Wednesday, July 12, 2017

बादल, बारिश एवं सखियों संग भंडारधारा की सैर

पिछले कुछ वर्षों से बारिश में सहेलियों के साथ एक पिकनिक हो ही जाती है ।पर इस बार की पिकनिक कुछ अलग थी ,पहले हमारा खाना पीना किसी रिसॉर्ट में होता था ।पर इस बार साथ में ही महाराज , रसद और बर्तन लेकर चल रहे थे ।मुम्बई से 185 किलोमीटर दूर एक हिल स्टेशन है , 'भंडारधारा ' शिरडी से बहुत पास ।वहाँ ढेर सारे छोटे बड़े झरने हैं, दो सौ साल पुराना डैम है, झील है, आस पास बिखरे बादल हैं और आँखों को सुकून पहुंचाती दूर तक फैली हरीयाली है ।

सुबह छः बजे हमलोग निकले ।जाहिर है नाश्ता रस्ते में ही करना था ।करीब आठ बजे शाहपुर के पास एक खाली जगह देख बस रुकी और महाराज ने गरमागरम उपमा और चाय बनाई ।केवल दूध में कुछ लेमन ग्रास की पत्तियां उबाल 'उकाला' भी बना ।मैंने दोनों ट्राई किये ,पर अपनी चाय ही बेहतर :)
इस बार बस में खेली गई अंत्याक्षरी भी अलग थी।एक शब्द पर अटक जाने पर एक ग्रुप ने कहा ,'मराठी गाना' चलेगा ? और फिर जहाँ हिंदी गाने याद नहीं आते वहां कन्नड़, गुजराती , तुलु में गाने गाये गए ।मैंने भी अपनी यादों के पिटारे में से 'ग' से सारे गाने खत्म हो जाने के बाद एक भोजपुरी गीत सुनाया पर थोड़ी चीटींग करके :)।'हे गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो ' का हे गायब कर दिया :D ।अकेली हिंदी भाषी थी, इसलिए कोई पकड़ नहीं पाया :)।एक सत्तर से ऊपर की आंटी ने पुराने गाने गा कर अपने ग्रुप को कई बार बचाया । 'मैं बन की चिड़िया बन में बोलूं रे ' जैसे गीत कब से नहीं सुने थे। योगा क्लास की पिकनिक थी,जिसमें चौबीस से लेकर सत्तर वर्ष की महिलाएं शामिल थीं ।

भंडारधारा पहुँच कर वहां से एक गाइड साथ हो गया और गाइड के घर पर ही खाना बनाने के लिए महाराज अपने साजो सामान सहित उतर गए ।घर के पास ही एक छोटी सी लड़की कुएं की जगत पर चढ़कर पानी भरे जा रही थी ।ट्राई करने की सोची पर फिर जाने दिया ,कॉन्फिडेन्स ही नहीं था :(
बस से हम देर तक घूमते रहे ।आर्थर लेक , विल्सन डैम , नेकलेस वाटर फॉल, नैनी वाटर फॉल, रांधा वाटर फॉल , अम्ब्रेला वाटर फॉल ,रिवर्स वाटर फॉल ,अमृतेश्वर मन्दिर यहाँ के मुख्य दर्शनीय स्थल हैं ।रिवर्स वाटर फॉल में पानी तेजी से नीचे गिरता है , फिर उसकी फुहारें ऊपर की तरफ आती हैं ।

अमृतेश्वर मन्दिर में शिव लिंग पानी के अंदर ही है ।कहते हैं ,यह प्रवरा नदी का उद्गम स्त्रोत है ।कथा है कि अगस्त्य मुनि ने एक वर्ष तक इस पहाड़ पर सिर्फ हवा और पानी के सहारे तपस्या की थी और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने गंगा की एक धारा प्रदान की जिसे प्रवरा नदी के रूप में जाना जाता है ।
घूमते हुए चार बज गए और सबका भूख से बुरा हाल था ।गाइड के घर वापसी हुई ।खपरैल की छत और मिटटी की दीवारों वाला एक साफ़ सुथरा घर था ।एक बड़े से कमरे में चटाई बिछा हमें बिठाया गया ।ईश्वर ने सोचा , हमें पूरा ही गंवई अनुभव हो और बिजली चली गई ।दो ढिबरी जलाई गई ।सब कहने लगीं, हम कैंडल लाइट लंच कर रहे हैं। तब मैंने बताया,' इसे ढिबरी कहते हैं' ।एक ने बताया ,'हमलोग इसे चिमनी कहते हैं' ।छोले ,ढोकला,गुलाब जामुन , चावल दाल और कढ़ाई से उतरती गरम गरम पूरियां ।जम कर खाने के बाद हम गांव में ही इधर उधर घूमने चले गए ।खेतों में घुटने तक रंग बिरंगी साड़ियाँ बांधे और चटाई और बोरे से बना तिकोना रेनकोट ओढ़े महिलायें धान रोप रही थीं ।एक किसान दो बैलों को हांकते कंधे पर हल रखे लौट रहा था ।एक शहरी लड़की ने उमग कर कहा , 'ए देखो बैलगाड़ी '।उसे करेक्ट किया, 'ये हल है' ।वो भी झेंप गई , बोली 'वो दो बैल देखते ही बैलगाड़ी ही ध्यान में आता है' ।ढेर सारी बकरियों को हांकते दो किशोर लड़के चले आ रहे थे ।जगह जगह छोटे छोटे बच्चे, जंगली फूल लिए बेचने के लिए खड़े थे ।पर मैं इन सबकी तस्वीर नहीं ले सकी ।कैमरा घर पर ही छूट गया था और फोन की बैटरी डाउन :(

वापसी में धुंध ,ट्रैफिक का सामना करते चाय पीने , खाने के लिए रुकते हुए, घर पहुँचने में रात के साढ़े बारह बज गए ।पर सब कुछ घर के आस पास ही तो नहीं मिलेगा ।थोड़ी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी ।