Thursday, August 21, 2014

माँ बनी हैं, तो कर्तव्य भी निभाइए

आज सुबह सुबह प्रवीण शाह जी के फेसबुक स्टेटस पर नज़र पड़ी...

"शोक सूचना :-
'हिन्दी ब्लॉगिंग' का असामयिक निधन हो गया है।"

और शाम को वंदना अवस्थी दुबे ने फेसबुक पर लिखा ,
"ब्लॉग-जगत की हालत बहुत गम्भीर है भाई...सबने वहां लिखना बंद ही कर दिया..या बहुत कम कर दिया है. तो मुझे लगता है, कि हमें यहां फेसबुक पर ही एक ऐसा समूह बनाना चाहिये, जिस पर सभी अपनी ब्लॉग-पोस्ट का लिंक पेस्ट करें. समूह के सारे सदस्य महीने में कम से कम एक पोस्ट ब्लॉग पर लिखने के लिये प्रतिबद्ध हों, और यहां पोस्ट किये गये लिंक पर पहुंच कर कमेंट करने के लिये भी. ब्लॉग-जगत का बहुत अच्छा समय हमने देखा है, और अब फिर वही समय हम ही वापस लौटायेंगे....आमीन..."

और संयोग कुछ ऐसा हुआ कि मैं यह सब फेसबुक स्टेटस के रूप में लिखने वाली  थी पर फेसबुक के हिसाब से  पोस्ट बहुत लम्बी हो रही थी और मुझे सारी बातें समेटने का मन था .फिर वंदना की बात मस्तिष्क में कौंधी कि क्यूँ न ब्लॉग पर ही लिख दूँ ...

अगस्त का अपना  कोटा तो पूरा :)


आज अपनी बचपन की सखी पर फिर से गर्व हो आया . 

उसने अपनी बेटी का रिश्ता एक IIT और IIMA से पढ़े लड़के से तय किया. बेटी भी MBA कर एक अच्छी नौकरी में है. लड़के के पिता राज्य सरकार में सेक्रेटरी लेवल पर हैं. बातचीत में लड़के के थोड़े से गर्वीले होने की झलक  मिली पर उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और बात पक्की कर दी. शादी पक्की होने की खबर सुन  एक विजातीय लड़के ने जो उसकी बेटी से कॉन्फ्रेंस और सेमिनार वगैरह में मिल चुका था , लड़की से शादी  की इच्छा जाहिर की . मेरी सहेली ने अपनी बेटी से पूछा तो उसका कहना था , 'वो लड़के को जानती है ,दोनों दोस्त हैं, पर उनका कोई अफेयर नहीं है. जैसा उसका निर्णय हो ' सहेली ने विजातीय लड़के को मना  कर दिया .

लड़के-लड़की फोन पर बातें करने लगे .एक दिन बेटी ने अपनी माँ से कहा, 'तुम्हे सचमुच ये लड़का इतना पसंद है ?..मुझे थोडा घमंडी लगता है ,बिलकुल आत्ममुग्ध , केवल अपनी अचीवमेंट की बातें  ही करता रहता है . मेरी पढ़ाई और नौकरी को ज्यादा महत्व नहीं देता "

मेरी सहेली ने अपने बेटे को लड़के से मिलने भेजा . बेटे ने मिल कर कहा ,'मुझसे तो अच्छे से ही मिला .बातें करने में भी ठीक है. शायद शादी से पहले लड़की को इम्प्रेस करने के लिए बढ़ चढ़ कर बातें कर रहा है . यह इतनी चिंता की बात  नहीं है. ' 

जब शादी की तैयारियों की बातें होने लगी तो लड़के के पिता ने फरमाया कि ये बातें सिर्फ पुरुषों के बीच होंगी, महिलायें शामिल नहीं होंगी (जबकि मेरी सहेली एक उच्च  पद पर कार्यरत है )  .लड़की के पिता से उन्होंने कहा ,'आपकी एक ही बेटी है आप तो कंजूसी नहीं करेंगे . शादी का पूरा खर्च  तो आपको उठाना ही होगा' और साथ में उन्होंने बेटे के लिए एक महँगी कार और महानगर में एक फ़्लैट की मांग रख दी. साथ ही ये भी कहा कि बेटे को इस सम्बन्ध  में कुछ न कहा  जाए . सहेली के पति तो ये कहकर चले आये कि 'सबकी पत्नी घर की होम मिनिस्टर तो होती ही हैं ,मेरी पत्नी घर की फाइनेंस मिनिस्टर भी है ,उससे सलाह के बाद ही  कुछ कह पाऊंगा.'

मेरी फ्रेंड ने लड़के को फोन मिलाकर पूछा ,"किस मॉडल की कार तुम्हे पसंद है.  अपनी पसंद बताओ तो हम बुक कर दें " 
लड़का चौंक गया और बोला ," आप क्यूँ बुक करेंगी ?..इतना तो मैं कमा ही लेता हूँ कि अपनी पसंद की कार खरीद सकूँ "
लेकिन तुम्हारे पिताजी ने तो हमें  तुम्हारी पसंद की कार खरीदने के लिए कहा है "
"पापा ने आपसे और क्या क्या कहा है ?
ये मेरे और उनके बीच की बात  है , रहने दो " सहेली  के ये कहते ही लड़के ने फोन रख दिया . 

शाम को सहेली के पास लड़के के पिता का फोन आया .गुस्से में बोले, "आपने मेरे बेटे से क्यूँ बात की मैंने मना किया था न आपको "
"ये कोई चाइल्ड मैरेज है क्या ..कि लड़के की राय न पूछी जाए ' सहेली  बोली.
"आपकी एक ही बेटी है इतनी इतनी  ऊँची नौकरी वाले लड़के से रिश्ता करना चाहते हैं...और  अपनी बेटी के लिए इतना भी नहीं कर सकते हैं "
"हम अपनी बेटी के लिए क्या कर सकते हैं क्या नहीं उसकी बात जाने दीजिये पर आप तो अपने बेटे के लिए ,उसकी  शादी में एक बैंड भी नहीं ठीक कर सकते हैं .उसकी फरमाइश  भी हमसे ही की है ' सहेली ने कहा ( यू पी ,बिहार में शादी से जुड़ी हर छोटी बड़ी चीज़ का खर्च लड़की वाले ही उठाते हैं )
लड़के के पिता ने फोन काट दिया और उसके बाद दोनों पक्षों में कोई संवाद नहीं हुआ .

मेरी सहेली ऊँचे पद पर   है, पति डॉक्टर हैं, बेटा भी अच्छी  नौकरी में है, काफी जमीन जायदाद है .वो वर पक्ष की मांगें आराम से पूरी  कर सकती थी . लड़का अच्छी नौकरी में था .पिता बहुत पहुँच वाले थे . खानदान अच्छा था . लड़के की भी दहेज़ न लेने वाली बात उसे अच्छी  लगी थी. पर मेरी सहेली  ने अपनी बेटी की ख़ुशी सर्वोपरि रखी . कुछ लड़के का स्वभाव भी उसे खटक  रहा था और फिर उसने ये भी सोचा कि इस तरह के परिवार में लड़की जायेगी तो पता नहीं ,उसे कितना  कुछ सुनना सहना पड़े. और उसने लड़की के दूसरी जाति वाले दोस्त से संपर्क किया .और जब लड़के से मिली तो पाया कि वह लड़का उसकी बेटी की बहुत इज्जत करता है . उसने भी IIM से पढ़ाई की है पर CA के बाद. भले ही पहले वाले लड़के से थोड़े कम पैसे कमाता हो दूसरी जाति का है पर उसकी बेटी का सम्मान करता है,यह बात बहुत मायने रखती थी .उसने अपने नाते-रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद अपनी बेटी की शादी दूसरी जाति में करना तय कर लिया .

लेकिन यहाँ लड़के को अपने घर वालों को मनाने में समय लगा .उसके माता-पिता , समाज और अपने रिश्तेदारों के ताने से डर रहे थे . लेकिन जब मेरी सहेली और बेटी से मिले तो बहुत प्रभावित हुए. यहाँ तक कह दिया कि 'आपकी जैसी बेटी अगर हमारे समाज में होती तो हम उसे मांग कर घर ले आते "
यह बताते हुए मेरी सहेली का गला भर आया . जल्द ही दोनों की शादी होने वाली है .

अच्छा लग रहा है देख, मेरी कई सहेलियां अपनी बेटी की खुशियों  के लिए ढाल बन कर अपने पति,परिवार और समाज के सामने खडी हो जाती हैं. अपनी ज़िन्दगी में जितने भी समझौते करने पड़े ,जैसे भी ज़िन्दगी जी पर अपनी बेटियों को अच्छी  शिक्षा देने ,आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने और सुख सम्मान से भरी ज़िन्दगी देने के लिए कटिबद्ध हैं.
एक बार माँ बन जाने के बाद फिर ज़िन्दगी सिर्फ अपनी नहीं रह जाती.अपने बेटे/बेटियों के अच्छे  भविष्य के लिए हर प्रयास जरूरी है .

24 comments:

  1. जब भी कोई बात खटकती हो तो रिश्ते नहीं करने चाहिए. आपका अंतर्मन आपको रोक रहा होता है. आशा है ये युवा सुखी जीवन बिताएँगे .
    घुघूती बासूती

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  2. True ! . A Chinese proverb says “Parents who are afraid to put their foot down usually have children who step on their toes” .
    Above case is a nice teaching for parents who spend their lives in preparing future for their children instead of preparing their children for future.

    Nice Post

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  3. आपकी लिखी रचना शनिवार 23 अगस्त 2014 को लिंक की जाएगी........
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  4. बिल्कुल रश्मि अब वक्त आ गया है स्त्रियाँ स्वंय निर्णय लें और उन्हें क्रियान्वित भी करें ।

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  5. रश्मि, जब कहीं कुछ सकारात्मक पढती हूं, तो जीवन के प्रति आस्था कुछ बढ जाती है, वरना लगातार होने वाली नकारात्मक घटनाओं ने तो मन खराब कर रक्खा है. हर घर की मां अगर ऐसे ही समझदारी भरे निर्णय ले सके, तो बेटियों की तकलीफ़ें कम हो जायें...

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  6. सोच विचार कर निर्णय किया जाय , समय रहते ही चेतना बेहतर है ऐसे मामलों में .....

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  7. रिश्तों को सझना पड़ता है, और इस पर गंभीरता से विचार भी करना पड़ता है,
    रिश्तों के अर्थों को समझाती सार्थक प्रस्तुति
    सादर -----

    आग्रह है मेरे ब्लॉग में सम्मलित हों
    हम बेमतलब क्यों डर रहें हैं ----

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  8. निश्चित रूप से उन्होंने गर्व करने लायक कार्य किया है. काश हर माँ ऐसी होती पर दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है. छोटे शहरों और मध्यमवर्गीय परिवारों में माँ-बाप इन बातों का बिलकुल भी ख्याल नहीं रखते हैं. किसी भी तरह से बेटी की शादी अच्छे "घर" में हो जाये यही उनका प्रयास होता है चाहे अपनी औकात से बाहर खर्च करना पड़े या लड़के वालों की चापलूसी करनी पड़े.
    आपकी फ्रेंड ने अनुकरणीय काम किया है. उनके साथ आप भी साधुवाद की पात्र हैं जो ऐसे उदहारण सबके सामने प्रस्तुत करती हैं.

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  9. दहेज़ का अर्थ ही लालच है और ऐसे परिवार में बेटी को क्कैसे भेजा जा सकता है , मेरी समझ नहीं आता !
    मंगलकामनाएं इस लड़की को !

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  10. उम्मीदें अभी बहुत परवाज़ लेंगी ....

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  11. Ise hi samajhdari kahte hain....rishte me aadami dekhna chahihe, lekin log na jane kya kya dekhte hain! Bahut badhiya post ke liye apko badhai..

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  12. अच्छे लोग भी हैं सुनकर अच्छा लगता है ।

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  13. मुझे नहीं लगता कि हिन्दी ब्लोगिंग का निधन हो गया जैसी कोई बात है। यदि ऐसा होता तो फुरसतिया जैसे ब्लोगस 10 साल का समय नहीं बिता नहीं पाते। हाँ पुराने लोगों ने लिखना कम कर दिया है;नए लोग 2-4 पोस्ट लिख कर लिखना बंद कर दे रहे हैं। फिर भी ब्लोगिंग का अपना महत्व है वह हमेशा बना रहेगा। फेसबुक पर नयी पुरानी हलचल,चर्चा मंच जैसे कई समूह पहले से ही बने हुए हैं जो लिंक्स साझा करने का बेहतर मंच उपलब्ध कराते हैं । वास्तविकता तो यह है कि हम सिर्फ अपने लिखे को ही पढ़वाना चाहते हैं औरों को लिखे को पढ्न और उस पर चिंतन करना नहीं चाहते जिसकी वजह से ब्लोगिंग के निधन जैसी बातें सामने आ रही हैं।

    बाकी आपकी अपनी पोस्ट एक सामयिक एवं सकारात्मक सामाजिक संदेश देती है।

    सादर

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  14. लो जी मै भी आ गयी ब्लाग की ओर्1 मरने नही देंगे इस जगत को1मेरी ्र से इस देश की सभी लड्कियों के लिये मंगल कामनायें1

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  15. उम्मीद पर दुनिया चलती है.....निधन और जन्म साथ चलता रहता है यही प्रकृति न नियम है ...
    बढ़िया प्रस्तुति

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  16. aap ke blog par to kament ki suvidha mujhae mili haen par facebook par aap ne nahin dii haen , post badhiyaa haen

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  17. सकारात्मक संदेश देती सार्थक रचना

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  18. अपने चुने हुए परिवार में कुछ खटक रहा हो तो इनकार करने में ही कुशलता है !
    ईश्वर करे कि इन बच्चों के जीवन में खुशियाँ रहे !

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  19. रिश्तों में सोच विचार कर ही निर्णय लेना चाहिए ... और ऐसी जगह तो कटाई नहीं करना चाहिए जहां डिमांड वो भी शादी से पहले ही आनी शुरू हो जाएँ ...

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  20. मेरा तो यह मानना है की जिस घर में लोग मुँह खोलकर कोई मांग रखें उस घर में तो अपनी बेटी कतई न दो ...वैसे चाहे अपनी बेटी का अपनी कूवत के हिसाब से घर भर दो ....पर मांगने वालों को अपने आसपास न फटकने दो .....ऐसे लोग क्या इज़्ज़त करेंगे तुम्हारी बेटी की ..जिनका ईमान सिर्फ पैसा है ...मानवीय मूल्य नहीं

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