Saturday, January 28, 2012

ईश्वर से बड़ा लेखक कौन ??


अक्सर जब दस-बारह या उस से ज्यादा किस्तों वाली कहनियाँ लिखती हूँ...तो उसके बाद...उस कहानी को लिखने की प्रक्रिया या कहें मेकिंग ऑफ द स्टोरी/नॉवेल....भी लिख डालती हूँ. इन दो किस्तों की कहानी के बाद कुछ लिखने का इरादा नहीं था...पर इस कहानी पर लोगो की प्रतिक्रियायों ने कुछ लिखने को बाध्य...नहीं बाध्य तो नहीं...हाँ, कुछ लिखने की इच्छा जरूर जगाई मन में.

इस कहानी की  थीम कुछ अलग सी थी और मुझे इसे लिखने में थोड़ी हिचकिचाहट भी  थी....कि कहीं ऐसा तो नहीं लगे कि ये कहानी 'बंद दरवाजों का सच 'विवाहेतर संबंधों ' को बढ़ावा दे रही  हो या फिर उसे सही ठहरा रही हो. मन में दुविधा थी और ऐसे में तो दोस्त ही काम आते हैं. वंदना अवस्थी दुबे ,राजी मेनन और रश्मि प्रभा जी से इसके प्लाट की चर्चा की....और तीनो ने ही सुन कर कहा...तुम्हे जरूर लिखना चाहिए. आभार उन सबका. अक्सर इस कहानी में वर्णित जैसे  हालात आते हैं लोगों की जिंदगी में......और इसके लिए अक्सर स्त्री को ही दोषी ठहरा दिया जाता है. पर इसके लिए सिर्फ स्त्री को गलत नहीं कहा  जा सकता...दोषी वे हालात होते हैं. 

कुछ लोगों ने टिप्पणियों में भी कहा और कुछ ने मेल में और बातचीत में भी कहा कि नीलिमा सही वक़्त पर संभल गयी वरना वास्तविक जीवन में ऐसा होता नहीं...लोग भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते और बहक जाते हैं. पर मैं इस से इत्तफाक नहीं रखती. अभी भी हमारे देश में देह की पवित्रता बहुत मायने रखती है. और यह बात पूरे विश्वास से इसलिए भी कह रही हूँ क्यूंकि यह कहानी एक सत्य घटना पर आधारित है. 

मेरी सहेली के पड़ोस में एक महिला रहने आई. साथ में उसके सास-ससुर भी आए थे. उन्होंने मेरी सहेली से कहा ...बहू पहली बार शहर में अकेले पति के साथ रहने आई है, जरा इसका ख्याल रखना. वे लोग अहिन्दीभाषी थे ..महिला को लोगों के साथ घुलने-मिलने में थोड़ा संकोच होता था. सहेली नौकरी करती है...काफी व्यस्त रहती है..फिर भी वह उक्त महिला का हाल-चाल पूछ लिया करती थी...कभी फ्री रहती तो अपने साथ बाज़ार वगैरह ले जाती क्यूंकि उस महिला का पति काफी व्यस्त रहता था...सुबह के गए देर रात को घर आया करता था.
मेरी सहेली ने  गौर किया...सामने वाली बिल्डिंग के टेरेस  से एक लड़का अक्सर उनकी बिल्डिंग की तरफ देखता रहता है....उसने इसे ,ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया...पर एक दिन वह छुट्टी ले घर पर थी तो देखा...वह लड़का उसके पड़ोस में उक्त महिला के घर गया. सहेली ने बाद में उस से पूछा भी...और समझाया भी...कि 'वह दूर ही रहे'..पर उस महिला ने कहा...'वे लोग सिर्फ अच्छे दोस्त हैं.." एकाध बार और सहेली ने उसके घर लड़के को आते देख उसे समझाने की कोशिश की....पर फिर बाद में चुप हो गयी  कि कहीं व्यर्थ की दखलअंदाजी ना लगे. 

इसके बाद घटनाक्रम  ने जो मोड़ लिया..वो अगर मैं कहानी में लिख देती तो नाटकीयता से भरपूर लगता लेकिन ऐसे ही नहीं कहते.. .. "God is  the greatest fiction writer "   उन लोगो का फ़्लैट का ग्यारह महीने का कॉन्ट्रेक्ट ख़त्म हो गया और उक्त महिला के पति ने उसी बिल्डिंग में  फ़्लैट किराए पर ले लिया...जिस बिल्डिंग में वो लड़का रहता था. आस-पास के सैकड़ों बिल्डिंग छोड़कर प्रौपर्टी डीलर ने उसी बिल्डिंग में उस महिला के पति को फ़्लैट दिखाया और उन्हें पसंद भी आ गया. अब वो महिला घबरा गयी...अब उसे लड़के के लक्षण भी ठीक नहीं लग रहे थे. एक ही बिल्डिंग में दूसरे माले पर वो महिला और सातवें माले पर वो लड़का रहने लगा. और वही हुआ जिसका उसे डर था. महिला के अवोइड करने पर वो लड़का समय-असमय उसे फोन करने लगा...और एक दिन जबरदस्ती उसके फ़्लैट में घुस आया....महिला ने किसी तरह भागकर पड़ोस में शरण ली. कह दिया की कोई अजनबी था. वो लड़का सीढियों से ऊपर चला गया. यह सब उसने मेरी सहेली को फोन पर बताया. 

पर बात यहीं ख़त्म नहीं होती. उस बिल्डिंग के लोग काफी चिंता में पड़ गए कि इतनी सिक्युरिटी के बाद भी कोई बाहर से कैसे बिल्डिंग में घुस आया. सोसायटी की मीटिंग हुई...वाचमैन की खबर ली गयी.  उस बिल्डिंग में भी मेरी कई सहेलियाँ रहती हैं...उन सबने मुझसे भी अपनी चिंता बांटी. मुझे अंदर की बात की खबर थी...पर उक्त महिला की खातिर मैने उन्हें सच्चाई नहीं बतायी. 

करीब  पांच वर्ष पहले की घटना  है,यह. उस महिला से मिलना तो दूर मैने उसे कभी देखा भी नहीं...सहेली ने नाम जरूर बताया होगा..पर अब तो वो भी नहीं याद......पर इस पूरे घटनाक्रम ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया कि जरूर वो महिला बहुत अकेलापन महसूस करती होगी...नए  शहर में...कोई दोस्त नहीं....हिंदी-अंग्रेजी  बोलने में कठिनाई..पति व्यस्त रहता होगा.... इसीलिए उसने उस लड़के से दोस्ती की होगी. और इसके लिए उस महिला को बिलकुल गलत नहीं कहा जा सकता. थोड़ी सराहना....थोड़ी केयरिंग... अपनी कहने..दुसरो की सुनने की इच्छा सबके भीतर होती है. 

जबतक उस लड़के ने  मीठी-मीठी बातें की ...उसे अच्छा लगा पर...जब इस से आगे बढ़कर उसने कुछ चाहा तो महिला का संस्कारी मन स्वीकार नहीं कर पाया. अभी भी हमारी संस्कृति में देह की पवित्रता ही अहम् होती  है. और रिश्ते एक निश्चित दूरी पर ही निभाये जाते हैं. इसलिए सिर्फ कहानी में ही नहीं..वास्तविक जीवन में भी लोग भावनाओं पर काबू रखना जानते हैं. 

यह कहानी बहुत ही वास्तविक सी लगती है....इसका थोड़ा श्रेय मेरी सहेली 'राजी' को भी जाता है. रोज मॉर्निंग वॉक पर मैं उस से इसके सीन डिस्कस किया करती थी....और उस से पूछती..ऐसा हो सकता है ना...और वो मुझे आश्वस्त करती. { जबरदस्ती कविता सुनायी जाती है...यह तो सब जानते हैं...पर जबरन कहानी भी सुनायी जाती है,यह सिर्फ राजी जानती है:).. पर मानती नहीं...कहती है..'वो एन्जॉय करती है,सुनना' }

वंदना ने भी सिर्फ आश्वस्त ही नहीं किया...बल्कि कहा था...इसी प्लाट पर मैं भी एक कहानी लिखती हूँ....मैने तो लिख डाला...अब मुझे भी वंदना की कहानी का इंतज़ार है...आप सब भी उस से फरमाइश करते रहिए :)

Tuesday, January 10, 2012

ज़ीरो पोल्यूशन वाला शहर 'माथेरान'


कुछ महीने पहले सहेलियों के साथ मुंबई के पास एक हिल स्टेशन 'माथेरान' गयी थी. जब फेसबुक पर फोटो लगाई तो कई लोगो ने कहा....'तस्वीरें यहाँ देख ली...विवरण तो ब्लॉग पर पढ़ने को मिलेगा." परन्तु मैने कहा.."कुछ ख़ास घटा ही नहीं...सब कुछ आराम से संपन्न हो गया तो क्या लिखूं?" ...दरअसल वहाँ जाते समय मिनी बस में बैठते ही मैने कहा था.."ईश्वर!! कुछ ऐसा ना घटे कि मुझे मुझे कोई पोस्ट लिखनी पड़े..." अक्सर होता यही है...जब कुछ मनोरंजक  या भयावह घटता है..तभी हम उस घटना के विषय में लिखने को उद्धत होते हैं..पर कई सहेलियों  ने मुझसे बहस की 'ऐसा क्यूँ??...कुछ अनचाहा घटेगा तभी लिखोगी?..उन दुष्टों ने मजाक में यह भी कह डाला.."इसका अर्थ तुम अपने अवचेतन में चाहती हो.. कि कुछ ऐसा घटे कि तुम्हे लिखना पड़े " 

उनकी बातों पर मनन कर ही रही थी कि एक अखबारनवीस की नज़र उन तस्वीरों पर पड़ गयी...और उन्होंने आग्रह कर डाला कि ' अब सामाजिक बदलाव हो रहे हैं..महिलाएँ बिना किसी पुरुष संरक्षक  के भी घूमने जाने लगी हैं'...इन सब मुद्दों पर एक आलेख लिख डालूं.." आलेख  लिखा गया...छप भी गया..{एक दूसरे आलेख की फरमाइश भी आ गयी...जो अब तक नहीं लिखी गयी  है :)} परन्तु एक बार ब्लॉग पर लिखने की आदत पड़ जाए तो पत्र-पत्रिकाओं में लिखना कठिन लगने लगता है...शब्द सीमा की वजह से. तब से सोच रखा था unedited version...को ब्लॉग पर डाल दूंगी...पर मौका ही नहीं मिला..और अब पंचगनी ट्रिप पर लिख डाला...'माथेरान' तो वैसे ही मेरी फेवरेट जगह है...नाराज़ हो गया...तो अब बुलाएगा भी नहीं...:)

शायद बचपन से हॉस्टल में रहने के कारण ..दोस्त जल्दी बन जाते हैं. मुंबई में भी कुछ सहेलियों का ग्रुप बन गया ..और हम साथ-साथ  शॉपिंग..फिल्मों के लिए जाने लगे. कुछ ज्यादा समय साथ बिताने की इच्छा हुई..और कभी-कभार दिन भर के पिकनिक का प्रोग्राम भी बनने लगा. हमारी हसरतें और बढीं...और हम दस सहेलियों ने मुंबई से 90 किलोमटर दूर प्रकृति की सुरम्य वादियों में बसे 'माथेरान भ्रमण' की योजना बनाई. पर इस प्लान को हकीकत का रूप देने में पूरा एक साल लग गया. क्यूंकि गृहणियों की कई जिम्मेवारियां होती हैं. कभी बच्चों की परीक्षा...कभी रिश्तेदारों का आगमन...कभी परिवार में कोई शादी-ब्याह..कभी किसी का बीमार पड़ जाना...दस सहेलियों का एक साथ दो दिन का समय निकालना बहुत मुश्किल हो रहा था....किसी तरह अनुकूल समय आया और एक तिथि तय हुई जब सब फ्री थे.

अब दूसरी रूकावट थी...सबके पति की सहमति...अब तक एक ही शहर में घूमने जाने और सुबह जाकर शाम तक वापस लौट आने की व्यवस्था से किसी के घर में कोई आपत्ति नहीं थी. पर ये दो दिन  के लिए...शहर से दूर..जाने की बात  थी. घरवालों को ,हमारी सुरक्षा की  चिंता भी वाजिब थी. ऐसा रिजॉर्ट चुना गया...जिसमे कुछ के पास उसमे पहले भी रुकने के अनुभव थे. कुछ अपनी उम्र का हवाला दिया गया कि अपना ख्याल तो रख ही सकते हैं.   

एक सुबह हम महिलाओं का ये काफिला..अपने सफ़र पर निकल पड़ा. और सुबह घर से निकलने से पहले...सब अपने घर में खाने का इंतजाम कर के आई थीं...किसी ने छोले बनाए थे..किसी ने इडली तो किसी ने आलू पराठे. हमारी मौजूदगी में भले ही बाहर से पिज्जा और नूडल्स मंगवाए जाएँ पर ये महिलाएँ अपराध-बोध नहीं महसूस करना चाहती थीं कि उनकी अनुपस्थिति में बाजार का खाना खाना पड़ा. 

माथेरान भारत का सबसे छोटा हिल-स्टेशन है. 1850 में ब्रिटिश हुकूमत ने हिल स्टेशन का दर्जा दे दिया था . यह समुद्र तल  से करीब २,६२५ फीट की उंचाई पर स्थित है. यह दुनिया के उन गिने-चुने स्थानों में से है ..जहाँ कोई भी सवारी नहीं जाती. बिलकुल जीरो पोल्यूशन है. पैदल ही घूमना होता है. या फिर  घोड़े या हाथ-रिक्शा पर बैठकर. नीचे से रसद और जरूरी सामान भी घोड़े या कुली ही ढो कर लाते हैं. पूरे माथेरान में पक्की सड़क भी नहीं है. बस लाल मिटटी से बने रास्ते हैं  और हैं... हरी-भरी घाटियाँ ..पहाड़..सुरम्य वादियाँ..प्रकृति का अनुपम  सान्निध्य .मुंबई के शोर-शराबे से दूर ,यह जगह बहुत आकर्षित करती है. 

माथेरान के लिए  मिनी बस के रवाना होते ही सबने पत्नी-बहू-माँ का अवतार परे कर दिया..यहाँ बस उनकी अपनी पहचान थी..कभी अन्त्याक्षरी खेली जा रही थी....कभी कोरस में गाने गाए जा रहे थे.. तो कभी अलग-अलग पोज़ में फोटो निकाले जा रहे थे. तीन घंटे का सफ़र कैसे कट गया..पता ही नहीं चला. माथेरान पहुँचने के पहले दो पड़ाव पड़ते हैं...एक निश्चित स्थान से कोई भी भारी गाड़ी आगे नहीं जाती...सिर्फ कार या टैक्सी से ही जाया जा सकता है. हमें भी  मिनी बस छोड़ना पड़ा. महिलाओं को देखकर भी टैक्सी वाले अपनी मनमर्जी का किराया नहीं वसूल सके. कुछ सहेलियाँ अच्छी मराठी जानती हैं. उन्होंने धाराप्रवाह मराठी में अच्छी तोल-मोल की . टैक्सी से पैतालीस मिनट की यात्रा के बाद एक दूसरा पड़ाव आता है...यहाँ से ऊपर कोई वाहन नहीं जाता ..सिर्फ घोड़े या रिक्शे पर ही जाया जा सकता है. बाकी सब तो घोड़े और रिक्शे पर सवार हो लिए पर पैदल चलने की शौक़ीन तंगम,वैशाली,राजी और मैने पैदल ही चलना शुरू कर दिया. रास्ते में कुछ काफी उम्रदराज़ महिलाएँ भी सर पर बड़ी-बड़ी अटैची और बैग उठाये दिखीं. पुरुषों ने तो सर पर तीन तीन अटैची और दोनों बाहों से दो -दो बड़े बैग लटका रखे थे. स्टेशन पर तो फिर भी थोड़ी दूरी ही तय करनी होती है...यहाँ आधे घंटे की चढ़ाई थी...पर इनकी आजीविका का साधन ही यही है.  

मेरे हाथ में एक जूस की बॉटल थी...मैने बैग में ही रखी थी. एक जगह रुक कर हम सबने पिया..थोड़ी सी बची थी...मैने वापस बैग में नहीं रखा और रास्ते में एक बन्दर ने लपक कर  हाथ से जूस की बोतल ले ली. और एकदम एक्सपर्ट की तरह ढक्कन खोल गट-गट करके सारा जूस पी गया. घने जंगल के बीच का  रास्ता...जगह-जगह बिकते अमरुद-इमली- खीरा और अदरक-इलायची वाले ढाबे की चाय ने हमारी वाक को और खुशनुमा बना दिया.

हमने कॉटेज बुक किया था...बाहर बरामदे में कुर्सी पर बैठी बाकी सहेलियाँ हमारे सामान के साथ  हमारा इंतज़ार कर रही थीं....अभी हम अपनी यात्रा का बखान कर ही रहे थे कि एक बन्दर लपक कर आया....और उसने एक बैग की जिप खोलकर एक थैली निकाल ली...उस थैली में कैमरा.. चार्ज़र वगैरह थे....मैने भगाने की कोशिश की तो अपने काले-काले दाँत निकाल कर इतने जोर से गुर्राया कि मैं अपना पर्स फेंक-फांक कर भागी. एक सहेली के हाथ में छतरी थी..उसने छतरी से डराया तब वो भागा...हमने सोचा था...बाहर बैठ कर सुन्दर नजारे देखते हुए चाय पी जायेगी...पर बंदरों के आतंक की वजह से हमें अंदर ही बैठना पडा.

इसके बाद हम माथेरान घूमने निकल पड़े...अधिकाँश लोग छतरी या रेनकोट लाना भूल गए थे. {अनीता ने तो रात में छतरी निकाल कर बैग के पास रखी कि मुझे सुबह लेकर जाना है...और सुबह वहाँ  छतरी पड़ी देख कर गुस्सा होने लगी...घर में कोई भी सामान जगह पर नहीं रखता और छतरी सहेज कर अंदर जगह पर रख आई:)}....मुझे..राजी,वैशाली, तंगम को  तो छतरी लाने का ध्यान भी नहीं रहा. हम सबने वहीँ बाज़ार से बीस- बीस रुपये का रेनकोट  (जो बड़ी सी एक प्लास्टिक की शीट थी...)और पाँच रुपये की टोपी खरीदी और सबने शान से पहनकर तस्वीरें भी खिंचवायीं. इस तरह की हरकतें...परिवारजनों के सामने नहीं हो सकतीं...दोस्तों के साथ ही संभव  है.

किसी भी हिलस्टेशन की तरह...यहाँ भी..हार्ट -पॉइंट..मंकी पॉइंट...हनीमून पॉइंट...लुइज़ा पॉइंट  आदि है...हर पॉइंट से प्रकृति का स्वरूप इतना ख़ूबसूरत लगता कि कदम आगे बढ़ने से इनकार करने लगते. इको पॉइंट पर खूब एक दूसरे का नाम लेकर पुकारा गाया. 

अक्सर हिल स्टेशन में शाम के बाद थोड़ी शान्ति हो जाती है...टूरिस्ट बोर ना हों..इसके लिए रिजॉर्ट वाले रात में आकर्षक कार्यक्रम रखते हैं.  शर्मिला और मैं...पहले भी इस रिजॉर्ट में रुक चुके थे..हमें पता था..यहाँ Karaoke होता है...पर उस दिन तम्बोला का कार्यक्रम था.....हमारी टोली होटल मैनेजर के पास पहुँच गयी..कि हमने तो Karaoke  की वजह से ये होटल चुना...हमें तो वही चाहिए...और वह आधे घंटे के लिए सिर्फ हमारे ग्रुप की खातिर Karaoke  के लिए मान गया था...इसमें  किसी भी गाने का म्युज़िक बजता रहता  है...और सामने स्क्रीन पर गीत के दृश्य के साथ दो दो पंक्तियों में गाने के बोल उभरते रहते  हैं...उन बोलो को पढ़कर म्युज़िक के साथ गाना गाना होता है...गाना ख़त्म होने पर स्क्रीन पर ही मार्क्स भी उभरते हैं...किसी को पच्चीस मिले किसी को सत्तर तो किसी को अडतालीस....पर लुत्फ़ सबने जम कर उठाया.(अच्छा हुआ...आधे घंटे का ही कार्यक्रम था और मेरी बारी आने से रह गयी....वरना मुश्किल हो जाती....वहाँ माइनस में मार्क्स देने का प्रावधान नहीं था :)) ..इसके बाद डिस्को का कार्यक्रम था..... कुछ ने शायद कभी बारात में भी डांस नहीं किया था...पर यहाँ सहेलियों का साथ पाकर एक घंटे तक सब ने जम कर पैर थिरकाए. हमारी मण्डली ने पूरे फ्लोर पर ही कब्ज़ा कर रखा था...हमारी इतनी बड़ी मण्डली देखकर दूसरे गेस्ट दरवाजे से ही लौट गए...दो-तीन महिलाएँ जरूर शामिल हो गयीं...और उनसे  दोस्ती भी हो गयी. 

इतना थके होने के बाद भी नींद कहाँ ..दो  बजे रात तक अन्त्याक्षरी खेली गयी...और इतनी देर से सोने के बावजूद सबलोग सुबह सुबह कोहरे में लिपटी  प्रकृति के दर्शनार्थ निकल पड़ीं . घनघोर जंगल...और चारो तरफ धुंध छाई हुई...फिर भी किसी तरह का डर छू तक नहीं गया...धुंध में लिपटे नैसर्गिक दृश्य कभी छुप  जाते तो कभी आँखों के सामने आ जाते. अनुपम स्वर्गिक दृश्य था. राजी..तंगम..इंदिरा वगैरह तस्वीरें खींचने  -खिंचवाने में व्यस्त थीं...और हम बाकी लोग आगे निकल आए...हमें लगा...लौटने का रास्ता तो एक ही है...काफी देर होती देख...हम रुक-रुक कर उनके नाम की पुकार लगाते रहे...आश्चर्य भी हो रहा था...और गुस्सा भी आ रहा था...कैमरे के साथ इतना भी क्या मशगूल होना...और होटल आ कर देखा...पता नहीं किस रास्ते से वे लोग हमसे पहले ही पहुँच गयी थीं...और सोच रही थीं...हमें इतना वक़्त क्यूँ लग रहा है. 

होटल वापस आकर सबने बड़े भारी मन से पैकिंग की और माथेरान को अलविदा कहा. पर बस में बैठते ही...अगले किसी ऐसे ही भ्रमण की योजना बनने लगी...जिसके कार्यान्वयन में भले ही साल लग जाएँ...पर कार्यान्वित होगा जरूर...क्यूंकि आज की महिलाओं  ने घर की देहरी से बाहर  निकल कर खुद के लिए भी पल दो पल के लिए जीना सीख लिया है. 

Wednesday, January 4, 2012

स्ट्राबेरीज़ के शहर में


मुंबई आने से पहले...पंचगनी के विषय में इतना ही पता था कि वहाँ फिल्मो की शूटिंग होती है...फिल्म कलाकारों के बड़े बड़े बंगले हैं...और उनके बच्चे वहाँ के बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते हैं. यहाँ आने के बाद पता चला....बड़ा ख़ूबसूरत सा हिल स्टेशन है...जहाँ की स्ट्राबेरीज  बहुत मशहूर हैं.

इस बार नए साल का स्वागत पंचगनी में करने की ही योजना बनी. अब बच्चे बड़े हो गए हैं...और अब नई चीज़ें उन्हें  आकर्षित करती हैं. उनका सबसे बड़ा आकर्षण था, 'पैरा ग्लाइडिंग' . मेरे मन में कशमकश चल रही थी...मन भी हो रहा था...और थोड़ा डर भी लग रहा था...फिर ये ख्याल भी आ रहा था कि अब नई चीज़ें जल्दी जल्दी ट्राई कर ली जाएँ..वरना आगे उम्र इजाज़त नहीं देने वाली. उस पर से एक सहेली का  उदाहरण  सामने था..जो हाल में ही ऋषिकेश में एक  ऊँची चोटी से पानी में छलांग लगाने का अनुभव ले चुकी थी...मन में बीसियों बार कल्पना करती कि 'यूँ दौड़ते हुए जाना है और पहाड़ी से कूद जाना है..बस इतना ही करना है'...एक बार कूद गए फिर तो जो होना है, होकर रहेगा...अपना वश छूट जाएगा. बस दौड़ने के लिए हिम्मत जुटानी है...और अगर डर लगा..तो ZNMD के फरहान अख्तर की तरह इंस्ट्रक्टर को कह दूंगी..'पुश मी ' . इसमें झिझक कैसी.... सामान संभालते ..रास्ते में भी बस पूरे समय दिमाग में यही चलता रहता. पर  घर वालों से  ये सारा कुछ शेयर नहीं किया..वहाँ तो हिम्मत ही दिखाती रही. :) पर पंचगनी पहुँचने पर पता चला...कुछ दुर्घटनाएं हो चुकी हैं...जिसकी वजह से सरकार ने 'पैरा ग्लाइडिंग' बंद कर दी है...पैसे के लालच में प्रबंधक अब भी चोरी छुपे करवाते हैं...(शायद पुलिस वालों को पैसे खिलाकर )  ..पर यह ना मेरे पतिदेव को गवारा था और ना मुझे...बच्चे तो ऐसे  निराश  हुए ..मानो उनके लिए सारी ट्रिप ही व्यर्थ हो गयी....पर मुझे जैसे सुकून आ गया..चलो अब अगली बार तक के लिए ये कशमकश टली...और अब जाकर मेरा दिमाग कुछ और देखने-समझने लायक हुआ....इतने ख़ूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से बेखबर मैं 'पैरा ग्लाइडिंग' की कल्पना  में ही उलझी थी.

पंचगनी...का वास्तविक नाम पांचगनी  है... क्यूंकि यह  'सह्याद्री पर्वत श्रृंखला' के मध्य में स्थित , पांच  पहाड़ियों से घिरा हुआ है. ब्रिटिश राज्य के समय गर्मी से निजात पाने के लिए एक 'हिल स्टेशन' के  रूप में इसे विकसित किया गया.1860 में 'जौन चेसन' ने पांच गाँवों से घिरे इस क्षेत्र के विकास में अहम् भूमिका निभाई. बारहों महीने यहाँ का मौसम बहुत ही सुहाना रहता है..इसी वजह से ज्यादातर ,पुणे मुंबई से पूरे साल लोग पौल्युशन से दो घड़ी ब्रेक लेने को यहाँ का रुख करते हैं. मुंबई से यह १०० किलोमीटर की दूरी  पर है. पंचगनी  से अठारह किलोमीटर की दूरी पर महाबलेश्वर है....टूरिस्ट पंचगनी में रूकें या महाबलेश्वर में..दोनों ही जगह की सैर का आनंद जरूर लेते हैं. 

सिडनी पॉइंट..मंकी पॉइंट...विल्सन पॉइंट..एलिफैंट पॉइंट..आर्थर सीट जैसे कई ख़ूबसूरत पॉइंट्स हैं जहाँ से इस शहर के बीचोबीच बहती कृष्णा नदी और सहयाद्री पर्वत श्रृंखला का अलग-अलग कोण से नज़ारा लिया जा सकता है. 

यहाँ तिब्बत के बाद...एशिया का दूसरा सबसे लम्बा पठार है, 'टेबल लैंड' . पहाड़ी के ऊपर इतनी  समतल जगह है कि जहाँ एक छोटा सा प्लेन लैंड कर सकता है.

, एलिफैंट पॉइंट
डेविल्स किचन नाम की गुफाएं हैं...मान्यता है कि, पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इन गुफाओं में छुप कर गुजारा था. 'टेबल लैंड'  पर पत्थरों पर एक बड़े से पंजे के निशान हैं...कहा जाता है कि यह भीम के पैरों के निशान  हैं.

1980 तक पंचगनी सिर्फ बोर्डिंग स्कूल...और स्वास्थ्य सुधारने के स्थान के रूप में ही विख्यात था..पर अब पूरे साल टूरिस्ट का जमघट लगा रहता है.
पर यह जमघट मिक्स्ड क्राउड का होता  है.. शिमला-मसूरी की तरह सिर्फ हनीमून कपल्स नहीं होते . {शिमला में हमने हाथों में पहने चूड़े देख  सिर्फ मालरोड पर  ११२ कपल्स गिने थे. :)}

अच्छा लग रहा था देख...कुछ लोग अपने उम्रदराज़ माता-पिता को लेकर भी आए थे और वे लोग भी पूरी गर्मजोशी से पहाड़ियां चढ़-उतर रहे थे. छोटे बच्चों के माता-पिता की परेशानी  देख...हमें अपने दिन याद आ  रहे थे...जब एक बेटा किसी  चीज़ के लिए हाथ पकड़ कर एक तरफ खींचता तो दूसरा दूसरी तरफ....पर एक चीज़ बड़े जोरों से खटक रही थी..बिरला ही कोई था...जो उन सुन्दर  दृश्यों का अवलोकन कर रहा था...सबलोग बस एक दूसरे की फोटो उतारने में ही व्यस्त थे...किस एंगल से दृश्य ख़ूबसूरत लग रहा है की जगह किस दृश्य के साथ खुद अच्छे लग रहे हैं...इसकी अहमियत ज्यादा थी. इतनी मेहनत से 'टेबल लैंड ' पर सबलोग सूर्यास्त देखने आए थे...पर उस दृश्य को कैमरे में कैद करने की कवायद ही अहम्  थी. {हमलोग कोई अपवाद नहीं थे..पर मैं बार-बार आगाह कर रही थी(खुद को भी :))..पहले कुछ देर देखने के बाद कैमरे को हाथ लगाएं}. सूर्यास्त की किरणों ने तालाब के पानी को दो रंगों में विभक्त कर दिया था...एक हिस्सा सिन्दूरी लाल था तो दूसरा गहरा नीला..जैसे किसी ने बीच से एक लकीर खींच दी हो......इस तरह की पेंटिंग करते वक्त हाथ कितने बार रुकते थे... कि कहीं नकली ना लगे...और बीच के हिस्से में मैं लाल और नीले को स्मज करने की कोशिश करती थी..जबकि यहाँ प्रकृति ने पूरे ठसक से बिना रंग वाले पानी को दो गहरे रंगों में बाँट रखा था .

किसी भी पहाड़ी शहर  की तरह..ख़ूबसूरत घाटियाँ...हरे-भरे पहाड़...झील.....पुराने मंदिर पंचगनी के मुख्य आकर्षण है. एक मंदिर जो कृष्णा नदी के उद्गम पर बना है...कहते हैं चार हज़ार वर्ष पुराना है. मंदिर के परिसर में एक नंदी बैल की मूर्ति रखी है. जिसके सामने और पीछे एक सूराख  है...उस सूराख से आँख लगा कर देखने पर...मूर्ति बिलकुल स्पष्ट  नज़र आती है. शायद यह जाति व्यवस्था का ही नतीजा हो. कुछ विशेष जाति के लोगो को मंदिर में जाने की इजाज़त नहीं होगी . मंदिर का निर्माण करने वाले किसी कारीगर ने ही यह युक्ति निकाली होगी क्यूंकि मंदिर का निर्माण भले ही उसके हाथों हुआ हो...पर उसके अंदर तो उसका जाना भी वर्जित ही होगा.


महाराष्ट्र के हर शहर की तरह यहाँ भी गणपति के विशाल मंदिर हैं...जिनका काफी महात्म्य है.
भीम के पैरों के निशान (कथित)


पंचगनी की आर्थिक व्यवस्था...टूरिस्ट पर ही निर्भर है. बारिश के दिनों में चार महीने टूरिस्ट का अकाल रहता है....इसलिए वहाँ के लोग बाकी बचे महीनो में दुगुनी मेहनत करते हैं. हमने जिसकी गाड़ी किराए पर ली थी ..वह ड्राइवर  अपनी दिनचर्या बता रहा था...दिन भर वह टूरिस्ट को पंचगनी-महाबलेश्वर घुमाता है. रात के नौ बजे..लम्बी दूरी की बस लेकर जाता है...सुबह चार बजे वापस लौटता है. और फिर नौ बजे से टूरिस्ट को घुमाने का रूटीन शुरू. जब मैने पूछा.."नींद कैसे पूरी होती है..?" तो कहने लगा....'जब टूरिस्ट खाने-पीने के लिए..या कोई पॉइंट देखने जाते हैं...बीच -बीच में  सो लेता हूँ'.. मैने अपनी आशंका जता दी.."ऐसे में एक्सीडेंट हो सकते हैं" लेकिन उसका कहना था..पिछले बीस साल से उसका यही रूटीन है. कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ...और अब अपनी मेहनत से उसने दो ट्रक और चार गाड़ियां कर ली हैं....फिर भी उसने अपनी मेहनत  में कमी नहीं की..बच्चे बारहवीं और दसवीं में हैं...उन्हें एक अच्छा भविष्य देना है..बस अब .वे बच्चे पिता की इस मेहनत को निष्फल ना जाने दें.  पंचगनी की खास बात है कि यहाँ के 82% लोग साक्षर है..जो भारत के औसत 65% साक्षर से ज्यादा है. 


नमी से बचाने के लिए प्लास्टिक से ढकी स्ट्राबेरी  की  क्यारियाँ 
मुंबई के ट्रैफिक जैम से त्रस्त लोगों को सबसे अच्छी वहाँ की लॉंग ड्राइव लगनी  चाहिए . दोनो तरफ  पेडों से घिरा संकरा  सा रास्ता. कई जगह दोनों तरफ की पेडों की शाखाएं आपस में मिल गयी थीं और रास्ते पर दूर तक एक  लम्बी कनात सी तन गयी थी. रास्ते  में जगह जगह.. छोटी  छोटी मेजों पर  सजे स्ट्राबेरीज   अपने ग्राहकों का इंतज़ार कर रहे थे. स्ट्राबेरी पंचगनी का मुख्य उत्पादन है और २०११ में इसके उत्पादन का टर्न ओवर सौ करोड़ था. इसे एक्सपोर्ट भी किया जाता है. पूरे भातर में स्ट्राबेरी की खपत का 87% पंचगनी से ही पूरा होता है. इसका 80%फ्रेश फ्रूट के रूप में ही खाया जाता है..और बीस प्रतिशत का  जैम और सिरप बनाने में उपयोग होता है. मैप्रो गार्डन भी एक दर्शनीय स्थल ही बन गया है..जहाँ स्ट्राबेरी के जैम सिरप कैसे बनते हैं...देखा जा सकता है. पंचगनी -महाबलेश्वर आए और कोई फ्रेश क्रीम के साथ स्ट्राबेरी का स्वाद ना ले..ये नामुमकिन है. पेश करने का अंदाज़ भी इतना  दिलकश रहता है कि कैलोरी की चिंता भूलनी ही पड़ती है. कई दुकानों पर  दुकान के मालिक के साथ...शाहरुख खान..जौन अब्राहम..अक्षय कुमार जैसे सितारों की तस्वीरें लगी हुई थीं...अक्सर यहाँ शूटिंग होती रहती है..

स्ट्राबेरी विद फ्रेश क्रीम (कैलोरीज़  कौन याद रखे )
करीब चालीस बोर्डिंग स्कूल है वहाँ...इन दिनों स्कूल बंद थे...पर कुछ स्कूली, लडकियाँ..गंदे से एक ठेले पर चाट खाते हुए दिख गयीं...(या तो वे घर नहीं गयी होंगी या...पैरेंट्स भी छुट्टियाँ मनाने यहीं आ गए होंगे ) पैरेंट्स शायद हाथ भी बिसलरी से धुलवाते होंगे...पर यहाँ बेफिक्री से वे चटखारे लेकर गोलगप्पे खा रही थीं...पहनावे और बातचीत का लहज़ा अत्याधुनिक था....पर अच्छा लगा, देख.....वे ठेले वाले को बड़े अदब से भैया कह कर संबोधित कर रही थीं....बाकी तो आम लड़कियों सी ही एक दूसरे पर हँसते हुए गिरना और क्लास के हैंडसम लडको की बातें ...किसने किसे देखा..और किसने किसे इग्नोर  मारा...

सारे होटल्स दुल्हन से सजे थे...कहीं 'ओपन एयर डिस्को' था तो कहीं 'पूल साइड पार्टी'...ग्राहकों को आकर्षित करने के एक से एक बढ़ कर पैंतरे...जो अमूमन हर पर्यटन स्थल पर होते हैं...

लौटते हुए लगा..जैसे सारा पुणे, मुंबई ही छुट्टियाँ मनाने गया हुआ था..एक एक इंच गाड़ी सरक रही थी...घर पहुँचने में नियत समय से दो घंटे ज्यादा लग गए...हम..उसी शोर शराबे से भरपूर... भीड़ भरी दुनिया में वापस लौट आए थे..जो हकीकत भी था और अपना सा भी...आदत में जो शामिल है...