Monday, September 1, 2014

साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम से 'एक मुलाक़ात' (नाटक )

कल सारा दिन बादल मेंह बरसाते रहे और हम साहिर की शायरी और अमृता प्रीतम की नज्मों की बारिश में भीगते रहे . 
साहिर और अमृता प्रीतम के रिश्तों पर आधारित नाटक 'एक मुलाक़ात' देखना एक अनोखा अनुभव रहा. रहस्यमय से दृश्य से नाटक की शुरुआत होती है. जाड़े की शाम ...चारों तरफ पसरा कुहासा , लैम्पपोस्ट से छन कर आती रौशनी में टेरेस पर बैठी, स्वेटर के फंदे के साथ अलफ़ाज़ बुनती अमृता प्रीतम . नीचे से इमरोज़ की आवाज़ आती है , "बॉम्बे से 'ट्रंक कॉल' आ रहा है पर बार बार कट जा रहा है." अमृता सोचती हैं,'कौन उन्हें फोन कर रहा है' और थोड़ी देर में साहिर उनके सामने खड़े होते हैं. फिर दोनों के बीच शुरू होती है एक बहुत ही आत्मीय गुफ्तगू . एक दूसरे से किये गए सवाल -जबाब से दोनों की ज़िन्दगी के एक एक फंदे हौले से आहिस्ता आहिस्ता उधड़ते चले जाते हैं. अपनी ज़िन्दगी की किताब के हर वर्क को दोनों ने अपनी शायरी और नज्मों से सजाया है. अमृता किसी वाकये का जिक्र करतीं और साहिर उस पर लिखी नज़्म पढ़ते.
अपने बचपन में अपनी माँ को प्रताड़ित होते हुए देखा था और उसकी छाप साहिर के दिल से कभी न मिट सकी . और उन्होंने लिखा 

''मदद चाहती है ये हौवा की बेटी
यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत, ज़ुलयखां की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं "

बंटवारे का दर्द...गरीबी..मजदूरों के संघर्ष ..मुहब्बत, अवसाद ,निराशा हर मूड पर लिखी नज़्म पढ़ी गई 
मशहूर नज़्म 'ताजमहल' से "मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझ से! " 
'मादाम' से ,आप बेवजह परेशान-सी क्यों हैं मादाम?
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होँगे "

अमृता की तरफ सीधा देखते हुए ये पढ़ी "ये हुस्न तेरा ये इश्क़ मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही
मुझ पर तो कई इल्ज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इल्ज़ाम सही

कभी स्वीकार करते , 
" तेरे तड़प से न तड़पा था मेरा दिल,लेकिन
तेरे सुकून से बेचैन हो गया हूँ मैं ' 

साहिर की कई मशहूर नज़्म शेखर सुमन ने अपनी पुरकशिश आवाज़ में साफ़ उच्चारण और लहजे के साथ बड़ी खूबसूरती से पढ़ी .

दीप्ती नवल ने भी अमृता प्रीतम की कवितायें..अपनी सुरीली आवाज़ में पढ़ीं "मैं तिड़के घड़े दा पानी,कल तक नई रहना ... ' अज्ज आंक्खा वारिस शाह नूं , किते कब्रां विच्चों बोल .......
"मेले के शोर में भी ख़ामोशी का आलम है
और तुम्हारी याद इस तरह जैसे धूप का एक टुकड़ा..."

कुछ गिले शिकवे भी हुए ,.जब अमृता ने साहिर के अफेयर के बारे में शिकायत की . और साहिर ने सफाई दी कि 'वे मोहतरमा मुझसे सम्बन्ध बना कर गाने का कॉन्ट्रेक्ट हासिल करना चाहती थीं.और जब उनकी मुराद पूरी हो गयी तो उन्होंने मुझसे किनारा कर लिया' .( मेरा सवाली मन इस पर विश्वास नहीं कर पाया और मुझे लगा कि ब्रेक अप होने पर एक पार्टनर दूसरे  पर यही आरोप लगाता है, पर एक फ्रेंड जो इनके इनर सर्किल से  बहुत अच्छी तराह वाकिफ थीं, ने बताया कि यह सच है. उस गायिका ने काफी नाम कमा  लेने के बाद, एक बड़े घराने में शादी कर के गायकी छोड़ दी ) 
मुझे अपनाया क्यूँ नहीं"...अमृता ने ये सवाल भी किया और साहिर का जबाब था ,"जिसे अंजाम तक पहुँचाना न हो मुमकिन ,उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ दे छोड़ना अच्छा "

साहिर अमृता से सीधे सवाल भी करते हैं , "इमरोज़ की तुम्हारी ज़िन्दगी में क्या जगह है ?' और अमृता कहतीं हैं.."तुम्हारा प्यार मेरे लिए किसी पहाड़ की चोटी है पर चोटी पर ज्यादा देर खड़े नहीं रह सकते, बैठने को समतल जमीन भी चाहिए और इमरोज़ मेरे लिए समतल जमीन से हैं. अमृता ये भी कहती हैं..." तुम एक ऐसे छायादार घने वृक्ष के समान हो, जिसके नीचे बैठ कर चैन और सुकून पाया जा सकता है पर रात नहीं गुजारी जा सकती."
जब साहिर ये पूछते हैं, "इमरोज़ को पता है ,मैं यहाँ हूँ ?" जबाब में अमृता कहती हैं ," जब बरसों तक उसकी पीठ पर मैं तुम्हारा नाम लिखती रही थी तो यहाँ की खामोशी से भी वो समझ गया होगा कि मैं तुम्हारे साथ हूँ " 
अमृता को खांसी आती है और साहिर कहते हैं, ,पानी पी लो,...अमृता कहती है," तुम पिला दो.." किनारे रखे मटके से साहिर ग्लास में पानी ले आते हैं पर कहते हैं,,"तुम्हे पता है मुझे ऐसा लिजलिजा  मुहब्बत पसंद नहीं " यानि साहिर का लिखा सबकुछ ठोस धरातल पर था ,वायवीय नहीं था कुछ भी. 
साहिर भी अमृता से पूछते हैं , " तुम्हारे व्यक्तित्व में अन्दर की औरत ज्यादा प्रभावी है या  कवियत्री ? " अमृता कहती हैं ," याद है ,जब एक बार तुम्हे बुखार था और मैंने तुम्हारे गले और छाती पर विक्स मला था ,उस वक़्त मैं सिर्फ एक औरत रह गयी थी और औरत ही बने रह जाना  चाहती थी.
अमृता कहती हैं , "हमारे बीच कई दीवार के साथ ,अदब की दीवार भी है .तुम उर्दू में लिखते हो और मैं पंजाबी में .जब 'सुनहड़े ' को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो मैंने सोचा ऐसे पुरस्कार का क्या फायदा, जिसके लिए लिखा, उसने तो पढ़ा ही  नहीं ." साहिर बताते हैं, पंजाबी मेरी मातृभाषा है और तुम्हारी लिखी हर नज़्म पढता हूँ, भले ही बतलाता नहीं "


थोड़ी  देर तक दोनों चुप बैठ रहते हैं , पर उनके बीच की बहती प्रेमधारा और बोलती खामोशी ,दर्शक शिद्दत से महसूस करते हैं . 

इस नाटक में वर्णित ज्यादातर दृश्य अमृता प्रीतम की आत्मकथा ,'रसीदी टिकट ' से लिए गए हैं .पर यह नाटक अमृता के जीवन से ज्यादा साहिर लुधियानवी के जीवन की घटनाओं पर आधारित लगा. उनकी नज्में ज्यादा पढ़ी गयीं और बीच बीच में साहिर के मशहूर गीत अलग धुनों पर बजते रहे . "कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है..." जैसे कई  लोकप्रिय गीतों को अलग धुन पर सुनना अखर नहीं रहा था , अच्छा ही लग रहा था . 

शेखर सुमन और दीप्ती नवल का अभिनय और नज़्म पढने का अंदाज़ इतना सजीव था कि दर्शक भूल जाते हैं कि वे सच में साहिर और अमृता को नहीं...उनका किरदार जीते दो बेहतरीन कलाकार को देख रहे हैं . फिर से 'ट्रंक कॉल' आता है...और इस बार अमृता फोन उठाती हैं...साहिर के हार्ट अटैक की खबर है ,दोस्तों के संग ताश की बाजी खेलते हुए वे दुनिया को विदा कह गए. अमृता टेरेस पर वापस आ कर चौंक कर पूछती है..'तुम कौन हो..' और साहिर कहते हैं.."तुमसे बिना विदा लिए कैसे चला जाता . मेरी ज़िन्दगी की सारी जमा पूँजी तो तुम हो " 


सच है , दोनों ने एक दुसरे के प्रेम में उत्कृष्ट रचनाएं रच डालीं और हमारा साहित्य ही समृद्ध हुआ . 

इनकी ज़िन्दगी के टुकड़ों को इस नाटक के रूप में बुना था ,'सुमाना अहमद' और 'सैफ अहमद हसन 'ने . निर्देशन 'सैफ अहमद हसन ' का था .
नाटक के बाद दर्शकों से मुखातिब होते हुए 'शेखर सुमन' ने शिकायत कर दी कि नाटक के बीच बीच में वाह वाह कम हुए और तालियाँ कम बजीं . मुझे तो लगता है..'दर्शक इतना डूब कर देख-सुन रहे थे कि तालियाँ बजाना, कलाकारों को  डिस्टर्ब करने जैसा लगा (मुझे तो ऐसा ही लगा ) . अंत में  सबने खड़े होकर देर तक तालियाँ बजायी थीं .

 शेखर सुमन ने ये भी कहा कि ," वे जब आठ वर्ष के थे तो उन्हें साहिर की किताब 'परछाइयां, किसी ने भेंट की थीं (आठ वर्ष के बच्चे को ये किताब...मुश्किल है विश्वास करना :)} और आज उन्हें साहिर का किरदार निभाने का अवसर मिला. " दीप्ती नवल से भी कुछ सुनने की अपेक्षा थी पर वे कुछ नहीं बोलीं. शायद महिला कलाकार कैरेक्टर में इतनी समा जाती हैं कि उन्हें उबरने में समय लगता है . एक नाटक में शेफाली शाह के साथ भी यही देखा था ,वे बोल नहीं पा रही  थीं .पर उस नाटक के अंतिम दृश्य में उन्हें जोर जोर से रोना था .मुझे लगा था शायद इस वजह से वे नहीं बोल पा रही हैं . पर दीपित नवल को सुनना अच्छा लगता . 
एक  बात और बहुत ही अजीब लगी . अमृता प्रीतम के जन्मदिन 31 अगस्त के दिन ये नाटक प्रस्तुत किया गया पर निर्देशक, लेखक, अभिनेता किसी ने भी इसका जिक्र नहीं किया. बहुत आश्चर्य हुआ.

9 comments:

  1. "साहिर भी अमृता से पूछते हैं , " तुम्हारे व्यक्तित्व में अन्दर की औरत ज्यादा प्रभावी है या कवियत्री ? " अमृता कहती हैं ," याद है ,जब एक बार तुम्हे बुखार था और मैंने तुम्हारे गले और छाती पर विक्स मला था ,उस वक़्त मैं सिर्फ एक औरत रह गयी थी और औरत ही बने रह जाना चाहती थी."

    बहुत प्यारी समीक्षा की है तुमने रश्मि...ये सारे अंश पढते हुए एक बार फिर "रसीदी टिकट" पढने का मन हो आया.

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  2. वाकई एक अनोखा अनुभव रहा होगा ये नाटक देखना...दीप्ति नवल बेहद इंटेंस कलाकार है...और लिखती भी लाजवाब है...वे अमृता के रोल में फिट होंगी...हाँ शेखर सुमन का पता नहीं....कि वे कितने साहिर लगे कितने नहीं.....उनकी इमेज मेरे मन में कोई ख़ास संजीदा सी तो नहीं है...
    बढ़िया पोस्ट
    thanks
    अनु

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  3. जीवंत वर्णन है.... हर स्टेज कलाकार चाहेगा कि दर्शक इतनी ही तन्मयता से उनका परफॉमेंस देखे .....

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  4. तेरे तड़प से न तड़पा था मेरा दिल,लेकिन
    तेरे सुकून से बेचैन हो गया हूँ मैं " बहुत खूब....

    मैंने आज तक जितनी भी प्रेम कहानिया पढ़ी हे उनमे अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी.....साथ ही अमृता और इमरोज़ की प्रेम कहानी बेस्ट हे.... कभी कभी लगता हे की ये कहानी ही हो सकती हे...हकीकत नहीं.... पर ये हकीकत हे....ऐसा क्या था इस शख्सियत में ( अमृता प्रीतम में ) की उन्होंने प्रेम की परिभाषा ही बदल दी.... एक नही...ं दो दो अमर प्रेम अपने नाम किये....

    रसीदी टिकट पढ़ने के बाद मेरे अंदर बहुत कुछ बदला.... कुछ चीज़ो का बहुत गहरा असर होता हे आपकी ज़िन्दगी में... आज भी जब कभी इस किताब के पन्ने पलटती हु तो प्रेम के नए अर्थ सामने आते हे.....

    नाटक के संवाद बहुत अच्छे लगे.... दीप्ति नवल और शेखर सुमन बहुत अच्छे कलाकार हे तो समझ सकती हु की ये नाटक कितना अच्छा रहा होगा.... बाकी आपकी ये पोस्ट..... हर बार की तरह बहुत ही अच्छी हे....
    "स्वेटर के फंदे के साथ अलफ़ाज़ बुनती अमृता प्रीतम "
    "एक दूसरे से किये गए सवाल -जबाब से दोनों की ज़िन्दगी के एक एक फंदे हौले से आहिस्ता आहिस्ता उधड़ते चले जाते हैं. "
    क्या खूब लिखा हे आपने :)

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  5. साहिर अमृता से सीधे सवाल भी करते हैं , "इमरोज़ की तुम्हारी ज़िन्दगी में क्या जगह है ?' और अमृता कहतीं हैं.."तुम्हारा प्यार मेरे लिए किसी पहाड़ की चोटी है पर चोटी पर ज्यादा देर खड़े नहीं रह सकते, बैठने को समतल जमीन भी चाहिए और इमरोज़ मेरे लिए समतल जमीन से हैं. अमृता ये भी कहती हैं..." तुम एक ऐसे छायादार घने वृक्ष के समान हो, जिसके नीचे बैठ कर चैन और सुकून पाया जा सकता है पर रात नहीं गुजारी जा सकती."-------

    प्रेम का पारदर्शी सच तो यही है,शायद इसीलिए यह प्रेम सदा अमर रहेगा
    बहुत प्रभावी समीक्षा रची है नाटक की
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर ---

    आग्रह है --
    भीतर ही भीतर -------

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  6. मैं तो इस पोस्ट को पढ़ते हुए एक आलोकिक, अनूठे अनुभव से गुज़र रहा हूँ तो आपने तो इसे देखा है ग्रहण किया है ... सोच सकता हूँ आपका अनुभव ...
    अच्छा किया आपने इस अनुभव को साझा किया ...

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  7. तुम्हारा लिखा सब पढ़ती हूँ , भले ही बतलाती नहीं :-) तेल की धार सा माथे पर बहता हुआ दिल और दिमाग को अजीब सा सुकून और तरलता देता है !

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  8. इधर रिसेंटली कुछ ऐसा इत्तेफ़ाक़ हुआ है की बहोत लोग अमृता प्रीतम पर लिख रहे हैं ....कहीं उनकी नज़्में , कहीं उनके रिश्ते ...साहिर साहब के साथ इमरोज़ जी के साथ ....और जितना पढ़ती जा रही हूँ ....जिज्ञासा बढ़ती जा रही है ....तुम्हारे आर्टिकल ने आग में घी का काम किया है ......बहोत ही सुन्दर नरेशन ... मौका लगा तो यह प्ले ज़रूर देखूंगी.....कब ..पता नहीं

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  9. ये शब्दों का सफर जितनी रूमानी है उतनी ही रूहानी है , भावविभोर हो गया। अापका बहुत बहुत शुक्रिया अॉर शुभकामनाएँ भी।

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