Tuesday, October 22, 2013

दिमाग के परदे पर देर तक चलती रहनेवाली फिल्म : शाहिद

वकील शाहिद आज़मी
बड़े दिनों से किसी फिल्म पर नहीं लिखा...पर हाल-फिलहाल में कोई ऐसी फिल्म भी नहीं देखी जो परदे पर देखने के बाद ,देर तक दिमाग के परदे पर भी चलती रहे. यह फिल्म थी 'शाहिद' एक सच्चे व्यक्ति के जीवन पर आधारित सच्ची कहानी ,जो वैसी की वैसी ही फिल्माई गयी है .
फिल्म 'शाहिद' मुंबई के वकील और सामाजिक कार्यकर्ता 'शाहिद आजमी' के जीवन से प्रेरित है, जिन्होंने गलतियां की ,उन्हें सुधारा और पैसे का लालच न कर उन गरीब लोगों की सहायता के लिए आगे आये जिनका कोई नहीं था. सात साल के अपने वकालत के कैरियर में उन्होंने 17 लोगों को झूठे मुक़दमे से छुड़ा कर बरी करवाया और अपनी इसी कोशिश में २०१० में स्वार्थी लोगों के गोली के शिकार भी हो गए.
निर्देशक हंसल मेहता ने इतनी ईमानदारी से यह फिल्म बनाई है कि उनके परिवार जनों ने भी कहा कि यह  फिल्म
९५% 'शाहिद आज़मी' के जीवन से जुडी सच्ची घटनाओं पर आधारित है.

हम अक्सर कहीं पढ़ते हैं कि कमउम्र के नौजवान गुमराह होकर पाकिस्तान द्वारा चलाये गए कैम्प में शामिल हो जाते हैं ,पर जब उनका मोहभंग हो जाता है, फिर भी उन्हें वहाँ से निकलने की कोई राह नज़र नहीं आती. शाहिद आज़मी भी ऐसे ही एक नौजवान थे जो  मुंबई के १९९३ के दंगों का नज़ारा देख , सोलह वर्ष की उम्र में भागकर पाकिस्तान द्वारा चलाये गए कैम्प में शामिल हो गए पर वहाँ के क्रियाकलाप देख बहुत जल्दी समझ गए कि वो गलत थे और जान की परवाह न कर भाग निकले. मुम्बई में आकर सामान्य जीवन जीने की कोशिश करने लगे और अपनी छूटी पढ़ाई दुबारा शुरू की, लेकिन पुलिस एक दिन उन्हें आतंकवादी होने के शक में जेल में डाल देती है. जेल में कैदियों को यातना देने वाले दृश्य बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्वक फिल्माए गए हैं. वहाँ की असलियत भी पता चल जाती है, और घबरा कर आँखें  भी नहीं बंद करनी पड़तीं . जेल में उन्हें अच्छे  बुरे दोनों तरह के लोग मिलते हैं ,एक जो उनका ब्रेनवाश कर फिर से जेहादी बनाना चाहते हैं, और दुसरे के .के मेनन जैसे लोग जो उन्हें पढाई जारी रखने के लिए प्रेरित करते हैं . (के.के. मेनन मेरे फेवरेट एक्टर हैं, पर उनका रोल बहुत छोटा था पर इम्प्रेसिव था ) ज़िन्दगी में भी तो हमें ऐसे ही लोग मिलते हैं पर यह व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है कि वो किसका साथ चुने और किसकी बात सुने .
 

शाहिद जेल में और जेल से छूटने के बाद भी लगन से अपनी पढ़ाई करते हैं और वकालत पास कर ,पैसे के लालच में झूठे मुक़दमे न लड़ कर गरीबों के मुक़दमे लड़ते हैं , जिनके पास फीस देने के पैसे नहीं होते और अक्सर जिन्हें बिना किसी ठोस सबूत के केवल शक के बिना पर जेल में डाल दिया जाता है. अपने कार्य में उन्हें बहुत विरोध भी सहना पड़ता  है, फोन पर लगातार धमकियां भी मिलती हैं, कभी चेहरे पर कालिख भी मल दी जाती है.फिर भी वे पीछे नहीं हटते और आखिरकार एक गैंगस्टर की गोलियों के शिकार हो जाते हैं.
फिम शाहिद में राजकुमार यादव


फिल्म में राजकुमार यादव ने जैसे 'शाहिद आज़मी' के किरदार को अभिनीत नहीं किया बल्कि जिया है . सुना है ,उन्होंने  शाहिद आज़मी के भाइयों से कई बार मिलकर उनकी बौडी लैंग्वेज़ ,उनके चलने का अंदाज़, उठने बैठने का तरीका, मैनरिज्म सीखने की  कोशिश की . फिल्म में  एक और चीज़ बहुत अच्छी लगी , शाहिद आज़मी के भाइयों का बल्कि पूरे परिवार का आपस में प्यार.(जो सच में भी होगा )  शाहिद के बड़े भाई, हर कदम पर उनका  साथ देते हैं, उन्हें जेल से छुडाने से लेकर , उनकी पढ़ाई का खर्च , वकालत पास कर लेने के बाद उनका ऑफिस सेट अप करने का खर्च. वे  लोन पर लोन लेते जाते हैं पर शाहिद की मदद करते हैं. और शाहिद भी एक आम इंसान हैं, भगवान नहीं...इसलिए उनमें मानवीय कमजोरियां भी हैं. परिवार वालों को बिना बताये ,वे एक तलाकशुदा महिला ,जो एक बच्चे की माँ भी है, मरियम से प्यार और शादी भी कर लेते हैं. अपने बड़े भाई पर परिवार का सारा बोझ डाल, वे अपने काम में लगे होते हैं और मरियम के साथ रहने लगते हैं. शायद समाज के लिए..दूसरों के लिए,गरीबों के लिए  कुछ करने का ज़ज्बा रखने वालों का अपना परिवार उपेक्षित ही रहता है. मरियम और उसके बच्चों को भी वे समय नहीं दे पाते .
कोर्ट रूम के दृश्य बहुत ही वास्तविक लगते हैं . आमलोग जो फिल्मों और टी.वी. से ही कोर्टरूम से परिचित हैं उन्हें न यहाँ साफ़ सुथरे बड़े से विटनेस बॉक्स दिखेंगे ,न जज के हथौड़े  की ठक ठक और न ही वकीलों का योर ऑनर कहते चीखना-चिल्लाना . वकीलों की आवाज़ भी तेज होती है...बहस तीखा होता है, एक दूसरे पर छींटाकशी भी होती है पर सब कुछ नकली नहीं बल्कि बहुत ही सहज लगता है. जज भी यहाँ उतने हेल्पलेस नहीं लगते और उनके प्रति भी सम्मान जागता है, मन में .

बहुत ही कम बजट में बनी यह यथार्थवादी फिल्म , शायद फिल्म में मनोरंजन ढूँढने वालों को पसंद न आये .पर ऐसी फ़िल्में देखनी चाहियें क्यूंकि समाज में ऐसे लोगों के विषय में हम बस अखबारों में चंद सतरें पढ़ते हैं और भूल जाते हैं...जब कोई निर्माता-निर्देशक हिम्मत कर उनके  जीवन को परदे पर उतारता है तब हमें,उनके विषय में विस्तार से  पता चलता है और फख्र भी होता है कि समाज में ऐसे लोग भी होते हैं.
फिल्म के हर कलाकार ने बहुत ही अच्छा काम किया है. मरियम के रोल में 'प्रभलीन संधू 'और बड़े भाई के रूप में 'मोहम्मद जीशान अय्यूब, का अभिनय बहुत प्रभावशाली है .


इस फिल्म को देखकर  हम शाहिद आज़मी को उनके किये काम  के विषय में जान पा रहे हैं ,पर उनका परिवार जो उन्हें भीतर-बाहर से जानता था , यह फिल्म देखने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है. शाहिद आज़मी के छोटे भाई 'खालिद आज़मी ' भी वकालत करते हैं और शाहिद  आज़मी के ही नक्श-ए-कदम पर चलकर गरीबों के हक के लिए काम कर रहे हैं .

फिल्म शुरू और ख़त्म इसी पंक्ति से होती है ,जो कितना सही प्रतीत होता है..."ज़ुल्म सहने वालों और ज़ुल्म करने वालों दोनों का कोई मजहब नहीं होता. मरता भी इंसान है और मारता भी इंसान है "


11 comments:

  1. यह फिल्म अभी नहीं देखी पर सभी कह रहे हैं कि एक बार देखने लायक फिल्म है।सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्म मुझे मनोरंजक नहीं लगती थी पर पान सिंह तोमर बहुत शानदार निकली उससे अपेक्षाएँ भी बढ़ गई।के के मेनन मेरे भी फेवरेट हैं।ये कुछ कलाकार जैसे के के मेनन ,मनोज वाजपेयी, आशुतोष राणा ,ओमपुरी ,किरन खैर ,इरफान खान आदि किसी भी फिल्म में कितने ही छोटे रोल में आएँ प्रभावित कर ही जाते हैं।

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  2. ऐसी फिल्‍में पता नहीं हमारे यहां आती भी है या नहीं, क्‍योंकि हमने उनका नाम ही नहीं सुना होता है। वैसे फिल्‍मों के बारे में हमारी रुचि भी कम ही है क्‍योंकि जैसी फिल्‍म अभी आती हैं उनमें नया कुछ नहीं होता है। जब भी टीवी पर यह फिल्‍म आएगी, अव
    श्‍य देखने का प्रयास रहेगा।

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  3. यह फिल्म देखनी है हमें भी .....

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  4. Good to see the popularity of realistic cinema among viewers growing . Also, the making of such films with lot of acting content inside too has increased. Though , songs and dance have its own place in Bollywood . 'Shaeed ' is in my yet to be seen list . Last week watched 'Lunch Box' .

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  5. शानदार समीक्षा.. जल्दी ही देखने का जुगाड़ करती हूं अब तो.

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  6. इतनी अच्छी फिरं पर ये ही दुबई में तो प्रदर्शित नहीं होने वाली ... एक तो छोटे बजट की दूसरा .... विषय ... खैर ... कभी नेट पे म्पुका मिला तो जरूर देखूंगा .. आपने इतनी तारीफ़ जो कर दि अब ...

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  7. पर्दे पर सच्चाई कम ही दिखती है. बढिया प्रयास है इस फिल्म का .

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  8. आपकी समीक्षा के चलते देखने पड़ेगी, वरना आजकल बिना विषय की पिक्चरों की लाइन लगी रहती है

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  9. निःसंदेह शाहिद का जीवन प्रेरक है भटके युवाओं को राह दिखाने में , अंजाम की परवाह किये बगैर !
    प्रेरक , उल्लेखनीय कार्य फिल्म से जुड़े सभी लोगो का !

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  10. आपकी समीक्षा फ़िल्म देखने को उकसा रही है।

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