Wednesday, February 21, 2018

भावना शेखर की नजर में "काँच के शामियाने "

भावना शेखर एक प्रतिष्ठित कवयित्री , कहानीकार और शिक्षिका हैं । शहर दर शहर विभिन्न साहित्यिक आयोजनों में शिरकत करती हैं यानि कि अति व्यस्त रहती हैं। भावना को आराम से खरामा खरामा चलते शायद ही किसी ने देखा हो, भागती ही रहती हैं 
इतनी व्यस्तता के बीच भी इतवार की एक दोपहर 'काँच के शामियाने' के नाम कर दी और इतनी सारगर्भित टिप्पणी लिखी है ।
बहुत बहुत शुक्रिया,भावना 
काँच के शामियाने
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एक पेंडिंग फ़ाइल की तरह बार बार मुझे याद दिलाती यह किताब जिसके दो पन्ने ही पढ़ पाई थी... कल रात से आज दोपहर तक तीन सिटिंग में कांच के शामियाने के भीतर बाहर घूम आई। शुरू से अंत तक सचमुच काँच का फर्श, कांच की दीवारें और छत भी काँच की, यही तो रहा सदियों से औरत का जीवन...ज़माने की बेधती निगाहों से कितनी ही बार चटकता है, कितनी ही किरचें चुभती हैं, लहूलुहान तलवों से चलते जाना है अग्निपथ पर... उफ़ करने का अधिकार नहीं...आत्मा पर बैंडेज बांधकर एक मुखौटे के पीछे छिपा लेना है किस्मत के गूमड़ों को। पूरा उपन्यास एक औरत की पीड़ा का आख्यान है। जया की पीड़ा विवाह संस्था के भीतर घुटती आकांक्षाओं का दस्तावेज़ है। नाज़ों से पली बेटी पराए घर जाती है और तन मन झोंक देती है उस घर के दरोदीवार को अपनाने में पर उसके साथ हुआ पाशविक व्यवहार पाठक को उद्वेलित करता है और जया के धैर्य और सहनशीलता पर कई बार पाठक झुंझला भी उठता है। आज ऐसा कहाँ होता है.... पर होता है, आज भी होता है --- यही तस्वीर पेश करता है यह उपन्यास। औरत का जीवन मायके और ससुराल, इन दो किनारों के बीच बहती अनुशासित नदी सा है जिसे न तटबन्ध तोड़ने की आज़ादी मिलती, न कोई उसे नई धारा में फूटने का हौंसला बख्शता। अपनी सलीब खुद ही उठानी पड़ती है।
रश्मि रविजा ने कोई नई बात नहीं कही पर आज के नवलेखन में जब नए नए मुद्दों में यह मूल मुद्दे छूट रहे हैं, इस पौराणिक दर्द को बयां करना ज़रूरी है जो औरत की प्रगति के तिलस्मी आंकड़ों को तोड़ता है क्योंकि ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि औरत आज भी कांच के शामियाने में रह रही है। सदियों से पुरुष की सामंती वृत्ति के अंकुश तले दबी रहने को अभिशप्त हैं ग्रामीण, कस्बाई और शहरी स्त्रियाँ। लोकापवाद और समाज के उपालम्भ आज भी औरत को पंख नहीं खोलने देते।
रश्मि का सबसे बड़ा अस्त्र उसकी पात्रों के अनुरूप इस्तेमाल की गयी ठेठ आंचलिक भाषा है। जो समूचे कथानक को एक सच्चाई बख्शती है। आधी आबादी की सीधी सच्ची दास्तान पढ़ते हुए आंखों की कोर भीग भीग जाती है। किताब पढ़ते पाठक को अपने इर्द गिर्द किसी न किसी जया का अक्स उभरता दिखता है। यही कहानी की सफलता है। रश्मि रविजा ने औपन्यासिक शिल्प की चकाचौंध से परे मानवीय सम्वेदना को जगाने वाला एक सहज उपन्यास रचा है जो उनके अनायास सृजन के प्रतिफल सरीखा है। जिसे हाल में महाराष्ट्र सरकार का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ है। लेखिका को खूब बधाई और शुभकामनाएँ।

Wednesday, February 14, 2018

"काँच के शामियाने " को "महाराष्ट्र साहित्य अकादमी स्वर्ण पुरस्कार "

ब्लॉग से  ही मेरे लेखन की दूसरी पारी की शुरुआत हुई .कई कहानियाँ, उपन्यास सभी यहाँ लिखे .ब्लॉग पर ही किस्तों में लिखे "काँच के शामियाने' को पाठकों का बेशुमार प्यार मिला और सोने पर सुहागा, "महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी  का  जैनेन्द्र कुमार स्वर्ण पुरस्कार" पुरस्कार भी मिला. १७ जनवरी २०१८ को एक भव्य समारोह में सम्मान पत्र, पुरस्कार राशि का चेक, ,शाल एवं स्मृति चिन्ह से सभी पुरस्कार्र्थियों को समानित किया गया. 

अपनी  ख़ुशी ,उपलब्धि और गौरव के ये क्षण फेसबुक पर तो लिखा लेकिन  ब्लॉग पर सहेजना ही भूल गई थी .

पापा  ये आपके लिए .....
आपने ही बचपन से हमें,नंदन,पराग,धर्मयुग ,इलस्ट्रेटेड विकली जैसी पत्रिकाएँ पढने की आदत डाली. नोबल पुरस्कार प्राप्त कैंसर वार्ड, डॉक्टर ज़िवागो जैसी किताबें आप खरीद कर लाते थे. तब समझ नहीं आती थीं,फिर भी पढने की भूख हमसे पढवा ले जाती. आप कभी भी हमें गलत हिंदी नहीं  बोलने देते...अगर हम भाई बहन में से किसी ने स्त्रीलिंग पुल्लिंग में गलती की और आप तुरंत टोक देते, 'हवा बह रहा है यभ रही है?..."भूख लगा अहै या भूख लगी है " . आपके इस तरह सुधारते रहने का ही परिणाम था कि एक बार बस में मैं और बस में ही बनी एक  फ्रेंड खूब बातें कर रहे थे. पीछे बैठे कोई हिंदी के शिक्षक हमारी  बातें सुन रह थे. एक जगह जब बस रुकी और सब खाने पीने उतरे तो उन्होंने मुझे पास बुलाकर बोला, ' मैं इतनी देर से सुन रहा हूँ , तुमने एक बार भी गलत हिंदी या गलत उच्चारण  नहीं किया है " 
आपने शुरू से ही मेरी शिक्षा दीक्षा का विशेष ख्याल रखा, हॉस्टल में रख कर अच्छे स्कूल-कॉलेज में पढ़ाया पर आपके मन में कहीं मलाल था कि पढाई खत्म होते ही मेरी शादी कर दी, मुझे आगे बढ़ने के अवसर नहीं मिले. आपकी इच्छा थी मैं पटना वीमेंस कॉलेज में पढूँ, एडमिशन भी मिल गया था पर हॉस्टल तीन महीने बाद मिल रहा था. मैं वहाँ नहीं पढ़ पाई. मुझे लोगों ने बताया कि रिटायरमेंट के बाद जब आप पटना रहने लगे .ऑटो में कोई लड़की वीमेंस कॉलेज जाती मिल जाती तो आप उसे किराया नहीं देने देते .उस से कहते ,"मैं चाहता था मेरी बेटी यहाँ पढ़े, अब तुम मेरी बेटी सी ही हो."


सभी मिलने जुलने वालों को मेरा ब्लॉग,अखबार में छपी कोई रचना बड़े उत्साह से पढवाते और साथ में अफ़सोस भरे स्वर कहते,' उसमें बहुत पोटेंशियल था पर मैं उसे प्रोत्साहित नहीं कर सका.'
पापा ये छोटा सा जो कुछ अचीव किया है वो आपके द्वारा साहित्य में जगाई गई रूचि का ही परिणाम है. पुरस्कार मिलने की खबर से सबसे ज्यादा ख़ुशी आपको होती पर आप तो ऊपर से सब देख ही रहे हैं, हर पल हमारे साथ हैं . पुरस्कार मिलना,माँ का इस अवसर पर उपस्थित रहना ,सब आपके आशीर्वाद से ही संभव हुआ .
प्रणाम पापा



















Sunday, February 4, 2018

डिप्रेशन को भी एक आम बीमारी सा समझें

(फेसबुक पर यह पोस्ट बहुत लोगों ने पढ़ी,इसपर अछा विमर्श किया और कई लोगों ने शेयर भी किये ,लगा इसे ब्लॉग पर सहेज लेना चाहिए )


एक फ्रेंड है, जो फेसबुक पर एक्टिव हैं,पर सिर्फ पढ़ने के लिए । उन्होंने डिप्रेशन पर कुछ लिख कर मुझे भेजा है कि मैं इसे अपनी वाल पर शेयर करूँ। बहुत जरूरी और सटीक बातें लिखी हैं,उन्होंने।आज समाज में डिप्रेशन के विषय में जागरूकता अतिआवश्यक है ।
उन्होंने देवनागरी के साथ रोमन का भी प्रयोग किया है ,जिसे मैंने यथावत रहने दिया है ।
Depression,एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में हमारा भारतीय समाज कभी खुलकर बात नहीं करता।यूं तो अधिकतर cases मे रोगी खुद ये स्वीकार करने को तैयार नहीं होता कि वो depressed है,और कहीं अगर कोई अपनों से इसका ज़िक्र करता भी है तो उसे परिवार वाले ही कहते हैं कि दिमाग पर control रखो,खुद को व्यस्त रखो आदि आदि । ये कहते हुए उन्होने कभी ये नहीं सोचा होता है कि दिमाग पर control भला करना पड़ता है क्या?क्या thyroid का कोई रोगी thyroxin hormone को control मे रहने को कह सकता है,BP का रोगी अपने BP को control मे रख सकता है भला? ।ये एक mental illness है,और अन्य बीमारियों की तरह ही हमारा इसपर कोई control नहीं हो पाता । जैसे हम BP Sugar,Cholestrol आदि अन्य बीमारियों से ग्रसित हो सकते है, उसी तरह depression के भी शिकार हो सकते है।
मतलब ये कि हर बीमारी का अपना एक अलग इलाज़ है। और हाँ, लोगों के पास उन्हे उसे न छिपाने का एक सम्मानजनक कारण भी। फिर जब हमारे यहाँ लोग depress होते हैं तो हम समाज को ये क्यों नहीं कह पाते,कि हाँ ये बीमार हैं और हम doctor/psychiatrist से मिल रहे हैं। अगर कोई depressed है और उसके परिवार ने सही समय पर इसे पहचान लिया और accept भी कर लिया तो ये रोगी के लिए बहुत अच्छा है। पर रोगी की समस्या यही खत्म नहीं हो जाती ,हाँ कम से कम उन्हे उनलोगों की तरह नहीं जीना पड़ता जिसके परिवार मे ही उसकी ये बीमारी स्वीकार्य नहीं है और वो बिना दवा के अपने दिमाग को control मे रखकर जीने या यूं कहें घुटघुटकर जीने को बाध्य है।
वैज्ञानिकों के अनुसार Brain मे serotonin नाम का एक chemical होता है जो brain में दो cells के बीच neuro transmitters की तरह कार्य करता है। यह mood balance,याददाश्त भूख आदि के लिए ज़िम्मेवार होता है। उनका मानना है कि serotonin के असंतुलन की वजह से डिप्रेशन होता है। हालांकि इसको लेकर वैज्ञानिक sure नहीं हैं की इसकी कमी से डिप्रेशन होता है या डिप्रेशन की वजह से serotonin कम हो जाता है क्योकि brain के अंदर serotonin लेवेल की जांच हो पाना अभी तक संभव नहीं हुआ है।

Doctors के अनुसार इस बीमारी मे रोगी का दिल किसी काम मे नहीं लगता।थकान,कमजोरी नींद व भूख की कमी होती हैं। रोगी उदास व अकेला महसूस करता है साथ ही जीने की इच्छा न होना व suicidal attempt जैसे लक्षण भी होते हैं।शुरुआत मे अगर हम इस रोग को पहचान लें तो psychotherapy जिसे talk therapy भी कहते है से काम बन सकता है।इसमे psychologist रोगी के साथ बात कर उन्हे उनकी बीमारी का अहसास दिलाते हैं।रोगी को stress न लेने और अपने mood swings को (जो उनकी बीमारी की अहम वजह होती है) समझने को कहा जाता है। साथ ही उन्हे ये समझाया जाता है की जो चीज उन्हे परेशान कर रही है उसका कैसे सामना कर सके या उससे निजात पा सके।और सबसे अहम बात कि psychologist पहले उन्हे समझते है,बिना निर्णायक बने।लेकिन कई मामलों मे जब रोगी को दवा की जरूरत होती है ,तो psychiatrist के सलाहनुसार उन्हे antidepressant medicine लेना पड़ता है।

आज हमारे देश मे लगभग 40 प्रतिशत लोग डिप्रेशन के शिकार हैं।हालांकि world health organisation जैसी संस्थाएं लोगो को जागरूक बनाने के लिए अपने तरीके से काम कर रही है। अभी हाल मे ही उन्होने let’s talk depression campaign किया है ,पर छोटे शहरों और गावों मे इसके प्रति सजकता लाना जरूरी है।doctors को इस बीमारी के प्रति सजगता लाने के लिए आगे आना चाहिए। साथ ही depressed patient के परिवार को को भी इस बीमारी को छिपाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए,ताकि रोगी खुद को अलग न समझे। साथ ही उनके बात करने से समाज में उनके आसपास कोई और, जो इसी बीमारी से जूझ रहा हो लेकिन समझ नहीं पा रहा हो कि वो बीमार है उसे भी दिशा मिले,और वो भी अपना इलाज कराने की सोच सके!आए दिन हम किसी न किसी जगह से depression से suicide कर लेने वाली घटना के बारे में सुनते है।अगर depression को लेकर एक बेहतर सोच बनाई जाए व depressed लोगों के लिए हमारे परिवार workplace व समाज मे बेहतर माहौल बन सके तो शायद ऐसे घटनाएँ न हो।come on, let’s talk ,let’s act!
(इस पोस्ट पर आये कमेंट्स ) 
बीनू भटनागर :  रश्मि मै मनोविज्ञान में ऐम ए हूं और ख़ुद अवसाद या डिप्रैशन से गुज़री हूं। डिप्रैशन के लिये दवाइयों की ज़रूरत पड़ती है पर सायकौथैरैपी भी कम महत्व नहीं रखती। मेरा लेखन सायकौथैरैपी सैशन में ही शुरू हुआ। सायकॉलजिस्ट और सायकेट्रिस्ट दोनों के काम अलग है। मैने Anxiety disorder, bipolar disorder, OCD, dysylaxia, attention deficit hyper activity तथा और कुछ सामान्य मनोरोगों के बारे में जागरूकता लाने के लिये बहुत लेख लिखे है। कोई चाहे तो लिंक दे सकती हूं पर हम लोग हमेशा इसे नकारने के आदी है किसी से चिकित्सा लेने को कहो तो वो बुरा मान जाता है। बहुत संकीर्ण सोच है। मैने तो अपनी पहली किताब की भूमिका में भी इसका जिक्र किया था।

सक्सेना : आर्ट ऑफ लिविंग के प्रणेता श्री रविशंकर ने प्राणायाम तथा ध्यान को हर मनोवैज्ञानिक समस्या का समाधान बताया है । वे सुझाते हैं कि प्रसन्नता किस प्रकार हमारे जीवन का अंग बने । हम वर्तमान में कैसे जियें । 

प्राणायाम तथा ध्यान से देह की अंतस्रावी ग्रंथियाँ को सक्रिय बनाया जा सकता है इसमें सन्देह नहीं । स्राव ठीक तरह से होते रहें तो किसी औषध की आवश्यकता ही नही पड़ेगी ।

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बीनू भटनागर :  योग से फायदा होता है पर हर मनोरोग बिना दवा केठीक नहीं होता।reactive depression ठीक हो सकता है clinical depression नहीं ठीक होगा।

नीलू नीलपरी : सही लिखा है रश्मि आपकी दोस्त ने। मैं भी साइकोलॉजी में एमएससी हूँ, साइकोलोजिस्ट और खुद भी डिप्रेशन और suicide attempt कर साइकेट्रिस्ट की मदद से उस अवसाद की स्थिति से निकली हूँ। अब मेरा बेटा भी adhd और डिप्रेशन की ट्रीटमेंट ले रहा है। इनमें साइकेट्रिस्ट और साइकोलोजिस्ट के साथ साथ परिवार, सहकर्मी, मित्रों का साथ भी बहुत ज़रूरी है, नहीं तो अवसाद कब सुसाइड और अन्य mental illnesses में बदल जाये कह नहीं सकते। अपनी प्रॉब्लम करीबी व्यक्तियों से शेयर करने से, बात करने से ही इलाज की राह पर जाय जा सकता है। जो भी ट्रीटमेंट हो साइकेट्रिस्ट की देखरेख में ही दवा, काउंसलिंग, मैडिटेशन सब चलना चाहिए। otc यानी केमिस्ट से खुद से दवा लेकर, या किसी अन्य पेशेंट की दवा को खुद पर आजमाना रोग को बढ़ा सकता है, इससे बचना चाहिए। यह केमिकल imbalance ही है जो ठीक हो जाता है, जैसे विटामिन की कमी विटामिन की गोलियों और उचित खानपान से ठीक होती है। छुपाने जैसी कोई बात नहीं इसमें। रोग है ठीक होता है 100%.

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सुरेश चन्द्र उपाध्याय ;इसके अतिरिक्त मैंने एक पत्रिका में पढा कि होम्योपैथी का आरिटैनम अचूक दवा है, जिसे आयुर्वेद में स्वर्ण भस्म कहा है। 
इसके अलावा दोनों समय पसीने आने तक कसरत भी जरुरी है। मैंने शाइजोफ्रेनिया मरीज को कसरत और अच्छी खुराक़ से ठीक होते देखा है। 
कसरत सबसे अधिक प्रभावी उपाय है। साथ ही भारतीय शास्त्रीय संगीत का नियमित सुनना, गाना, बजाना असरकारक है। मेरे दो साथियों पर पडे प्रभाव को देख रहा हूँ। नींद आने लगी है, डिप्रैशन बिलकुल नहीं है,आत्मविश्वास बढ गया है कसरत टुकडों में हो तो भी असरकारक


अनजानी राह

अनिमेष ऑफिस से एक हफ्ते की छुट्टी लेकर अपने घर आया हुआ था . निरुद्देश्य सा सड़कों पर भटक रहा था .उसे यूँ घूमना अच्छा लगता . जिन सड़कों ...