Thursday, January 21, 2016

काँच के शामियाने ' पर घुघूती जी के विचार

Ghughuti Basuti जी ,ब्लॉग  जगत में और अब फेसबुक पर भी अपने प्रखर विचार को दृढ़ता से रखने के लिए मशहूर एक जाना पहचना नाम हैं . अपने  चर्चित ब्लॉग   घुघूती बासूती   में उन्होंने कई महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर  आलेख लिखे हैं . ब्लॉग पर उनके प्यारे संस्मरण और अर्थपूर्ण  कवितायें भी पढ़ी जा सकती हैं .
 इस उपन्यास के बहाने बहुत जरूरी सवाल उठाया है कि आखिर माता-पिता किसी भी तरह लड़की को दूसरे के हवाले कर छुट्टी पा लेना क्यूँ चाहते हैं ?'
हर हाल में उसे ससुराल में निभाने की सीख दी जाती है .अगर लड़की लगातार प्रताड़ित होते हुए अपनी जान भी दे दे तो उसके माता-पिता उसकी मौत पर दो बूँद आंसू बहा लेंगे पर समय रहते ,उसे उस प्रताड़ना से छुटकारा दिलाने की कोशिश नहीं करेंगे .
स्थिति बदल रही है पर यह बदलाव समुद्र में एक बूँद जैसा है...बाकी समुद्र का पानी वैसा ही खारा है. 
बहुत आभारी हूँ ,आपने इतना गहरा विश्लेषण किया .बहुत बहुत शुक्रिया

                                                                      काँच  के  शामियाने 

यह एक ऐसी कहानी है जो किसी भी स्त्री समानता में विश्वास रखने वाले को ही नहीं, स्त्री को मानव मानने वाले तक के हृदय को निचोड़ कर रख देगी। इस कहानी को पढ़ते समय जितना आक्रोश अपने समाज पर, उसके दोहरे मापदंडों पर आता है उससे भी अधिक भारतीय माता पिता पर आता है। हर पीड़ित, चाहे दहेज पीड़ित, मार पीड़ित, तिरस्कृत स्त्री के पीछे उसका साथ न देने वाले माता पिता की भी गजब भूमिका रहती है।

यह कहानी है एक स्त्री की, एक आम भारतीय स्त्री की, जिसे परिवार तब तक वयस्क नहीं होने देता जब तक विवाह न हो जाए। परिवार लाड़ दुलार देगा किन्तु मासूमियत बनी रहनी चाहिए। सांसारिकता और चतुराई जिसे अंग्रेजी में स्ट्रीट स्मार्ट होना कहते हैं, जिसके चलते व्यक्ति आने वाली विपदा को भाँप सकता है, उससे अपना बचाव करने में सक्षम हो सकता है, वे नहीं होने चाहिए। उसका निरा अभाव विवाह से पहले स्त्री के गुण माने जाते हैं। वह पढ़ाई में तेज हो, कलाओं में कुशल हो, गृहकार्य में दक्ष हो किन्तु महत्त्वाकांक्षी न हो। नौकरी करे, महत्त्वाकांक्षाएँ पाले तो पति और ससुराल की अनुमति से और उनके अनुरूप। उसका व्यक्तित्व और इच्छाएँ पति के व्यक्तित्व और इच्छाओं का विस्तार भर हों। वह बिना रंग का, बिना आकार का द्रव्य हो जो जिस बर्तन में डाल दिया जाए उसका आकार और रंग ले सके।

कहानी की नायिका जया से भी यही सब अपेक्षाएँ की गईं और उससे भी आगे बढ़कर बहुत कुछ। उसे बिना आकार बिना रंग का द्रव्य न केवल पति और ससुराल वालों ने माना, जिसे जब तब जैसे मन किया आकर मथ दिया, किन्तु उसकी अपनी माँ ने भी उसे यही माना। इस उपन्यास की कथा का सबसे दुखद पहलू पति और ससुराल का दुर्व्यवहार नहीं है अपितु उसके अपने परिवार का रवैया है। ससुराल वालों की तरह वे बुरे नहीं हैं किन्तु बेटी की व्यथा से अधिक उनके लिए जैसे तैसे उसके बोझ से मुक्त रहना है। जरा सा भी, रेशे भर भी दामाद में मानवता दिख जाए तो उस ही का सहारा लिए वे जया के प्रति किसी भी कर्त्तव्य या ग्लानि से अपने को मुक्त कर लेते हैं। विधवा माँ इतनी भी असहाय नहीं है। जया के पिता का मकान है, जिसमें जया का भी हिस्सा होना चाहिए। किन्तु माँ का असहायता ओढ़ना मुझ माँ को भीतर तक झकझोर गया।

जया पर क्रोध आ सकता है कि प्रतिकार क्यों नहीं करती। किन्तु जब जन्म से ही प्रतिकार न करने की घुट्टी पिलाकर बेटियों को बड़ा किया जाए तो क्रोध पिघल जाता है।
बहुत से पाठकों को लग सकता है कि जया का पति इतना धूर्त और बुरा क्यों और कैसे हो सकता है। प्रायः हमारे समाज में इसके लिए भी पत्नी को ही दोष दिया जाता है, कि तुम क्रोध मत दिलाओ, तुम ही कुछ गलत करती होगी जो वह तुम्हें पीटता है। अर्थात उसे क्रोध करने का अधिकार और स्त्री को महसूस करने का, हिलने डुलने का भी अधिकार नहीं। साँस रोके रहे, शब्द बाहर न निकलने दे ताकि कोई बात इस विशिष्ठ मानव को बुरी न लग जाए।

लेखिका ने जया के पति का अच्छा मानसिक विश्लेषण भी किया है। घर का लाड़ला पहला पौत्र होने के कारण दादी का वर्षों उसे गोद में लिए घूमना, उसकी जिद को पूरा करने के लिए आधी रात को भी अपनी बहू से उसका मन पसन्द पकवाना आदि। इस पुरुष को तो जन्म से ही यह सिखाया गया कि स्त्री उसकी इच्छापूर्ती का साधन मात्र है। इसी पाठ को और जिद को वह जीवन भर गाँठ बाँधकर चला। इसी जिद में उसने जया से विवाह रचाया, इसी जिद में उसने जया को शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक रूप से तोड़ा और तहस नहस किया।

यह तो जया के भीतर की जिजिविषा थी, उसकी आन्तरिक शक्ति थी जिसे एक बार बेटी ने अपने जीने की चाह दिखाकर जागृत कर दिया और जया एक दयनीय अमानवीय जीवन से अपनी लगन, मेहनत और कलम के माध्यम से पुनः मानव जीवन ही नहीं जी अपितु सम्माननीय जीवन जी सकी। एक बार जब उसे राह दिख गई तो वह राह की हर रुकावट को या तो हटाती गई या उसकी बगल से अपने लिए मार्ग बनाती चली गई।

उपन्यास लगातार बाँधे रखता है। भाषा, शैली और कहानी सभी मजबूत हैं। लेखिका की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि जया हमें अपने ही बीच की कोई सहेली, बेटी नजर आती है। हम उससे इतना जुड़ जाते हैं कि उसका दुख हमें दुखी कर जाता है और उसकी सफलता उल्लसित। उसे जरा सा सहारा देता स्वयं असहाय, बड़े भाई के कोपभाजन से सहमा छोटा देवर और महरी हमें देवदूत प्रतीत होते हैं। हम उनके मानवीय व्यवहार से ही इतने द्रवित हो जाते हैं जैसे उन्होंने कोई असम्भव काम कर दिया हो क्योंकि कई घरों में यह तिनके का सहारा भी नहीं मिलता।
सच है कि जया जितना कष्ट भोगने का दुर्भाग्य सबके हिस्से नहीं आता। किन्तु हमारी पीढ़ी की और छोटे कस्बों और गाँवों की कम ही स्त्रियाँ ऐसी होंगी जिन्होंने मायके में यह ब्रह्म वाक्य न सुना हो कि 'यह या वह मायके में नहीं विवाह के बाद अपने घर में करना' और विवाह के बाद यही वाक्य बदल कर 'यह सब (जिसमें हँसना, उत्तर देना, अपने मन का खाना, पहनना कुछ भी शामिल हो सकता है) हमारे घर नहीं चलता, तुम्हारे मायके में चलता होगा।' 'यहाँ रहना है तो हमारे रीति रिवाज अनुसार चलो' कभी कहा जाता है कभी अनकहे ही समझा दिया जाता है।

देर सबेर हर स्त्री को बचपन और यौवन में यह आभास हो ही जाता है कि उसका कोई घर नहीं है, यदि है तो एक काँच का शामियाना जो कभी भी दरक कर उसे लहूलुहान ही नहीं बेघर कर सकता है।

रश्मि रविजा बधाई की पात्र हैं कि भावनाप्रधान होते हुए भी उनका यह उपन्यास बहुत कुछ सकरात्मक और ठोस बातें सिखा जाता है। यदि पाठक इससे कुछ भी सीख सकें तो बहुत सी बेटियों का जीवन नर्क होने से बच सकता है।
घुघूती बासूती

3 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (22.01.2016) को "अन्तर्जाल का सात साल का सफर" (चर्चा अंक-2229)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. समीक्षा पुस्तक को और पठनीय बनाती हुयी। इन विषयों में उदारता और उन्मुक्तता से सोचने की आवश्यकता है।

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  3. बढिया समीक्षा की है घुघूती जी ने.

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