शनिवार, 14 सितंबर 2013

मेरा साथी -शिक्षक-पथप्रदर्शक : 'धर्मयुग'

शिक्षक दिवस पर जो पोस्ट लिखी थी, उसके बाद ही यह पोस्ट लिखनी थी पर गणेशोत्सव की तैयारियों ने इतना व्यस्त रखा कि देर होती गयी और संयोग ऐसा है कि आज हिंदी दिवस के दिन लिखने का मौक़ा मिल रहा है . वैसे तो किसी ख़ास को याद करने के लिए कोई ख़ास दिन निश्चित नहीं होना चाहिए . पर ये दिन उनकी यादों में डूबने उतराने का बहाना तो दे ही देते हैं.

यूँ तो हिन्दी हमारी मातृभाषा है ही...पर हिंदी से प्यार करना उसने सिखाया जिसे मैं बेझिझक अपना असली गुरु कह सकती हूँ. प्राइमरी से लेकर एम. ए .तक कई शिक्षक /शिक्षिकाओं ने अपनी शिक्षा से हमारे व्यक्तिव निर्माण में सहयोग दिया  पर एक शिक्षक -साथी- पथप्रदर्शक जो हमेशा साथ रहा वो था "धर्मयुग " .  साहित्य से प्रेम, खेल -फिल्मों में रूचि , मेरी सोच , मेरा व्यक्तित्व ,मेरा लेखन सब इसी पत्रिका की देन है.

 वाक्यों को जोड़ जोड़ कर पढना शुरू किया और तब से ही शायद 'धर्मयुग' पढना भी शुरू कर दिया . शुरुआत तो आबिद सुरती के 'कार्टून कोना ढब्बू जी' से ही हुई होगी . फिर बाल-जगत, क्रीड़ा-जगत , फिल्म -जगत से गुजरते हुए ,राजनीति पर गूढ़ आलेख और कहानियाँ , धारावाहिक उपन्यास भी पढने लगी. धर्मयुग साप्ताहिक पत्रिका थी और काफी बड़े आकार की . आजकल तो कोई भी पत्रिका इतने बड़े आकार की  नहीं है पर उन दिनों धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान और Illustrated Weekly  बहुत बड़े आकार  में आते थे .जाहिर है अन्दर पढने की सामग्री भी बहुतायत में होती थी. धर्मयुग के शुरू में ही दो पन्नों में होतीं थीं  "आँखों देखी  ख़बरें " छोटे-छोटे चित्रों सहित ढेर सारी ख़बरें लिखी होती थीं. देश विदेश की कोई भी खबर नहीं छूटती थी .और धर्मयुग के पाठक बिलकुल अपडेट रहते थे .

धर्मयुग में हर सप्ताह एक कहानी और धारावाहिक उपन्यास की एक क़िस्त  छपती  थी . 'संजीव', प्रियंवद , गोविन्द मिश्र ,मिथिलेश्वर , मंजूर एहतेशाम, मेहरुन्निसा परवेज़  आज कथा जगत में ये नाम एक सशक्त हस्ताक्षर हैं .इन सबकी पहली कहानी (या प्रथम  कहानियों में से )धर्मयुग में ही छपी थीं . सूर्यबाला. मालती जोशी, पानू खोलिया, स्वदेश दीपक ,शिवानी , स्नेह मोहनीश, चित्र मुद्गल इनकी कहानियां तो नियमित ही पढने को मिलतीं.और मैं इनके लेखन की जबरदस्त फैन थी. कुछ कहानियाँ समझ में नहीं आतीं . फिर भी मैं चार बार पढ़ जाती . कमलेश्वर , मन्नू भंडारी , जैसे सशक्त कथाकार भी लगातार धर्मयुग में लिखते थे . एक बार स्कूल की लाइब्रेरी के रख रखाव का काम हम कुछ लड़कियों को सौंपा गया था .वहाँ मुझे धर्मयुग की बहुत  सारी पुरानी प्रतियां मिल गयीं . {सहेलियां काम करतीं  और मैं उनकी डांट खाते हुए चुपके चुपके धर्मयुग पढ़ा करती  :)}उनमें ही मन्नू भंडारी के मशहूर उपन्यास "आपका बंटी " की कुछ किस्तें पढ़ीं . कमलेश्वर की  "आगामी अतीत " (अगर मुझे नाम ठीक याद है ) भी पढ़ी जिस कहानी पर गुलज़ार ने एक बेहतरीन फिल्म मौसम बनायी . 'कामना चंद्रा' की कहानी  जिसपर फिल्म  'चांदनी' बनी .कुछ और कहानियों के साथ इसके  पन्ने  भी अब तक मेरे पास सहेजे हुए हैं . इतनी उच्च कोटि की कहानियाँ होती थी कि जीवन में कुछ सीख देकर ही जातीं .
 

नयी कविताओं का दौर था और धर्मयुग में भी ज्यादातर वैसी कवितायें ही छपतीं पर हमें ज्यादा समझ नहीं आतीं. सूर्यभानु गुप्त की गज़लें और कैलाश गौतम की कवितायें ही पसंद आतीं .  एक कविता थी ,'भाभी  की  चिट्ठी देवर के नाम " जिसमे एक भाभी गाँव  का सारा हाल शहर में बसे देवर को चिट्ठी में लिखती है. "पड़ोस की गाय ने बछिया दी है.... मन करता चूल्हे की माटी खाने को " ऐसा ही बहुत कुछ था ..बड़ी अच्छी कविता थी और बहुत चर्चा हुई थी ,उसकी .शायद नेट पर मिल जाए . एक कविता 'राखी का ऋण ' जिसके रचयिता का नाम नहीं याद पर मैंने अपने नोटबुक में नोट करके रखी थी..यहाँ पोस्ट भी की थी .
  
क्रीड़ा जगत में क्रिकेट, टेनिस, बैडमिन्टन, हॉकी  से सम्बंधित आलेख होते . पर ज्यादा बोलबाला क्रिकेट का ही रहता . जब भारत में कोई टेस्ट सीरीज खेली जाती तो बाकायदा क्रिकेट विशेषांक ही निकलता था और तब जरूर धर्मयुग की अतिरिक्त प्रतियां छपती होंगी क्यूंकि बहुत सारे लोग जो नियमित धर्मयुग नहीं लेते ,वे भी वो अंक जरूर खरीदते . दुसरे खेलों का तब भी वही हाल था जो अब है .पर जब प्रकाश पादुकोण ने 'विश्व कप जीता था तो मुखपृष्ठ पर कप के साथ प्रकाश पादुकोण और उनकी पत्नी  'उज्जला करकल ' (जो तब मंगेतर ही थीं ) की  बड़ी सी तस्वीर छपी थी . एक और तस्वीर याद आती है 'क्रिस एवर्ट ' और 'विजय अमृतराज' की .विजय अमृतराज ने क्रिस के कंधे पर हाथ रखा हुआ था . क्रिस के उजले गोरे कंधे पर अमृतराज के गहरे रंग के हाथ बहुत ही अजीब से लग रहे थे . उस वक्त मैं बहुत ही छोटी थी फिर भी ध्यान से उस फोटो को देख रही थी  और सोच रही थी, इतने गहरे रंग का व्यक्ति इतना हैंडसम कैसे हो सकता है ? (शायद उसे पहला क्रश कह सकते हैं ..दूसरा भी जरूर हुआ होगा..ऐसे ही कुछ लिखते वक़्त ख्याल आ जायेगा :)}
 

'हास्य व्यंग्य ' का भी एक पेज होता था .जिसमे अक्सर शरद जोशी के आलेख निकलते और शायद धर्मयुग की वजह से ही हास्य के पसंद का स्तर इतना अलग हो गया कि अब कोई कॉमेडी फिल्म -शो पसंद ही नहीं आते . होली पर हास्य कवियों की कुछ रोचक परिचर्चाएं तो अब तक याद हैं . कुछ साल पहले शरद जोशी की बिटिया 'नेहा शरद ' एक मॉल में मिल गयीं . मैंने उनसे 'शरद जोशी' उनकी पत्नी 'इरफाना शरद' की भी ढेर सारी बातें कीं (धर्मयुग में पढ़ी  हुई ही ) वे भी सुनकर बहुत खुश हुईं कि मुझे इतना कुछ याद है.
 

राजनीति परक आलेखों में कम रूचि थी पर पढ़ जरूर लेती थी. और अब लगता है धर्मयुग के आलेखों का टोन शायद समाजवादी होता था . वामपंथी या दक्षिणपंथी नहीं .शायद इसीलिए मेरा रुझान भी समाजवाद की तरफ ही है. पर ज्यादा गहरे मैं तब भी नहीं जाती थी  .आज भी दूर ही रहती हूँ . 

 

 दो पन्ने फिल्म जगत के भी होते थे . फ़िल्मी कलाकारों के साक्षात्कार या उनपर आलेख  होते थे. पर कभी भी कोई 'चीप गॉसिप' नहीं पढने को मिलती. नयी रिलीज़ हुई फिल्मों की समीक्षाएं भी होती थी (और उन्हें पढ़कर जब मैं हॉस्टल  जाती तो सहेलियों पर डींगें मारती कि ये फ़िल्में मैंने देख ली हैं )
 

नारी-जगत में पकवानों की विधि , हस्तकला ,नारी सम्बन्धी आलेख, परिचर्चाएं हुआ करती थीं. धर्मयुग में ही देखा था , चाय की छन्नी के ऊपर कपडा लगाकर एक गुडिया का चेहरा और छन्नी की डंडी पर कुछ कटे कागजों का नोटपैड जैसा बनाने की  विधि . मेरे  बेटे को जब स्कूल में  Best out of waste  बनाना था तो मैंने उसे यही बनाना सिखाया .स्कूल के प्रदर्शनी में भी उसे रखा गया था और बहुत पसंद आयी थी लोगों को .

धर्मयुग एक ऐसी पत्रिका थी, जिसमे सबकी रूचि का कुछ न कुछ होता था . और मेरी रूचि तो हर विषय में थी . अब किसी विषय की master तो मैं अपनी वजह से नहीं बन सकी  पर  jack of all trades  निश्चय ही धर्मयुग  ने बना दिया .

कई बड़े लेखकों का कहना था , धर्मयुग के सम्पादक 'धर्मवीर भारती ' अपना ज्यादा समय लेखन को नहीं दे पाए,उन्होंने  अपना सारा समय धर्मयुग के सम्पादन में लगा दिया. पर उनके सफल सम्पादन ने 'धर्मयुग' को इतनी उच्च  कोटि की पत्रिका बना दिया था कि  मेरे जैसे कितने ही लोगों का मार्गदर्शन  उनके व्यक्तिव निर्माण में धमर्युग ने अपना सहयोग दिया . प्रोफेशनली जो लोग धर्मयुग की वजह से आगे आये , 'उदयन शर्मा, सुरेन्द्र प्रताप सिंह ' इनलोगों को तो सारी दुनिया जानती है पर आम लोगों के जीवन में भी इस पत्रिका के नियमित पठन ने महत्वपूर्ण  बदलाव लाये हैं. मेरी बदकिस्मती है कि मैंने धर्मयुग के युवा जगत में लिखना शुरू  किया तब  तक टेलीविजन का दौर शुरू हो चुका था .लोगों की पढने की आदतें छूटने  लगीं और मनोरंजन के लिए लोग टी.वी. का सहारा लेने लगे और मेरी प्रिय पत्रिका बंद हो गयी . मुझे खुद से ज्यादा मेरे बाद वाली पीढ़ियों के लिए अफसोस है कि वे एक इतनी अच्छी पत्रिका से वंचित रह गए .

अगर मेरे जीवन में धर्मयुग नहीं होता तो मेरा व्यक्तित्व अच्छा होता या बुरा ये नहीं पता पर अलग होता यह तो निश्चित है .

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

जीवन को एक नयी दिशा देता 'हेड सर' का वह निर्णय



मेरा पहला स्कूल, सेन्ट्रल एकेडमी रांची






आज फेसबुक पर सबको अपने शिक्षकों को याद करते देख हमें भी अपनी सारी शिक्षिकाएं/ शिक्षक  सिरे से याद हो आये. सबसे पहले तो के.जी. की क्लास टीचर 'मिस डे ' का ही ख्याल आता है. ,उनका गोल चेहरा और उसके ऊपर चेहरे जितना ही बड़ा और गोल जूडा याद आता है और पूरी क्लास में हर थोड़ी देर बाद उनकी गूंजती आवाज़ , 'फिंगर ऑन योर लिप्स " .इस से आगे कुछ याद नहीं

उसके बाद पिताजी का ट्रांसफर एक छोटे से शहर में हुआ था और हमारा दाखिला , एक आनंदमार्गी स्कूल में हुआ . जिसकी पढाई तो बहुत अच्छी थी ही, साथ ही रोज सुबह  छोटे छोटे बच्चों से मेडिटेशन करवाया जाता .(वह स्कूल पांचवीं कक्षा तक ही था )  हम सब आँखें बंद कर के बैठते और जब आँखें खोलते तो पाते सबकी दिशा बदल गयी है . स्कूल के दाढ़ी वाले प्रिंसिपल रोज कुछ अच्छी बातें सिखाते .  रोज सुबह उठकर माता-पिता को प्रणाम करने पर जोर देते . कुछ शैतान बच्चों पर जिनपर उन्हें भरोसा नहीं होता . उनके घर पर प्यून को भेज देते कि घर से पूछकर आओ, उसने प्रणाम किया है या नहीं. (छोटी जगह थी..छोटा स्कूल, जहां यह सब संभव था ). साथ ही, मांसाहार की बुराइयां बताकर शाकाहार पर जोर दिया जाता . शायद मेरे कच्चे मस्तिष्क पर उनकी बातों का कुछ ऐसा प्रभाव पडा कि मैं आज तक विशुद्ध शाकाहारी हूँ. (हालांकि मेरी चाची कहती हैं कि तीन साल की उम्र से ही मुझे नॉनवेज पसंद नहीं था ) जबकि मेरे घर में सब नॉनवेज के शौक़ीन थे और मुझे नॉनवेज खिलाने की बहुत कोशिश की जाती थी . इस वजह से मैंने न जाने घर की कितनी प्लेटें तोड़ी हैं .तब चीनी मिटटी के बर्तन में ही नॉनवेज परोसा जाता था .मैं बहाने से प्लेट ही टेबल से गिरा देती और फिर भाग जाती . जब आठवीं में होस्टल में गयी और अपना नाम शाकाहर खाने वालों में लिखवा लिया. तब जाकर घर वालों की इस कोशिश को विराम मिला.

इसके बाद एक साल हम गाँव के स्कूल में जाते रहे . सचमुच सिर्फ जाते ही रहे . वहाँ की पढाई के स्टैण्डर्ड से हम बहुत ज्यादा जानते थे ,इसलिए मैं और मेरा भाई बिना कुछ पढ़े ही क्लास में फर्स्ट आये. 
तब तक पिताजी नए शहर में व्यवस्थित हो गए थे और उनके ऑफिस के दो कर्मचारी वहाँ के स्कूल में हमें दाखिले के लिए ले गए . इस स्कूल की पढाई बहुत ही अच्छी थी और यहाँ के हेडमास्टर बहुत ही सख्त . उन्होंने हमारा टेस्ट लिया और मुझे सातवीं की बजाय पांचवी में और भाई को तीसरी कक्षा में एडमिशन देने को तैयार हुए . सिर्फ सबसे छोटे भाई को पहली कक्षा में दाखिला मिल गया था . हमारे लिए यह डूब मरने की बात थी . हम शर्म से सर झुकाए घर आ गए और आँगन में एक दीवार की तरफ मुहं कर के खड़े हो गए. पिताजी का ऑफिस पहली मंजिल पर था और ग्राउंड फ्लोर पर हमलोग रहते थे . उन्हें खबर मिली और वे धम धम करते सीढियां उतर कर आये . आज भी उन कदमों की धमक जैसे कानों में है. पहले तो मम्मी-पापा दोनों से हमें खूब डांट पड़ी फिर उनलोगों ने अपनी गलती भी समझी. पापा हेडमास्टर साहब से मिले और उन्हें आश्वासन दिया कि तीन महीने में अगर हम उस क्लास के स्तर तक नहीं पहुँच सके तो बेशक वे हमें निचली कक्षाओं में डाल दें . हमारा एडमिशन तो अपेक्षित कक्षाओं में हो गया पर उसके बाद जो हमारी रगड़ाई शुरू हुई . पिताजी मैथ्स ,इंग्लिश साइंस पढ़ाते , माताश्री हिंदी,  इतिहास, भूगोल  का घोटा लगवातीं . पर यह हम सबकी ज़िन्दगी का 'टर्निंग पॉइंट' था. इस से पहले हमारे पिताजी ने कभी हमारी पढाई में रूचि नहीं ली थी. अब तक हम दोनों अपनी अपनी क्लास में फर्स्ट आते रहे थे. इसलिए उन्होंने  कभी जरूरत भी नहीं समझी .पर उस वक़्त जो बच्चों को पढ़ाने में उनकी रूचि जागी वो अब तक कायम है .( अपने बच्चों की गरमी की छुट्टियों में जब मैं पटना जाती तो पापा रोज सुबह मेरे दोनों बेटे को मैथ्स और इंग्लिश पढ़ाते ).

इस पढ़ाई का नतीजा ये निकला कि फिर से छमाही परीक्षा में हम दोनों अपनी अपनी क्लास में प्रथम आये और हेडमास्टर साहब ,जिन्हें  हम ‘हेड सर’ कहते थे निस्संकोच हमारे घर पर विशेष रूप से माता- पिता से मिलने आये (शायद थैंक्स कहने )

‘हेड सर’ बच्चों की पढ़ाई में बहुत रूचि लेते थे . उन दिनों सातवीं कक्षा में जिला स्तर पर स्कॉलरशिप की परीक्षा होती और पूरे जिले में दो बच्चों को आगे पढने के लिए १०० रुपये मासिक (जो तब बड़ी रकम थी ) स्कॉलरशिप प्रदान किया जाता. हेड सर की ये कोशिश होती कि स्कॉलरशिप उनके स्कूल के बच्चों को ही मिले. और इसके लिए वे एक क्लास टेस्ट लेते और आठ-दस बच्चों को चुनकर ,उनकी अलग से पढाई लेते . मेरी क्लास में आठ बच्चों को चुना गया था ,छः लड़के और दो लडकियां . लड़कों में हरि, विनोद, विभूति के नाम याद हैं लड़कियों में, मैं और झूमा चटर्जी थे . हमारी कक्षाएं बरामदे में अलग से लगतीं . हमारा टाइम टेबल अलग होता .स्कूल के ही सारे टीचर क्लास लेते पर बिना एक रुपया भी अलग से चार्ज किये . (शायद तब कोई स्कूल फीस भी नहीं थी ) .
स्कॉलरशिप की परीक्षा भी दो स्तर पर होती . प्रीलिम्स और फाइनल . प्रीलिम्स में तो हम आठों निकल गए पर फाइनल में मैं ही सफल हो पायी. और फिर आठवीं से आगे की पढाई के लिए हॉस्टल  में चली गयी .

मेरे बाद भी शायद हर साल, इस स्कूल के ही बच्चों को स्कॉलरशिप मिलता रहा . तीन साल बाद मेरे भाई को भी मिला जबकि मेरे भाई की क्लास में ही हेड सर का बेटा भी था . पर उन्होंने बिना स्वार्थ के सभी छात्रों को समान रूप से शिक्षा प्रदान की .

पता नहीं, अब इतने समर्पित शिक्षक होते हैं या नहीं जो स्कूल के बच्चों को उन्नति करते देख ही खुश हो जाएँ . निस्स्वार्थ रूप से बस छात्रों का भविष्य उज्जवल बनाने का प्रयत्न करें. आस-पास के इलाकों का वह इकलौता मिड्ल स्कूल था . उस स्कूल की पढ़ाई अच्छी होती या खराब , उस स्कूल में बच्चे पढने आते ही. अगर ‘हेड सर’ इतना  अतिरिक्त मेहनत नहीं करते फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ता .पर वे अपने छात्रों को एक बेहतर भविष्य देने के लिए कटिबद्ध थे .

‘हेड सर’ ने हमारे पूरे परिवार को ही एक नयी दिशा दी . अगर वे हमें उस दिन एडमिशन दे देते (क्यूंकि पापा के ऑफिस के कर्मचारियों ने उनकी बहुत चिरौरी की थी, मेरे पक्ष में तो इतना तक कहा था कि ये तो लड़की है, इसकी शादी हो जायेगी, क्या फर्क पड़ता है,किसी क्लास में पढ़े, पर वे अपने निर्णय पर दृढ रहे )हमें  एडमिशन मिल जाता  तो हम भी जैसे-तैसे पढ़ाई करते रहते. पिताजी भी इतनी रूचि नहीं लेते और हो सकता है हम सबके जीवन की दिशा कुछ और ही होती .

‘हेड सर’ तो हमेशा ही याद आते हैं. आज शिक्षक दिवस पर उन्हें कोटिशः नमन

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

कहानी 'उलटबांसी', फिल्म 'सुनो अमाया ' और कुछ पोस्ट्स




शेखर सुमन ने जब फेसबुक पर लिखा कि फिल्म ‘सुनो अमाया ‘ देखते हुए उन्हें मेरी लिखी एक पोस्ट याद आयी तो ध्यान आया कि यह फिल्म तो देखने से रह ही गयी . भला हो इस भले लड़के का,उसने लिंक भी दे दिया और अच्छी फिल्मों (मेरी रूचि वाली ) की चट्टन मैंने उसी वक़्त वह फिल्म देख भी डाली . फिल्म की थीम उम्र की सांझ में अकेले पड़ गए स्त्री/पुरुषों के फिर से अपना साथी चुनने के विषय पर है .

कुछ संयोग ऐसा हुआ कि अगले ही दिन प्रसिद्द कथाकार राजेन्द्र यादव के जन्मदिन पर युवा लेखिका ‘कविता राकेश’ का एक  संस्मरण ‘जानकी पुल’ पर पढने को मिला. उस संस्मरण में कविता जी ने अपनी एक कहानी ‘उलटबांसी ‘ की चर्चा की है कि कैसे इस कहानी के कथानक को स्वीकारना सबके लिए मुश्किल हो रहा था क्यूंकि यह एक भरे -पूरे परिवार वाली उम्रदराज माँ ,जिनके बच्चे दूसरे  शहरों  में रहते हैं और जो अब अकेली पड़ गयी है ,के पुनः एक जीवनसाथी चुनने के निर्णय पर आधारित थी. पर फिर 'हंस' में यह कहानी प्रकाशित हुई और बहुत चर्चित रही और खूब सराही गयी. मुझे इस कहानी  को पढने की इच्छा हुई, कविता जी से इसके लिंक की फरमाइश की तो उन्होंने गूगल बुक्स पर उपलब्ध होने की बात  बतायी.

मैंने ढूंढ कर पढ़ी और इस कहानी ने जैसे निशब्द कर दिया. एक माँ जो अपने बच्चों को बड़ा करती है, उनके सुख-दुःख का ख्याल रखती है, उनके निर्णय में उनका साथ देती है पर जब बच्चे अपनी गृहस्थी में रम जाते हैं तो वह कितनी अकेली पड़ जाती है. बच्चे उसका ख्याल रखते हैं, पर उनके जीवन की अपनी उलझनें  हैं...और प्राथमिकताओं की सूची में माँ की जरूरतें सबसे नचले पायदान पर चली जाती हैं. माँ के मोतियाबंद का ऑपरेशन करवाना ,उनके जोड़ों के दर्द का इलाज टलता जाता है ...उनका झुक कर चलना,  उनके व्यक्तित्व का ही हिस्सा मान लिया जाता है.

बेटे-बेटियाँ अपने परिवार के साथ दर्शनीय स्थलों पर घूमने जाते हैं. माँ तस्वीरें देख कर ही कल्पना कर लेती है कि पहाड़ कितने ऊँचे होते होंगे...सागर की लहरें कैसे पैरों से टकराती होंगी.
ये कहानी जैसे सबको खुद से ही नज़रें चुराने पर विवश कर देती है .
 वही बीमार, नितांत अकेली पड़ गयी माँ, जब एक हमउम्र पुरुष के साथ शादी का फैसला करती है तो बेटों-दामाद  को नागवार गुजरता है. उन्हें अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा खतरे में पड़ती दिखती है. वे नाराज़गी जताते हुए, जैसे माँ से रिश्ता ही तोड़ कर चले जाते हैं. पर बेटी और पोती माँ के अकेलेपन के दर्द को समझती है और उनके फैसले में उनके साथ खड़ी होती है .
बहुत ही सशक्त कहानी है और कहानी में रूचि रखनेवालों को जरूर पढनी चाहिए.

फिल्म ‘सुनो अमाया’ में भी यही विषय है पर यहाँ मॉडर्न, स्वाभिमानी  बेटी जो अपने बॉस की
गलत हरकत पर उन्हें थप्पड़ मार कर नौकरी छोड़ देती है , माँ का यह फैसला स्वीकार नहीं कर पाती . जबकि माँ के उस पुरुष फोटोग्राफर मित्र से उसकी बहुत अच्छी जमती है . वह उनके साथ मिलकर एक किताब लिख रही है ,जिसमे उसके संस्मरण और उनकी खिंची तस्वीरें होंगी. पर जब अपनी माँ से उनकी दोस्ती का पता चलता है तो वह परेशान हो जाती है. पहनावे और बोलचाल में आधुनिक दिखने वाली यह लड़की अपनी सोच में उतनी ही पुरातनपंथी है . कहानी ‘उलटबांसी ‘ में मध्यम वर्गीय चालीस  वर्षीय बेटे और फिल्म में उच्च  वर्ग की बाईस-तेईस वर्षीया बेटी की प्रतिक्रया एक सी ही है , “अपने दोस्तों से क्या कहेंगे...कि माँ शादी कर रही है ?? “

फिल्म में माँ –बेटी के रिश्ते को भी बहुत खूबसूरती से उभारा गया है . बेटी माँ से नाराज़ हो जाती है , बात नहीं करती, उल्टा जबाब देती है, खाने के लिए पूछने पर कहती है , " मैं बड़ी हो गयी हूँ ..अपना ख्याल रख सकती हूँ ,जब मर्जी होगा खा लूंगी “ इस पर माँ कहती है , “तुम बड़ी हो गयी हो पर मैं तुम्हारी माँ ही रहूंगी, यह रिश्ता नहीं बदल सकता . जब जब गिरोगी तुम्हे उठाने आउंगी, ये अधिकार मुझसे कोई नहीं ले सकता “ साथ ही यह भी कह देती है..”मुझसे इज्जत से बात किया करो “ वह पुरातनपंथी माओं की तरह बेटी के हर नखरे चुपचाप बर्दाश्त नहीं करती . पर बेटी का रुख देखकर अपने पुरुष मित्र से शादी के लिए मना भी कर देती है . बाद में बेटी को भी अहसास होता है और वो माफ़ी मांग लेती है .

फिल्म में माँ का एक कैफे है (Book a coffee )वह  सक्षम है, व्यस्त रहती है. अपना ख्याल रख सकती है . उसके पास उसकी बेटी भी है .पति भी बहुत अच्छे थे , कोई कडवी यादें नहीं हैं . अच्छा समय बिताया था पर बारह साल से अकेली है और जब एक पुरुष से दोस्ती होती है तो आगे की ज़िन्दगी उनके साथ बिताना चाहती है क्यूंकि सिर्फ यादों के सहारे ज़िन्दगी नहीं बिताई जा सकती.

अविनाश कुमार सिंह द्वारा निर्देशित इस फिल्म में दीप्ती नवल, फारुख शेख, और बेटी के रूप में 'स्वरा भास्कर' ने बहुत ही सहज अभिनय किया है. लगता ही नहीं  फिल्म देख रहे हैं..लगता है सब कुछ सचमुच सामने घट रहा है .
फिल्म के अंत में यह भी दिखाते हैं कि फारुख शेख  ‘अल्जाइमर ' से पीड़ित हैं . (और दीप्ती नवल को यह बात मालूम है ) शायद यह सन्देश भी देना चाहते हैं कि जब उम्रदराज़ होने पर किसी रिलेशनशिप में जाएँ तो इस उम्र के साथ आने वाली बीमारियों के लिए भी मानसिक रूप  से तैयार रहें .
शेखर ने भी यहाँ फिल्म की बहुत अच्छी समीक्षा लिखी है

फिल्म में एक बात खटकी , यह एक हिंदी फिल्म है, हिंदी दर्शकों के लिए बनायी गयी है  . कैफे(Book a coffee ) में जहाँ कॉफ़ी के  साथ किताबें भी पढ़ी जा सकती  हैं . वहां सारी किताबें अंग्रेजी की हैं . क्या हिंदी किताबें पढने वाले ऐसी कॉफ़ी नहीं अफोर्ड कर सकते ? पात्रों  के बीच ज्यादातर बातचीत अंग्रेजी में ही दिखाई गयी है. पूरी फिल्म अंग्रेजी में भी बन सकती थी .जैसे 'लीला ' जैसी फ़िल्में बनायी गयी थीं .

ब्लॉग पर हम अपने मन की बात ,दिमाग में चल रही हलचल उतार कर भूल जाते हैं . शेखर ने ही जिक्र किया कि मैंने इस विषय पर आपकी कुछ पोस्ट्स  पढ़ी तो मुझे हैरानी हुई फिर देखा तो पाया हाँ, अक्सर इस विषय पर लिखती रहती हूँ क्यूंकि एक असहायपन का अहसास होता है. इनका दर्द हम देख सकते हैं, समझ सकते हैं पर कुछ कर नहीं सकते .

अधिकाँश बुजुर्ग तो इस अकेलेपन को अपनी नियति मान लेते हैं . पूजा-पाठ में मन लगाने की कोशिश करते हैं और जैसे दुनिया से वैराग्य ही ले लेते हैं . उनके बच्चे शौक से उन्हें घुमाने ले जाना चाहें ,उनके लिए आधुनिक सुख सुविधा की चीज़ें मुहैया करना चाहें तो इनकार कर देते हैं. उन्हें लगता है वे अपने बच्चों पर बोझ डाल रहे हैं जबकि बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी करना चाहते हैं .
हज़ारों में एकाध बुजुर्ग महिलाए/पुरुष ऐसे होते हैं जो ज़िन्दगी को एक दूसरी पारी का मौक़ा देना चाहते हैं तो उनके निर्णय का सम्मान करना चाहिए. समाज की चिंता करना  व्यर्थ है . क्यूंकि  समाज हमसे बना है , कोई समाज पहले से नहीं बना बनाया था कि हम उसमे शामिल हुए .वैसे भी जो लोग समाज की परवाह नहीं करते ,समाज भी उनके सामने घुटने टेकने में देर नहीं लगाता .

सोमवार, 26 अगस्त 2013

क्षमा करना कितना सही

"क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात "
 
"क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो "

"To err is human , to forgive is divine "

"Forgiveness is the virtue of the brave and the final form of love "

ये  सारी उक्तियाँ सुनने में बहुत ही प्रेरणास्पद लगती हैं . क्षमा अपने आप में एक महान चीज़ है, व्यक्ति के उदारमना होने का परिचय देती है, अपराधी को सुधरने का मौक़ा देती है. पर क्या गारंटी है कि अपराधी सुधर जाए ?? कई बार अपराधी इसे सामनेवाले की  कमजोरी भी समझ लेते हैं और फिर वे तो नहीं ही सुधरते बल्कि उन्हें यूँ कोई सजा पाते न देख आपराधिक प्रवृत्ति के दुसरे लोगों का भी हौसला बढ़ता है और उनका डर गायब हो जाता है ,फिर उन्हें भी कोई अपराध करने में हिचक नहीं होती .

अभी हाल में ही महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित शहर कहे जाने वाले मुंबई में एक वीभत्स घटना हुई .(जो सामने आयी वरना पता नहीं मुम्बई सहित कितने शहरों में रोज ऐसे कितने ही अपराध होते हैं और पता भी नहीं चलता ) पिछले दिसंबर में निर्भया के साथ हुए दर्दनाक हादसे और उसकी मौत से पूरे देश का गुस्सा उबल पड़ा था , लोग सड़कों पर  आ गए  थे . लेकिन उन अपराधियों को सजा देने की प्रक्रिया भेडचाल से चल रही है. ऐसा नहीं है कि मुम्बई में इस कुकृत्य को करने वाले इन अपराधियों ने देश का वो रोष नहीं देखा होगा . लोग सड़कों पर थे ,टी,वी चैनल्स हफ़्तों पूरे पूरे दिन इसका प्रसारण करते रहे फिर भी इन अपराधियों को ज़रा भी डर नहीं लगा . वे साथ में ये भी देख रहे थे कि नारों,धरनों और टी.वी. रिपोर्टिंग के आगे कुछ नहीं हो रहा . उन्होंने इस फोटो जर्नलिस्ट के पहले भी जाने कितनी ही लड़कियों के साथ ये अमानुषिक अत्याचार किया है. क्यूंकि इन्हें सजा पाने का कोई डर नहीं था . इन्हें विश्वास था कि लडकियां पुलिस में रिपोर्ट नहीं करेंगी. समाज में बदनामी का भय और पुलिस की नाकामी और हमारी धीमी न्याय प्रक्रिया ..इन अपराधियों के हौसले और भी बढ़ा देती है .

पिछली पोस्ट लिखते वक़्त मुझे दो घटनाएं याद आयीं जो इन बड़े बड़े अपराधों के समक्ष तो बहुत छोटी हैं पर अपराध की श्रेणी में तो आती ही हैं.
 

जब मैंने यह जिक्र किया था कि धीमी ट्रैफिक में मैंने कार का शीशा इसलिए नीचे नहीं किया क्यूंकि मंगलसूत्र छिन जाने का डर था ...उस वक्त दिमाग में कुछ ही दिनों पहले अखबार में पढ़ी एक घटना ताज़ा थी . फिल्म अभिनेता 'विद्युत जामवाल ' ट्रैफिक जैम में फंसे हुए थे और अपने कार का शीशा नीचे कर मोबाइल पर बातें कर रहे थे .तभी एक लड़का उनके हाथों से मोबाइल छीन कर भागा . आज के अभिनेताओं की तरह विद्युत् भी अच्छी  वर्जिश करते हैं और फिट हैं. उन्होंने उस लड़के का पीछा किया .लड़के का एक साथी मोटरसाइकिल पर सवार था , लड़का जैसे ही बाइक पर बैठने को हुआ विद्युत् ने उसे पकड़ लिया .उसे कुछ झापड़ रसीद किये .पब्लिक ने भी उसे मारना शुरू कर दिया. लड़का गिडगिडाने लगा और विद्युत् ने उसे माफ़ कर दिया ,पब्लिक से बचा कर उसे जाने दिया. विद्युत् का कहना है , "वह एक अच्छे घर का पढ़ा -लिखा लड़का लग रहा था. अंग्रेजी में बातें कर रहा था .उसे सुधरने का मौक़ा मिलना चाहिए "
पहली नज़र में विद्युत् जामवाल की बातें सही लगती हैं ,लेकिन क्या पता वो लड़का इसे एक थ्रिल समझे फिर से ऐसा करने का प्रयास करे. इस बार किसी ओवरवेट सज्जन का मोबाइल छीने जो उसे भाग कर नहीं पकड़ सकें. उसे अपने किये की कोई सजा तो नहीं मिली .

जब मैंने मॉर्निंग वाक पर जाने वाली महिलाओं के गले से चेन छीने जाने की घटना का जिक्र किया तो उसी से जुडी एक घटना याद हो आयी .तीन-चार साल पहले की बात है ,इस तरह की घटनाएं नयी नयी शुरू हुई थीं .एक दिन वॉक पर जाते वक़्त मैं गले की चेन उतारना भूल गयी. मेरी फ्रेंड ने कहा . उतार कर पर्स में रख लो ,मैंने वैसा ही किया .लौटते वक़्त सब्जी खरीदने के लिए छोटा सा पर्स हम साथ रखते थे . वॉक से लौटकर मैंने डाइनिंग टेबल पर पर्स रख दिया और दुसरे कामों में लग गयी . जब बाद में पर्स ढूँढा तो पर्स नहीं मिला. पर्स में छः सौ रुपये भी थे . इसके चार-पांच दिनों पहले कहीं जाते हुए मंगलसूत्र पहनना चाहा था तो वो भी नहीं मिला . मुझे लगा मैंने कहीं और रखा होगा . मैं इतनी कुशल गृहणी नहीं हूँ . हर चीज़ जगह पर नहीं रखती  और आलमीरा भी लॉक  नहीं करती. मैंने सोचा किसी और दराज में या किसी और डब्बे में रख दिया होगा. मेरी लापरवाही की एक और वजह है, इतने दिनों की गृहस्थी में मुझे हमेशा ईमानदार कामवालियां मिलीं थीं . बाथरूम में गिरा हुआ चेन उठा कर दे देतीं, इधर उधर पड़ी मेरी अंगूठियाँ, कड़े  उठा कर दे देतीं. जब मैं पटना जाती तो वहां भी वही आदत ,कहीं भी चीज़ें रख देतीं और माँ  कहतीं 'यहाँ की कामवालियां तुम्हारे मुम्बईवालियों की तरह ईमानदार नहीं हैं ' इसीलिए जब मंगलसूत्र नहीं मिला तो मुझे कामवाली पर शक नहीं हुआ. नयी कामवाली दस दिन पहले ही मेरे पास आयी थी . उसका पिता पिछले दस वषों से बगल की बिल्डिंग में वाचमैन था .उसकी माँ भी आस-पास के फ्लैट्स में काम करती थी इसलिए उसपर शक का कोई सवाल ही नहीं पर जब चेन भी नहीं मिला तो उसपर शक किये बिना गुजारा भी  नहीं. मैंने कबर्ड का कोना कोना..पूरा दराज, हर डब्बा खोल खोल कर देख लिया पर न तो चेन था न मंगलसूत्र . सोचा वो काम करने आएगी तो पहले काम करवा लूंगी ,फिर उस से पूछताछ करुँगी. पर इतना धीरज नहीं रहा . उससे पूछा और वो जोर जोर से चिल्ला कर कसमें खाने लगी...रोने लगी ..तरह तरह के दलील देने लगी. पर मेरा भी कहना था , 'उसके सिवा कोई बाहरी व्यक्ति घर में आया ही नहीं.' वो बाहर चली गयी , अपने पिताजी , माँ को लेकर आयी . उनका भी यही कहना था ,"ऐसा काम वो कर ही नहीं सकती " जब मैंने पुलिस की धमकी दी तो रोने लगी, "मेरे दो छोटे छोटे बच्चे हैं..पति ने छोड़ दिया है..बच्चों का क्या होगा " मेरे बेटे  भी उसका रोना देख द्रवित हो गए . अंकुर ने मुझे अलग बुलाकर कहा , "उस दिन तुमने मुझे पांच सौ दिए थे ..शायद उसी पर्स में से दिया होगा " मेरी झल्लाहट उनपर निकली ,"अकेला वही पांच सौ का नोट था घर में ??"
पूरे दिन ये चलता रहा ,वो, उसके भाई..माता-पिता आते रहे . {और झाडू-पोछा बर्तन मैं करती रही :(} आखिर उसने कहा , "आपने ही  घर में इधर उधर गिरा दिया होगा..ठीक से देखिये " मैं उसकी चाल समझ गयी .मैंने कहा," ठीक है तुम्ही देखो" तो उसने  कहा,"अब तो रात हो गयी..कल झाड़ू लगाकर देखती हूँ '

दुसरे दिन आते ही उसने झाडू उठाया .मैं जानबूझकर कमरे में नहीं गयी . थोड़ी देर बाद उसकी चिल्लाने की आवाज़ आयी.."भाभी देखिये..यहाँ चेन है.." कोने में एक थैला पड़ा था जिसमे कुछ कागज़ वगैरह रखे थे. उसी में से उसने चेन निकाल कर दे दिया. मुझे सुनाया भी.."आप खुद ठीक से नहीं रखतीं ...दुसरे का नाम लगाती हैं..आदि आदि " उस पर्स में से निकल कर उस थैले में चेन गिर जाने की कोई संभावना नहीं थी फिर भी मैं चुप रही..मैंने कहा.."देखो ऐसे ही कहीं मंगलसूत्र गिरा होगा..वो भी ढूंढो " पर पूरे घर में झाडू लगाने के बाद उसने झाडू पटका और जोर से ये कहती हुई कि " चेन की तरह मंगलसूत्र भी आपने  कहीं गिरा दिया होगा,शायद घर से बाहर गिराया हो  " चली गयी. फिर दुबारा उसने मेरे घर का रुख नहीं किया . कई बार मन में आया पुलिस में शिकायत करूँ फिर उसके  बच्चों का ख्याल कर रुक गयी. कुछ दिनों बाद सुनने में  आया आस-पास के फ्लैट्स से भी उसने पैसे ,बर्तन चुराए हैं .सबने उसे निकाल दिया . अब किसी नयी कॉलोनी में काम कर रही होगी .पर न तो उसे कोई सबक मिला  न उसकी आदतें सुधरीं . ये उसके  हक में भी अच्छा नहीं हुआ. इसी तरह हर जगह से काम छूट जाएगा तो भूखो मरने की नौबत आ जायेगी .

मेरे लिए तो और भी बुरा हुआ . उसकी झोपड़पट्टी में ये बात फ़ैल गयी . .बाद में जो कामवाली आयी ,उसने भी बड़ा आश्चर्य जताया ,अपने ईमानदार होने की  कसमे खाईं . उन दिनों मेरे कुछ बुरे ग्रह ही चल रहे थे .एक दिन ऐसे ही देर रात कंप्यूटर पर कुछ पढ़ते हुए इस अंगुली की  अंगूठी उस अंगुली में डाल रही थी और अंगूठी नीचे गिर गयी . टन्न से आवाज़ भी हुई . झुक कर देखा,नहीं मिला..सोचा अब इतनी रात में मेज खिसका कर क्या सबकी नींद खराब करूँ .दुसरे दिन मैंने  बाई के साथ ही टेबल खिसका कर ढूँढा पर मुझसे पहले शायद बाई को नज़र आ गयी . और अंगूठी नहीं मिली .

कुछ दिनों बाद ही  किसी फंक्शन में जाना था ,मैंने अपनी डायमंड इयररिंग्स उतार कर सौ रुपये के मैचिंग लम्बे इयररिंग्स पहने  . दुसरे दिन, घर पर कुछ गेस्ट आने वाले थे ,बहुत ही बिजी थी..उसी में जल्दी में पुरानी इयररिंग्स पहनी पर ठीक से उसका स्क्रू नहीं लगा और वो  घर में ही कहीं गिर गया . मैंने तो अगले दिन नोटिस किया तब तक झाडू-पोछा हो चुका था .दुबारा झाडू लगाकर ढूँढने की कोशिश की पर नहीं मिला.  कामवाली साफ़ नकार गयी . उसे डर तो था नहीं कि ये पुलिस में शिकायत कर देंगी . उसे लगा, इनके यहाँ तो आराम से चीज़ें ली जा सकती हैं .उन मैडम को भी अलविदा कहा . टचवुड उसके बाद से सब ठीक रहा है...मैं भी थोड़ी सतर्क हो गयी और अच्छी कामवाली भी  मिल गयी . लोगो ने ये कह कर भी डरा दिया था "सोना खोना बहुत बुरा होता है " पर सब ठीक ठाक ही है.

फिर भी कई बार ये ख्याल आता है अगर मैं पहली वाली बाई के साथ ही सख्ती बरतती तो शायद उसे मेरा मंगलसूत्र भी लौटाना पड़ता और दूसरी बाइयां भी मुझसे डर कर रहतीं कि इनके यहाँ से चोरी करके नहीं बचा जा सकता. उन्हें सबक मिलता तो उनकी आदतें भी सुधर जातीं .
 
क्षमा करने जैसी बात सुनने में बड़ी अच्छी लगती है ,पर जिन्हें क्षमा किया जाता है, उनका कुछ अच्छा नहीं होता .आखिर हम अपने बच्चों को भी छोटी छोटी बातों पर सजा देते हैं. 'होमवर्क नहीं किया, आज टी.वी. देखना बंद.' 'अपनी चीज़ें जगह पर नहीं रखीं ,.खेलने जाना बंद' .अपने बच्चों को हम अच्छा इंसान बनाना चाहते हैं ,उनकी गलतियां सुधारना चाहते हैं ,उनमें अच्छे गुण भरना चाहते हैं तो वैसे ही समाज के प्रति भी हमारा यही दृष्टिकोण होना चाहिए . उन्हें भी सुधारने की जिम्मेवारी हमारी ही है .

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