Friday, November 23, 2012

कल देखा, मैंने एक माँ को

किंजल्क के साथ 
ब्लॉग जगत ने बहुत कुछ दिया, इतने वर्षों बाद हिंदी लिखने-पढने का मौका दिया, ढेर सारे मित्र दिए ,इतने सारे छोटे भाई-बहन दिए ...आज 'थैंक्स गिविंग डे '  तो नहीं है पर मैं थैंक्स कहने के मूड में हूँ :)। वैसे एकाध unpleasant exp भी रहे पर वो शायद इसलिए कि कुछ कड़वा न चखो तो मीठे का स्वाद कैसे पता चले कि वो कितना मीठा है :) ये तो सुखद अनुभवों के सागर में  कंकड़ जैसे थे जो ज़रा सी हलचल मचा कर अतल  गहराइयों में डूब गए। 

पर आज भी अच्छे मित्रों की लिस्ट में नए नाम जुड़ते ही जा रहे हैं। ऐसे ही एक दिन 'अतुल पांडे' नाम के पाठक का एक मेल आया कि  मैंने आपका ब्लॉग पढना शुरू किया है, अच्छा लग रहा है......इत्यादि ,साथ ही आग्रह था कि  फेसबुक पर रिक्वेस्ट भेजी है add कर लीजिये . मैंने शुक्रिया  कहकर जबाब दे दिया और फ़ेसबुक  पर भी उन्हें दोस्त बना लिया।

कनिष्क के साथ 
फेसबुक पर अक्सर मैं अपने बच्चों की बातें ,उनकी शरारतें, उनकी बेवकूफियों के विषय में लिखती रहती हूँ पर ये नहीं पता था, इन्हें पढ़कर किसी के मन में गहरे अहसास जाग सकते हैं। अभी दो दिन पहले अतुल का एक मेल आया, एक प्यारी सी कविता और इस सन्देश के साथ 

"आपका अपने पुत्रो के प्रति प्रेम देखकर  (फेसबुक पर कुछ फोटोज और उनके नीचे लिखे कुछ शब्द पढ़ कर पता चला ) माँ की याद आ गयी , मै जल्दी जल्दी घर गया ,वहाँ  जाकर आप के बारे में सोच रहा था तो मन में कुछ शब्द आये और अपने आप पंक्तियों में सज गए आज करीब 8 दिन बाद लौटा हूँ सो आपको भेज रहा हूँ  " साथ में  कविता थी और ये आग्रह भी कि उसे सुधार दीजिये। 

अब मैंने अतुल की  प्रोफाइल  चेक की  तो पता चला अभी ,उसने कुल उन्नीस बसंत  देखे हैं ,वो तो मेरे बड़े बेटे से भी छोटा है :)
अब मुझे कहाँ कविता की इतनी  समझ कि उसकी कविता सुधार सकूँ .   उसी वक़्त एक प्रखर युवा कवि ऑनलाइन दिख गए। उनसे कहा ,तो उन्होंने हाथ जोड़ दिए कि ये मेरे वश का नहीं {हो सकता है, न भी हो। पर मैंने इसे ,उनके नखरे का नाम दे  दिया :)} क्यूंकि अनुभव ही कुछ ऐसे हैं .एक मित्र हैं , किसी कहानी पर उनके विचार मांगो  तो वे उसका मसनद बना कर सो जाते हैं। मित्र होने के नाते तकाज़ा करो, उलाहना दो ,नाराज़गी दिखाओ, उन पर  कोई असर नहीं होता .वे भी शायद इसे मित्रता का आवशयक अंग समझ नज़रंदाज़ कर देते हैं :( 

फिर मुझे सलिल वर्मा जी का ध्यान आया, उन्हें कविता की अच्छी समझ है और सलिल जी का शुक्रिया अदा करने को तो शब्द भी कम पड़ें {आप दोनों महानुभाव सुन रहे हैं ,I mean  पढ़ रहे हैं न  :) } . 
सलिल जी ने  लौटती डाक से यानि  कि  तुरंत ही कविता को संवार कर, निखार कर भेज दिया। तहे दिल  से  शुक्रिया  सलिल जी .
और अतुल तुम्हारा भी, भाव तो तुम्हारे ही हैं, और  मैं कोशिश करुँगी जैसे भाव तुमने कविता में पिरोये हैं, मैं वो सब खुद में उतार सकूँ {मुश्किल है, पर कोशिश पर दुनिया कायम है :) }

तो आप भी पढ़िए वो कविता 




अतुल
कल देखा, मैंने एक माँ को 

अपने बच्चों को प्यार करे, उन का ही मनुहार करे ,
खुद ही उनसे वह रुष्ट रहे, खुद ही उनका श्रृंगार करे , 
अपने बच्चों पर पूरी दुनिया, वह न्योछावर करती है 
ना जाने क्यूँ वह मुझको भी, मेरी माँ सी लगती है । 

हर वक़्त उन्हीं का ध्यान रहे ,खुद का कुछ भी न भान  रहे ,
बच्चों को कष्ट न हो कोई ,अपने दुःख से अनजान रहे, 
इनका बढ़ता ही मान  रहे ,ईश्वर से सदा ये कहती है ,
ना जाने क्यूँ वह मुझको भी, मेरी माँ सी लगती है ।

उनकी खातिर दुःख भी झेले ,पर किसी से कुछ ना बोले 
जब कभी देर हो आने में, करे प्रतीक्षा वो दर खोले 
खुद ही खुद में मालूम नहीं, वो क्या गुनती-सुनती रहती है 
ना  जाने क्यूँ वह मुझको भी, मेरी माँ सी लगती है ।

चाहे जितना ही कष्ट सहे, चाहे जितनी वो  त्रस्त  रहे , 
अपने सब कष्ट भुलाकर, अपने बच्चों में व्यस्त रहे ,
अपने बच्चों की आँखों से वह दुनिया देखा करती है ,
ना जाने क्यूँ वह मुझको भी, मेरी माँ सी लगती है ।

जब भी मैं कोई प्रश्न करूँ, पूरा उत्तर बतलाती है ,
दुनियादारी के पहलू  के सारे मतलब समझाती है ,
मैं भूल करूँ चाहे कोई, वह क्रोध नहीं दर्शाती है ,
ना जाने क्यूँ वह मुझको भी मेरी माँ सी लगती है ।

तुम वीर बहादुर, मृदुल बनो, दुनिया में तुम 'अतुल' बनो ,
तुम मुकुल मेरी इस बगिया के ,कर्तव्यनिष्ठ तुम प्रतुल बनो ,
जीवन में आगे बढ़ने का वह मार्ग सदा दिखलाती है 
न जाने क्यूँ वह मुझको भी मेरी माँ सी लगती है ।

---अतुल पांडे 

43 comments:

  1. सुंदर भाव हैं अतुल जी के और उम्मीद है कि सलिल जी ने इन्हें निखारा ही है ! मां के लिए सब कुछ वही जो पूर्व स्थापित सत्य है !

    आपके दोस्त बड़े अजीब हैं , खासकर कहानी को मसनद बना कर सोने वाला बंदा , उसे ज़रा लंबी फटकार लगाईयेगा :)

    मैंने कहा था कि सपने अक्सर देखता हूं , आज भोर में सलिल जी को सूर्य के ग्रहण से मुक्ति के वक़्त बनने वाली डायमंड रिंग दिखा रहा हूं , ऐसा सपना देखा ! इधर इत्तेफाक देखिये कि आप भी उनकी तारीफ कर रही हैं !

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    1. अली सा.
      मेरा प्रणाम स्वीकारें!! आपके स्वप्न के साथ मेरा जुड़ाव मेरे लिए गर्व का विषय है!!

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    2. कोई फायदा नहीं अली जी,
      लम्बी -चौड़ी, दुबली- मोटी, ऊँची-छोटी किसी बात का कोई असर नहीं होगा, उन दोस्त पर :(

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    3. ..कहानी को मनसद बनाकर सोने वाला बेअसर बंदा! कुछ तो रहम करे। अगर पढ़ सके तो मेरी भी फरियाद इसमें शामिल करे। :)

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  2. क्या बात है ... बहुत खूब ... वैसे यह अतुल बाबू से कहिए ... ब्लॉग जगत का भी हिस्सा बने ... केवल एक पाठक के रूप मे ही नहीं एक लेखक के रूप मे भी ... ;-)

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    1. बिलकुल शिवम्,
      अतुल तुम्हारी सलाह जरूर मानेगा

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  3. भाव विभोर हो गये हम भी

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    1. शुक्रिया मनु जी,

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  4. एक टीनेजर द्वारा लिखी गई सुन्दर कविता, वास्तव में सराहनीय प्रयास है. माँ का तो मन ही ऐसा होता है , पिता एतराज़ करते रह जाएँ तब भी माँ औलाद की ही फ़िक्र करती रहती है. सुन्दर प्रस्तुति.

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    1. शुक्रिया डा. दाराल
      आपके शब्द अतुल का उत्साह ही बढ़ाएंगे

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  5. अतुल की कविता बहुत प्यारी है, भाव गहरे उकेरे हैं।

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    1. शुक्रिया प्रवीण जी

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  6. अतुल बेहद खूबसूरती और धैर्य के साथ बुनी है आपने यह कविता पढ़कर आनंद आ गया दोस्त, भविष्य में आप और निखर कर आयें आपकी मनोकामना पूर्ण हो प्रभू से यही प्रार्थना है.
    सादर अरुन शर्मा
    www.arunsblog.in

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  7. सुन्दर भाव भरे हैं।

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  8. इतनी सारी बातें कहनी हैं रश्मि और सब अलग अलग मसले हैं सो पॉइंटवाइस कहती हूँ...
    १-बहुत सुन्दर भाव हैं अतुल की कविता के..अच्छा लगता है जब इतने छोटे बच्चे इस तरह अभिव्यक्त करते हैं भावनाएँ (आजकल कम हैं ऐसे बच्चे.)
    २-सलिल दादा की वाकई जितनी तारीफ़ की जाय कम हैं....इत्ते बड़े ब्लॉग वर्ल्ड और फेसबुक में एक उन्हें ही बड़े भाई कहने का साहस किया(मैं भी जौहरी हूँ :-))
    ३-शिवम जी की सलाह अतुल तक पहुंचाई जाय...ब्लॉग बनवा दो उनका.
    ४-तुम्हारा लिखा पढ़कर ऐसा लगता है जैसे बात कर रहे हैं तुमसे रूबरू होकर ....
    बधाई और शुभकामनाएँ सभी को.
    अनु

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    1. मैं भी पॉइंट वाइज़ ही उत्तर देती हूँ :)
      1. आज भी बच्चों में वो संवेदनशीलता बरकरार है, अच्छा लगता है देख
      2. सलिल जी के विषय में तुमने अक्षरशः सत्य कहा है और तुम्हारे जौहरी होने में मुझे कोई शक नहीं :)
      3. शायद अतुल ऑनलाइन कम आता है, खुद ही देख लेगा शिवम् की सलाह और उस पर अमल भी करेगा
      4. मुझे लगता है मैं बहुत सिंपल लिखती हूँ, पर तुमलोगों की ऐसी टिप्पणियाँ अपने लेखन के प्रति ही विश्वास जगाती है।

      अब एक पॉइंट मेरी तरफ से :)
      5. तुम बहुत ही दिल से अपने विचार व्यक्त करती हो, इंतज़ार रहता है तुम्हारे कमेंट्स का ,शुभकामनाओं का शुक्रिया

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  9. behad khoobsurat kavita...blog jagat isi tarah lekhan ko sanvarne me sahyog deta rahe to jane kitane hi bhav kitane sundar roop me nikhar kar aayenge...aapka ye prayas sarahneey hai..

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    1. शुक्रिया कविता जी,
      नयी प्रतिभाओं को सामने लाना, उनका उत्साह बढ़ाना भी ब्लॉग जगत के कर्तव्य में शामिल होना चाहिए .

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  10. सबसे पहले तो मैं मौडेस्टी में नहीं जेनुइनली कह रहा हूँ कि जिन शब्दों में आपने मेरा ज़िक्र किया है उसकी आवश्यकता नहीं है... यह नहीं कह रहा कि मैं उसके काबिल नहीं हूँ :)
    यहाँ अतुल और उसकी कविता का ही ज़िक्र किया जाना चाहिए. और मित्रता में आभार/क्षमा की कोई गुंजाइश नहीं होती, न होनी चाहिए!!
    एक शिल्पकार की बनायी ईश्वर प्रतिमा को देखकर लोगों ने प्रशंसा के पुल बना दिए तो उसने कहा कि परमात्मा तो उस पत्थर में मौजूद था, मैंने तो बस बेकार के पत्थरों को छांटकर उस परमात्मा की तस्वीर दिखा दी है..
    बच्चे में प्रतिभा है.. मैंने बस शब्दों का हेर-फेर किया है!! अतुल को मेरा आशीर्वाद और जैसा मैंने कहा था आपसे.. बच्चे में संभावनाएं हैं!!
    /
    पुनश्च: किंजल्क-कनिष्क भी आज कुछ ज़्यादा ही प्यारे लग रहे हैं!!

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    1. शुक्रिया सलिल जी,
      अतुल ने कहा था ,'उसने कुछ और कविताएँ लिखी हैं, मुझे भेजने वाला है।'
      मैंने आपसे कह ही दिया है, उसे आपका पता दे दूंगी, आप उसका मार्गदर्शन किया कीजियेगा .

      किंजल्क-कनिष्क प्यारे तो लगेंगे ही मेरे साथ जो हैं, लीजिये हमने मौडेस्टी को ताक पर रख दिया जहाँ उसे कोई ताक न सके :)

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  11. माँ को समर्पित एक सम्पूर्ण कविता | जैसे सुगंध बताती है ,पुष्प कौन सा है ,उसी प्रकार बच्चों के व्यवहार और आचरण से ज्ञात होता है उनके माँ-बाप कैसे हैं | निश्चित तौर पर आप बधाई की पात्र हैं एक दायित्वपूर्ण माँ होने के लिए और हाँ ! अतुल को स्नेह एवं शुभकामनाएं और सुन्दर लेखन के लिए |

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    1. शुक्रिया अमित जी,
      पता नहीं अपना कितना दायित्व निभा पाई हूँ, अभी तो परीक्षा जारी ही है .

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  12. कितनी सुन्दर कविता है!!! अलंकृत करने के लिए सलिल जी बधाई के पात्र हैं। अतुल जैसे कम-उम्र बच्चे जब इतने भावुक दिखाई देते हैं, तो विश्वास फिर जड़ें जमाने लगता है कि आज की पीढी संवेदनाहीन नहीं हुई है।

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    1. बिलकुल वंदना,
      मैं बहुत आशान्वित हूँ युवा पीढ़ी से ,मुझे उनमें बहुत संभावनाएं दिखती हैं।
      एक मजे की बात है, एक बार एक युवा से ही बातें हो रही थीं। वे युवा पीढ़ी की कमियाँ गिना रहे थे ,बहुत निराश थे और मैं उनकी अच्छाइयां बता रही थी:)

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  13. सलिलजी की छाप स्‍पष्‍ट दिख रही है। अतुल को भी बधाई।

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    1. शुक्रिया अजित जी,

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  14. बड़ी प्यारी पोस्ट है। सलिल भैया तो हैं ही जादूगर। मुझे भी उत्साहित करते रहते हैं।
    मुझे माताओं से कभी-कभी जलन भी होती है। मेरे बच्चे भी अपनी माँ से ही घुले-मिले रहते हैं। मुझसे बात छुपाते हैं लेकिन माँ को सब बताते हैं। मेरे बेटे का नाम भी अतुलेश पाण्डेय है। वह भी 18 वर्ष का है। मेरी श्रीमति जी कभी उसका लिखा मुझे पढ़ा जाती हैं। बिटिया मुझसे अच्छा लिखती है लेकिन मुझे नहीं पढ़ाती अपनी माँ को ही पढ़ाती है। ये बच्चे माँ की इत्ती तरफदारी काहे को करते हैं?

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  15. जब भी मैं कोई प्रश्न करूँ, पूरा उत्तर बतलाती है ,
    दुनियादारी के पहलू के सारे मतलब समझाती है ,
    मैं भूल करूँ चाहे कोई, वह क्रोध नहीं दर्शाती है ,
    ना जाने क्यूँ वह मुझको भी मेरी माँ सी लगती है ।

    बहुत बढ़िया ..दिल को छूती हुई रचना

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  16. This comment has been removed by the author.

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  17. अच्छा ! तो ये है अतुल बेटा, जिसकी तुम इतनी तारीफ कर रही थी हमसे फुनवा पर ! बहुत प्यारा बच्चा है। और बहुत सुन्दर कविता है। कविता में संजोये गए निर्मल मनोभाव ने मन मोह लिया । सलिल जी के हाथों जब संवरी है तो, खूबसूरती के सारे आयाम परिलक्षित हो ही रहे हैं।
    हो सकता है, मैं सही न भी हूँ, लेकिन अभी अतुल को ब्लोग्गिंग की दुनिया में आने की सलाह नहीं दूंगी, क्योंकि समय बहुत व्यर्थ जाता है यहाँ। इस समय वो अपनी पढ़ाई और भविष्य को बनाने की ओर ज्यादा ध्यान दे तो अच्छा रहेगा। ये मैं अनुभव के आधार पर ही कह रही हूँ।

    अतुल बस ऐसे ही कवितायें लिखता जाए, और तुमसे मार्गदर्शन लेता रहे। उसे धीर सारा स्नेह देना मेरी तरफ से।
    तुम्हारी और बेटों की तस्वीर मशालाह है। नज़र उतार देना दोनों की ...प्लीज ..!

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    1. धीर=ढेर
      तस्वीर=तसवीरें
      माशालाह=माशाअल्लाह

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  18. waaah ji,
    aapke aur atul k liye...
    http://meourmeriaavaaragee.blogspot.in/

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  19. मां को समर्पित कोमल एहसासों के साथ सुंदर प्रस्तुति।

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  20. @वैसे एकाध
    unpleasant exp भी रहे पर
    वो शायद इसलिए कि कुछ कड़वा न
    चखो तो मीठे का स्वाद कैसे पता चले
    कि वो कितना मीठा है :)
    सकारात्मक नजरिया है ,यही सोच रखना जरूरी भी है क्योंकि मैंने देखा है कुछ लोग जरा सी नकारात्मक बातें सुनकर निराश हो जाते हैं,कई तो लिखना ही छोड़ देते है।
    और अतुल की कविता के बारे में तो क्या कहें जो उन्होंने लिखा दिल से लिखा और बहुत ही सुन्दर शब्दो में लिखा।
    एक बात और कि बच्चो के साथ जो तस्वीरें आपने लगाई हैं उनसे माँ पर लिखी कविता के भाव और उसकी खूबसूरती और निखर कर आई है।

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  21. चचा तो हमारी बकवास कविताओं को भी सुधारते रहते हैं और तो और अनुवाद भी कर देते हैं :)

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  22. माँ को समर्पित उत्कृष्ट रचना .. अतुल ओर सलिल जी दोनों ही लेखनी के धनि हैं ...ओर उनके मिलने से काव्य की सरिता तो बहनी ही है ... सुन्दर भावों से सजी निखरी लाजवाब रचना ...

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  23. रोचक! बिहारी बाबू की जय हो!

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  24. में आप से निवेदन करता हूँ की में आज आपकी यह कविता अपने ब्लॉग में इस्तेमाल कर रहा हूँ इसलिए मुझे माफ़ करे
    विवेक सिंह(sVm Group™)

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