Tuesday, November 20, 2012

कुछ अनुत्तरित प्रश्न

कल कुछ छठ पूजा के दृश्य देखने के लिए न्यूज़ चैनल ऑन किया और खबर ये मिली कि पटना में छठ घाट पर एक अस्थाई बांस का पुल टूट जाने से मची भगदड़ में कई लोगों की मृत्यु हो गयी। जिसमे ज्यादातर बच्चे और महिलायें  शामिल हैं . ईश्वर उन सबकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें .


ऐसा समय ही आता है जब ईश्वर पर से विश्वास हिलने लगता है। ईश्वर को लेकर बहस से मैं हमेशा दूर रहती हूँ। न तो मैं घोर आस्तिक हूँ न ही नास्तिक। 
बचपन से बड़ों ने जहाँ कहा, सर झुका दिया। तीज त्यौहार पसंद हैं , और मैं अपने मन से भी ये सवाल नहीं करती कि ईश्वर में आस्था की वजह से पसंद हैं या फिर उनसे जुडी दूसरी  बातों के लिए। हालांकि जब मेरे भाई की शादी हुई थी और पहली तीज के लिए भाई-भाभी में बहस चल रही थी, भाभी तीज का पूरे दिन का व्रत रखना चाहती थी और भाई यह कहकर मना कर रहा था कि 'उसे ऐसे कर्मकांडों में विश्वास नहीं ' तब मैंने उसे यही समझाया था अगर भाभी व्रत रखना  चाहती है तो रखने  दो , रोज की दैनंदिन एकरसता से कुछ अलग होता है। घर का माहौल बदल जाता है। शौपिंग करना ..पूजा की तैयारी करना , घर की साफ़ सफाई, सजावट करना ,प्रसाद बनाना , लोगों  का आना जाना, किसी भी त्यौहार से जुडी कई सारी बातें होती हैं, जो घर का माहौल बिलकुल अलग सा खुशनुमा बना देती  है। 
और वैसे भी व्रत रखे या नहीं ये भाभी (या किसी भी स्त्री का )  का निर्णय होना चाहिए। कई लोग प्यार में कहते हैं ,मैंने तो अपनी पत्नी को करवा चौथ या तीज का व्रत नहीं रखने दिया अपने हाथों  से उसे खाना खिला दिया। उन पतियों के प्यार के आगे नतमस्तक पर ये निर्णय आप अपनी पत्नी पर ही छोड़ दें, तो बेहतर। उन्हें अपना निर्णय लेने की आजादी होनी चाहिए और व्रत रखना कोई ख़ुदकुशी नहीं हैं कि  जबरन रोका जाए। अगर जबरन रोका जाए तो फिर ये भी आपकी पुरुष मानसिकता की तानाशाही ही कहलाएगी। खैर भाभी तो व्रत रखती  ही है 

उन्हें यह सब कहने के बाद, मैंने अपने मन को टटोला आखिर मैं क्यूँ दीवाली, तीज ,गणपति, सब इतने शौक से मनाती हूँ। शायद उनसे जुडी तमाम इन्हीं बातों के लिए। और मैं भगवान के आगे भी उसी श्रद्धा से हाथ जोडती हूँ जैसे अपने किसी बड़े बुजुर्ग के सामने . उनका आशीर्वाद लेने के लिए। एक बार मैंने अपनी  पोस्ट में  मजाक में लिखा था 'मेरी इस बात से लोग कहीं मुझे नास्तिक न समझ लें' इस पर शरद कोकास जी  ने अपने कमेन्ट में लिखा था "आपको नास्तिक बनने  के लिए बहुत मेहनत  करनी पड़ेगी, ऐसे ही कोई नास्तिक नहीं बन जाता " तो मैं ऐसी   मेहनत  से इनकार करती हूँ। न तो मुझे ये सिद्ध करना है कि  ईश्वर  है न ही ये सिद्ध  करना है कि  ईश्वर नहीं है। दुनिया में बहुतेरे ऐसे दूसरे  काम पड़े हैं , जिन्हें करने के लिए ज़िन्दगी कम पड़  जाए।


पर जब धार्मिक स्थलों पर ऐसी घटनाएं होती हैं .अमरनाथ यात्रा पर जाते हुए लोगों के साथ हादसा, किसी मंदिर में दर्शन के लिए गए लोगो की भगदड़ में मौत।  कल ही छठ  पूजा के दौरान इतनी महिलाओं और बच्चों की मौत तो ईश्वर से सवाल करने को जी चाहता है, ये लोग तो पूरी श्रद्धा से आपकी पूजा के लिए गए थे फिर क्यूँ कितनी ही माँओं का आँचल  सूना किया??कितने ही बच्चों के सर पर से साया छीना ?? 
जबाब में  मन को सांत्वना देने के लिए लोग कह सकते हैं, 'इतने ही दिन का जीवन था'.....'वे पूर्वजन्म का कोई कर्म भुगतने आये होंगे '.  पर उनके जो आत्मीय जन पीछे रह गए, उनके दुःख का क्या? छठ पर्व ज्यादातर बच्चों के लिए किया जाता है। जिनके बच्चों को  भगवान  ने छीन लिया, उनकी माँ  ने उनकी लम्बी उम्र के लिए व्रत रखा था, वे अब बाकी का  जीवन कैसे गुजारेंगी ??  या वो बच्चे जिन्हें जीवन भर ये दुःख सालता रहेगा कि  'माँ ने उनकी मंगल-कामना के लिए व्रत  रखा और ईश्वर  ने उन्हें अपने पास ही बुला लिया।'

ये कुछ ऐसे सवाल है जो शायद सबका दिल-दिमाग मथते होंगे पर ये समझ नहीं आता, लोग कैसे अपने मन को समझाते हैं ?? .
एक सलाह मिल सकती है 'गीता पढ़ा करो "
पर अभी मन इतना क्षुब्ध और कुपित है कि कुछ भी सही  नहीं लग रहा .

हादसों पर वैसे तो  किसी का वश नहीं पर जब ये हादसे मानव निर्मित होते हैं तो क्षोभ दुगुना हो जाता है। 
छठ  पूजा , बिहार का महापर्व है। सभी बिहारियों के मन में इस व्रत को लेकर असीम श्रद्धा होती है और शायद ही कोई घर ऐसा हो जिनके खानदान का  कोई न कोई सदस्य  छठ  पूजा न करता हो।
हर वर्ष पटना में हज़ारों लोग गंगा किनारे  छठ पूजा के लिए एकत्रित  होते हैं। प्रशासन इतना लेखा-जोखा नहीं लगा सकता ? अनुमानतः कितने लोग आयेंगे, कितने लोगों के पूजा की व्यवस्था होनी चाहिए? 
कितने घाट  बनाने चाहिए ? साल  में एक बार जनता के सामने प्रशासन को अपनी  कार्यकुशलता दिखलाने  की जरूरत पड़ती है पर उसमे भी वे बुरी तरह नाकाम रहते हैं। 
पर कब तक चलती रहेगी इस तरह की ऐसी अव्यवस्था ? इतना कमजोर पुल क्यूँ बनाया गया?  अगर इतने लोगो का भार पुल नहीं संभाल सकता था तो पुलिस वाले वहां तैनात क्यूँ नहीं थे? क्यूँ लोगों को नहीं रोका गया? पूजा के दौरान बिजली कैसे चली गयी? ये कुछ अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिनके जबाब कभी नहीं मिलेंगे 
आम जनता की सुविधा-असुविधा यहाँ तक कि उनकी ज़िन्दगी तक की परवाह नहीं इन्हें। 

पटना के अट्ठाईस घाट  असुरक्षित घोषित कर दिए गए थे। समय रहते, वे अच्छे सुरक्षित घाट का निर्माण नहीं कर सके। कम से कम जनता की  सुरक्षा के लिए तो कोई बंदोबस्त करते कि अनावश्यक  भीड़ न इकट्ठी हो। पर इन सबकी तैयारी बहुत पहले शुरू कर देनी चाहिए जिसकी आदत नहीं हमारे प्रशासन को .वे आनन् फानन में काम करना जानते हैं। इस महापर्व के दो दिन पहले उनकी नींद खुलती है  ताकि बड़े अधिकारियों, मंत्रियों  की आँखों में धूल  झोंका जा सके और वे लोग भी सारी असलियत समझते हुए भी आँखें मूंदे रहते हैं।
क्या इतना दुष्कर कार्य है , इस महापर्व के लिए अच्छी व्यवस्था करना ? जनसँख्या ज्यादा है , यह कहकर लोग किनारा कर लेते हैं। पर यह तो पहले से पता है, तो उसके अनुरूप ही व्यवस्था होनी चाहिए।
क्या मुंबई की जनसँख्या कम है? अभी अभी बाल ठाकरे की अंतिम यात्रा  में लाखों लोग शामिल हुए। कोई अनहोनी नहीं घटी , अखबारों में पढ़ा, चार साल पहले जब बाल ठाकरे बीमार पड़े थे ,उसी वक़्त पुलिस विभाग ने उनकी अंतिम यात्रा में भीड़ का अनुमान लगाकर पूरी रूप रेखा तैयार कर ली थी। अनुमानतः कितने लोग शामिल होंगे, किन रास्तों से किस वक़्त ट्रैफिक गुजरेगा आदि .और उसके ब्लू प्रिंट पूरे विभाग को भेज दिए गए। पिछले चार वर्षों में मुंबई की जनसंख्या बढ़ी ही होगी। फिर भी इसे संभालने में उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई। 

अगर दूसरी जगह की सुव्यवस्था की बात  की जाए तो तुरंत अपने प्रदेश वाले नाराज़ हो जाते हैं कि  बाहर  रहकर हमें सीख देने का क्या अधिकार है,किसी को। (मुझपर तो एक बार अपने ही एक बिहारी भाई  ने लाठी लेकर दौड़ने वाली बात  भी कह डाली थी, क्यूंकि वे मुझे मुम्बईकर  समझ बैठे थे, कई लोगों को ऐसी ग़लतफ़हमी होते देख,मन हुआ ब्लॉग पर ही लिख कर टांक दूँ,'मैं भी बिहार की ही हूँ ' )
पर हम कोई सीख नहीं देना  चाहते , हम प्रदेश से दूर रहनेवालों का दिल दुखता है, जब हम देखते हैं कि यहाँ सडकों पर इतनी भीड़ को आसानी से नियंत्रित कर लिया जाता है। गणपति विसर्जन में एक मंदिर के छोटे से तालाब के आस-पास हज़ारों की भीड़ एकत्रित होती है पर सारा काम सुचारू रूप से संपन्न हो जाता है। किसी को कोई तकलीफ नहीं होती। तब मन में ये सवाल उठता है, हमारे यहाँ भी इतने सुचारू रूप से हर  कार्य क्यूँ नहीं संपन्न होता? हमारे देश की ही पुलिस है, समान ट्रेनिंग प्राप्त फिर एक जगह वो इतनी अक्षम क्यूँ हो जाती है?  

इसके लिए थोड़ी सी अपेक्षा अपने भाई-बहनों से भी  है, वे भी जरा खुद में सहनशीलता लायें। अपने कर्तव्यों का पालन करें .आज भी वहां यही माना जाता है, जिसके गले में आवाज़ है, जिसकी बाजू में ताकत है वह सबसे आगे खड़ा होगा। क्यू में पीछे खड़े रहना बुजदिली की निशानी है। प्रशासन और जनता दोनों को ही अपने अपने कर्तव्य समझने होंगे, मिल कर काम करना होगा, तभी ऐसे हादसे टाल  जा सकते हैं।

सभी दिवंगत आत्माओं को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि 

34 comments:

  1. इन्सानो की गलती के कारण ही दूसरे इन्सानों की जान पर बन आती है और दोष भगवान को दिया जाता है !

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    1. अगर ये माना जाए कि पत्ता भी ईश्वर की मर्जी के बिना नहीं हिलता तो शिकायत भी तो उनसे ही की जाएगी न।

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  2. हां रश्मि, सुबह मैने भी पेपर में न्यूज़ देखी. मन बहुत खराब हुआ.व्यवस्थाओं की कमी, और लोगों की अनुशासनहीनता ऐसी दुर्घटनाओं की तह में होती है, ऐसा मुझे लगता है. रश्मि, असल में नास्तिक कोई होता ही नहीं. हर व्यक्ति की आस्था के आयाम अलग होते हैं. आस्था चाहे अपने माता-पिता में हो, गुरुजनों में हो, अपने कर्म में हो, या ईश्वर में हो, आस्थाहीन कोई नहीं होता. अब, जब आस्था कहीं न कहीं जुड़ी है, तो कोई भी नास्तिक कैसे हुआ? केवल मूर्ति-पूजा या आडम्बरों को ही आस्तिकता माना जायेगा क्या? मुझे भी कर्मकांड पसंद नहीं, करती भी नहीं, लेकिन त्यौहार मनाना अच्छा लगता है. कारण वही, जो तुमने बताया. माहौल में बदलाव. त्यौहार वैसे भी प्रसन्नता सूचक होते हैं. व्रत मैं नहीं करती. प्रकृति से जुड़ी सभी पूजाएं करती हूं.
    पटना की यह घटना साफ़ तौर पर प्रशासन की खामी दर्शा रही है.

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    1. सही है, सबकी आस्था के अपने आयाम होते हैं परन्तु अक्सर आस्तिक और नास्तिक शब्द को देवी-देवता...पूजा-पाठ,से ही जोड़ कर देखा जाता है।

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  3. रश्मि सलाम आपकी लेखनी को....
    जो लिखा वैसे विचार सभी के दिल में हैं मगर उनको अभिव्यक्त करके का तरीका लाजवाब...
    कसा हुआ लेखन..मुझे जबकि लेखों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं,एक साँस में पढ़ गयी...
    मंदिरों और पर्वों के समय हादसे की बात करें तो उसमें हमारा पूरा देश याने हर राज्य एक सामान (लापरवाह)है....शायद ही कोई मंदिर हो जहां कभी न कभी हादसा न हुआ हो..
    जो गए उनकी आत्मा को प्रभु शान्ति दें.
    अनु

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    1. सही कहा अनु,
      हर जगह अव्यवस्था छाई हुई है, आम लोगों की परवाह ही नहीं किसी को।

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  4. ...और ऐसा भी नहीं कि भीड़ इकट्ठी होने पर पहले हादसे न हुए हों ...पहले भी कई जगह हुए ही हैं, नासिक /उज्जैन और एक मंदिर का नाम याद नहीं आ रहा जहाँ भगदड़ मच चुकी है ...ये पूरी तरह शासन की लापरवाही है ...जिन्हें इस कार्य को अंजाम देना था उन्हें इसका ध्यान रखना था...हमारे देश और संस्कृति की जान है हमारे पर्व और हमारी आस्था...किसी में भी ...
    दुखद घटना जिसे हम दूसरे प्रदेश के लोगों को भी भूलना आसान नहीं होगा...
    सभी दिवंगत आत्माओं को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि ...

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    1. उज्जैन में भगदड़ का किस्सा इसलिए हुआ था क्योंकि सीढ़ियों पर चिकना मार्बल लगा दिया था और उस वक्त कोई मंत्री या नेता के आने की वजह से भीड़ बढ़ गयी थी सीढ़ियों से फिसलने की वजह से ४० लोग मरे गए थे बाद में उन सीढ़ियों पर पावपोश चिपकाये गए.

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    2. ओह!! ये नेतागण
      लोग भागते क्यूँ हैं , उनकी शक्ल देखने।
      और मार्बल की सीढियां बनाते वक़्त आर्किटेक्ट को ये नहीं सोचना था ज्यादा भीड़ हुई तो लोग फिसल सकते हैं??

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    3. जी नहीं ! लोग नहीं भागे थे नेताओ के पीछे बल्कि उनके आने की वजह से आम दर्शनार्थी को कुछ वक़्त के लिए रोक दिया था. इससे भीड़ बढ़ गयी थी.

      और मार्बल देखने में सुंदर लगता है तो सभी मंदिरों में लगाया जाने लगा है अगर दर्शनार्थी फिसलते है तो फिसले.

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    4. हाँ,यही तो होता है, भले ही आम जनता को कितनी भी परेशानी हो, पर इन नेताओं की सवारी शहंशाह की तरह निकालनी चाहिए .
      अगर उन्हें वी.आई.पी. ट्रीटमेंट देना ही है, अकेले दर्शन लाभ लेना ही है तो रात के तीन-चार बजे जाएँ दर्शन करने जब आम जनता आराम की नींद सो रही हो।

      मुंबई में सिद्धिविनायक मंदिर में दर्शन करने अक्सर अभिनेता इसी वक़्त जाते हैं। हर जगह इसे नियम की तरह बना देना चाहिए।

      सुन्दरता अपनी जगह है, पर इस बात का ध्यान तो रखना ही चाहिए कि मंदिर निर्माण में ऐसी चीज़ों का इस्तेमाल हो कि जब भीड़ हो तो कोई दुर्घटना न घटने पाए।

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  5. Well, bhagvaan ke prati itni shraddha rakhte wale log hain humare desh me.. atleast bhagvaan ke dar se to unke liye kuchh dhang ki vyavastha kar hi lete!

    aur mai to explain hi nahi karti ki kitni aastik ya naastik hoon mai.. kyunki explain karne ke baad saabit karna padta hai.. isse accha hai kuchh kaam ka kaam kiya jaye jisse sabka bhala ho..

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    1. हाँ ,किसी का भला न भी हो तो कम से कम कुछ बुरा न हो।

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  6. ईश्वर नही है,
    ऐसा लगता है जब,
    मिलते हैं नवजात शिशु,
    कूड़े के ढ़ेर में,
    दिखते हैं अबोध बच्चे,
    भूखे प्यासे भीख मांगते हुए,
    और देखता हूं जब,
    कच्चे परिवारों से,
    बाप का साया उठते हुए,
    खबर छपती है जब,
    जवान बच्चों की मौत की,
    कैसे ईश्वर दर्शक बन सकता है,
    मासूम बच्चियों के बलात्कार का,
    ईश्वर बिलकुल ही नही है मानो,
    जब मूक पशु,पक्षी होते हैं ,
    शिकार मनुष्य की हिंसा के,
    प्रार्थना है उस ईश्वर से,
    दे सबूत अपने होने का,
    मॄत्यु हो सभी की,
    पर समय से,
    ना हो कोई अनाथ,
    ना हो कोई बेचारगी,
    प्रकॄति का कार्य,
    लगे प्राकॄतिक ही,
    अ-समय या कु-समय,
    ना हो कोई घटना,
    मंदिर/मस्जिद में फ़टे बम कभी,
    तो विध्वंस हो भले ही खूब,
    पर अंत ना हो एक भी जीवन का।

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    1. अच्छी कविता,
      यहाँ शेयर करने का शुक्रिया

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  7. हमारे पर्वों की एक ख़राब बात यह है की इनमे जनता भेड़ चाल चलती है. श्रद्धा में अंध विश्वास ज्यादा होता है और वैज्ञानिक तर्क कम . बेचारी जनता अज्ञानतावश मुफ्त में मारी जाती है.
    बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना .

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    1. नहीं डा .दाराल
      बात अंधविश्वास की नहीं श्रद्धा की है।
      अगर जनता गंगा किनारे जाकर पूजा करना चाहती है तो प्रशासन का कर्तव्य है कि वे इसका अच्छा इंतजाम करें और सुचारू रूप से अच्छी तरह कार्य संपन्न करवाएं . कोई दुर्घटना न घटे ,इसकी पूरी जिम्मेवारी उनकी है।

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    2. रश्मि जी , अंधी श्रद्धा को ही तो अंध विश्वास कहते हैं :)
      इस मामले में ओह माई गौड फिल्म अच्छी लगी थी.
      हालाँकि प्रशासन को इंतजाम तो करना ही चाहिए.

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  8. सामयिक लेख
    आस्था पर प्रशासन की अक्षमता भारी पड़ गई।

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  9. behad dukhad hai.... waise hee aapdayein kam hai uspar sarkari laparwahi ke chalte aisi ghatnaayein

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  10. भीड़ का अनुशासन आवश्‍यक है।

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  11. Dear Rashmi Ma'm ,

    You have pointed out few weaknesses of civil management in country . No doubt that its due to large population , but also it is not impossible to provide a safe and manage it . In few states police nicely manages such gatherings . But again , the question is , is it Police's duty or Municipality's duty ? In other countries police doesn't get involve in managing civic matters. Its the task of civil management ( or municipal corp in our country ) . Also the civic sense of people is far better and responsible than ours . As a citizen we have failed to represent ourselves as clean and sensible people . There is a saying 'Cleanliness is next to Godliness ' . But it can be seen that religious places only are surrounded by garbage , waste flowers,garlands etc. Even if God might be staying there at some time , he/she might have left the place due to its dirtiness.

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    1. you are right dear if police is able to control the crowd its bcoz ppl r ready to cooperate. Without ppl cooperation any administration, police dept..municipal corp. nt a single dept can work efficiently...we will hv to instill civic sense in ourselves or otherwise we will hv to face the consequences which we r already facing in abundance .

      And its high time we shud take a vow to keep our religious places clean .

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  12. हम मानवीय अव्यवस्था के लिये हम ईश्वर को दोषी मान बैठते हैं...

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  13. रश्मिजी आज कल ये प्रवृत्ति बढ़ रही है किसी स्थान विशेष पर जाना. बिहार की मुझे खास जानकारी नहीं है पर उज्जैन में ये बात बहुत देखने में आ रही है. दिन विशेष पर इतनी भीड़ हो जाती है कि कोई भी दुर्घटना असंभव नहीं है. जब कोई दुर्घटना हो जाती है तो सब बाते उठती है वर्ना सब चलता रहता है. इस का क्या इलाज हो सकता है?

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    1. देखिये शोभा जी,
      हमलोग कोई एक्सपर्ट तो हैं नहीं, एक आम भारतीय नागरिक की तरह इस पर चिंतन मनन कर सकते हैं। कार्यवाई तो सम्बंधित अधिकारी ही करेंगे .
      यह तो सही कह रही हैं आप, आजकल किसी विशेष दिन किसी तीर्थस्थान या मंदिर में दर्शनार्थियों की संख्या में हर साल इजाफा हो रहा है। तो इसके लिए तैयारी भी वैसी ही करनी होगी। नियम से क्यू बनवाये जाएँ। लम्बी कतार हो, बीच बीच में बेंचों, और चाय-पानी की भी व्यवस्था हो। जैसा शिर्डी, तिरुपति, गणपति उत्सव के दिनों में 'लाल बाग़ का राजा ' और नवरात्र में महालक्ष्मी मंदिर में होती है । हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। जिनकी श्रद्धा होती है वे अट्ठारह घंटे तक कतार में खड़े होने के बाद दर्शन करते हैं। पर सब कुछ सुव्यवस्थित तरीके से होता है। कोई अफरा-तफरी नहीं मचती .

      भीड़ तो हर साल बढ़नी ही है तो अब प्रशासन को ही इसे गंभीरतापूर्वक लेना होगा और आम नागरिकों के सहयोग से ही सबकुछ संपन्न हो सकता है।

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    2. मैं भी शोभा जी से सहमत होना चाहती हूँ . दिन विशेष पर उमड़ने वाली अनियंत्रित भीड़ को संतुलित करना बहुत मुश्किल कार्य है , जब तक जनता स्वयं इसमें सहयोग ना दे .

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  14. तुम्हारे आलेख ने मुख्यतः तीन मुद्दों को उठाया है। पहला मुद्दा, नारी स्वतंत्रता का है ...सही कहा तुमने व्रत-उपवास जैसी चीज़ों को 'न' करने के लिए भी पति अपनी पत्नियों पर प्रेम पूर्वक दबाव डालते हैं, यह भी एक किसिम की तानाशाही ही होती है, बेचारी पत्नी पति के प्रेम के आगे कुछ कह नहीं पाती है और पति इस बात का झंडा लेकर खड़ा हो जाता है की देखा मैं अपनी पत्नी से कितना प्रेम करता हूँ ....जबकि सही अर्थ में यह पति द्वारा ईमोशनल ब्लैकमेलिंग ही होती है। ये क्यों भूल जाते हैं लोग, कि अपने बच्चे, अपने पति अपने परिवार दोस्तों के लिए कुछ करने में भी बहुत ख़ुशी मिलती है।

    दूसरा मुद्दा आस्था और अंधविश्वास का है, इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया के सभी धर्मों में लोगों की आस्था अंधविश्वास की हद तक है ...फिर वो हिन्दू धर्म हो, ईसाई हो या फिर इस्लाम हो ...और शायद इसे ही धर्मान्धता कहते हैं, जिसके कारण आज इतने हादसे हो रहे हैं और सारे देश इसी एक समस्या से जूझ रहे हैं ...इसपर अगर बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी ...इसलिए इसे यहीं विराम देतीं हूँ ...

    तीसरा मुद्दा है सामूहिक धार्मिक अनुष्ठानों वाले स्थानों में प्रशासन की तरफ से समुचित व्यवस्था एवं सुरक्षा । इस तरह के आयोजनों के लिए व्यवस्था करना म्युनिसिपल कारपोरेशन का काम है, किन्तु वहां पर लोगों की सुरक्षा पुलिस का ही काम है। ऐसे स्थानों को साफ़ रखने की जिम्मेदारी हर नागरिक का है, इसकेलिए आम जनता में कॉमन सिविक सेन्स अब भी नहीं आएगा तो कब आएगा ? हम इक्कीसवी सदी में आ चुके हैं ...दुनिया के बाकी मुल्कों से भी हमारा तार्रुफ़ प्रत्यक्ष या मिडिया के माध्यम से होता ही रहता है, हम पश्चिम के फैशन, और बाकी 'कूल' चीज़ों को अपनाने में कोई कोताही नहीं करते फिर इस 'सिविक सेन्स' जैसी अहम् बात को अपनाने में इतनी कोताही क्यों करते हैं ? फिर जैसा तुमने कहा की मुंबई जैसी जगह में जहाँ की आबादी भी कम नहीं है, एडमिनिस्ट्रेशन काम करता , तो यह भी कहना गलत होगा कि इस तरह की सिविल मैनेजमेंट नहीं हो सकता क्योंकि पोपुलेशन ज्यादा है। हर इंसान अपना काम करे तो सब संभव है।

    दुःख हुआ जान कर कि ऐसी घटना घटी ....ऐसा नहीं होना चाहिए था, लेकिन फिर दिल को बहलाने को 'ग़ालिब' ये ख्याल भी ठीक ही है, कि प्रकृति स्वयं को संतुलित करने के अजीब-अजीब तरीके करती हैं ....क्या पता, यह भी उसका एक तरीका हो। :(

    दिवंगत आत्माओं की शांति की कामना करती हूँ।

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  15. दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि.
    घुघूतीबासूती

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  16. बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी वह... त्यौहारों से हंसी-खुशी और उत्सव का माहौल बनता है, इसलिए भारत की संस्कृति इतनी रंग-बिरंगी और विविध है। लेकिन पर्व के नाम पर भीड़-भाड़ में दुर्घटनाएं होने का खतरा बना रहता है। बेहतर हो यदि हम पर्वों में उल्लसित होने के साथ-साथ सुरक्षा का भी ख्याल रखें। और साथ ही ऐसे व्रत त्यौहार करें जिनके लिए हमारा शरीर और मन हमें स्वीकृति देता हो। शरीर को कष्ट देकर कोई त्यौहार मनाना कोई बुद्धिमत्ता नहीं है। और आपका यह कहना बिल्कुल सही है कि यह तय करना स्त्री का अधिकार है, हालांकि हमारे समाज में स्त्रियों के मन में जन्म से ही इतने डर बिठा दिए जाते हैं, जैसे तीज नहीं करोगी तो पति के साथ बुरा हो सकता है, आदि, कि अक्सर वह खुशी से नहीं भय से व्रत करती है और व्रत में कुछ ऊंच नीच हो जाए, तो उसका हृदय आशंकित होता रहता है कि कुछ बुरा न हो जाए।

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  17. मैं एक आस्तिक हूँ, लेकिन मैं किसी तीर्थ स्‍थल पर किसी विशेष तिथि या अवसर पर जाने का आग्रही नहीं हूँ। जरूरी हो तो उस तिथि को घर पर ही पूजा कर लेता हूँ। मैं किसी भी तीर्थ स्‍थल पर एकान्‍त में या कम भीड़ के समय ही जाना पसंद करता हूँ।

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  18. रश्मि जी, पहली बात तो मुझे नहीं लगता कि पति कोई बहुत ज्यादा जबरदस्ती करते होंगे ऐसे व्रत को न करने देने के लिए।वो केवल एक दो बार मना करते होंगे और पत्नी मान जाती होगी और मैंने देखा है कि आजकल पुरुष ही इस तरह के कर्मकाडो से असहज महसूस करते है।और दूसरों के बीच सभी पुरुष इसकी चर्चा नहीं करते।और यदि मान लीजिए यदि पुरुष इनका केवल मौखिक ही विरोध करें तब आप ही ये भी कह देंगे कि देखो पुरुष ऊपर से खुद को प्रगतिशील दिखाने की कोशिश करते हैं और अन्दर ही अंदर ऐसे तीज त्योहार चलते भी रहने देना चाहते हैं।और कहेंगे क्या ऐसी बातें तो यहाँ पहले ही कही ही जा रही हैं।वर्ना आप इन चीजों के लिए पुरुषों को दोष न दिया करें और सीधे कहें कि महिलाओं की इच्छा से ही ऐसे रीति रिवाज चल जिंदा है ।वैसे पुरुषों की भी हर बात में ही पुरुष मानसिकता या ब्लैकमैलिग आदि देखना भी एक तरह की तानाशाही ही है।आप या अदा जी मानें या न मानें ।और जिन्हें आप अनुत्तरित प्रश्न कह रही हैं उनके जवाब सबको पता है पर कभी हमारी आस्था तो कभी डर उन्हें मानने से बचता है।

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    1. @वैसे पुरुषों की भी हर बात में ही पुरुष मानसिकता या ब्लैकमैलिग आदि देखना भी एक तरह की तानाशाही ही है।

      सही कहा, राजन :)
      पर तानाशाही का अर्थ क्या है?
      दुसरे की मर्जी न मानना ,उस पर अपने विचार थोपना।
      अपने मन के अनुसार ही करने को बाध्य करना ...आदि।
      व्रत के लिए ये तानाशाही भी सर आँखों पर अगर पत्नी बीमार हो, उसे दवा खाना जरूरी हो फिर भी वो पानी न पिए व्रत रखे तो उसे जबरदस्ती खिला देना पति की केयरिंग और प्रेम ही दर्शायेगा .
      परन्तु अगर सिर्फ इसलिए कि पति का विश्वास न हो,इसलिए कोई त्यौहार न मनाये व्रत न रखे, सही नहीं लगता .
      और आपको भी पता है राजन, अभी बहुसंख्यक लोगों में पति को हुक्म चलाने की आदत है और पत्नी को दोयम दर्जा प्राप्त है।
      आपने ही एक बार टिपण्णी में लिखा था कि आपके सहकर्मी टी.वी. बंद कर चाबी अपने साथ ले आते हैं क्यूंकि उन्हें लगता है उनके पीछे उनकी पत्नी केवल टी.वी. देखती है।
      तो ऐसे लोगो की कैसी मानसिकता होगी?

      और इन प्रश्नों के जबाब किसके पास हैं बालक कि जिस बच्चे की मंगलकामना के लिए व्रत रखा उसे ही ईश्वर ने अपने पास क्यूँ बुला लिया ??

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    2. रश्मि जी,शायद कुछ गलतफहमी हुई है।मैं यहाँ हर एक व्रत की बात नहीं कर रहा हूँ जैसे कि आपने पोस्ट में उदाहरण दिए मैं केवल उनकी बात कर रहा हूँ जो पुरुषों के लिए किए जाते है और उन्हें महिमामंडित करते हैं।आपको शायद विश्वास न हो लेकिन आजकल बहुत से पुरुष ऐसे है जिन्हें ये सब बातें असहज करती हैं कि उन्हें देवता माना जाए और पत्नी उनके पैर छुए या उनके हाथ से ही जल ग्रहण कर व्रत तोडे बल्कि अब तो फिल्म या सीरियल में भी ऐसे दृश्य नहीं पचते।अब वो ऐसा करने से पत्नी को रोकते होंगे जिसमें थोड़ी मनुहार होगी तो थोड़ी ज़बरदस्ती और दबाव भी लेकिन वो ऐसा नहीं होगा कि उसे तानाशाही कहा जाए।लेकिन जो सचमुच तानाशाह है वो तो क्यों पत्नी को ऐसे व्रत करने से रोकने लगे?और जो मैंने उदाहरण दिया था वैसे बहुत सारे पुरुष हमारे समाज में है इसमें तो कोई शक नहीं।लेकिन आप इतनी निराश भी न हों क्योंकि अच्छे पुरुष भी बहुत हैं।मेरे साथ ऐसे सहकर्मी भी है जो हर शनिवार को ही अपने बीवी बच्चों के लिए उपहार लेकर जाते है और जब उनसे मजाक में पूछा जाए कि हर हफ्ते ही गिफ्ट क्यों तो जवाब होता है कि कमा ही उनके लिए रहे हैं और उनकी ही इच्छा पूरी न हो तो क्या फायदा।

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