Saturday, January 28, 2012

ईश्वर से बड़ा लेखक कौन ??


अक्सर जब दस-बारह या उस से ज्यादा किस्तों वाली कहनियाँ लिखती हूँ...तो उसके बाद...उस कहानी को लिखने की प्रक्रिया या कहें मेकिंग ऑफ द स्टोरी/नॉवेल....भी लिख डालती हूँ. इन दो किस्तों की कहानी के बाद कुछ लिखने का इरादा नहीं था...पर इस कहानी पर लोगो की प्रतिक्रियायों ने कुछ लिखने को बाध्य...नहीं बाध्य तो नहीं...हाँ, कुछ लिखने की इच्छा जरूर जगाई मन में.

इस कहानी की  थीम कुछ अलग सी थी और मुझे इसे लिखने में थोड़ी हिचकिचाहट भी  थी....कि कहीं ऐसा तो नहीं लगे कि ये कहानी 'बंद दरवाजों का सच 'विवाहेतर संबंधों ' को बढ़ावा दे रही  हो या फिर उसे सही ठहरा रही हो. मन में दुविधा थी और ऐसे में तो दोस्त ही काम आते हैं. वंदना अवस्थी दुबे ,राजी मेनन और रश्मि प्रभा जी से इसके प्लाट की चर्चा की....और तीनो ने ही सुन कर कहा...तुम्हे जरूर लिखना चाहिए. आभार उन सबका. अक्सर इस कहानी में वर्णित जैसे  हालात आते हैं लोगों की जिंदगी में......और इसके लिए अक्सर स्त्री को ही दोषी ठहरा दिया जाता है. पर इसके लिए सिर्फ स्त्री को गलत नहीं कहा  जा सकता...दोषी वे हालात होते हैं. 

कुछ लोगों ने टिप्पणियों में भी कहा और कुछ ने मेल में और बातचीत में भी कहा कि नीलिमा सही वक़्त पर संभल गयी वरना वास्तविक जीवन में ऐसा होता नहीं...लोग भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते और बहक जाते हैं. पर मैं इस से इत्तफाक नहीं रखती. अभी भी हमारे देश में देह की पवित्रता बहुत मायने रखती है. और यह बात पूरे विश्वास से इसलिए भी कह रही हूँ क्यूंकि यह कहानी एक सत्य घटना पर आधारित है. 

मेरी सहेली के पड़ोस में एक महिला रहने आई. साथ में उसके सास-ससुर भी आए थे. उन्होंने मेरी सहेली से कहा ...बहू पहली बार शहर में अकेले पति के साथ रहने आई है, जरा इसका ख्याल रखना. वे लोग अहिन्दीभाषी थे ..महिला को लोगों के साथ घुलने-मिलने में थोड़ा संकोच होता था. सहेली नौकरी करती है...काफी व्यस्त रहती है..फिर भी वह उक्त महिला का हाल-चाल पूछ लिया करती थी...कभी फ्री रहती तो अपने साथ बाज़ार वगैरह ले जाती क्यूंकि उस महिला का पति काफी व्यस्त रहता था...सुबह के गए देर रात को घर आया करता था.
मेरी सहेली ने  गौर किया...सामने वाली बिल्डिंग के टेरेस  से एक लड़का अक्सर उनकी बिल्डिंग की तरफ देखता रहता है....उसने इसे ,ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया...पर एक दिन वह छुट्टी ले घर पर थी तो देखा...वह लड़का उसके पड़ोस में उक्त महिला के घर गया. सहेली ने बाद में उस से पूछा भी...और समझाया भी...कि 'वह दूर ही रहे'..पर उस महिला ने कहा...'वे लोग सिर्फ अच्छे दोस्त हैं.." एकाध बार और सहेली ने उसके घर लड़के को आते देख उसे समझाने की कोशिश की....पर फिर बाद में चुप हो गयी  कि कहीं व्यर्थ की दखलअंदाजी ना लगे. 

इसके बाद घटनाक्रम  ने जो मोड़ लिया..वो अगर मैं कहानी में लिख देती तो नाटकीयता से भरपूर लगता लेकिन ऐसे ही नहीं कहते.. .. "God is  the greatest fiction writer "   उन लोगो का फ़्लैट का ग्यारह महीने का कॉन्ट्रेक्ट ख़त्म हो गया और उक्त महिला के पति ने उसी बिल्डिंग में  फ़्लैट किराए पर ले लिया...जिस बिल्डिंग में वो लड़का रहता था. आस-पास के सैकड़ों बिल्डिंग छोड़कर प्रौपर्टी डीलर ने उसी बिल्डिंग में उस महिला के पति को फ़्लैट दिखाया और उन्हें पसंद भी आ गया. अब वो महिला घबरा गयी...अब उसे लड़के के लक्षण भी ठीक नहीं लग रहे थे. एक ही बिल्डिंग में दूसरे माले पर वो महिला और सातवें माले पर वो लड़का रहने लगा. और वही हुआ जिसका उसे डर था. महिला के अवोइड करने पर वो लड़का समय-असमय उसे फोन करने लगा...और एक दिन जबरदस्ती उसके फ़्लैट में घुस आया....महिला ने किसी तरह भागकर पड़ोस में शरण ली. कह दिया की कोई अजनबी था. वो लड़का सीढियों से ऊपर चला गया. यह सब उसने मेरी सहेली को फोन पर बताया. 

पर बात यहीं ख़त्म नहीं होती. उस बिल्डिंग के लोग काफी चिंता में पड़ गए कि इतनी सिक्युरिटी के बाद भी कोई बाहर से कैसे बिल्डिंग में घुस आया. सोसायटी की मीटिंग हुई...वाचमैन की खबर ली गयी.  उस बिल्डिंग में भी मेरी कई सहेलियाँ रहती हैं...उन सबने मुझसे भी अपनी चिंता बांटी. मुझे अंदर की बात की खबर थी...पर उक्त महिला की खातिर मैने उन्हें सच्चाई नहीं बतायी. 

करीब  पांच वर्ष पहले की घटना  है,यह. उस महिला से मिलना तो दूर मैने उसे कभी देखा भी नहीं...सहेली ने नाम जरूर बताया होगा..पर अब तो वो भी नहीं याद......पर इस पूरे घटनाक्रम ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया कि जरूर वो महिला बहुत अकेलापन महसूस करती होगी...नए  शहर में...कोई दोस्त नहीं....हिंदी-अंग्रेजी  बोलने में कठिनाई..पति व्यस्त रहता होगा.... इसीलिए उसने उस लड़के से दोस्ती की होगी. और इसके लिए उस महिला को बिलकुल गलत नहीं कहा जा सकता. थोड़ी सराहना....थोड़ी केयरिंग... अपनी कहने..दुसरो की सुनने की इच्छा सबके भीतर होती है. 

जबतक उस लड़के ने  मीठी-मीठी बातें की ...उसे अच्छा लगा पर...जब इस से आगे बढ़कर उसने कुछ चाहा तो महिला का संस्कारी मन स्वीकार नहीं कर पाया. अभी भी हमारी संस्कृति में देह की पवित्रता ही अहम् होती  है. और रिश्ते एक निश्चित दूरी पर ही निभाये जाते हैं. इसलिए सिर्फ कहानी में ही नहीं..वास्तविक जीवन में भी लोग भावनाओं पर काबू रखना जानते हैं. 

यह कहानी बहुत ही वास्तविक सी लगती है....इसका थोड़ा श्रेय मेरी सहेली 'राजी' को भी जाता है. रोज मॉर्निंग वॉक पर मैं उस से इसके सीन डिस्कस किया करती थी....और उस से पूछती..ऐसा हो सकता है ना...और वो मुझे आश्वस्त करती. { जबरदस्ती कविता सुनायी जाती है...यह तो सब जानते हैं...पर जबरन कहानी भी सुनायी जाती है,यह सिर्फ राजी जानती है:).. पर मानती नहीं...कहती है..'वो एन्जॉय करती है,सुनना' }

वंदना ने भी सिर्फ आश्वस्त ही नहीं किया...बल्कि कहा था...इसी प्लाट पर मैं भी एक कहानी लिखती हूँ....मैने तो लिख डाला...अब मुझे भी वंदना की कहानी का इंतज़ार है...आप सब भी उस से फरमाइश करते रहिए :)

35 comments:

  1. bahut hi achi lgi apki rachna ........keep it up :))

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  2. bahut hi achchi or sachchi lgi apki peshkash...keep it up dear :))apki paintings ne to muje hairan kr diya h ! itni talent ek hi insan me ! :)))))))

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  3. bahut achchi or sachchi kahani h.......or apki paintings ne to impress kr diya muje.itni sari talents ! keep it up dear :))

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  4. देश कितना भी आगे चला जाए.... पश्चिमी सभ्‍यता पांव फैला ले पर देह की पवित्रता अब भी कायम है और यही है जो भारत की संस्‍कृति, सभ्‍यता की नींव है।
    बेहतरीन विचारणीय पोस्‍ट।

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  5. रोटी की चाह .

    हम सबकी जिंदगियों की कहानी लिखने वाले ईश्वर से बड़ा लेखक कौन ...
    वाकई !

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  6. आमतौर से लेखन की प्रकिया के बारे में स्वयं कम ही लोग लिखते हैं

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  7. मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ रश्मि ,,,यदि नारीत्व पर आँच आने का संदेह भी हो तो नारी को स्वयं पर और अपनी इच्छाओं पर पूरा वश होता है लेकिन अगर हालात ही क़ाबू से बाहर हों तो केवल नारी को दोषी कैसे ठहराया जा सकता है
    सुंदर और सार्थक लेखन के लिये बधाई

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  8. सच है, ईश्वर की रचित कहानियाँ ही हम लिखते रहते हैं, बड़ी रोचक हैं वे कहानियाँ...

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  9. दुनिया में सब तरह के लोग रहते हैं । सब कुछ संभव भी है । कहानी को कोई कोई भी मोड़ दिया जा सकता है । यह लेखक की सोच पर निर्भर करता है ।

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  10. ईश्वर की लिखी ही हैं कहानियां जिन्हें हम शब्दों में ढालते हैं...... सुंदर विचार

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  11. रश्मि जी मैं आपकी इस आस्‍था पर कोई सवाल नहीं उठा रहा हूं कि आप ईश्‍वर में विश्‍वास करती हैं या नहीं। लेकिन आपकी इस पोस्‍ट से आप अनजाने में(या जानते हुए) ही इस अवधारणा को स्‍थापित कर रही हैं कि जीवन में क्‍या होगा यह सब कुछ ईश्‍वर ने तय कर रखा है। अगर ऐसा है तो फिर गाहे-बगाहे विभिन्‍न हालातों पर हमारे स्‍यापा करने का कोई मतलब ही नहीं है।
    *
    देह की पवित्रता निसंदेह हमारी संस्‍कृति में अभी बहुत मान रखती है। पर क्‍या आपको नहीं लगता कि उससे कहीं अधिक महत्‍वपूर्ण है मन की पवित्रता। हो सकता है आप देह का संयम बरत लें पर क्‍या मन को संयमित किया जा सकता है।

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  12. ईश्वर से बड़ा रचनाकार कोई नहीं।

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  13. मुझे लग ही रहा था की हो न हो ये कहानी एक सत्य घटना पर आधारित है..

    खैर, आप ऐसे ही लिखते रहिये और हम ऐसे ही पढते रहेंगे :)

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  14. लोग अपनी सोच से बहुत कुछ कहते हैं ... समझ में नहीं आता , कटु कल्पना को कटु सत्य बनाना इन्हें खूब आता है !नारी बहुत कुछ सोचती है , हाँ एक मन वह भी तो जीती है - इसे लोग भूल जाते हैं

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  15. आपकी बात से शत-प्रतिशत सहमत हूँ। आपकी कहानी का अन्‍त एकदम स्‍वाभाविक था। यदि उन दोनों के मध्‍य कुछ होता तो अवश्‍य फिल्‍मी लगता। हमारे देह और मन की आवश्‍कता अलग अलग हैं, इन्‍हें एकसाथ नहीं जोड़ा जा सकता। कम से कम महिलाओं के संदर्भ में तो।

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  16. राजेश जी,
    यही तो एक ऐसी उलझन है...जो सुलझती नहीं...इतनी सारी विसंगतियां देख, लगता है.. .. ईश्वर कहाँ है और इतना बेदर्द क्यूँ है ??...और फिर कभी इतने संयोग घटते हैं कि लगता है...सारे धागे ईश्वर के हाथों में ही है...वो जब चाहे खींच ले..जब चाहे ढील दे दे...

    मन की पवित्रता तो खैर सबसे महत्वपूर्ण है....पर मन पर वश नहीं रहता...जबकि तन को वश में किया जा सकता है..और तब शायद धीरे-धीरे मन की मनमानी भी ख़त्म हो जाती है.

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  17. अच्छा किया रश्मि, इस कहानी के उपजने की कथा लिख के. असल में हमारी त्रासदी ये है कि हम जब भी कोई कहानी या कविता पढते हैं,तो उस कथानक को कवि या कथाकार के व्यक्तिगत जीवन से जोड़ने लगते हैं. जबकि अधिकांशत:होता है ये कि उस घटना का लेखक के व्यक्तिगत जीवन से कोई ताल्लुक नहीं होता. हां हमारे आस-पास के परिवेश से ही कथाओं का जन्म होता है, सो उक्त घटना कहीं न कहीं तो जीवंत होती ही है.
    तुमने तो जबरन ही मुझे भाव दे दे दिया :) :)
    इसे मदद कहते हैं क्या? चलो अब दे दिया है तो ले ही लेती हूं :) :)
    रश्मि, मुझे लगता है कि हम देह और मन पर संयम नहीं बरतते, बल्कि अपनी इन्द्रियों को वश में करते हैं, जिसके चलते मन और देह, दोनों वश में हो जाते हैं.

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  18. अचरज होता है |

    एक तरफ हम कहते हैं की "इश्वर की मर्जी के बिना कुछ भी नहीं होता - ईश्ववर सब सही करते हैं |"

    दूसरी और हम हमारे बनाए सही गलत के फैसले इश्वर के फैसलों से अधिक सही मानते हैं, और खुद ही दूसरों की भावनाओं को पाप और पुण्य के तराजू में तौलते हैं - खुद ही खुदा बन बैठते हैं |
    :(

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  19. आज आपकी पोस्ट पढ़ने से पहले, कहानी की दोनों किश्तें पढीं... बाहर था, तभी शायद नहीं पढ़ पाया. मेकिंग ऑफ द स्टोरी भी अच्छी है.. उसने सारी कहानी पहले से लिख रखी है तभी तो उसकी कहानियों के पात्रों और घटनाओं से हम कहानियां नहीं लिख पाते!
    हरमन हेस की एक कहानी पढ़ी थी बहुत पहले.. उस कहानी में नीलिमा के देहातीपन को दूर करने और उसका आत्मविश्वास वापस लाने के लिए रोहित वो सब करता है जो वो आपकी कहानी में कर रहा था.. और जब नीलिमा पुआने से नयी हो गयी तो वह अचानक चला गया.. और नीलिमा ने आत्महत्या कर ली..
    दिल, देह और मन कब साथ देना छोड़ देता है यह कहना बहुत मुश्किल है.. मैंने भी ऐसी ही एक कहानी करीब से देखी है!!
    बहुत संजीदा कहानी और उसके बनने की कथा!!

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  20. बहुत ही उम्दा और शिक्षाप्रद पोस्ट |लेकिन कुशल कथा लेखकों की तरह निर्णय अपने पाठकों पर छोड़ दिया |

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  21. मुझे तो राजेश उत्साही का कमेन्ट ठीक लगा !

    देह की पवित्रता और हमारी संस्कृति ,बहस के योग्य धारणायें हैं ! आपकी सहेलियां आपको चिंतन के स्तर पर ऊर्जावान और लेखन में सक्रिय बनाये रखती हैं इसके लिए उन्हें साधुवाद !

    बाकी आपकी कहानी का वाचन अब तक मुझ पर उधार है :)

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  22. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  23. इसमें कोई संदेह ही नहीं है कि स्त्री बरबस ही अपने नारीत्व पर कभी आँच आने देगी ! अपने मन अपनी भावनाओं पर सही नियंत्रण रखना और अपनी ज़रूरतों पर अंकुश लगाना भारतीय संस्कारी नारी को भली भाँति आता है ! लेकिन क्या कभी उसके जीवनसाथी ने उसका मन टटोलने की, उसके दिल की बात जानने की या कभी उसकी छोटी-छोटी चाहतों को, नारी सुलभ इच्छाओं को समझने की, उन्हें पूरा करने के लिये वक्त निकालने की या फिर थोड़ा सा भी क्वालिटी टाइम अपनी पत्नी के साथ बिताने की अहमियत को समझा है ? या नारी सिर्फ घर की केयरटेकर ही बन कर रह गयी है ? जिन दम्पत्तियों ने इन बातों के महत्त्व को समझ लिया है वहाँ शायद इस तरह की घटनाएँ नहीं होतीं ! जीवन में तमाम भौतिक सुख सुविधाओं के साथ मानसिक संतुष्टि भी बहुत ज़रूरी होती है !

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  24. "वो महिला बहुत अकेलापन महसूस करती होगी...नए शहर में...कोई दोस्त नहीं....हिंदी-अंग्रेजी बोलने में कठिनाई..पति व्यस्त रहता होगा.... इसीलिए उसने उस लड़के से दोस्ती की होगी. और इसके लिए उस महिला को बिलकुल गलत नहीं कहा जा सकता. थोड़ी सराहना....थोड़ी केयरिंग... अपनी कहने..दुसरो की सुनने की इच्छा सबके भीतर होती है. ...."

    ---यह वाक्य एक गलती को सही ठहराने जैसा है .... निश्चय ही गलती है उस महिला की ...पति की व्यस्तता, शहर में नया होना कोई इतनी बडी बात नहीं है कि किसी विपरीत लिन्गी से दोस्ती की जाय ...यह निश्चय ही अनाचरण की कोटि में आता है .... महिलायें (कमजोर चरित्र बाली) तो सदा ही यही करती हैं स्वयं आगे बढती हैं पकडे जाने पर दोष पुरुष पर मढ कर अलग हो जाती हैं...

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  25. विवाह से इतर सम्बन्ध रखने से बेहतर होता हैं विवाह को समाप्त करके नये सिरे अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहना ।
    लोग { महिला और पुरुष } दोनों झूठ बोलते हैं अगर वो कहते हैं की गलती से हुआ । सबसे बड़ी बात हैं आप चरित्र किसे कहते हैं , क्या चरित्र का मतलब केवल किसी के साथ सहवास करने तक ही सिमित हैं ।
    एक पोस्ट पर पहले भी काफी बहस हुई थी { अजीत जी की पोस्ट } और उसके बाद वाणी जी की पोस्ट पर भी वही विषय था ।
    ये सब विषय बेहद पुराने हैं { माफ़ करना रश्मि मै ने कहानी नहीं पढी } इस लिये इन पर लिखी कहानी भी बेहद पुराना विषय हैं { मेरा सोचना } समकालीन विषय हैं की अगर विवाह इतर सम्बन्ध बनते ही हैं तो परिवार के नाम पर कब तक इन संबंधो को हमारा समाज "गलती " कह कर स्वीकार करता रहेगा । परिवार की अगर इतनी फ़िक्र हो तो लोग ये सब ना करे ।

    समय हैं की हम समकालीन विषयों पर बहस करे की अगर विवाह से इतर देह सम्बन्ध हैं तो उनको रोका कैसे जाए । क्या सजा दी जाए उनलोगों को जो समाज में ये सब करके भी अच्छे कहलाते हैं और वही डिवोर्स लेकर अपनी जिंदगी दुबारा शुरू करने वाले को समाज परिवार विरोधी का तमगा देता हैं

    औरत का चरित्र ये महज समाज की सोच हैं औरत और पुरुष बराबर हैं म उनकी जरूरते भी बराबर हैं इस लिये उनके लिये संविधान और कानून के नियम भी बराबर हैं ।

    हिंदी साहित्य में कहानी की विधा में परिवर्तन की जरुरत हैं और नयी सोच लाने की जरुरत हैं

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  26. ईश्वर ही तो सब से बडा लेखक है जो हम जैसे पात्रों से भी लिखा देता है। अच्छी पृष्ठभूमि।

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  27. रचना जी,
    आपके अपने दृष्टिकोण हैं पर कहानी में वही सब कुछ होता है जो समाज में घटित होता रहता है.
    अगर इस तरह की घटनाएं नहीं होतीं तो ऐसी कहानियाँ लिखी भी नहीं जातीं.
    करीब-करीब सबने कहा है कि कहानी बिलकुल वास्तविकता के करीब है....सच सी लगती है...इसका अर्थ ही है कि समाज में लोगो ने भी इस तरह के वाकये देखे हैं.

    आपने लिखा है,
    समय हैं की हम समकालीन विषयों पर बहस करे

    जरूर बहस करें...पर कहानी एक अलग विधा है....आधुनिक समाज की कहानियाँ भी लिखी जाती हैं..और आपके हिसाब से इस 'पुराने सोच' वाली भी क्यूंकि समाज में हर तरह के लोग हैं..और उनके जीवन की झलक देने वाले हर तरह के लेखक भी हैं. आपको जरूर ये विषय पुराना लगेगा....पर हमारे समाज का एक सच ही है यह.

    और आपने कहानी पढ़ी नहीं...इसलिए आपको पता नहीं है कि इस कहानी में 'विवाहेतर सम्बन्ध' जैसी कोई बात थी ही नहीं.

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  28. संभवतः कहानी पर टिप्पणी नहीं की थी मैंने।
    पढ़ा ही बहुत बाद में था, लेकिन मेकिंग के बारे में जानना रुचिकर लगा।

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  29. रचना जी,
    पोस्ट रश्मि की है, इसलिये मेरा कुछ कहने का हक़ तो नहीं है, लेकिन कुछ बातें खटक जाती हैं, सो लिख देती हूं. जैसे, कहानी आपने पढी नहीं, लिहाजा आपका कमेंट ही बेमानी हो गया :(

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  30. भारतीय संस्कारों को परिभाषित करती पोस्ट है आभार|

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  31. डॉ श्याम गुप्त या कोई भी क्या कहते सोचते हैं, क्या गलत या सही मानते हैं इससे यथार्थ में कोई अन्तर नहीं आता। यथार्थ यह है कि हर व्यक्ति, और व्यक्ति में स्त्रियाँ भी सम्मिलित होती हैं, की आवश्यकता है कि कोई उनके साथ हो, उनकी सुने, अपनी कहे, उन्हें महत्व दे और उनसे महत्व पाए। हाथ पकड़ जीवन की राहों में साथ चले। साथ का अर्थ केवल संतान जन्मना ही नहीं होता।
    ये अति व्यस्त लोग भी अपने दफ्तरों में मुस्कराते हैं, गप्प मारते हैं, साथ खाते पीते हैं, यहाँ वहाँ की बातें करते हैं। हाँ, बस घर आते ही थक अवश्य जाते हें और यह नहीं समझ पाते कि पत्नी को कपड़े , छत व भोजन से अधिक कुछ क्यों चाहिए।
    नीलिमा तो रुक गई किन्तु कोई तो पीढ़ी ऐसी आएगी जो रुकेगी नहीं।
    घुघूती बासूती

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  32. hindi sahitya me kehani ki vidha aur inlish sahitya mae kehani ki vidha dono kae vishyo me samkaaleen kehaniyon me itna antar kyun haen ???

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  33. शीर्षक सहज में ही सब कुछ कह गया ...! विचारणीय ..!

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  34. रचना जी,
    कहीं कोई अंतर नहीं है....एक वाक्य पहले ही मेरे ध्यान में आया था पर मैने नहीं लिखा क्यूंकि मैं खुद अपने लेखन के बारे में कुछ नहीं कहना चाहती कि मैने कुछ बहुत गंभीर लिख मारा है...जिसे साहित्य का दर्जा दिया जा सकता है..पर जब आप हिंदी और अंग्रेजी साहित्य की बात कर रही हैं तो कह रही हूँ..
    "साहित्य समाज का दर्पण होता है"
    जैसा समाज होगा...साहित्य में (कहानी/नॉवेल/कविता ) में वही नज़र आएगा.

    इस कहानी में छोटे शहर से महानगर में आई एक स्त्री का उल्लेख है...जो महानगर में कई वजहों से काफी अकेलापन महसूस करती है. एक लड़के से दोस्ती होती है जिसके सहारे धीरे-धीरे वह निराशा के गर्त से बाहर निकलती है...और उसका आत्मविश्वास वापस लौटता है.
    (अब आप कहेंगी ..उसे किसी सहारे की जरूरत क्यूँ पड़ी??....वो अकेले खुद के दम पर निराशा के गर्त से बाहर क्यूँ नहीं निकली...वो अपने पति की उपेक्षा के कारण डिप्रेशन में गयी ही क्यूँ..तो इतना कह दूँ...हर औरत superwoman नहीं होती...एक सामान्य से human being में ऐसी भावनाएं होती हैं...और सामान्य लोगो को भी सामान्य तरीके से जीने का उतना ही हक़ होता है...उन्हें भी समझा जाना चाहिए...उन्हें superwoman बनने की हिदायत नहीं दी जा सकती )

    और यह सब यह समकालीन नहीं है?????
    क्या आजकल ऐसा नहीं होता??
    अपने कह दिया बेहद पुराना विषय है...ताज्जुब है....बल्कि आजकल ही ऐसा हो रहा है....घुघूती जी के तीनो कमेन्ट देख लीजिये...उन्होंने भी बहुत करीब से महानगरों में महिलाओं के अकेलेपन का अवलोकन किया है....इसलिए ये कह देना कि ये सब पुराने विषय हैं...अजीब सा लगता है.

    अकेलेपन का अहसास....कभी पुराना हो सकता है??...बल्कि पुराने जमाने में ही यह नहीं था...आजकल इसे लोग ज्यादा भुगत रहे हैं.

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  35. आपकी कहानी लिखने की शैली भी कमाल की है ... कई बार पता नहीं चलता असल का किस्सा है या कहानी ... आपकी बात से सहमत हूँ की केवल नारी को किसी भी काम के लिए दोष देना उचित नहीं है ...

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