Wednesday, July 12, 2017

बादल, बारिश एवं सखियों संग भंडारधारा की सैर

पिछले कुछ वर्षों से बारिश में सहेलियों के साथ एक पिकनिक हो ही जाती है ।पर इस बार की पिकनिक कुछ अलग थी ,पहले हमारा खाना पीना किसी रिसॉर्ट में होता था ।पर इस बार साथ में ही महाराज , रसद और बर्तन लेकर चल रहे थे ।मुम्बई से 185 किलोमीटर दूर एक हिल स्टेशन है , 'भंडारधारा ' शिरडी से बहुत पास ।वहाँ ढेर सारे छोटे बड़े झरने हैं, दो सौ साल पुराना डैम है, झील है, आस पास बिखरे बादल हैं और आँखों को सुकून पहुंचाती दूर तक फैली हरीयाली है ।

सुबह छः बजे हमलोग निकले ।जाहिर है नाश्ता रस्ते में ही करना था ।करीब आठ बजे शाहपुर के पास एक खाली जगह देख बस रुकी और महाराज ने गरमागरम उपमा और चाय बनाई ।केवल दूध में कुछ लेमन ग्रास की पत्तियां उबाल 'उकाला' भी बना ।मैंने दोनों ट्राई किये ,पर अपनी चाय ही बेहतर :)
इस बार बस में खेली गई अंत्याक्षरी भी अलग थी।एक शब्द पर अटक जाने पर एक ग्रुप ने कहा ,'मराठी गाना' चलेगा ? और फिर जहाँ हिंदी गाने याद नहीं आते वहां कन्नड़, गुजराती , तुलु में गाने गाये गए ।मैंने भी अपनी यादों के पिटारे में से 'ग' से सारे गाने खत्म हो जाने के बाद एक भोजपुरी गीत सुनाया पर थोड़ी चीटींग करके :)।'हे गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो ' का हे गायब कर दिया :D ।अकेली हिंदी भाषी थी, इसलिए कोई पकड़ नहीं पाया :)।एक सत्तर से ऊपर की आंटी ने पुराने गाने गा कर अपने ग्रुप को कई बार बचाया । 'मैं बन की चिड़िया बन में बोलूं रे ' जैसे गीत कब से नहीं सुने थे। योगा क्लास की पिकनिक थी,जिसमें चौबीस से लेकर सत्तर वर्ष की महिलाएं शामिल थीं ।

भंडारधारा पहुँच कर वहां से एक गाइड साथ हो गया और गाइड के घर पर ही खाना बनाने के लिए महाराज अपने साजो सामान सहित उतर गए ।घर के पास ही एक छोटी सी लड़की कुएं की जगत पर चढ़कर पानी भरे जा रही थी ।ट्राई करने की सोची पर फिर जाने दिया ,कॉन्फिडेन्स ही नहीं था :(
बस से हम देर तक घूमते रहे ।आर्थर लेक , विल्सन डैम , नेकलेस वाटर फॉल, नैनी वाटर फॉल, रांधा वाटर फॉल , अम्ब्रेला वाटर फॉल ,रिवर्स वाटर फॉल ,अमृतेश्वर मन्दिर यहाँ के मुख्य दर्शनीय स्थल हैं ।रिवर्स वाटर फॉल में पानी तेजी से नीचे गिरता है , फिर उसकी फुहारें ऊपर की तरफ आती हैं ।

अमृतेश्वर मन्दिर में शिव लिंग पानी के अंदर ही है ।कहते हैं ,यह प्रवरा नदी का उद्गम स्त्रोत है ।कथा है कि अगस्त्य मुनि ने एक वर्ष तक इस पहाड़ पर सिर्फ हवा और पानी के सहारे तपस्या की थी और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने गंगा की एक धारा प्रदान की जिसे प्रवरा नदी के रूप में जाना जाता है ।
घूमते हुए चार बज गए और सबका भूख से बुरा हाल था ।गाइड के घर वापसी हुई ।खपरैल की छत और मिटटी की दीवारों वाला एक साफ़ सुथरा घर था ।एक बड़े से कमरे में चटाई बिछा हमें बिठाया गया ।ईश्वर ने सोचा , हमें पूरा ही गंवई अनुभव हो और बिजली चली गई ।दो ढिबरी जलाई गई ।सब कहने लगीं, हम कैंडल लाइट लंच कर रहे हैं। तब मैंने बताया,' इसे ढिबरी कहते हैं' ।एक ने बताया ,'हमलोग इसे चिमनी कहते हैं' ।छोले ,ढोकला,गुलाब जामुन , चावल दाल और कढ़ाई से उतरती गरम गरम पूरियां ।जम कर खाने के बाद हम गांव में ही इधर उधर घूमने चले गए ।खेतों में घुटने तक रंग बिरंगी साड़ियाँ बांधे और चटाई और बोरे से बना तिकोना रेनकोट ओढ़े महिलायें धान रोप रही थीं ।एक किसान दो बैलों को हांकते कंधे पर हल रखे लौट रहा था ।एक शहरी लड़की ने उमग कर कहा , 'ए देखो बैलगाड़ी '।उसे करेक्ट किया, 'ये हल है' ।वो भी झेंप गई , बोली 'वो दो बैल देखते ही बैलगाड़ी ही ध्यान में आता है' ।ढेर सारी बकरियों को हांकते दो किशोर लड़के चले आ रहे थे ।जगह जगह छोटे छोटे बच्चे, जंगली फूल लिए बेचने के लिए खड़े थे ।पर मैं इन सबकी तस्वीर नहीं ले सकी ।कैमरा घर पर ही छूट गया था और फोन की बैटरी डाउन :(

वापसी में धुंध ,ट्रैफिक का सामना करते चाय पीने , खाने के लिए रुकते हुए, घर पहुँचने में रात के साढ़े बारह बज गए ।पर सब कुछ घर के आस पास ही तो नहीं मिलेगा ।थोड़ी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी ।        
































Friday, June 30, 2017

लाहुल स्पीती यात्रा (1 )

काफी दिनों बाद कोई ब्लॉगपोस्ट लिख रही हूँ. शुरुआत करने से पहले एक बार फिर अपने ब्लॉग पाठकों का शुक्रिया अदा कर दूँ। लेखन की दूसरी पारी ,आप सब पाठकों के उत्सावर्द्धन से ही जारी रही...कहानियाँ लिखते,उपन्यास भी छप गया। कुछ यात्रा वृत्तांत काफी दिनों से लिखना चाह रही थी ,पर टलता जा रहा था। अब ब्लॉग वापसी हुई है तो सोचा, किस्तों में वही लिख डालूँ। पढ़ने वाले होते हैं तो लिखने का भी दिल करता है। तो भूमिका ज्यादा लंबा न खींचते हुए ,ले चलती हूँ आप  सबको 'लाहुल स्पीति' की सैर पर।

मुझे पहाड़ घूमने का मन था ,पर जानी सुनी , भीड़ भरी जगहों पर नहीं। मुझे एक मित्र ने 'लाहुल स्पीति ट्रिप' सुझाया। इसके पहले मैंने यहाँ का नाम भी नहीं सुना था। फिर तो इंटरनेट खंगाला गया ,काफी कुछ पढ़ा और ग्यारह दिनों की ट्रिप प्लान कर ली।  'लाहुल स्पीती' हिमाचल प्रदेश में स्थित दो जिलों का नाम है ,जिन्हें पहाड़ों का रेगिस्तान भी कहा जाता है..करीब  15000 फीट पर स्थित यह भारत की चौथी सबसे कम आबादी वाली जगह है. यहाँ सिर्फ ऊंचे पहाड़, नदियाँ, झरने मिलने वाले थे. हमारी यात्रा के पड़ाव थे ,चंडीगढ़- नारकंडा- सराहन- सांगला- चिट्कुल-काल्पा- टाबो- काज़ा - चंद्रताल - मनाली- चंडीगढ़। हमने सब जगह होटल की बुकिंग कर दी।

मुंबई से चंडीगढ़ की सुबह की फ्लाइट थी। मुंबई की ट्रैफिक से तो सभी वाकिफ हैं। सुबह ऑफिस जाने वालों का रश भी होता है. लिहाजा हम मार्जिन लेकर चले थे फिर भी हमारे 'ओला कैब' का ड्राइवर धीमा था या उस दिन ट्रैफिक ही ज्यादा थी पता नहीं. पर हम बहुत लेट हो गए. बोर्डिंग बंद हो चुकी थी। जेट एयरवेज के कर्मचारी किसी तरह भी नहीं मान रहे थे। जब हमने काफी रिक्वेस्ट की तो उस लड़की ने अपने किसी सीनियर से बात कर कहा कि 'आपलोग जा सकते हैं पर आपका सामान नहीं जा पायेगा।  कोई छोड़ने आया है तो उनके हाथ घर भिजवा दीजिये।' कितनी अजीब सी बात है, बिना सामान हम कैसे जाते। फिर थोड़ा मक्खन लगाया तो उसने कहा, 'अच्छा दोपहर की फ्लाइट से भेज देंगे।' किसी के कुछ कहने से पहले ही मैंने हामी भर दी। चंडीगढ़ से हमें तुरंत ही निकल जाना था और शिमला होते हुए 182  किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 'नारकंडा' पहुंचना था। दोपहर को निकलते तो मुश्किल होती पर और कोई चारा ही  नहीं था। उस लड़की ने एक दूसरे कर्मचारी को बुलाया और हमें उसके सुपुर्द कर दिया। वो लड़का हमें दौड़ाते हुए बिना किसी क्यू में लगे,सिक्योरिटी चेक करवा बाहर तक ले गया। वहाँ उसने जेट एयरवेज़ के एक सूमो को इशारे से बुलाया और एयरक्राफ्ट तक ले जाने के लिए कहा. एक आदमी प्लेन के नीचे इंतज़ार में खड़ा था।  हमे देखते ही बोला ..."हरी अप ,वी वर वेटिंग फॉर यू " .एयरक्राफ्ट के अंदर गई तो पाया एयरहोस्टेस ,'सुरक्षा निर्देश ' देने की तैयारी कर रही थी और सबलोग हमें घूर रहे थे कि 'कौन हैं ये लेटलतीफ लोग ' . मन कृतञता  से भर गया था और मैंने सोचा था ,जेट एयरवेज़ के वेबसाइट पर जाकर एक धन्यवाद ज्ञापन लिखूंगी। पर लौटते वक्त उनके व्यवहार ने ऐसा मन खट्टा किया कि मैंने थैंक्यू नोट लिखना कैंसल कर दिया.
शिमला 

चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर हम टकटकी लगाए देख रहे थे कि शायद हमारा सामान आ गया हो। और जब काफी देर बाद हमारा बड़ा सा बैग नज़रों की ज़द में आया तो सारी  मायूसी काफूर हो गई.  हमने एक इनोवा बुक की थी , जो हमें चंडीगढ़ एयरपोर्ट से रिसीव कर सारी जगहें घुमा फिर चंडीगढ़ छोड़ जाने वाली थी । बाहर ड्राइवर इंतज़ार में ही था। एक मेजदार बात हुई. मेरे साथ ही एक महिला अपनी ट्रॉली धकेलते हुए जा रही थी...जब हमारी नज़रें मिलीं तो अनजान होते हुए भी हम दोनों एक दूसरे को देख खुल कर मुस्करा दिए, 'हम दोनों ने बिलकुल एक जैसा टॉप पहना हुआ था :) .मुंबई के एक ही स्टोर से खरीदा होगा. 

पर हमारी परेशानी खत्म नहीं हुई थी। अभी हम थोड़ी ही दूर गए थे कि पुलिसवालों ने गाड़ी रोक पेपर दिखाने को कहा. शायद टैक्स नहीं भरा था और उन्होंने गाडी रोक दी। ड्राइवर ने ट्रैवल एजेंसी के मालिक को फोन किया।  अब जब तक वे आते हम सड़क के किनारे चहलकदमी कर तस्वीरें और सेल्फी खींचते रहे। पर भूखे प्यासों की तस्वीर इतनी बुरी आई कि सब डीलीट कर दिए. कार के मालिक के आने और पुलिस वालों से रिश्वत की हील हुज्जत में पूरे दो घंटे बर्बाद हो गए। हमारे शिकायत करने पर उनका कहना था ,'सिर्फ एक दिन लेट हुआ और बैडलक है कि पुलिसवालों ने पकड़ लिया ' (गोया ये उनका नहीं हमारे खराब ग्रह का दोष था ) आगे जाकर एक छोटे से रेस्त्रां में भरपेट तंदूरी रोटी और पनीर टिक्का मसाला खाय तो जान में जान आई.


शिमला में एंटर करते ही घुमावदार सड़कें, लाल, हरे  रंग  वाली टीन की छतें, ऊँचे चीड़ के वृक्ष और उनके पार पर्वतों की चोटियां मन मोह ले रही थीं।  शिमला पहुँचते अँधेरा घिर  आया. शिमला से हमें गर्म कपड़े खरीदने थे।  आगे 'रोहतांग पास' वगैरह में मौसम ठंढा होने वाला था और हम मुम्बईकर के पास गरम कपडे होते  नहीं. मेरा हॉलिडे का मूड, ठंढी हवा,  शिमला की पतली गालियां, छोटी दुकानें, लाल लाल गाल वाले प्यारे से बच्चे। सब कुछ इतना  खुशनुमा लग रहा था कि मन हो रहा था, खरामा खरामा चलती रहूं पर ड्राइवर बार बार फोन कर रहा था कि हमें नारकंडा पहुंचते बहुत रात हो जायेगी, पहाड़ी रास्ता है...और रास्ता भी खराब है. बिना ज्यादा घूमे, मोलभाव किये पहली  दूकान में जो मिला...हमने स्वेटर,जैकेट,मफलर सब खरीद लिया . ( सिर्फ चंद्रताल में जैकेट काम आये ,बाकी स्वेटर वगैरह अब तक वैसे ही नए पड़े हैं. जुलाई के महीने में बाकी सारी जगहों पर जरा भी ठंढ नहीं थी और मौसम बहुत खुशनुमा था। )
नारकंडा का रास्ता सचमुच बहुत ही भयावह था। पतली सी सड़क. कहीं,कहीं कच्ची भी, दोनों तरफ झाड़ियाँ और अँधेरे में सिर्फ हेडलाइट के सहारे बढ़ती हमारी गाड़ी।  बरसों से इतना अँधेरा रास्ता मैंने देखा ही नहीं था. मुंबई में तो सड़कों पर इतनी गाड़ियां और उनके हेडलाइट से इतना उजाला होता है कि दो बार ऐसा हुआ है, मैं तीन घंटे का सफर करके आ गई हूँ और हेडलाइट ऑन ही नहीं की। दोनों बार शाम  को चली थी, रास्ते में अन्धेरा तो हो गया था पर अहसास ही नहीं हुआ. एक बार तो बिल्डिंग के नीचे गाडी पार्क करने के बाद मैंने हेडलाइट ऑफ करने की सोची तो पाया ऑन ही नहीं किया था। दूसरी बार, घर के पास का एक स्ट्रीट लाइट खराब था ,मैंने सोचा इतना अँधेरा क्यों लग रहा तब ध्यान गया कि हेडलाइट ऑन ही नहीं है. ट्रैफिक पुलिस पकड़ लेती तो हेवी फाईन लगता पर उन्हें भी इतनी बत्तियों की चकाचौंध में पता ही नहीं चला होगा. 

अब तक हम थक कर चूर हो चुके थे ,निढाल से पड़े थे। जंगलों के बीच एक ढाबा नज़र आया, ड्राइवर से आग्रह किया गया, 'कुछ खाकर चाय पी जाए।' आँखों के सामने गर्मागर्म समोसे और पकौड़े की प्लेट नाच रही थी। पर ढाबा बिलकुल खाली था ,एक औरत कुछ रख,उठा रही थी. दो लडकियां टी वी देख रही थीं. पता चला, बिस्किट और चाय के सिवा कुछ नहीं मिलेगा. माँ आवाज़ लगाती रह गई, पर देश-विदेश, मैदान- पहाड़ कोई भी जगह हो, किशोरावस्था एक सी होती है. लडकियां टी वी के सामने से नहीं उठीं. माँ ने ही हाथ का काम छोड़ स्टोव जला, चाय बनाई ।  वे लोग जितना हो सके स्टोव या लकड़ियों पर खाना बनाती थीं. गैस बचा बचा कर खर्च करती थीं.

नारकंडा में हमारा होटल एक छोटी सी पहाड़ी पर था. दोनों तरफ ढलान और ढलान पर हल्की रौशनी में नहाते चीड़ के पेड़ एक तिलस्म सा रच रहे थे।  होटल की बगल में कुछ लोहे की कुर्सियां और गोल टेबल रखे थे। किनारे रेलिंग थी और रेलिंग के पार गहरी घाटी।  तभी हल्की सी बारिश शुरू हो गई. होटल के शेड में लगे बल्ब से छन कर आती रौशनी में नाचती बारिश की बूंदें कुछ इतनी भली लग रही थीं कि मन हुआ उस  फुहार में कुर्सी पर देर तक बैठी रह जाऊँ ,पर थके शरीर ने इज़ाज़त नहीं दी। कुछ देर बाद संगीत और शोर शराबे की आवाज़ आने लगी ।  खिड़की से देखा, कुछ युवा उसी फुहार में गाना लगा, पार्टी कर रहे थे। हमने सोचा ये तो शिमला से आये होंगे ,हम तो मुम्बई से करीब २००० किलोमीटर का सफर करके आये हैं। खाना भी हमने रूम में ही मंगवाया और उन सबकी एन्जॉयमेंट पर रश्क करते सो गए.
सुबह मैं सबसे पहले उठ कर बाहर को चल दी। नीचे से होटल तक आती लाल घुमावदार पतली सी सड़क के  दोनों तरफ जहां तक नज़र जाती ,कुहासे में लिपटे लम्बे लम्बे चीड़ के पेड़ नज़र आ रहे थे. . ऐसा दृश्य बस फिल्मों में ही देखा था। शायद किसी ब्लैक एन्ड व्हाईट फिल्म में नायिका जोर जोर से विरह के गीत गाती ,ऐसे ही पेड़ों के बीच भटकती रहती थी . पेड़ पर कुछ बंदर उछलकूद मचाते ,पकडापकड़ी खेल रहे थे। सोचा, मजे है इनके तो आँखें खुली और खेल शुरू , नहाने धोने, खाने-पीने की चिंता ही नहीं...:)

 बहुत शौक था की किसी अनजान शहर में सुबह सुबह मैं अकेली निरुद्देश्य  घुमा करूं. लिहाजा चलती चली गई. शहर बस अलसाया सा अधमुंदी आँखों से माहौल का जायजा ले रहा था. इक्का दुक्का लोग सड़कों पर थे. पर सड़क मरम्मत करने वाले इतनी सुबह से काम पर लगे थे।  सब अठारह-बीस वर्ष के लड़के लग रहे थे। पता नहीं वहीँ के थे या फिर दूसरे शहरों से मजदूरी करने आये थे। इतनी सुबह उन्हें फावड़ा चलाते देख,अपने इस तरह निफिक्र  घूमने पर कुछ गिल्ट भी हुआ.

चौराहे पर एक मंदिर था। लोहे का जालीदार दरवाजा बंद था।  भगवान जाग भी गए होंगे पर पुजारी पर निर्भर थे। वो जब उन्हें नहलाये-धुलाये, भोग लगाए। थोड़ी देर सड़कों पर भटकती रही, पीछे से बेटा भी आ गया। एक छोटी सी चाय की दूकान थी. हमने चाय की फरमाइश की तो दुकानवाले ने कहा, 'अभी बना देता हूँ  '. पूरे हिमाचल ट्रिप पर मैंने पाया ,वे लोग चाय ऑर्डर करने पर बनाते थे. बनी बनाई चाय नहीं होती थी. इस से हमारा फायदा ये  हो जाता कि हम फरमाईशी चाय बनवाते, 'चीनी जरा काम डालना, थोड़ी अदरक इलायची डाल  देना।' 
चाय पीकर हम होटल वापस आ गए।  अब तैयार हो, थोड़ा 'नारकंडा'  घूमते हुए 'सराहन' के लिए निकलना था। सामान पैक करते खिड़की के पार जो नज़र गई तो टूर ऑपरेटर की बात सही साबित होती लगी.उसने कहा  था ," यहाँ  हर दो मिनट  पर दृश्य बदल जाते हैं " अब तक सामने दिखती पहाड़ी बादलों में लिपटी पड़ी थी. अब मानो पहाड़ी ने बादलों की चादर परे  फेंक दी थी . सूरज की नरम रौशनी  में नहाये छोटे छोटे लाल हरे खिलौने से घर खूबसूरत लग रहे थे। मैंने तस्वीरें लेने की सोची पर फिर लगा, हाथ का काम पूरा कर लिया जाये. बैग की ज़िप बंद कर जैसे ही कैमरा ले खिड़की के पास गई....आलसन पहाड़ी ने फिर बादलों की चादर अपने ऊपर खींच ली थी.  कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था.
 एक सीख भी मिली,.... जो दृश्य अच्छा लगे, झट कैमरे में कैद करो, वरना बदल जाएगा. 

 (क्रमशः )



इतनी सुबह सडक मरम्मत करते मजदूर 








Thursday, March 16, 2017

"काँच के शामियाने " पर मेरी पुष्पा मौसी की टिप्पणी

'घर की मुर्गी दाल बराबर' कहावत हर बार सही सिध्द होती है . मेरा उपन्यास 'काँच के शामियाने ' काफी लोगों ने पढ़ा और उसपर लिखा भी, किताब के साथ तस्वीरें भी खिंचवा कर भेजीं. पर घर वालों ने चार लाइन में प्रतिक्रिया देकर छुट्टी पा ली. तस्वीर भी नहीं भेजी कोई. लेकिन मेरी सबसे छोटी 'पुष्पा मौसी' ने काफी देर से पढ़ा पर पढ़कर मुझे फोन किया और कहा,मैंने किताब पढ़कर कुछ लिखा है, तुम्हे सुनाती हूँ. सुनने में मुझे कविता सरीखी लगी. मैंने फरमाईश की कि टाइप कर के भेज दो. पर मौसी के लिए देवनागरी में टाइप करना मुश्किल था .फिर मैंने कहा,'पोस्ट कर दो' .वे भी खुश हो गईं कि बड़े दिनों बाद किसी को चिट्ठी भेजूंगी .मैंने भी शायद सदियों बाद कोई पाती पाई .

ये मौसी कम दोस्त ज्यादा हैं. आठ भाई बहनों में सबसे छोटी और अपनी बहन की बेटियों से थोड़ी ही बड़ी. गर्मी छुट्टियों में रात रत भर जागकर हम दोनों ने एक दूसरे को देखी गई फिल्म, पढ़े गए नॉवेल की कहानियाँ सुनाईं हैं. कॉलेज के दिनों में मेरी लिखी कहानियाँ ,इन्होने ही सबसे पहले सुनी हैं. मुझे इनकी एक बात हमेशा याद आती , जब रात के अँधेरे में बिस्तर पर लेटे, हम एक दूसरे को कहानियाँ सुनाते थे तो वे कहतीं, ' कुछ सुनाने में चेहरे के एक्सप्रेशन का भी बहुत महत्व होता है, अँधेरे में तुम चेहरे के भाव नहीं देख पा रही....वरना ज्यादा रोचक लगती कहानी' :)
बहुत शुक्रिया मौसी जी ( शायद पहली बार उन्हें शुक्रिया कह रही हूँ :) )

"कहानियों और कविताओं' की फिसलन भरी घाटी में तुम पूरी तैयारी के साथ उतर गई और 'काँच के शामियाने' उपन्यास की रचना कर दिल की गहराइयों को छू गई .हर महिला कहीं ना कहीं उस किरदार में अपने को ढूँढने लगती है. तुम्हारे उपन्यास में मनुष्यत्व की खोज और बचाव के लिए निकली किरदार जया दिल में उतर जाती है.
सच कहा है --
"भरोसा खुदा पर है, तो जो लिखा है तकदीर में वही पाओगे.
भरोसा खुद पर है तो खुदा वही देगा, जो तुम चाहोगे ."
रश्मि तुम एक सजग लेखिका हो, जो अपने आसपास की चीजों को, संबंधों को बहुत सूक्ष्मता से पकडती हो .और तुम्हारे भीतर का कथाकार उसे बारीकी से चित्रित करता है. अपने पहले उपन्यास 'काँच के शामियाने' में स्त्री-पुरुष के जटिल संबंधों तथा पुरुष के अभिमान की गहरी मनोवैज्ञानिक पड़ताल कर डाली .अपनी सधी हुई लेखनी से लेखिका किसी मनोवैज्ञानिक की तरह जया के भीतर उतरने लगी और पाठक की आँखों से अपने आप आंसू गिरने लगे. तुम पात्रों के भीतर साहसपूर्वक उतरती हो ,कारण ढूंढ लाती हो औए उसका व्यक्तित्व उभार देती हो. तुम्हारे उपन्यास से महिलाओं को एक बड़ी सीख मिलती है. अपने को बचाते हुए वो समाज में क्या कुछ नहीं कर सकती. जज्बा और जरूरत ही किसी स्त्री को महान बनाता है.
रीना (रश्मि ) तुम्हारा लेखिका होना ही तुम्हारा इच्छित संसार है. ढेर सारा आशीर्वाद .
जया के लिए :
"दिन सपनों को सजाने, घर को बचाने में रह गई
रात पति धर्म निभाने, बच्चों को सुलाने में रह गई
जिस घर में अपने नाम की तख्ती भी नहीं
सारी उम्र उस घर को सजाने में रह गई "
(टाइप करते वक्त ध्यान गया ,मनोवैज्ञानिक शब्द दो बार आया है...उन्होंने मनोविज्ञान में एम.ए. किया है, इस शब्द से लगाव लाज़मी है :) )

Thursday, March 2, 2017

परतीमा (कहानी )


प्रशांत ऑफिस में काम में उलझा था कि मोबाइल बजा , बिना नंबर देखे ही उठा कर हलो बोला ,"उधर से किसी स्त्री की जोर की आवाज़ आई ,"हलोss हलोss "…प्रशान्त ने फोन कान से थोड़ी दूर कर लिया ,उसे लगा, रोंग नम्बर है .कट करने ही जा रहा था कि फिर आवाज़ आई,"हलो आप परसांत बोल रहे हैं....परसांत ...प्रशांत शर्मा  " अब ये तो कोई उसके घर की तरफ की ही हो सकती थीं. पर आवाज़ पहचानी सी नहीं लग रही थी। "

  "अरे हम परतीमा …पह्चाने हमको ?' दिमाग पर बहुत जोर डाला पर उसे बिलकुल याद नहीं आ रहा था तभी आगे बोलीं वे, " याद है, तुम मोतीपुर में सातवीं में पढ़ते थे ,हमारे घर के बगल में रहते थे..... चचा का फोन नंबर मिला तो तुम्हारा नंबर भी लिए , खूब बड़े अफसर बन गए हो, अच्छा लगा सुन कर , सादी कर लिए ,बच्चा लोग कैसा है , सबको मेरा आशीर्वाद देना , चलो तुम ऑफिस में बिज़ी होगे ,हमको तो तुम्हारा नंबर मिला तो इंतज़ारे नहीं हुआ। ये मेरा नंबर है, सेव कर लेना , फुर्सत से फोन करना कभी ,अपनी वाइफ से भी बात करवाना … चलो, बाय। " 
जैसे अचानक फोन आया था ,वैसे ही बंद भी हो गया। वो कुछ देर तक फोन घूरता रहा। उसके बाद काम में मन नहीं लगा , बार बार जी उचट जाता आखिर एक कॉफी मंगवाई और कप लेकर खिड़की के पास चला आया। खिड़की से नीचे नज़र आती सड़क पर तेजी से  गाड़ियां आ जा रही थीं. दूर सडक के पार वाला बाउंड्रीवाल,गुलाबी बोगनवेलिया से ढका हुआ था . ऐसे ही तो बचपन के गुलाबी दिन थे वो और उसका मन भी उन गाड़ियों संग तेजी से भाग  निकला. . मोतीपुर में उसके पापा ट्रांसफर होकर गए थे। प्रतिमा और उसका घर पास पास था ,सिर्फ एक दीवार थी बीच में। सामने का बरामदा ,ऊपर जाने वाली सीढ़ी और छत सब साझे थे। प्रतिमा पूरे महल्ले की बिल्ली थी, जब तक सबके घर एक बार न घूम ले उसका खाना हज़म नहीं होता था.. सबको उसके आने जाने की इतनी आदत भी पड़ गयी थी कि जिस घर में शाम तक न गयी हो , लोग चिंतित हो ,आस-पास से उसका हाल चाल पूछने लगते थे कि प्रतिमा ठीक तो है। जिस घर में प्रतिमा की पसंद की चीज़ बनती,एक कटोरी अलग से उसके लिए रख दी जाती. प्रशांत के घर में तो उसका डेरा ही जमा रहता। अपने घर में तो वो टिकती ही नहीं. किसी काम में हाथ नहीं बटाती, चाची छत पर से कपड़े लाने को कहती और वो प्रशांत के यहाँ आकर बैठ जाती। चाची जब गुस्से में उसे ढूंढते हुए आतीं तो वो किचन में छुप जाती। छोटा भाई विशाल खी खी करके मुँह छुपाये हँसता पर उन्हें बताता नहीं. प्रशांत किचन की तरफ इशारा कर देता ,चाची किचन की तरफ बढ़तीं उसके पहले ही प्रतिमा तीर की तरह निकलतीं और बाहर भाग जाती। "तू आ, आज घर में , आज तेरी टाँगे न तोड़ दीं तो कहना ' चाची बड़बड़ाती हुई छत से कपडे लाने चली जातीं। " पर प्रतिमा लौटकर अपने घर में नहीं प्रशांत के घर में पहले आती और फिर जी भरकर उससे लड़ती कि उसने चाची को क्यों बताया कि वो किचन में छुपी है। प्रशांत भी अकड़ता, 'मैं झूठ नहीं बोलता "
    "तो राजा हरिश्चंदर रख लो न अपना नाम " ऐसे मुहं चिढ़ा कर वो कहती कि प्रशांत गुस्से मे उसकी तरफ झपटता . प्रतिमा भागती और उसकी लहराती लम्बी छोटी उसके हाथ में आ जाती। वो चीखती ,"चाची ss ' और मम्मी आकर प्रशांत को डांटने लगती ,'छोडो उसकी चोटी …तमीज नहीं है जरा भी …एक लड़की के साथ ऐसा बिहेव करते हैं "…वो गुस्से से भर जाता , "लड़की होने के बड़े फायदे हैं,अपनी माँ का कहना न मानो, उनसे छुप का बाहर भाग जाओ। लोगो को झूठ बोलना सिखाओ और सब करके साफ़ बच जाओ क्यूंकि लड़की हो ' लड़कियाँ बड़ी चालाक होती हैं। वो गुस्से में भर चल देता। पर प्रतिमा दूसरे दिन ही सब भूल भाल धमक जाती, "चल खेलने चलें"
"हमको नही खेलना तेरे साथ"...वो उसकी कल की बदमाशी भूला नहीं था.
"काहे  हार जाता है इसलिए"....प्रतिमा उसकी हंसी उडाती हुई बोलती.
"कब हारें हैं रे तुझसे "वो लाल आँखें दिखाता
    "तो चल न"...प्रतिमा,उसका हाथ खींचती हुई ले जाती। वो हाथ झटक कर आगे बढ़ जाता। शाम को महल्ले के सब लड़के मिल कर पिट्टो,डेगा-पानी,लंगडी, आइस पाइस खेलते। लडकियां रस्सी कूदतीं या इक्ख्त दुक्ख्त खेलतीं. नहीं तो बातें करती हुई टहलती रहतीं.पर प्रतिमा को तो कूद -फंड पसंद थी. वो क्या लड़कियों के साथ खेलती. वो लडकों के संग सारे खेल खेलती. प्रशांत  पिट्टो में प्रतिमा पर जोर से बॉल का निशाना लगाता कि प्रतिमा को खूब चोट लगे पर वो बहुत तेज थी हर बार बच जाती और उसे अंगूठा दिखाती। कभी कभी प्रशांत  छुपकर कंचे भी खेलता .मम्मी -पापा की तरफ से कंचे खेलने की सख्त मनाही थी. मम्मी कहतीं, 'कंचे गली के लडके खेलते हैं '.उसे समझ नहीं आता, ये गली के लडके कौन होते हैं. वे लोग भी तो सडक के किनारे ही खेलते थे . पर तब आज के बच्चों की तरह , फट से माता-पिता से सवाल करने का रिवाज नहीं था. उनकी जितनी बातें समझ में आईं,समझो वरना सर के ऊपर से गुजर जाने दो.  प्रतिमा उसे कंचे खेलते देख लेती तो फिर ब्लैकमेल करती कि मैथ्स का ये सवाल बना दो वरना  चाची को बता दूंगी। खीझते हुए भी उसे उसका  होमवर्क करना ही  पड़ता.
प्रशांत ने कॉफ़ी का एक लम्बा घूँट भरा...क्या दिन थे वे भी , सिर्फ पढना  लिखना, खेलना, कूदना। पढाई का भी कोई बोझ नहीं. सिर्फ हिसाब वाले मास्टर जी कुछ सवाल घर से बनाने कर लाने  को देते .वरना कोई होमवर्क नहीं. ना परीक्षा का कोई खौफ ,ना परसेंटेज की कोई होड़.
आये दिन कोई न कोई त्यौहार पड़ता और सारा महल्ला ही वो त्यौहार मिलकर मनाया करता था। होली, दिवाली दशहरा ,सरस्वती पूजासब खूब धूमधाम से मनाते.  दशहरे का मेला सारे बच्चे मिलकर देखने जाते , एक बार प्रतिमा ने पचास पैसे की एक पीतल की अंगूठी खरीदी थी। शरारती तो थी ही पता नहीं अंगुली में कैसे दाँत से दबा कर पिचका ली थी। अंगुली सूज कर मोटी हो गयी थी और उसका रो रो कर बुरा हाल। वो चिढाता,'अब तो अंगुली काटनी पड़ेगी' प्रतिमा का रोना और बढ़ जाता.दोनों की मायें परशान हो गयी थीं। पिता ऑफिस गए हुए थे , फोन तो था नहीं जो उन्हें बुलाया जा सके। उस छोटे से कस्बे में औरतें बाज़ार नहीं जातीं थीं. और तब ये जिम्मेवारी उसे सौंपी गयी थी। वो महल्ले के बच्चों की फ़ौज के साथ बड़ी जिम्मेवारी से सुनार के यहाँ से उसकी अंगूठी कटवा कर ले आया था। प्रतिमा ने भरी आँखों से रुंधी आवाज़ में पहली बार उसे 'थैंक्यू 'कहा था। मन तो हुआ फिर से चिढ़ाने लगे पर उसकी रोनी सूरत देख दया आ गयी थी। दो दिन प्रतिमा ने उसका अहसान मान लड़ाई नहीं की पर तीसरे दिन ही सब भूल भाल…'चाची देखिये, परसाांत पढाई का किताब नहीं कॉमिक्स पढ़ रहा है " और उसकी गुस्से से लाल आँखे देख अंगूठा दिखा भाग गई थी। उसे सचमुच अफसोस हो गया था , बेकार ही ले गया था सुनार के पास। हो जाने देता उसकी अंगुली, हाथी के पाँव जैसी।

    पर दिवाली के समय प्रतिमा सारी दुश्मनी भूल जाती। उसका और प्रतिमा का सामने वाले घर के  गगन और मिथिलेश से पटाखे छोड़ने का कम्पीटीशन होता । अपने सारे बचाये पैसे उसे दे देती कि वो पटाखे ले आये। किसी भी बच्चे को बहुत ज्यादा पैसे तो मिलते नहीं थे ,तो कम्पीटीशन होता कि किसने सबसे अंत में पटाखे छोडे. प्रतिमा  घर-घर की   बिल्ली तो वो थी ही ,चुपके से उनके घर में जाकर देख आती कि उन्होंने कौन से पटाखे और कितने पटाखे खरीदे हैं और फिर दोनों उसी हिसाब से पटाखे छोड़ते. बहुत देर तक मिथिलेश और गगन के घर के सामने से पटाखों की आवाज़ नहीं आती तो प्रशांत अंतिम रॉकेट छोड़ने के लिए उद्धत होता पर प्रतिमा कहती, 'नहीं.,रुको अभी ..उनका एक अनार अभी बचा हुआ  है, हम गिने हैं.वो लोग अभी तक पांच ही अनार जलाया है जबकि छः लाया था . और फिर उनके अनार जलते ही ,प्रशांत विजयघोष सा अंतिम राकेट छोड़ देता. किसकी छत पर दिए देर तक जले, इसका भी कम्पीटीशन होता। छत तो साझा थी, दोनों देर रात तक  जागकर दिए में तेल डाला करते। एक भूली सी मुस्कराहट प्रशांत के चहरे पर आई. आज तो रंग बिरंगे बिजली के बल्ब लगा दो वे दूसरे दिन तक जलते रहेंगे। बस एक स्विच ऑन ऑफ करना ही तो  होता है.
 खिड़की छोड़कर प्रशांत  ने वापस काम में मन लगाने की कोशिश की पर बचपन के वे दिन, मोतीपुर की गालियां ही जेहन में घूमती रहीं। आजकल न्यू इयर पार्टी का बड़ा शोर होता  है. इकतीस  दिसंबर को देर रात तक पार्टी करते हैं लोग और फिर नए साल की सुबह देर तक सोये रहते हैं। नए साल का सूरज तो कोई देखता ही नहीं. और एक उनका बचपन था। सुबह सुबह नहा धोकर वे लोग मंदिर जाते और फिर जलेबी पूरी का नाश्ता करते और फिर सारे बच्चे मिलकर छत पर पिकनिक मनाते। उस दिन कोई झगड़ा नहीं होता। सबकी मम्मियां भी भरपूर मदद करतीं। छत पर  आकर चूल्हा सुलगा देतीं पर इस से ज्यादा कोई मदद नहीं लेते वे लोग। आज के दिन लड़कियों के रौब सह लेते . शोभा, रीता, निर्मला सब लडकों के  उम्र की ही थीं, पर बड़े सलीके से सारे काम कर लेतीं.  आलू गोभी मटर की खिचड़ी और चटनी बनती .खिचड़ी का वैसा स्वाद फिर  कभी नहीं आया । लडके पानी ढो कर लाने का , आलू छील देने का, पत्तलें लगाने का, उठाने का काम  बखूबी करते। कौन ज्यादा काम करता है ,इसकी ही होड़ लगी होती।

 पिकनिक ख़त्म होते ही सरस्वती पूजा की तैयारियां शुरू हो जातीं। सारे बच्चे मिलकर सीढ़ी के ऊपर थोड़ी सी खाली जगह थी, वहीँ प्रतिमा लाते। हर घर से वे लोग चंदा इकठ्ठा करते. और फिर उन पैसों से साधारण सा प्रसाद लाते. थोड़ी सी बूंदी , बताशे और फल. सजावट के लिए मम्मी लोग उदारता पूर्वक साड़ियां दे देतीं। रंगीन कागज़ों को तिकोना काटकर वे लोग पताका बनाते। लडकियां साड़ियों से सजावट करतीं। लड़के रस्सी टांगकर रंगीन कागज़ों की झंडियां लगाते। प्रसाद काटना ,प्रसाद बांटना हर काम वे लोग मिलकर करते।
 पर  मोतीपुर छोड़ने से पहले अंतिम सरस्वती पूजा में बड़ा हंगामा हुआ था ।एक नई लड़की आई थी महल्ले में ।बहुत सज संवर कर रहती. अपने पिता के अफसर होने का उसे बड़ा घमंड था ।खूब कीमती फ्रॉक, सुन्दर सैंडल पहन और रंग बिरंगे हेयर बैंड लगा कर शाम को आती ।खुद भी नहीं खेलती और लड़कियों को भी नहीं खेलने देती,उन्हें बिठा कर लंबी लंबी डींगे हांक करती ।लड़कों पर उसका रौब नहीं चलता, इसलिए उनसे चिढ़ी रहती ।अब तक सरस्वती पूजा में सबलोग एक बराबर चन्दा दिया करते थे । इस नई लड़की ने ज्यादा पैसे दिए । अपनी माँ की ढेर सारी कीमती साड़ियां लाई और विसर्जन के लिए अपने पिता से कहकर एक जीप  अरेंज कर दी थी।
प्रतिमा को छोड़कर बाकी सारी लडकियां उसकी मुरीद हो गयी थीं ।लड़कों ने मूर्ति लाने का ,सजावट का सारा काम तो किया पर दूसरे दिन लडकियों ने उन्हें गैरों की तरह एक एक प्रसाद का दोना देकर चलता कर दिया ।
    इस तरह मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिए जाने पर लड़के कड़वा घूँट पीकर रह गए ।विसर्जन के लिए भी जीप में बैठकर सिर्फ लडकियां ही गईं . उस अपर्णा के पिताजी का एक चपरासी और ड्राइवर साथ था . लडकों को बिलकुल ही नहीं पूछा.
    पर वे भी ताक में थे जैसे ही लडकियां विसर्जन के लिए गयीं ,वे बंचा हुआ  सारा प्रसाद चुरा लाये । कुछ खुद खाया और बाकी रास्ते पर आने जाने वालों में बाँट दिया ।लड़कियों को आग बबूला तो होना ही था , खूब चीखी-चिल्लाएँ.। घर वालों से भी इस हरकत के लिए बहुत डांट पड़ी ।पर किसी को बुरा नहीं लगा।सब सर नीचा किये मंद मंद मुस्काते रहे ।सामूहिक रूप से डांट खाने का मजा ही कुछ और होता है ।
एक ठंढी सांस निकल गई । आज अपनी मोबाइल और लैपटॉप में घुसे गेम खेलते बच्चे क्या जानें ये मिलजुल कर खेलना, शैतानियाँ करना और डांट खाना .
    प्रतिमा ,उसके घर में इतनी ज्यादा रहने लगी थी कि अनजान लोग उसे मम्मी पापा की बेटी ही समझते ।बस फर्क ये था कि वो और विशाल पापा से बहुत डरते थे जबकि प्रतिमा बिलकुल नहीं झिझकती । बड़े आराम से कह देती ,'चचा इस शर्ट में आप बहुत स्मार्ट लग रहे हैं ।'...पापा के सामने भी गाना गाती रहती ।अब वो दसवीं में आ गई थी ।और अब तक पढ़ाई को टाइमपास की तरह लेने वाली और जैसे तैसे पास होने वाली प्रतिमा घबराने लगी थी ।उसका मैथ्स बहुत कमजोर था ।उसके घर में पढ़ाई को और वो भी लड़की की पढ़ाई को ज्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता था ।ट्यूशन का तो सवाल ही नहीं ।आखिर उसकी रोनी रोनी सूरत देख पापा ने कहा ,वे उसे पढ़ायेंगे ।और उसके बाद प्रतिमा का एक दूसरा रूप ही सामने आया ।सुबह सुबह ही वो किताब कॉपियां लेकर बरामदे में जम जाती। कोई सम सौल्व नहीं कर पाती तो सोते हुए पापा को झकझोर कर जगा देती,"चचा उत्तर नहीं मिल रहा है " और आश्चर्य पापा, जरा भी नहीं गुस्सा करते ।चश्मा लगाते और सवाल समझाने लगते ।वरना सोते हुए पापा के कमरे के बाहर भी व लोग डरते डरते गुजरते थे कि कहीं आवाज़ न हो जाए ।पाप के ऑफिस जाने से पहले वो पढ़ती,दोपहर में पापा के दिए सम्स सौल्व करती ।रात में भी देर तक पढ़ती । यहाँ तक कि उसे और विशाल को डांट पड़ने लगी थी कि "देखो ,'कितना मन लगाकर पढ़ती है ..सीखो कुछ उस से " प्रतिमा की बोर्ड की परीक्षा तो हो गयी, पेपर भी अच्छे हुए थे ।पापा ने मैथ्स का पेपर सौल्व करवाया था और संतुष्ट भी थे ।पर उसका रिजल्ट आने से पहले ही उनका ट्रान्सफर हो गया और वे लोग नए शहर में आ गये थे । रिजल्ट आने के बाद,प्रतिमा ने पापा को चिट्ठी लिखी थी और पापा बहुत खुश हुए थे । आने जाने वाले सबको पापा बड़े गर्व से प्रतिमा के रिजल्ट के बारे में सुनाते । उसके बाद प्रतिमा की याद धीरे धीरे धूमिल होती गई ।मम्मी कभी कभी पड़ोस की आंटियों से उसकी शरारतों की चर्चा करतीं । वो तो अपने खेल ,कॉलेज ,कैरियर में प्रतिमा को बिलकुल भूल गया था । आज उसके फोन कॉल ने पूरा बचपन लौटा दिया, उसका ।रात में माँ का फोन आया ," प्रतिमा का फोन आया था कि उसने तुमसे बात की है ।बहुत खुश लग रही थी "
    "हाँ माँ, बिलकुल  वैसी ही है अभी भी चिल्ला चिल्ला कर बोलती है, और अपना नाम अब भी परतीमा बताती है,प्रतिमा नहीं  "...प्रशांत हंस पड़ा था .

    "नहीं बेटा, वो तुमसे बातें करने की ख़ुशी में बोल रही होगी । दुःख का पहाड़ टूटा है उसपर । शादी अच्छे घर में हुई थी पर बच्चे छोटे थे तभी पति की मृत्यु हो गई ।पर प्रतिमा ने सबकुछ अच्छे से संभाल लिया ।बेटी की शादी कर दी ।बेटा भी नौकरी में आ गया है ।वो ,टीचर है एक स्कूल में । हमारे बगल के फ़्लैट में एक सज्जन आये हैं ।वे प्रतिमा के ससुराल के रिश्तेदार हैं ।एक दिन तुम्हारे पापा,अपनी नौकरी की बातें कर रहे थे उसी क्रम में जैसे ही मोतीपुर का नाम लिया । उन्होंने बताया कि मोतीपुर की प्रतिमा उनके रिश्ते में है और फिर तो पापा ने उनसे नंबर लेकर प्रतिमा  से बात की  ।मुझ से भी बात हुई. तुम सबलोग का हाल चाल पूछ रही थी ।तुम्हारा नंबर लिया ।तुमसे बात करने के बाद भी मुझे फोन करके बताई पर बोल रही थी तुम ऑफिस में थे ,ज्यादा बात नहीं हुई ।बात कर लेना बेटा ,बहुत खुश होगी ।"

    "हाँ मम्मी जरूर किसी सन्डे सैटरडे करूँगा .." यह सब सुनकर उदास हो गया वह.विधाता ने  किसके भविष्य की टोकरी में क्या सहेज कर रखा है, किसी को पता नहीं होता. उछलती-कूदती,शरारती प्रतिमा के इतने जिम्मेवार रूप की कल्पना भी नहीं कर पा रहा था . कैसे उसने सम्भाला होगा सबकुछ . या शायद इतनी एक्टिव, मिलनसार, हंसमुख होने के कारण ही उसने सब अच्छे से सम्भाल लिया  वरना कोई  सरल सहमी सीधी सी लडकी होती तो बिखर ही जाती. पहली फुर्सत में ही प्रतिमा को कॉल करेगा  और फिर ढेर सारी बातें करेगा . उसने सोच तो लिया था  पर छुट्टी के दिन कुछ आराम में ,कुछ परिवार के साथ समय बिताने, कुछ बाहर जाने, कुछ मेहमानों की खातिर तवज्जो में याद ही नहीं पड़ा और कई महीने गुजर गए ,वो फोन करना भूल ही गया.
    पर आज टी वी पर बिलकुल प्रतिमा जैसी गोल चेहरे वाली गोरी सी कमर तक दो चोटी लटकाए एक लड़की को कूदते - फांदते, शरारतें करते देखा तो प्रतिमा की बेतरह याद हो आई । बिना एक पल गंवाए उसने प्रतिमा को फोन मिला दिया ।पर उसने फोन नहीं उठाया ।बाद में प्रतिमा ने कॉल बैक किया तो वो बाथरूम में था । उसने फिर से फोन किया पर पूरे रिंग के बाद फोन नहीं उठा ।पर उसे भी जैसे जिद हो आई थी ,आज प्रतिमा से बात करनी ही है । उसके बाद पांच पांच मिनट पर उसने कई बार फोन मिलाया पर प्रतिमा ने फ़ोन नहीं उठाया ।और जब काफी देर बाद प्रतिमा ने कॉल बैक किया तो वो गुस्से में फट पड़ा ,"कहाँ थी ? कब से फोन कर रहा हूँ ...फोन नहीं उठाया जाता "
    "शान्ति शान्ति अरे बाबा गुस्सा वैसा ही है,तुम्हारा  " प्रतिमा के ये कहने पर ध्यान आया कि वह पूरे तीस  साल बाद उस से बात कर रहा है । प्रतिमा ने कहा," मंदिर में थी न ,इसलिए फोन नहीं उठा पाई ।सिद्धिविनायक आई हुई हूँ न"
    "अरे तुम मुंबई में ..मेरे शहर में हो ...कब आई एक फोन भी नहीं किया ।"
    " वो  चेक अप के लिए आई थी...पर आज ही रात की वापसी है "
"चेक अप...कैसा,किसका  चेक अप
.अरे मुझे ही पांच साल पहले ब्रेस्ट कैंसर हो गया था. ऑपरेशन हो गया है , अब ठीक  हूँ .पर छः महीने में चेक अप के लिए आना पड़ता है. आज ही  रात की ट्रेन है,इसलिए फोन नहीं कर पाई,अगली बार पक्का बताउंगी "
 वो दुःख से भर उठा .विधाता ने  दो बच्चे सौंप कर पति छीन लिया , इतने से भी संतोष ना हुआ  तो  कैंसर की सौगात भी दे डाली .कोई अगर बर्दाश्त करने में सक्षम है तो उसे दुःख पर दुःख दिए जाओ. किसी की जिंदादिली की ऐसी कठिन परीक्षा भी ली जाती है.
 अपराधबोध भी सताने लगा ,"प्रतिमा ने इतने उत्साह से फोन किया था पर उसने पलट कर एक बार भी फोन नहीं किया ,प्रतिमा ने सोचा होगा उसे बात चीत करने में कोई रुचि नहीं है ।
पर अब ज़रा भी समय नही गंवाना है. प्रशांत ने कहा "ठीक है रात की ट्रेन है न ...मैं अभी आता हूँ तुम्हे लेने ...रात को स्टेशन छोड़ दूंगा ।चिंता मत करो ।"
    "तुम आओगे, फिर लेकर जाओगे सारा समय तो आने जाने में ही चला जायेगा ...हम ही आ जाएंगे लोकल से "
    "ठीक है साथ में कौन है उसे फोन दो मैं रास्ता समझा देता हूँ "
    "अरे मैं अकेले ही आई हूँ । पांच साल से आ रही हूँ, कई महीने रही हूँ. मुम्बई पूरा जाना -पहचाना है . वैसे भी कौन खाली है ,सब अपने काम में बिज़ी हैं । किसी को परेशान भी क्यूँ करें. हमको ही बताओ ,हम आ जायेंगे ।"
उसने सोचा ,प्रतिमा तो शुरू की स्मार्ट है ।यहाँ सालों से रहने वाले भी लोकल से अकेले सफ़र करने की हिम्मत नहीं कर पाते और ये बाहर की लड़की 'और फिर हंस दिया.. "लड़की??" ...उसकी बेटी की शादी हो चुकी है ।उसने प्रतिमा को समझाया कि अमुक स्टेशन पर वेस्ट साइड में आकर खड़ी रहे ।वो लेने आ जाएगा ।
स्टेशन पहुँच वो इधर उधर देख रहा था ।इतने चेहरों की भीड़ में उस चेहरे को ढूंढें भी कैसे जिसकी अब उसे पहचान भी नहीं ।तभी दाहिनी तरफ से एक आवाज़ आई," परसांssत..." मुड़ कर देखा ,"अरे तो ये है प्रतिमा ।वक़्त की मार से प्रतिमा का गोरा रंग कुम्हला गया था ।कमर तक लटकती काली चोटियों की जगह अब कंधे तक कच्चे पक्के बाल एक क्लिप में बंधे थे ।पतली छरहरी देह थोड़ी फ़ैल गई थी .
उसे अपनी तरफ देखते पा कर प्रतिमा पास आ गई ,बोली, "हम तो पहचान ही नहीं पाते पर तुम अब बिलकुल वैसे ही दिखते हो, तब जैसे चचा दिखते थे .पर चचा तुमसे पतले थे " और फिर हंस कर बोली ,"कितना मोटा गए हो "
 चश्मे के पीछे से झांकती प्रतिमा की आँखों की चमक और शरारती हंसी वैसी ही थी ।उसके हाथ से उसका बैग लेते हुए उसने भी हंस कर कहा ,"और तुम नहीं मोटाई . ,एकदम बुढ़िया लगने लगी हो ।"
    "बुढ़िया कहेगा ,मुझे ..."प्रतिमा ने उसे जोर की कोहनी मारी और दोनों के बीच से बीच के वर्ष छलांग लगा, कहीं बिला गए  । दोनों स्कूली बच्चे से ठठा कर हंस पड़े ।




'काँच के शामियाने' पर स्वाति सक्सेना की टिप्पणी


 पाठक कभी कभी निशब्द कर देते हैं ।स्वाति सक्सेना है, 'काँच के शामियाने' पढ़ने के बाद उन्हें अपने स्त्री होने पर गर्व  हुआ कि एक स्त्री में ही इतनी जीवटता होती है कि सारी मुश्किलों का सामना करके भी वह अपने बच्चों का जीवन संवार देती है "
बहुत बहुत आभार स्वाति :)
 
"काँच के शामियाने"
बहुत इंतज़ार के बाद, 'काँच के शामियाने' मिली ।किसी वजह से दो दिनों तक नहीं पढ़ पाई ।आज दिन में दो बजे मैंने पढ़ना शुरू किया और इस वक्त रात के बारह बज रहे हैं, जब मैंने किताब खत्म की ।जब तक किताब पूरी नहीं हुई, मन ही नहीं हुआ कुछ करने का ।इवनिंग वाक पर गई और सिर्फ पाँच मिनट में वापस आकर किताब पढ़नी शुरू कर दी ।
किताब पढ़ते हुए शुरू में लगा, जया ये सब क्यों झेल रही है। वापस अपनेे घर चली क्यों नहीं जाती ,फिर बाद में लगा ,शायद इतना आसान भी नहीं सब कुछ छोड़ देना।कोई भी स्त्री पहले अपनी पूरी कोशिश लगा देती है, चीज़ों को ठीक करने के लिए।
पर जब बाद में उसने घर छोड़ दिया और खुद अपने पैरों पर खड़े होकर बच्चों को पाला तो लगा,उसने अब सही किया।
आपकी इस कहानी में मैंने समाज के दो रूप देखे। एक वो जो समाज पुरुष प्रधान है।,जिसमें नारी को सिर्फ घर गृहस्थी और बच्चों को सम्भालना चाहिए और त्याग की मूर्ति बनकर सारे दुःख सहन करने चाहिए ।क्योंकि उस समाज में औरत का जनम ही त्याग करने और सहने के लिए हुआ है ।
दूसरी तरफ समाज में दकियानूसी विचारों को बेधती हुई एक सोच भी है, जिसने समाज के दूसरे पहलू के दर्शन करा दिए ,जिसमें औरत अबला नहीं है।उसमें सहन करने की शक्ति है तो अपने अधिकारों के लिए लड़ने की ताकत भी है । वो कमजोर नहीं है, उसे कमजोर समझने की गलती करना एक भूल होगी ।
आपकी कहानी पढ़कर अपने औरत होने पर गर्व महसूस हुआ कि एक औरत ही इतना कुछ झेलकर भी अपना और अपने बच्चे का जीवन बना सकती है ।
मेरी शुभकामनाएँ, आपके साथ हैं ।आप इसी तरह अच्छा लिखती रहें ।
धन्यवाद
स्वाति सक्सेना ।

Wednesday, March 1, 2017

पूजा अनिल के स्वर में 'काँच के शामियाने' का अंश

'पूजा अनिल' ,स्पेन में रहती हैं .वे जब भारत आईं  थीं तो अपने साथ 'काँच के शामियाने ' उपन्यास ले गईं थीं
.उन्हें उपन्यास बहुत पसंद आया .उन्होंने पढ़ कर इसकी समीक्षा भी लिखी और अभी हाल में ही एक उपन्यास के एक अंश का अपनी भाव भरी आवाज़ में पाठ भी किया है. नीचे दिए गए लिंक पर सुना जा सकता है. शुक्रिया पूजा :)

काँच के शामियाने - रश्मि रविजा

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ।
आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं रश्मि रविजा के चर्चित उपन्यास काँच के शामियाने का एक अंश जिसे स्वर दिया है पूजा अनिल ने।

प्रस्तुत अंश का कुल प्रसारण समय 8 मिनट 17 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। इस उपन्यास की अधिक जानकारी रश्मि रविजा के ब्लॉग अपनी, उनकी, सबकी बातें उपलब्ध है। http://radioplaybackindia.blogspot.in/2017/01/rashmi-ravija-kaanch-ke-shamiyane.html?m=1
http://radioplaybackindia.blogspot.in/2017/01/rashmi-ravija-kaanch-ke-shamiyane.html?m=1

Wednesday, February 22, 2017

मालती जोशी जी की स्नेह भरी पाती

आज मैं ऊपर आसमां नीचे....आज बेधड़क ऐसा कह सकती हूँ :) :)

आठवीं में थी तब धर्मयुग में जिनकी कहानी पढ़ी थी और अब तक याद है और बाद में लगातार उनकी कहानियां पढ़ती रही, आज उन प्रिय लेखिका "मालती जोशी दी " का हस्तलिखित पत्र मिला ।
जब हाल में उनसे मिली थी तो उन्हें अपनी किताब भेंट की थी। मुझे कोई अपेक्षा नहीं थी कि वे इसे पढ़ेंगी। मेरी किताब को उनके हाथों का स्पर्श मिला ,मैं उन्हें किताब दे पाई,यही सुख मेरे लिए बहुत बड़ा था। वैसे भी मैं संकोचवश अग्रजाओं से कभी नहीं पूछती कि , 'आपने मेरी किताब पढ़ी, कैसी लगी '।मुझे लगता था,वे लोग तो बड़े लोगों को पढ़ती होंगीं ।
उषाकिरण खान दी से भी नहीं पूछा था। बाद में विजयपुष्पम ने बताया कि वे तुम्हारी किताब का जिक्र कर रही थीं ,तब उनसे बात की । सूर्यबाला दी, उषा दी, मालती दी को मेरी किताब पसंद आई , इस से बढ़कर कोई ईनाम और क्या । वो भी उनलोगों ने खुद से बताया :)

मालती जोशी दी से मिलकर आई थी तो फेसबुक पर सारा विवरण लिख डाला था .

वे दिन याद आते हैं जब धर्मयुग में मालती जोशी जी की कहानी की अगली क़िस्त आने वाली होती थी, बेसब्री से अंक का इंतजार होता था और कहीं जो भाई के हाथ में पत्रिका पहले पड़ गई तो आंसू निकल आते थे। (वो पूरी पत्रिका पढ़े बगैर देता नहीं था :( )
कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि स्कूल-कॉलेज में जिनकी कहानियों की घनघोर प्रशंसिका हुआ करती थी , कभी उनके सामने बैठ कर एक अनौपचारिक सी गोष्ठी में उनके ही श्रीमुख से कहानी सुनने का सौभाग्य मिलेगा। मालती दी की ये अद्भुत कला है , वे बिना देखे पूरे भाव के साथ, मय डायलॉग सहित लंबी लम्बी कहानियाँ सुनाती हैं । और मंत्रमुग्ध से सबलोग एकटक उन पर नज़रे जमाये ,कहानी को आत्मसात करते रहते हैं ।

प्रख्यात पेंटर एवं लेखिका उषा भटनागर जी ने अपने आवास पर छोटी सी गोष्ठी आयोजित की थी, जिसमें मालती जोशी दी, पुष्पा भारती जी, सुधा अरोड़ा जी, सुमित्रा अग्रवाल जी, उर्मिला जी, छाया जी, रागिनी, चित्रा देसाई और मैं अकिंचन भी शामिल हुई ।
मालती दी से मिलते ही मैंने उनकी उस कहानी का जिक्र किया जिसकी नायिका का नाम इतना अच्छा लगा था कि मैंने स्कूल में ही अपना नाम 'रश्मि विधु' रख लिया था ('रविजा' शब्द बाद में मिला ) कथानक थोड़ा बहुत ही याद था ,मालती दी ने तुरंत कहानी का नाम बताया, ' निष्कासन'। उन्होंने पात्रों का नाम रखने में कहानीकारों को आने वाली परेशानियों का भी जिक्र किया कि कैसे हमेशा सजग रहना पड़ता है कि कोई बुरा चरित्र हो तो किसी जानने वाले का नाम ना रखा जाए ।उन्होंने बताया इसीलिये वे बहुत अलग से नाम रखती हैं, अपराजिता, बाँसुरी आदि। मुझे उनकी वो कहानी भी याद आ गई जिसमें लडक़ी का नाम 'बांसुरी' था । एक प्रेम सफल नहीं हो पाया था, लड़की एक हॉस्टल की वार्डेन बन गई थी और उसके हॉस्टल में ही उसके प्रेमी की बेटी 'बांसुरी' रहने आती है (शायद अपनी माँ को खोने के बाद ) बांसुरी के साथ रिश्ते की कश्मकश ही शायद कहानी का मूलभाव था ।मालती दी ने कहानी का नाम बताया, 'एक और देवदास ' (अब ये कहानी ढूंढ कर पढ़नी है) आज शाम उन्होंने दो कहानियां सुनाईं, 'नो सिम्पैथी प्लीज़'। स्त्रियों द्वारा एक पुरुष के मनोभावों को व्यक्त करते हुए कहानियाँ कम ही लिखी जातीं हैं । जब किसी लड़की के प्रेम सम्बन्ध को नकार कर उसकी शादी जबरन किसी और से कर दी जाती है तो सबकी सहानुभूति उस लड़की के साथ होती है ।इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता कि उस पुरुष पर क्या गुजरती है, जिसे पता होता है कि वह अपनी पत्नी का प्रेम नहीं है फिर भी वह रिश्ता निभाए जाता है ।कहानी इसी विषय की तरफ ध्यान दिलाती है।

मालती दी ने "काँच के शामियाने' पढ़कर अपनी टिप्पणी में कितना सच और सार्थक लिखा है, " शिक्षित होने का अर्थ सुसंस्कृत होना नहीं है । डिग्रियाँ मनुष्य को सभ्य नहीं बनातीं। आभिजात्य तो खून में ही होना चाहिए।वो ऊपर से ओढ़ने की वस्तु नहीं है। पौरुषी अहंकार मनुष्य को पशु बना देता है,इसका यह ज्वलंत उदाहरण है ।"
सादर नमन मालती दी 🙏🙏
(मालती जी के सुपुत्र जी का भी बहुत धन्यवाद जिन्होंने पता और फोन नम्बर की अनुपस्थिति में ये पत्र स्कैन कर मुझे मेल किया ।उनके इस प्रयास के लिए उनकी आभारी हूँ )
मालती जोशी जी  एवं पुष्प भारती जी

सुधा अरोड़ा जी और मालती जोशी जी के साथ
पुष्प भारती जी के संग