये संस्मरण महज़ एक पिकनिक या यात्रा का बखान नहीं करता अपितु मध्य-वर्गीय ज़िन्दगी के दुःख-सुख ,अनुकूलता-प्रतिकूलता का चित्रण भी अनजाने ही कर जाता है.यही श्रेष्ठ लेखन को जिवंत बनता है.

    शहरोज़

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  22. वैसे मानना पड़ेगा तुम बहुत सजीव चित्रण करती हो, यार किसी रेडियो स्टेशन पर जाओ और वहाँ से कमेन्ट्री करो. सब को सुनाई भी देगा. यहाँ तो पढ़ना पड़ता है. ऐसा वर्णन जिसमें लगता है की वाकई हम भी जा रहे हैं लेकिन इलायची की चाय और बड़ा पाँव के नाम से मुँह में पानी आ गया. वो नहीं मिला बाकी तो सैर करली.
    ऐसे ही सैर करती रहो. हम यही बैठे घूम लेते हैं.

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  23. बहुत ही सुन्दर संस्मरण …………………ऐसी यादे ही जेहन मे ताज़ा रहती हैं।

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  24. अगली बार मुंबई हिन्‍दी ब्‍लॉगर मिलन वहीं रखते हैं। क्‍या पॉसीबल है रश्मि जी, अगर हो सका तो खूब आनंद आएगा। पर हमें भी सूचित अवश्‍य कर दीजिएगा। किस्‍सा खूब आनंददायक है और ऊर्जा भर देता है।

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  25. Chalo dildaar chalo, baadlon ke paar chalo...

    सजीव चित्रण !

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  26. रोचक रोमांचक यात्रा वृतांत .. पढना अच्‍छा लगा !!

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  27. आपने बहुत सुन्दरता से घटनाओं का वर्णन किया है.... मैं पहले से ही कहता आ रहा हूँ ..... कि... अब आप अपने ब्लॉग का नाम रेनबो कर दीजिये....

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  28. बढ़िया संस्मरण!
    धन्‍यवाद.

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  29. बहुत सुन्दर और रोचक यात्रा वृत्तान्त----तस्वीरें भी सुन्दर हैं।

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  30. वाह, बहुत मजा आया होगा! मुझे भी ले चलतीं।
    घुघूती बासूती

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  31. वाह!! हम तीन दिन के लिये बाहर क्या गये, तुमने तो बड़ी शैतानी कर दी!!! बारिश में ट्रैकिंग!! अरे कितनी फिसलन होती है ऐसे में. झरने देख के तो मज़ा आ गया. रोमांचक यात्रा और विवरण भी. आइन्दा ऐसे मौसम में खतरनाक यात्रा मत करना.( ताकीद है ये)

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  32. अब तो मुझे भी डरना पड़ेगा दी.. क्योंकि----- अच्छी -बुरी सारी ही चीज़ें याद रहती हैं आपको :)

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  33. रश्मि जी, मुझे वैसा सफर पे जाने का बहुत मन है...कॉलेज में जब था, तब एक बार ऐसी ही एक सफर मैंने मिस कर दी थी..जिसका दुःख अभी भी है..

    जो आपने लिखा है, मुझे वैसी यात्रा के बारे में पढ़ना खूब पसंद है..और मैं तो बस मौके के तलाश में हूँ की कब जाऊं घूमने को :)

    आप तो बेहतरीन लिखती ही है, ये बातें अब वापस दोहराऊंगा नहीं :)

    बस मजा आ गया और क्या कहें :)

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  34. आज कुछ फुरसत मिली है तो आपकी सभी पुरानी पोस्ट पढ रहे हैं। काफी कुछ मिस कर दिया इन पिछले दिनों।
    बहुत ही अच्छा लिखा है। हमारा भी मन कर रहा है कहीं ऎसे ही घूमने जाने का। वैसे हमें लगता है कि कंपनी अच्छी हो तो साधारण सी जगह भी बहुत सुहानी लगती है।

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  35. सारा विवरण तो मजेदार रहा ही मै ने भी लुत्फ उठा लिया ....खास बात जो जची वो टीन्एर्जस को मात देने की ....:)

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