Monday, April 9, 2012

बेजान पड़ते सपनो में उम्मीद की धड़कन (कहानी --7 )


(जया के कविता संग्रह को पुरस्कार मिलने पर पत्रकारों के इस सवाल ने  'उसकी कविताओं में इतना दर्द कहाँ से आया ?' उसे पुरानी यादों के मंज़र में धकेल दिया...बड़े भाई-बहनों...माँ-बाबूजी के संरक्षण में बचपन बड़े प्यार में बीता...बाबूजी के दुनिया से चले जाने के बाद उसने सोचा नौकरी करके माँ की देखभाल करेगी..पर एक पड़ोस के लड़के ने अपने प्यार का इजहार शुरू कर दिया..उसकी अनिच्छा होने पर भी घरवालों ने नौकरी वाला अच्छे घर का लड़का समझ कर उस लड़के से उसकी शादी कर दी. पर वो ससुराल वालों की अपेक्षा के अनुसार दान-दहेज़ नहीं ला सकी और इसलिए उसपर बहुत जुल्म ढाए  जाने लगे. सास ताने देती..घर का सारा काम करवाती. पति ने एक दिन उसे जन्माष्टमी की तैयारियों में व्यस्त देख...अपनी उपेक्षा समझ उसे खूब पीटा..)


गतांक से आगे ---




जब आँखें खुलीं..तो पता नहीं चला..वो दिन का कौन सा पहर था. बदन बुखार से तप रहा था..सर दर्द से फट रहा था..पलकें इतनी भारी हो गयी थीं कि पूरी ताकत लगाकर उन्हें खोलती..पर दूसरे ही पल वे बंद हो जाती..सूखे होंठ पर जीभ फेर कर रह जाती..बड़े जोरों से प्यास लग रही थी...पर उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी...उठने की इन सारी कोशिशों ने उसे इतना  थका दिया कि फिर से उसकी आँखें मूँद गयीं...काफी देर बाद..काकी की आवाज़ से नींद खुली.."कब तक सोवोगी कनिया..."

और उसके चेहरे पर नज़र पड़ते ही जैसे वो  चिल्ला उठीं.."अरे!! कनिया  को तो बुखार है...अ राजीव माएँ कह रही हैं की काम  के बहाने सुतल है...."
उसने आँखें खोल दीं...अस्फुट सा स्वर निकला...."काकी..पानी.."
"हाँ हाँ...कनिया अभी लाते हैं,.." काकी भागती हुई कमरे से बाहर चली गयीं...."राजीव माएँ...ओ राजीव माएँ...कनिया को बहुते बुखार है..."
काकी ने सहारा देकर पानी पिलाया...फिर बाहर चली गयीं. थोड़ी देर बाहर से आवाजें आती रहीं..."बार्ली बना के दे आओ परमिला माएं...जरा सा बरत रखी और बुखार हो गया...इतना सुकुमार  है की का कहें...कैसे चलेगी राजीब की गिरहस्थी..हमको तो एही चिंता है.."

कोई उसे देखने अंदर नहीं आया....उसे कोई उम्मीद भी नहीं थी कि कोई आएगा...राजीव के आने के बाद संजीव शनिचर-इतवार को तो दूर दूर ही रहता था...अपने कमरे में ही बना रहता था...उसे तो पता ही नहीं होगा...वो पूरे दिन बुखार की बेहोशी में ही डूबती-उतरती नहीं...किसी बात की सुध नहीं....काकी बार्ली लेकर आईं तो बिना ना -नुकुर के पी लिया...वरना अपने घर में जरा सा बुखार आते ही कितना तूफ़ान मचाती थी. माँ को एक पल के लिए अपने पास से नहीं उठने देती थी. बार्ली तो कोई सोच भी नहीं सकता था उसे पिलाने के लिए. पर पता था...यहाँ नहीं पीयेगी तो कभी 
अपने पैरों पर खड़ी भी नहीं हो पाएगी. बीच बीच में आँखें खुलतीं तो खिड़की के बाहर कभी तेज धूप दिखती..कभी शाम का धुंधलका तो कभी गहरा अँधेरा....वो वैसे ही अशक्त  पड़ी रही. गहरी रात में नीम बेहोशी  में ही किसी के हाथ जिस्म पर  रेंगते महसूस हुए..पर ना तो प्रतिकार की हिम्मत थी...ना ही...क्या गुजर रही है देह पर यह  जानने का होश था..

दूसरे दिन भी वैसे ही लस्त पड़ी रही काकी के बहुत हल्ला मचाने पर ही...सास ने अपने मन से बुखार की दवा भेजी...डाक्टर को तब भी नहीं बुलाया गया ..शायद डाक्टर के सवालों का डर था. राजीव तो सुबह ही उस से एक बात किए बिना..चले गए थे. 
 संजीव बीच बीच में आता..उसका हाल पूछता,...वो फीकी सी मुस्कराहट के साथ कहती, 'ठीक हूँ..' उठने  का उपक्रम करती पर वो कहता.."ना ना भाभी आप लेटी रहिए...आराम कीजिए..." शरीर को आराम के साथ मन को भी तो सुकून जरूरी है...किसी से दो बातें करने को तरस जाती.सारा सारा  दिन छत घूरती रहती...आँखों के किनारे से आँसू बहकर तकिये में ज़ज्ब होते रहते. ऐसे में घर बहुत याद आता.
 पर उसे तो सब भूल ही गए. इतने दिन हो गए थे...एक चिट्ठी तक किसी की नहीं आई. जबकि शादी से पहले..दीदी भाभी लोगो की चिट्ठी  की इतनी आदत थी कि दो दिन गुजरते नहीं कि किसी ना किसी के पत्र  का इंतज़ार होने लगता और पत्र आ भी जाते. एक एक बातें विस्तार से लिखी हुईं...बच्चों के भी टेढ़े-मेढ़े अक्षरों  में लिखे दो लाइन पढ़ कर ही वो और माँ निहाल हो जातीं. जिन बच्चों ने पढना शुरू नहीं किया होता...वे बस कलर पेन्सिल से चाँद-सूरज ही बना कर भेज देते...और वो उनकी ये पेंटिंग अपने टेबल पर सजा कर रखती.  फिर सिलसिलेवार ढंग से पत्रों का जबाब देने का सिलसिला शुरू होता. आस-पड़ोस की बातें...रोज-रोज की बातें...कैसे एक दिन चूल्हे पर दूध चढ़ा कर छत पर  चली गयी...किचन पूरा धुंआ से भर गया...'बिनाका गीतमाला' में कौन सा गीत टॉप पर पहुंचा ..ये सुनने के चक्कर में सब्जी जला दी..और माँ से डांट  सुननी पड़ी....पड़ोस में शादी है..उसमे कौन सी सलवार समीज पहनूं?...गुलाबी वाली या नीली वाली?...तमाम बेमतलब की बातें...पर ये बातें ही जीने का बहाना बन जातीं.
 पर अब तक एक ख़त भी नहीं मिला..उसे घर से...वो खुद भी लिखने को तरस जाती ...पर ना तो लिफाफा था ना अंतर्देशीय..पोस्टकार्ड भी नहीं था...पर उस पर तो आज तक उसने लिखा भी नहीं.
राजीव तो कभी सीधे मुहँ बोलते ही नहीं...जरा सा उनका अच्छा मूड देखती और सोचती कह देगी,लाने के लिए ...पर उनका अच्छा मूड विशेष कारण से होता..अगले ही पल वे बिलकुल अनजान से बन जाते...और किसी  ना किसी बात पर चिल्ला उठते..वही पानी का गिलास उन्हें पहले नहीं दिखाई देता..पर मतलब पूरा होते ही चीख उठते.." जरा भी शउर  नहीं..सुबह से गिलास ऐसे ही पड़ा हुआ है' मन  मसोस कर रह जाती. एक दिन हिम्मत करके सासू जी से कहा तो उन्होंने कह दिया.." अपन दूल्हा से कहो...बाहर-भीतर तो उहे आता जाता है...ला देगा.."
पास में पैसे भी नहीं थे....कि किसी से मंगवा लेती..पर मंगवाती  भी किस से..संजीव को इन सब झंझटों में उलझाने का मन नहीं था..कच्ची उम्र है..पता नहीं अपने घर वालों के प्रति कैसी भावनाएं घर कर जाएँ . और एक धेला भी तो नहीं था उसके पास. मुहँदिखाई में इतने सारे लिफ़ाफ़े मिले थे. जब सासू जी ने कहा, "लिफ़ाफ़े लेकर आओ...लिखना होगा..किसने कितना दिया है...उनके यहाँ भी हमें उतना ही देना होगा." तो वह सारे लिफ़ाफ़े उन्हें दे आई...पैसों का लालच भी नहीं था..और जिंदगी ऐसी करवट लेगी..सोचा भी नहीं था....
इनलोगों ने वो सारे पैसे गिन कर उसे नहीं दिए..बल्कि उन्हीं पैसों से उसके  लिए लाख में जड़े कंगन बनवा दिए...और सासू जी ने बड़ी उदारता से वे कंगन मुहँ दिखाई के रूप में उसे दे दिए, ये कहते हुए.."हमलोग बहू को मिला पैसा नहीं रखते ..लो तुम्हारे ही लिए कंगन बनवा दिए हैं.." जब उसने कंगन लेकर उनके पैर छुए तो इस बार उन्होंने नहीं रोका...तब उसे समझ में आया...वे पैर छूने से रोक देती थीं..कि मुहँदिखाई देना पड़ेगा. 

वो तो नहीं लिख पा रही..पर दीदी माँ..सबलोग उसे भूल गयीं...माँ भी अपने बेटे-बहू ..पोते-पोतियों के बीच..अपनी छुटकी बेटी को बिलकुल ही भुला बैठी है..शायद उनके पत्र बार बार आते तो उसका भी कहने का मुहँ होता...'पत्र का जबाब देना है". 

***
एक गहरी उसांस ली उसने...अतीत का दर्द ..शब्दों में बंध कविता के रूप में तो जब तब छलकता ही रहता था आज तो जैसे सैलाब बन उसे अपने गिरफ्त में ले लिया था. अतीत की यादों से पीछा छुडाने को..उसने परदे वापस खींच  दिए...रसोई में जाकर ठंढा पानी पिया...और सोफे पर सर टेक आँखें मूँद लीं...आँखें मूंदते ही मानस पटल पर फिर से जिंदगी के पुराने चित्र उभरने और मिटने शुरू हो गए. तब कहाँ अंदर की बात उसे पता चल पाती थी...माँ-दीदी-भैया-भाभी  सब उसे लगातार पत्र लिखते थे..पर वे पत्र उस तक पहुँचने ही नहीं दिए जाते थे. जब उसकी कोई खबर ना पाकर एक दिन बड़े जीजाजी..उसकी खोज-खबर लेने आए तब उसे असली बात पता चली. पर उसे तो जीजाजी से मिलने भी नहीं दिया गया.
उनसे तो  शादी के वक़्त से ही लोग चिढ़े बैठे थे. राजीव ने व्यंग्य से कहा, " आपको अपनी साली की इतनी चिंता क्यूँ हो रही है? दू दू गो भाई हैं इनके...ऊ लोग काहे नहीं आए?'

"दोनों भाई तो कलकत्ता और दिल्ली में है...छुट्टी कहाँ मिलती है...हम पास के शहर में हैं..इसलिए हमसे सबलोग बोला है...जरा हाल-चाल लेने के लिए" ..जीजाजी ने सफाई दी.

"सब ठीक है...अ उसको तनी ससुराल में बसने दीजिये...मैके से ही जुड़ी रहेगी तो हियाँ कईसे एडजस्ट करेगी...हमारे इहाँ एक साल तक मायके वालों से मिलना जुलना..चिट्ठी-पत्री नहीं होता है...अब इहे उसका घर है..." ये ससुर जी की आवाज़ थी.

वो जल्दी जल्दी चाय नाश्ता तैयार करने लगी...कि ये लोग मना करें तो करे...वो ट्रे लेकर सीधा कमरे में चली जायेगी"
ट्रे  सजाए रसोई से निकली ही थी कि काकी आती दिखीं.."कहाँ जा रही हो कनिया...पाहुन त गए..भेंट हो गया ना..."
ओह! तो उसे मिलने भी नहीं दिया गया. उसे जोर का चक्कर आ गया था...काकी ने थाम नहीं लिया होता..तो सारे कप-प्लेट गिर कर चकनाचूर हो गए होते..और फिर उसे घरवालों से इसके प्रसादस्वरूप क्या मिलता...इसकी कल्पना भी बेकार है. 

कुछ अपनी हिम्मत कुछ आराम करने का असर..दो-चार दिनों में ही उसने बिस्तर छोड़ दिया..और पहले की तरह किचन का काम संभाल लिया.
जिंदगी धीमी रफ़्तार से उसी ढर्रे पर वापस आ गयी थी. शनिवार-इतवार को पहले की तरह ही राजीव आते...और ऐसा व्यवहार करते जैसे कभी कुछ हुआ ही ना हो.

एक बार उसने कहने की कोशिश भी की.."आपको इतना गुस्सा क्यूँ आता है....आप गुस्से में कुछ नहीं देखते.."
राजीव ने उसे परे धकेल दिया.."आपका काम ही ऐसा होता  है...मरद जात हैं....आन-बान वाले..गुस्सा नहीं आएगा??...हमको तो कोई कंधे पर हाथ रखे तो हम उसका जबड़ा तोड़ दें...हमको अपने खानदान  वालों जैसा पिलपिला  नहीं समझिएगा"
वो मुहँ फेरे बिस्तर के किनारे पड़ी रही...थोड़ी देर बाद ही बिना कुछ बोले..राजीव ने अपनी तरफ  खींच लिया...अपने शरीर से ही घृणा हो आई थी. अपने शरीर पर भी उसका अधिकार नहीं अब . 

एक दिन इसी घृणारूपी कीच  में एक कोंपल खिलने  का आभास हुआ और मन आह्लाद से भर गया. कानों में एक आवाज आई.." जब जब अधर्म की परकाष्ठा होती है...कोई अवतार लेता है" तो क्या ये आहट उसे सारे कष्टों से मुक्ति दिलाने वाले की है? शायद अब सब ठीक हो जाए. पत्नी से प्यार हो या ना हो..अपने अंश से सबको लगाव होता है...और इस अंश को साकार रूप देने वाली तो वही है..तो उसकी उपेक्षा अब कैसे की  जा सकती है? यह अनदेखा..अनजाना अनुभव..स्वर्गीय सुख सा लगा. अभी बस उसकी  आहट मिली है..और मन-प्राण जैसे उसके प्यार की शीतलता से सराबोर हो गया. 

पहली बार शनिवार की प्रतीक्षा इतनी आतुरता से की. कैसे यह समाचार देगी..सौ उपाय सोचती...फिर उन्हें खारिज कर देती...'ना ये ठीक नहीं.." बहुत अफ़सोस हो रहा था,यहाँ लोगों को पढ़ने-लिखने का शौक नहीं... घर में कोई पत्रिका नहीं..वरना उसमे से सुन्दर से बच्चों की तस्वीर काटकर आकर्षक  पोस्टर बनाती. आखिर अखबार के विज्ञापन में से ही बच्चे और माँ की एक सुन्दर सी तस्वीर ढूंढी. उसे दीवार पर लगा..बेसब्री से शाम का इंतज़ार करने लगी. राजीव हमेशा आ कर बरामदे में ही बैठते थे...और सासू जी ने उन्हें पहले ही बता दिया.
वो शरमाई सी दीवार से लगी खड़ी थी...'पता नहीं..कमरे के अंदर आकर कैसे रिएक्ट करेंगे'

राजीव की तेज चाल ने ही थोड़ी आशंका जगा दी...धम धम करते हुए भीतर आए.."पता था..पता था...मुझे...यही सुनने को  मिलेगा.."
वो हतप्रभ उनकी तरफ देखने लगी.."आपको ख़ुशी नहीं हुई...?"
"खुस्सी...कईसा खुस्सी...पोस्टिंग पर गए नहीं अभी..पईसा का जुगाड़ हुआ नहीं...अ बच्चा गोदी में.."
मन वितृष्णा से भर उठा..एक पल भी वहाँ खड़ा रहना मुमकिन नहीं था....चाय बनाने के बहाने कमरे से निकल कर बाहर आ गयी"

उसे लगा चाय भी इतनी जल्दी क्यूँ बन गयी...अब चाय लेकर कमरे में जाना पड़ेगा. बिस्तर के पास स्टूल पर चाय रखा ही था कि सामने दीवार पर जो नज़र गयी कि दिल बैठ गया...माँ बच्चे की तस्वीर के बीचोबीच एक चीरा लगा दिया गया था. अनजाने ही उसका हाथ अपने पेट पर चला गया..और दोनों हाथों से उसने पेट को ढक लिया, मन ही मन प्रतिज्ञा की..'तुझे मैं कुछ नहीं होने दूंगी..इतना भरोसा रख.." एक दृढ निश्चय मन में समा गया था. राजीव लाल लाल आँखें लिए अब भी दीवार घूर रहे थे. अचानक उठे जोर से चाय के कप पर हाथ मारा...सारी चाय फ़ैल गयी. वो दहशत में एक किनारे दुबक गयी...राजीव ने चोटी पकड़ कर उसे एक थप्पड़ लगाया और जमीन पे गिरा दिया . अंधाधुंध उसपर हाथ-लात बरसाने लगे...औंधे होकर उसने अपने पेट को जोर से पकड़ लिया था...राजीव चीख रहे थे.."ये बच्चा तो मैं किसी कीमत पर  नहीं होने दूंगा...बहुत मेरे बच्चे की माँ  बनने चली है..देखूं कैसे इसकी ये साजिश पूरी होती है"

ये शाम का वक़्त था ...बाबूजी ऑफिस से आ चुके थे. शोर शराबा सुन कमरे के दरवाजे तक चले आए.."अरे का हुआ राजीब...आते ही काहे का तूफ़ान मचाये हुए है"

"बाबूजी..ई बच्चा तो हम कौनो हाल में नहीं होने देंगे...सारा पिलान चौपट हो गया....बच्चा हो गया तब त ई कानूनन हक़ मांगेगी...हम त सोचे थे..ई भाग जायेगी अपना माइके...पर गज़ब कठकरेजी  है..ईसपर तो कौनो असरे नहीं है....अब मेरे बच्चे की माँ बनेगी...ना ई हम नहीं होने देंगे...हमको जिन्नगी  भर इसके साथ नहीं रहना है...बच्चा हो गया तब त मुस्किल हो जाएगा इसको निकालना..."

वो याचना भरी निगाहों से बाबूजी की तरफ देखने लगी..कि शायद वो उसके तारणहार बनें...पर उन्होंने भी आगे बढ़कर राजीव का हाथ नहीं पकड़ा...किसी को अपनी मदद के लिए नहीं आते देख... अचानक कोई शक्ति आ गयी उसमे और उठ कर बाहर की तरफ भागी... राजीव भी उसके पीछे किसी हिंसक की तरह दौड़ा तो उसने झपट  कर बरामदे में ताखे पर रखा..शेविंग का डब्बा उठा लिया और बोली...... "हम ब्लेड से नस काट लेंगे ', 
राजीव रुका ," बाबूजी... देखिये धमकी दे रही है ."
 उसकी आँखों से आँसू की जगह आज चिंगारियां निकल रही थीं. 
बाबूजी का स्वर सुना - "मर जाने दो, किसी को कानों कान खबर भी नहीं होगी ...फूंक  आएँगे उठा के..ई रोज रोज के किचकिच से छुट्टी मिलेगी.."
रुक गई वह .. "वो तो मर जायेगी..पर उसके अंदर पलता ये नन्हा जीव...उसका क्या कसूर...बेइंतहा प्यार उमड़ आया..... ना...अब तो उसकी खातिर जीना है.." 
नसों के जरा सा शिथिल पड़ते ही पेट में असहनीय दर्द उठा...चक्कर खाकर गिर पड़ी.."

उसकी संतान के भाग्य से संजीव और काकी..दोनों ने  ही एक साथ आँगन में प्रवेश किया..देखकर घबरा गए .."अरे क्या हो गया...क्या हुआ..." 
अब कोई चारा नहीं था...उन्हें, उसे हॉस्पिटल ले ही जाना पड़ा. राजीव और सास रास्ते भर समझाते रहे..."कह देना बाथरूम में गिर गयी हो..ये सब तो हर घर में होता है...तुम तो समझदार हो..घर का इज्जत बचाना तुम्हारा कर्तव्य है..आदि आदि.
दर्द के बीच अपनी साँसें थामते...लेडी डॉक्टर से यही कहा...सास और राजीव की नज़रें उसके चेहरे पर चिपकी हुई थीं.
पर लेडी डॉक्टर सिर्फ उसका चहरे घूरती रही..उँगलियों के निशान स्पष्ट थे. 

अंदर चेक-अप के लिए गयी तो डॉक्टर ने गहरी नज़र से उसे देखा...और कहा "सच बताओ...बाथरूम में गिरने से ऐसे निशान तो नहीं पड़ते.."
वो कुछ बोल नहीं पायी...रो पड़ी.
डॉक्टर ने उसका सर सहलाते हुए पूछा, .."डरो नहीं...मुझसे कहो..क्या हुआ..सारी बात बताओ.."

फिर भी वह कुछ बोल नहीं पायी...बस आँखों से भल्ल भल्ल आँसू गिरते रहे. डॉक्टर समझ गयी.."पति ने मारा है ना.??..अभी मैं उनलोगों से बात करती हूँ...पढ़े-लिखे होकर ऐसी हरकत....मैं पूछती हूँ जरा उन सबसे" 
डॉक्टर की आवाज़ में गुस्सा झलक रहा था पर वो बेतरह डर गयी...उसने डॉक्टर का हाथ पकड़ लिया..."नहीं..प्लीज़..उनसे कुछ मत कहिए..उनलोगों ने मना किया है ,बताने को....लौट कर तो मुझे उसी घर में जाना है..पता नहीं क्या हाल करें मेरा....अब मुझे अपने बच्चे को बचाना है...उसे कुछ नहीं होना चाहिए.."
डॉक्टर गंभीर होकर चुप हो गयी...बाहर आकर दवा लिख दी..और जरा सख्ती से कहा.." ये बहुत कमजोर हैं..इसकी अच्छी तरह देखभाल कीजिए...सारी दवा टॉनिक. दीजिये और रेगुलर चेक अप के लिए लेकर आइये."
पर  राजीव उसे फिर चेक अप के लिए नहीं ले गए,कभी...हाथ उठना भी नहीं रुका...अब तो और ज्यादा हो गया..उस पर अबौर्शन के लिए भी दबाव डाला पर वो अड़ गयी...'मार दीजिये मंजूर है..पर अपने बच्चे को नहीं खो सकती...मरेंगे तो दोनों मरेंगे.."
***
ये सब सोचते उसकी  आँखें स्वतः ही सामने टेबल पर रखे  एक सुदर्शन युवा की मुस्कुराती तस्वीर पर चली गयीं. 'रूद्र' - हाँ यही नाम रखा था उसने बेटे का . उसके विश्वास का बीज अब पनप कर झूमते देवदार के पौधे में बदल चुका था. पास ही रखी  तस्वीर में रूद्र अपनी दोनों बहनों के साथ था.- काव्या और सौम्या. उसकी क्यारी में आंसुओं से सींचें...दृढ निश्चय का खाद पाकर खिले  ये तीन फूल लहरा लहरा कर उसके सारे दुख हर लेते . वर्तमान की शान बने ..वे आगे बढ़ रहे थे और  वे लोग, जो सबकुछ ख़त्म होने के इंतज़ार में थे दांतों तले उंगलियाँ दबाये बैठे थे. 

नन्हें से घोंसले सा लगता उसे  अपना ये घर .... जैसे चिड़िया के बच्चे उससे दाना लेते हुए चहचहाते हैं , कुछ ऐसा ही माहौल रहता . 
जब वह अपने बच्चों को निहारती है , बच्चे पूछते हैं - 'क्या हुआ माँ ? '
वो मुस्कुरा देती है.."कुछ नहीं"
बेटा कहता ," मैं हूँ न ..तुम सोचा मत करो कुछ भी"
बेटियाँ कहतीं -" हम तो तुम्हारी प्रतिछाया हैं , जीवन में तुम्हारे सम्मान से बढ़कर कुछ नहीं हमारे लिए... "

पर जब ये नहीं आए थे, उसके जीवन में .तो कष्ट...अपमान...ही उसके जीवन के पर्याय थे. कौन से उपाय नहीं किए गए कि ये नन्ही जानें, इस संसार में आँखें ना खोल सकें..और वो घर छोड़ या दुनिया ही छोड़ चली जाए. पर उसके मन का विश्वास कि 'कृष्ण की तरह कोई आएगा'..उसके  लिए संजीवनी बन गया .

जब राजीव पेट पर लात मारते तो वो कहती..."आपको बच्चा नहीं चाहिए ना..मैं उठक-बैठक कर लूंगी..पर लात मत मारिये.."
राजीव किसी हिंसक जानवर की तरह दांत पीसते.."चल लगा उठक-बैठक..देखता हूँ...कब तक तू अपने  बच्चा को बचा सकती है?"

वो उठक बैठक करती और मन ही मन रक्षा मन्त्र का पाठ करती रहती..

ॐ जुंग सह माम संजीवये पालयः सह जुंग ॐ 

दिन भर दुहराती रहती...'हे ईश्वर अगर मैने जीवन में कभी कुछ भी अच्छा किया हो तो मेरे बच्चे को मुझसे मत छीनना'...एक जुनून सा सवार हो गया था. सारे अत्याचार सह लेती. पहले गुस्से में एक जिद की तरह खड़े होकर मार खाती रहती थी...मन ही मन उबलती रहती.."मारो कितना मार सकते हो"

लेकिन अब हर संभव कोशिश करती कि राजीव उसे कोई  गहरी चोट ना दे पाएं. एक बार भागकर बाथरूम में छुप गयी.थके बदन को जरा सा आराम देने के लिए चप्पलों का सिरहाना बना बाथरूम में ही लेट गयी. थोड़ी देर में ही हाथ पैरों में कुछ चिपचिपा सा लगा...आँखें खोली तो देखा...बाथरूम के दरवाजे के बाहर से पानी सा बहता हुआ आ रहा है. राजीव ने दरवाजे पर पेशाब कर दिया था कि वो छुप कर अंदर ना बैठ सके. 
हाथ-पैर पटकती बाहर निकल आई. इतना तो समझ गयी थी..'राजीव सैडिस्ट हैं...उन्हें हंसने-बोलने...में ख़ुशी नहीं मिलती...किसी को तकलीफ पहुंचाने में ही ख़ुशी मिलती है..और जब आदत भी हो..मकसद भी तो कहर ढाने से क्यूँ बाज आएँ.

बुआ सास थीं तो कहती रहती थीं..'अम्मा, राजीव का ब्याह नहीं देख पायी....सबसे ज्यादा ख़ुशी उनको ही होती. दादी का सबसे दुलारा था, राजीव.....पांच साल तक तो इसको गोदी के सिवा कहीं बैठने नहीं दिया...मजाल था कि भाभी कुछ कह दें...जो जिद करे सब पूरा ..रात के बारह बजे कहे..'हलुआ खाना है'.तो इसकी मतारी को बारह बजे हलुआ बनाना पड़ता था...नहीं तो अम्मा भाभी को घर में रहने नहीं देतीं...और अम्मा अपने दुलारा पोता का सादी देखने से पहली ही चली गयी'
उन दिनों, इन सब बातों पर गौर नहीं किया था....पर अब रह रह कर ध्यान जाता...बचपन से ही राजीव निरंकुश रहे हैं...और दूसरों को तकलीफ देने में ही इन्हें मजा आता है. और साधन वो बन गयी है. क्या करे वह??..इस नर-पिशाच से कैसे छुटकारा पाए.?? भैया लोग इतने दूर हैं...माँ भी भैया के पास है...और क्या वो किसी तरह घर से निकल कर उन तक पहुँच भी जाए तो क्या वे लोग अपने पास रख  लेंगें.??

किताबों में पढ़ चुकी है...आँखों देख चुकी है...कोई बेटी आती है..मायके में...अंदर की बात तो किसी को बतायी नहीं जाती..पर कुछ ही दिनों  में उसे फिर से ससुराल पहुंचा दिया  जाता है. कई बार लड़की वहीँ खुद को ख़त्म कर लेती है या ख़त्म कर दी जाती है. तब, मायके वाले बड़े बड़े टेसुए  बहा आते हैं पर जब वो अपनी समस्या लेकर आती है तो उसे अपने ही घर में रहने नहीं दिया जाता...समझाया जाता है..ससुराल ही उसका घर है. अगर वो ये कदम उठाये भी तो उसके साथ भी तो यही सब होगा. 
याद आ गए बाबूजी..शायद बाबू जी जिन्दा होते तो उनकी रानी बेटी को ये सब नहीं सहना पड़ता. पर फिर साथ ही पड़ोस की किरण दी भी याद आ गयीं. उनके तो बाबूजी भी हैं..और भैया भी..दोनों ऊँची नौकरी में. महल्ले में खबर फैली थी कि किरण को ससुराल में बहुत सताते हैं..मारते-पीटते हैं...वो अक्सर मायके आती भीं. पड़ोस की औरतें..आँख के इशारे से एक दूसरे से कहतीं. "आ गयी..फिर से कुछ हुआ होगा.." 
फिर दसेक दिनों में ही किरण दी को कभी उनके भैया तो कभी उनके बाबूजी ससुराल पहुंचा आते. पिछले कुछ सालों से किरण दी ने मायके आना ही बंद कर दिया. तब भी लोग उन्हें ही दोषी कहते हैं..यहाँ तक कि वो भी सोचतीं.."कैसी पत्थरदिल हैं वो...माँ-बाबूजी को देखने का मन भी नहीं होता उनका.." उन दिनों गहराई से नहीं देखा था ये सब...अब लग रहा है...शायद ईसा मसीह की तरह हर लड़की को अपना क्रॉस खुद ही ढोना पड़ता है...कोई उसकी मदद को नहीं आता. 

जितना ही वो अपने सहने की शक्ति बढ़ाती जा रही थी...इन सबके जुल्म बढ़ते जा रहे थे. पूरी पूरी रात उसे खड़े होकर गुजारनी पड़ती. घर का सारा काम करना पड़ता. वो रोटी बनाते हुए चार बार उठ कर उल्टियां करने जाती....पर सास आँगन में बैठे सब देखती रहतीं..एक बार नहीं कहती..'रहने दो..मैं बना लूंगी..'

एक दिन पड़ोस कि कुछ महिलाएँ आई हुई थीं  थीं...उन्हीलोगो के लिए चाय-नाश्ता बना रही थी...लगतार रसोई में खड़े रहने के कारण वो बेहोश होकर गिर गयी. लोक-लाज की खातिर घरवालों को उसे अस्पताल ले जाना ही पड़ा. डॉक्टर उसकी दशा देख सब समझ गयी..उसे डांटा भी...उसने डॉक्टर से मिन्नत की..,"मुझे कुछ दिनों के लिए एडमिट कर लीजिये...कई रात से मुझे नींद नसीब नहीं हुई है" 

डॉक्टर ने एडमिट कर लिया..पर साथ में राजीव रुका...उसे डराता रहा...."आज तो यहीं तुम्हे और तुम्हारे बच्चे को ख़त्म कर देंगे...हम पर कोई इलज़ाम भी नहीं आएगा...काम भी हो जाएगा...रात होने दो जरा.."
रात में नींद भर सोने के लिए उसने डॉक्टर से एडमिट करने की मिन्नत की थी...पर अभी अपनी नींद त्याग अँधेरे में भी आँखे फाड़ राजीव पर नज़र जमाये हुए थी. आधी रात के करीब जरा सी आँखें झपकी और मौका देख राजीव घुटनों के बल पेट पर चढ़ गया...जोर से चिल्ला उठी वह..नर्स भागती हुई आई..."क्या हुआ.."

पेट में जोरो का दर्द हो रहा है.." राजीव दीवार से लगे चोर की तरह खड़े थे.

अपना मकसद ना पूरा होते देख, राजीव नर्स और डाक्टर के विरोध के बावजूद दूसरे दिन उसे हॉस्पिटल से घर ले आए....समय खुद को घसीटते हुए बीतता रहा ...वे जुल्म ढाते रहे....बस सुकून यही था...कि हफ्ते के पांच दिन वो बाहर रहते....शरीर उनके अत्याचार से बचा रहता.

और आखिर वो घड़ी आ गयी, जब देवकी की तरह उसने रूद्र को जन्म दिया उसके भोले  से चेहरे पर नज़र डालते ही अपना सारा दुःख भूल गई ...उसकी किलकारियों ने उसके सारे कष्ट हर लिए...
बेटे को जब सीने से लगाया तो लगा...फूल सी हल्की हो आई है.....लगा ही नहीं इसी शरीर ने इतने अत्याचार झेले हैं.
 'यह मेरा अपना है ...' का एहसास उसमें संजीवनी ताकत भर गया . हिम्मत करके उसने डॉ को एक पर्ची थमाई , जिसमें फ़ोन नम्बर था . ' मेरे मायके में सूचित कर दीजिये प्लीज़.., ये लोग नहीं करेंगे ' 
डॉ ने बड़े प्यार से कहा - "बिल्कुल बेटा "
माँ..दीदी..भैया ..भाभी सबके ख़ुशी भरे चेहरे आँखों के सामने घूम गए. और वह उनकी खुशियों को खुद में महसूस करने लगी.

(क्रमशः ) 

49 comments:

  1. कौन कहता है कि हम ज़ुल्म-ओ-सितम की दास्ताँ नहीं पढते !


    वैसे राजीव सच में किसी आदमी का नाम है कि आप मजाक कर रही हैं !

    ReplyDelete
    Replies
    1. हम तो सिर्फ पढ़-लिख लेते हैं...जिनपर बरसो बरस गुजरती है..उनका क्या..

      केवल एक ही नहीं जाने कितने राजीव हमारे बीच हैं...बस आँखें खुली रखकर उनकी असलियत देखने की जरूरत है.

      Delete
    2. लड़कियों की चीख आज भी पीछा कर रही है ... राजीव जैसे लोग ? होते हैं या नहीं .... यह सवाल ही मज़ाक है

      Delete
    3. @ रश्मि प्रभा ,

      सवाल है कि राजीव किसी 'आदमी' का नाम है ?

      और आप सवाल को मजाक समझ रही हैं ! हैरानी हुई !

      Delete
    4. @ रश्मि रविजा ,
      क्या ये संभव नहीं कि जिन पर बरसों गुजरती है ! हम भी उनमें से एक हों ?

      Delete
    5. क्षमा चाहती हूँ अली जी .... आदमी ही है , जानवर बेहतर होते हैं

      Delete
    6. बिलकुल अली जी,
      हम उनमे से एक हैं....वे हममे से एक हैं..

      Delete
  2. राजीव जैसे लोग होते हैं ...बिलकुल होते हैं ...वे सिर्फ खुद को चाहते हैं ...सिर्फ "मैं" को पहचानते हैं ...उसीको अहमियत देते हैं .....राजीव चेहरा है हमारे समाज के "मेल शौविनिज्म " का ....जो पीढी दर पीढी चलती आयी है ...और दुःख तो यह है की औरत स्वयं झेलकर भी यह नहीं सोचती ...की कमसे कम हमने भोगा ...भोगा...आने वाली पीढ़ी को तो बचाएँ....लेकिन यह नहीं हो पाता क्योंकि पूरा समाज conditioned है ......रश्मि .....दूर एक दिया टिमटिमाया है ...जिसकी गर्मी सहसा महसूस हो रही है .....बहुत सुन्दर ...अगली किस्त का इंतज़ार रहेगा

    ReplyDelete
  3. इंसान का कितना घिनौना रूप है राजीव!! अफ़सोस तो ये है, कि पता नहीं कितने राजीव हमारे समाज में भरे पड़े हैं. जो जयाएं हिम्मत कर लेतीं हैं, अकेले रहने, विरोध करने की, वे जी जाती हैं, बाकी जयाओं के मरने की खबरें हम रोज़ ही पढते हैं...और पता नहीं कितनी तिल-तिल खत्म होती जयाओं की कहानियां सामने ही नहीं आ पातीं...दिल दहलाने वाली किस्त है रश्मि.

    ReplyDelete
    Replies
    1. हिम्मत करके रहने लगती हैं अकेले ..... जो दिखता है वह सच नहीं होता . बहुत से नरक मुंह बाए खड़े रहते हैं

      Delete
    2. सही है रश्मि जी. अकेली औरत को चैन से जीने का हक़ भी कहां देता है समाज और सिरफ़िरे?

      Delete
  4. शीर्षक से लगा था कि अब किस्मत बदलेगी.. खोजते खोजते अंत तक आ गए.. ख़ैर, अब भी बहुत से भारतीय परिवारों में बच्चों के आने की आहट इसी तरह होती है.. एक तरह से रेप के रिजल्ट होते हैं वे.. लेकिन यहां पर आशा का तार इतना लंबा होती है कि बच्चे को भी अपने बीच की दूरी पाटने का माध्यम समझ लिया जाता है।

    ReplyDelete
  5. मुझे फ़िर से प्रिंट आउट निकालना पड़ रहा है... अब निकाल लिया है.. अभी लेटे-लेटे पढ़ कर सोऊंगा...

    गुड नाईट...

    ReplyDelete
  6. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है।
    चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं....
    आपकी एक टिप्‍पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

    ReplyDelete
  7. रश्मि,
    कहानी में जया अपने मायके के परिवार को बहुत सहृदय, स्नेही, सुसंस्कृत, सुसंस्कारी मानकर चल रही है। जबकि यह पूरा सच नहीं है। यदि उसका पति निर्मोही है तो वे भी कम निर्मोही नहीं हैं। अन्तर केवल हिंसा व अहिंसा का है। उन्होंने भी जया के साथ कम अन्याय नहीं किया। अपने को असहाय व वरपक्ष के सामने कमजोर सिद्ध करने से कोई सही नहीं हो जाता। जिस प्रकार से उन्होंने जया को उसके हाल पर छोड़ दिया क्या वैसे ही कभी वे अपने पुत्रों को भी छोड़ सकते थे? यदि कोई पुत्र का अपहरण कर लेता तो क्या वे फिरौती की रकम भर देकर अपने कर्त्तव्य की इति मान लेते? क्या वे उसे उसके हाल पर छोड़ देते?
    प्रायः लड़की के माता पिता लड़की के विवाह में किए खर्च व दहेज को ही परिवार की संपत्ति में उसका हिस्सा मान यह सोच लेते हैं कि इस खर्च के बाद अब परिवार की सम्पत्ति में उसका कोई अधिकार नहीं बचा। वे यह भी जानना नहीं चाहते कि क्या बेटी इस हिस्से को इस तरह से पाकर खुश भी है कि नहीं। यह हिस्सा उसके लिए लगभग उतना ही उपयोगी हो सकता है जितना किसी शाकाहारी के सामने परोसा गया मुर्गा। या फिर किसी कैंसर रोगी के इलाज पर पैसा खर्चने की बजाए उसके चेहरे को सुन्दर बनाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी करवाकर उससे कहना कि उसके हिस्से के पूरे पैसे खत्म हो चुके हैं।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपने सच फ़रमाया ... मैं तो हमेशा कहती हूँ कि सबसे पहले वे गलत हैं , जो सुनकर अपनी इज्ज़त के आगे उसकी बली चढ़ा देते हैं

      Delete
    2. @जया के साथ मायके वालों का अन्याय:
      मुनव्वर राना साहब का शे'र उनकी मजबूरी बयान करता है..
      चलो माना कि शहनाई मसर्रत की निशानी है
      मगर वह शख़्स जिसकी आके बेटी बैठ जाती है.

      Delete
    3. @GB
      आपसे पूरी सहमति है...मुझे तो मायके वाले ज्यादा दोषी लगते हैं...बेटी उनकी अपनी होती है...जिंदगी के कम से कम बीस बरस उनके साथ बिताए होते हैं...और उसके दुख से वे लोग निरपेक्ष हो जाते हैं क्यूंकि उन्हें समाज में अपनी प्रतिष्ठा ज्यादा प्यारी होती है..उन्हें समाज को यह दिखाना होता है कि देखो..बेटी की कितने अच्छे घर में शादी कर दी..भले ही बेटी घुटती रहे. कई जगह परिवार सक्षम होते हैं..बेटी और उसके बच्चों का ख्याल रख सकते हैं...फिर भी..वे अपनी बेटी की कोई मदद नहीं करते सिर्फ अपनी झूठी प्रतिष्ठा के लिए.

      Delete
    4. @सलिल जी,
      मुझे नहीं पता.....इस शेर का रचना -काल क्या है.
      पर जो भी है..बहुत गलत है...बेटी का घर बैठ जाना (एक तो यह शब्द ही आपत्तिजनक लग रहा है )
      इतना तकलीफदेह क्यूँ माना जाता है.??
      ठीक है,लड़की अपने ससुराल में मान-सम्मान-प्यार के साथ रहे...ख़ुशी की बात है..पर अगर वहाँ उसपर अत्याचार किए जाएँ तो वो अपने घर वापस नहीं आ पाए ....ये क्या ज्यादा तकलीफदेह
      नहीं?? अगर ससुराल अच्छा ना मिले तो लड़की के माता-पिता को हर हाल में उसकी मदद करनी चाहिए.
      समाज हमसे ही बना है...जब एक किसी लड़की के मायके में आकर बैठ जाने पर लोगो ने हंसना सीखा होगा. ...तो अगर दस लड़कियों के माता-पिता उसे नरक जैसे ससुराल से वापस अपने घर ले आएँ तो समाज भी इसे स्वीकार कर लेगा. पर मुश्किल ये है कि पिता-भाई..लड़की की शादी करने के बाद उसकी जिम्मेवारी से पीछा छुड़ा लेना चाहते हैं.

      लड़की को आत्मनिर्भर भी नहीं बनाते...उसकी शादी कर देते हैं...और फिर उसे तकलीफ में देख..उसकी मदद को भी नहीं आते...
      यह कोई मजबूरी नहीं होती..उनमे अपनी बेटी की तकलीफ समझने की इच्छाशक्ति का अभाव होता है.

      Delete
    5. रश्मि जी!
      यहाँ आप कहानी और टिप्पणी को दो विभिन्न कालों में परिलक्षित कर रही हैं..
      "घर में बेटी बिठाए रखना" - यानि किसी कारणवश लड़की की शादी न हो पाना.. इसे तो उस समय का समाज सहानुभूति से देखता था.
      "घर पे आके बैठ जाना"- यह बड़ी शर्मनाक स्थिति होती थी. बहुत पुराना शब्द है. इसे आप सांप छुछुन्दर वाली स्थिति कह लें.
      @पर अगर वहाँ उसपर अत्याचार किए जाएँ तो वो अपने घर वापस नहीं आ पाए ....ये क्या ज्यादा तकलीफदेह नहीं??
      लड़की की तरफ से देख रही हैं आप और सिर्फ लड़की की तरफ से.. माँ-बाप की तरफ से सोचिये और अगर उसकी कोई छोटी बहन हो ब्याहने लायक, तब सोचिये.. "उनका हियाँ के लड़की लावल बेकार हई, उनकर त बडकी बेटी पहिलहीं से ससुराल छोडके नैहर बैठल हई!" यह सुनकर माँ-बाप पर क्या बीतेगी, ये भी सोचा कभी!!
      /
      आगे आपने जितनी बातें कहीं सब से सहमत हूँ.. मगर इस कहानी के सन्दर्भ या उसकी पृष्ठभूमि में नहीं.. आपकी कहानी का काल आपके प्रत्युत्तर के हिसाब से मेल नहीं खाता.. ऐसा ही होता तो जया ने पहले दिन ही हाथ पकड़ लिया होता और घसीट लिया होता ससुराल वालों को कोर्ट में.. विवाहिता थी!!
      आगे कुछ नहीं कहूँगा, क्योंकि यह दूसरे विवाद को जनम देगा!! यहाँ कहानी पर चर्चा हो रही है, न कि सामाजिक परिस्थिति और कुरीतियों पर.. अगर उनपर चर्चा करनी होती तो मैं रचना जी का विरोध नहीं करता.. क्योंकि उनकी बातें बिलकुल जायज थीं, हाँ कटु अवश्य थीं!!

      Delete
    6. सलिल जी,
      ये मानती हूँ ,."घर पर बैठ जाना' पुराना शब्द है...कई शब्दों का प्रचलन...कहीं तो बिलकुल सामान्य लगता है और कहीं आपत्तिजनक...ये सब परिवेश..काल पर निर्भर करता है.

      मैं भी यहाँ कहानी के सन्दर्भ में ही कह रही हूँ...कि जब जया को मायके आने से मना कर दिया गया...पत्र लिखने की इजाज़त नहीं दी गयी..पत्र में शादी से पहले ही धमकी दी गयी तो उसके मायकेवालों को ये अंदाज़ा तो हो ही गया होगा...कि जया पर ससुराल में जुल्म हो रहे हैं...पर उसकी सुध लेने की जरूरत किसी ने नहीं समझी...और इसलिए नहीं समझी क्यूँकि आम तौर पर मायकेवालों की यही प्रतिक्रिया होती है...तभी यह बात कहानी में आई है..
      और सलिल जी विडम्बना ये है कि इस कहानी का काल जरूर पच्चीस साल पहले का है..पर अब भी कुछ नहीं बदला है...ऊपर दिनेश जी और US में रह रही रीना जायसवाल की टिप्पणी में देख सकते हैं. यहाँ मुम्बई की सिर्फ पांच साल पहले की एक घटना है..कोलाबा जैसे पौश इलाके में रहने वाले एक दंपत्ति ने अपनी बेटी के विजातीय लड़के से प्रेम को नकार कर जबरदस्ती उसकी शादी...अपने नेटिव प्लेस में रहनेवाले एक लड़के से कर दी...बाद में वो लड़का शराबी निकला..और उसे मारने-पीटने लगा तो उसी शहर में रह रहे, लड़की के मामा ने उसे शरण दी...पर उसके माता-पिता वापस लड़की को मुंबई लाने को तैयार नहीं हुए...कि लोग क्या कहेंगे...उस लड़की ने वहीँ नौकरी की और अपने मामा के पास रही.
      .
      इसलिए ये सब बहाने होते हैं कि...छोटी बहन की शादी नहीं होगी...या लोग क्या कहेंगे...अगर माता-पिता अपनी बच्ची की रक्षा की सोच लें..तो सबका मुहँ बंद कर सकते हैं...अगर बेटी को अपने घर ले आए और उसे पढ़ाने लगे..कोई कोर्स करवाने लगे तो उसके क्या परिणाम होंगे...

      उनपर कुछ अतिरिक्त खर्च का बोझ होगा.
      समाज में लोग चर्चा करेंगे...ताने देंगे...
      छोटी बहन की शादी में दिक्कत जरूर होगी...
      आसानी से लड़का नहीं मिलेगा..उन्हें थोड़ी मेहनत करनी होगी..लेकिन ऐसा नहीं है कि शादी के लिए लड़का मिलेगा ही नहीं.

      पर ये अतिरिक्त खर्च....समाज के ताने...छोटी बेटी के लिए वर ढूंढने में मेहनत..इतना सब कुछ वे लोग क्यूँ करें...ज्यादा आसान तरीका ये है कि पैसे ना खर्च करने पड़ें...समाज में शान से रहें..बेटी के ससुराल और पति की तारीफ़ करें....छोटी बेटी की शादी धूमधाम से करें...और एक बेटी को ससुराल में अत्याचार सहने के लिए छोड़ दें.
      जबकि हर एक को एक ही जिंदगी मिली होती है....उसे प्यार-सम्मान से जीने का पूरा हक़ है.
      बहुत कटु है यह,सब ....पर सच भी है...

      और यहाँ कोई विवाद नहीं हो रहा..अपना-अपना नजरिया रख रहे हैं सबलोग. कई बातों की तरफ ध्यान नहीं जाता..पर विमर्श से सोच की नई खिड़कियाँ खुलती हैं...इसलिए आप उत्तर प्रत्युत्तर से घबराएं नहीं :)..हमेशा खुलकर अपने विचार रखें...

      Delete
  8. Ufff..... Ab to Intzar rahta hai ki aage kya hone wala hai.... apka prawahmayi lekhan bandhe rakhta hai Rashmji......

    ReplyDelete
  9. पहली बार इस कहानी को पढ़ा।
    पर ऐसी कहानियाँ तो हमारे आसपास जी जा रही हैं। ऐसी अनेक जयाएँ हमारे आसपास अपनी मुक्ति की आस लगाए देखती हैं। वे मदद चाहती हैं, लेकिन मदद कौन करे?
    मायके ने पल्ला झाड़ लिया है।
    पैरों पर खड़ी होना चाहती हैं, लेकिन घर से निकलना मुश्किल है। निकल जाए तो वापस घर में लौटना कठिन है। घर लौट आए तो जया का क्या हाल होगा अनुमान किया जा सकता है।
    क्या वे महिलाएँ जो अपने पैरों पर खड़ी हैं, संगठित हो इस तरह की महिलाओँ की मुक्ति के लिए कुछ कर सकती हैं?
    हो सकता है महिलाओं के कुछ संगठन इस तरह का काम कर रहे हों। लेकिन जयाओं को उन का पता कौन दे?
    कल रात मुझे एक जया का एक टेलीफोन मिला बहुत दूर उत्तर प्रदेश के एक नगर से। मैं उसे क्या जवाब देता? उसे हिम्मत बंधाई, उसे कहा कि किसी तरह वह अपने पैरों पर खड़ी होने का प्रयास करे। कम से कम इतना कि अपने बच्चे और अपने जीवन को चला सके। तभी उस का इस नर्क से मुक्ति प्राप्त कर सकना संभव हो सकता है। मैं ने कहा उस के शहर में कोई ऐसा संगठन होगा तो मैं पता कर के उसे बताउंगा। वह बता रही थी कि हो सकता है उस से उस का मोबाइल भी छिन जाए। उस ने मुझे अपना पता दिया।
    कोई मुझे बताएगा उस के लिए क्या किया जा सकता है?

    ReplyDelete
    Replies
    1. जितना आसान कहना होता है , उतना आसान कहाँ होता है दिनेश जी . आपने सही कहा , माँ बाप पल्ला झाड़ लेते हैं या इज्ज़त की
      दुहाई देकर बर्दाश्त करने को कहते हैं . पहले आक्रमण पर लोग क्षोभ व्यक्त करते हैं , फिर मुंह देखते हैं , फिर कहते हैं - अब तो आदत
      हो जानी चाहिए . पैर पर खड़े होना वाकई आसान नहीं , खड़े होकर भी बहुत कुछ फेस करना होता है .
      पूछते हैं लोग - क्यूँ मारा ? कोई तो वजह होगी ? इस चक्रव्यूह में रण चंडिका बन जाए कोई तो - ' स्त्रीयोचित गुण तो है ही नहीं .... "
      मार खाओ गाली सुनो या मर जाओ या फिर समाज से सुनो !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

      Delete
    2. दिनेश जी,
      आप ने देर से ही कहानी पढ़ी पर इसके मर्म को समझा....बहुत बहुत शुक्रिया.
      मेरी इच्छा है कि इस कहानी को ज्यादा से ज्यादा पुरुष पढ़ें क्यूंकि अक्सर इन अंदरूनी बातों से वे अनभिग्य रहते हैं. अधिकांशतः महिलाएँ आपस में ही इस तरह के दुख दर्द बांटती है. पुरुषों को इतने विस्तार से यह सब सुनने का पेशेंस नहीं होता...और उनकी रूचि भी नहीं होती. महिलाएँ भी सोचती है वे काम से थक कर आए हैं...उन्हें ऐसी बातें बता कर क्या परेशान करना. और अधिकाँश पुरुषों का समय राजनीति,क्रिकेट,,,और ऑफिस की पौलिटिक्स डिस्कस करने में ही व्यतीत होता है.

      यही कारण है कि वे समस्या को समझ ही नहीं पाते...जब उनके अपने घर की लड़कियों के साथ यह सब होता है और जहाँ वे कोई निर्णय ले सकने की स्थिति में होते हैं...फिर भी वे बहुत उपरी तौर पर समस्य को सुझाने की कोशिश करते हैं या फिर आँखें फेर लेते हैं क्यूंकि उन्हें समस्या की गहराई का पता ही नहीं होता...जड़ें कहाँ हैं...कहाँ सुधार लाना है इस से बेखबर वे बस बेटियों को एडजस्ट करने की सलाह देते हैं.

      घरेलू हिंसा पर लिखी मेरी एक पोस्ट पर एक बैंक के मैनेजर पद पर स्थापित पुरुष की प्रतिक्रिया थी...":वे लोग घर छोड़कर क्यूँ नहीं चली जाती?.."
      मेरे ये कहने पर कि.." कहाँ जायेंगी...??"
      उनका हास्यास्पद सा जबाब था.." लड़के अपने पिता से लड़ कर घर छोड़ देते हैं तो कहाँ जाते हैं..??"
      उन्हें इतना तक नहीं आभास कि लड़के प्लेट्फौर्म पर रह लेंगे..फुटपाथ पर रह लेंगे पर लडकियाँ नहीं रह पाएंगी....और ये जनाब अकेले नहीं हैं..इस तरह की सोच रखने वाले बहुत से लोग हैं.

      आप इतनी दूर से उस महिला की इतनी ही मदद कर सकते हैं कि उसके पिता-भाई का फोन नंबर लेकर उनसे संपर्क करें और उन्हें कन्विंस करें कि एक साल के लिए ही सही.."अपनी बेटी का साथ दें...उसे कोई कोर्स करवा कर अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करें. बाद में वो उनपर बोझ नहीं रहेगी..समाज की फ़िक्र वे ना करें...इस वक्त उनकी बेटी/बहन को उनकी जरूरत है.

      Delete
  10. किसी अनजानी आशा की किरण के सहारे यूँही जिंदगी बीत जाती. कहानी पूरी तरह से बाँध के रखती है.

    ReplyDelete
  11. यह कहानी नहीं है। किसी का भोगा हुआ यर्थाथ है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. राजेश जी,
      अक्सर कहानी कहीं ना कहीं किसी के या कई लोगो के भोगे हुए यथार्थ से ही जुड़ी होती है..

      यहाँ अपनी टिप्पणियों में भी सबलोग कह रहे हैं.... ऐसी कितनी ही जयायें आज भी हमारे समाज में हैं..समझ लीजिये...ये उन सबका ही भोगा हुआ यथार्थ है.

      Delete
  12. @चला बिहारी ब्लॉगर बनने जी,
    मुनव्वर राना या किसी ने भी कम ही बेटियों को ऐसी परिस्थितियों में आकर बैठते देखा होगा. प्राय: वे घर की कामवाली का स्थान ले लेती हैं चाहे साथ में नौकरी ही क्यों न कर रही हों. इन 'शख्स जी' को तो सहानुभूति मिल जाती है किन्तु जिसके घाव हैं उसे मलहम नहीं. इसीलिए तो थू है ऐसे समाज पर और उसके नियमों पर जो यूँ सिसकियों पर टिका है और फिर भी स्वयं पर गर्व करते नहीं अघाता.
    वैसे लगे हाथ यत्र नारी पूज्यन्ते भी जोड़ा जा सकता है.
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
    Replies
    1. जब यही मुनव्वर राना "मुझको मेरी माँ की मैली ओढनी अच्छी लगी" या "मेरी बिटिया भी इस चिड़िया से कितनी मिलती जुलती है" या "मैं जब तक घर न लौटूं माँ मेरी सजदे में रहती है" लिखते हैं तब तो लोग तालियाँ बजाते हैं और जब ये हकीकत बयान की तो बड़ा बुरा लगा!! और माफ कीजियेगा उन्होंने इसको ग्लोरिफाई नहीं किया है!! उनके बारे में बिना जाने जो आपने कह दिया उसे सुनकर बस स्माइली ही लगा सकता हूँ.. विवाद से दूर रहता हूँ, और जवाब भी नहीं देता हूँ.. इसे चाहे मेरी स्वीकारोक्ति मानी जाए या हार, या जो कुछ!!

      Delete
  13. जया की बेबसी और उसका नाजायज़ फायदा उठाते लोग.. एक अजीब सी सैडिस्ट लोगों की जमात... कोई मंशा नहीं, कोई फायदा नहीं, कोई उद्देश्य नहीं.. सिर्फ आनंद किसी की पीड़ा में... पूरा परिवार मनोविकार से ग्रस्त... दूसरी ओर मायके के लोग, असहाय और लाचार.. क्योंकि यदि वे उसका हाल जानते भी हों तो उनके पास केवल एक हल था.. जया को अपने घर बुलाकर बिठा लेना.. इससे बदनामी भी होती (तत्कालीन समाज में) और बेटी के आकर बैठ जाने का दर्द भी!!
    ऐसे में बच्चा.. क्या खुश हो ऐसी ममता पर वो बेचारी!!शायद परमात्मा ने सारे दुखों को समेटकर जब स्त्री का रूप दिया (पुरुष का क्यों नहीं-पता नहीं, शायद धरा स्त्री है जो सब सहती है इसलिए) तो वह जया के रूप में उभरी!!
    एक बात बरबस दिमाग में आ रही है!! कितनी ऐसी जया होंगी जिनकी आवाज़ हम तक पहुँची ही नहीं!!

    ReplyDelete
    Replies
    1. @एक बात बरबस दिमाग में आ रही है!! कितनी ऐसी जया होंगी जिनकी आवाज़ हम तक पहुँची ही नहीं!!

      बिलकुल सही कहा...पता नहीं...कितनी जयाएं..घुट घुट कर अपने मायके वालों की प्रतिष्ठा और अपने बच्चों के भविष्य की सोच..घुट घुट कर अपना जीवन बिता देती हैं...

      Delete
  14. आखों मे आंसू आ गये जया की बेबसी पर.....साथ ही राजीव के प्रति नफरत और क्रोध की भावना जगी....

    ReplyDelete
  15. Rashmidi, maine to yahan US mein apne ek friend ke saath yeh sab hote dekha hai. Abhi saal bhar pehle he us ladki ko uske husband ne divorce de diya. Lekin dhero atyachar sehneke baad bhi wo ladki mujhse kehti hai, ki aaj bhi agar mera pati mujhe wapas bula le to main use apna lungi.
    NRI logon ki ek alag he mentality hai yahan, especially anpadh NRI's ki. 50 saal purani mentality hai. India se padhi likhi ladkiyan chahiye, jo yahan aaye, kamaye, aur inki seva bhi kare aur inka bank balance bhi badhaye. Sanskar bhi pure chahiye. Aur jara ladkiyon ne muh khola nahi, ki tane dene lagte hai, ki India se ladki lane ka kya fayda, India jaise sanskaar he nahi. Ladki agar himmatwali hai to ladjhagad ke inko raaste pe le aaye ( ofcourse unke maa baap ko India mein badnam kiya jata hai bharpur), yaa alag ho jaye, warna meri friend jaisee ho to bechari ki jindagi barbad kar dee jaati hai. Us couple ke ek beta bhi hai, uski saja ladki ko yeh mili ki wo dusre state mein reh rahi apni behan ke paas bhi rehne nahi jaa sakti. abhi ek saste se apartment mein akele bete ko paal rahi hai kisi tarah, jahan usko sahara dene ke liye koi bhi nahi. Aur bhi bahut kuch hai batane ko, per kya kya batayein. Bure log aur unki jaadtiyon ka koi ant nahi hai.

    ReplyDelete
    Replies
    1. रीना,
      बहुत अफ़सोस है कि इतने अत्याचार के बाद भी...वो लड़की वापस जाने को तैयार है..शायद उसे एक जिद हो गयी है कि वो सब ठीक कर लेगी..कई बार ऐसा होता है कि लोग रिजेक्शन स्वीकार नहीं कर पाते...और फिर से कोशिश करना चाहते हैं...तुम उसकी फ्रेंड हो...उसे नई हॉबी अपनाने......बिखरे धागों को समेटकर फिर से जीने के लिए प्रेरित करो...

      भारतीय अमेरिका में रहें या..भारत में उनकी मानसिकता एक सी ही रहती है...और भारत में काफी कुछ बदल भी गया होता है पर विदेशों में बसे कुछ (अनएजुकेटेड ) लोग ये समझ बैठते हैं कि वे जब देश छोड़कर गए थे...वहाँ की परिस्थितियाँ अब भी वैसी की वैसी ही हैं. अब भी औरतें घूँघट निकाले ..सास के पैर दबाती हैं और पति की जूठन खाती हैं...और ऐसी ही उम्मीद लोग भारत से लाई गयी अपनी बहुओं से करते हैं.

      Delete
  16. जया कितनी दुलारी थी ये तो शादी के पहले से ही पता चल रहा है...कोई दुलारी-उलारी नहीं थी जया, वो अपने मायके वालों के लिए एक मुसीबत थी जिससे, सब जल्दी निजात पाना चाहते थे..और पा भी लिए...
    ऐसा भी नहीं की उनको समझ में बात नहीं आ रही थी...जानते बूझते हुए अपने घर की बेटी को ऐसे घर में ब्याह देना ही ग़लत था...शादी से पहले एक ख़त लिख कर, राजीव ने अपने चरित्र का प्रमाण दे भी दिया था...जया के घरवालों के लिए, वो खतरे की घंटी होनी चाहिए थी...और ऐसी बेहूदी घटना होने के बाद भी जया का इस शादी को स्वीकार कर लेना भी ग़लत था...वैसे भी जया, ने पहले इस शादी से इनकार किया ही था,,,क्योंकि अहसास तो उसे शादी के पहले ही हो गया था की, राजीव सही इन्सान नहीं है...अपने घर वालों को साफ़-साफ़ नहीं बताना भी जया की ग़लती है...और जैसे मायके वाले हैं जिनको पाता ही नहीं चल रहा है कुछ भी...ऐसे भी कोई भूलता है क्या अपनी बेटी को...?

    ReplyDelete
    Replies
    1. मैं फ़िजियोलॉजी में पीएच.डी. की हुयी एक ऐसी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर को जानता हूँ जिसने ओर्थोडॉक्स होने के मोह में परम्परागत ढ़ंग से तय किये रिश्ते को स्वीकार कर लिया बिना उसके बारे में लेश भी जानने की इच्छा किये हुये। और आज वह केवल एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी भर है जिसे अपने बच्चे के लिये एक पैकेट बिस्किट लाने के लिये भी पति को हिसाब देना पड़ता है।
      हमार समाज बहुत ही कॉम्प्लीकेटेड है। सारे तर्क समाप्त होने लगते हैं ....और गुस्सा आने लगता है।

      Delete
  17. इतना कुछ सहते हुवे भी जया के संकल्प ने अंत में विजय की शुरुआत कर ही डाली ... रूद्र ... अपने सही नाम दिया है इस पात्र का ... बदलाव का संकेत दिया है आपने ... काश इस बदलाव की शुरुआत तभी हो गई होती जब राजीव का पहला रंग दिखाई दिया था ...

    ReplyDelete
  18. कुल मिलाकर दोनों तरफ से बच्चों की परवरिश में दोष दिखायी देता है। हम और हमारा समाज बेटे-बेटी में जो भेदभाव बचपन से करते हैं, उसी के फलस्वरूप राजीव और जया जैसे पात्र जन्म ले लेते हैं।
    क्यों बेटों की हर जिद (सही-गलत)पूरी करते हैं, हम
    क्यों बेटियों को सहना, दबना सिखाते हैं, हम

    प्रणाम

    ReplyDelete
  19. dil chu lia aapki kahani ne rashmi di....par samaj nahin aata ek padhi likhi ladki itna atyachar kaise sahan kar leti hai...rajiv jaise log to is layak hai ki unhe 100 janmo mein bhi koi ladki naseeb na ho...vaise atyachar vahan jyada hota hai jahan use sahan kiya jaye....aaj kai dino baad blog par aayi aur teen ank sath mein padhe par man kar raha hai aage ki kahani bhi abhi padhne ka...waiting for the remaining story :)

    ReplyDelete
  20. यह किश्त तो दिल दहला देने वाली थी !
    अब तो जब तुम सुखांत लिखना शुरू करोंगी तब ही प्रतिक्रिया दूँगी , अब चाहे तुम पलायनवादी समझो !

    ReplyDelete
    Replies
    1. सुखान्त होने पर प्रतिक्रिया दोगी...या पढ़ोगी भी तब ही ??

      हम कौन होते हैं किसी को पलायनवादी .या कोई भी वादी कहनेवाले ...
      पर मन में ये ख्याल जरूर आता है......पढ़ने में दस मिनट लगता है...शायद एकाध घंटे मूड खराब रहे...पर जो इन दर्द से गुजरते हैं...जिन्होंने सालो साल ये सारा जुल्म झेला होता है...उनकी मनः स्थिति कैसी रहती होगी??

      Delete
    2. दर्द की अनुभूति की ही तो बात है ...पढना मेरा सिर्फ शौक नहीं , जुनून है ...जब कोई कहानी या उपन्यास पढ़ रही होती हूँ उसके चरित्र मेरे साथ उठते बैठते हैं , उनकी खुशियाँ और दर्द मेरे हो जाते हैं , इसलिए ही उस दर्द को बेहतर समझ पाती हूँ , बल्कि उसे जीने लगती हूँ , बस इस दर्द से बचने के लिए ही सुखांत कहानियां ढूंढती हूँ !!

      Delete
  21. और कितना ज़ुल्म सहेगी जया... मार्मिक होती जा रही है... यहाँ मानसिक और भौतिक दोनों स्तर पर जया का दोहन हो रहा है...

    ReplyDelete
  22. kahte hain garbhbavastha to stri ke jeevan ka sabse anokha waqt hota hai...lekin jaya ko yahan bhi chain nhai hai..kahin to lagta hai kasai bhi inse zyada raham dil hote hain...Dr. se bhi madad le sakti thi jaya..bhale hi wo bahar baithe the lekin wo Dr. se kahkar police me report to karwa hi sakti thi...shayad yahan to bhag niklane ka acchha rasta bhi tha..apne ghar ja sakti thi..

    ReplyDelete
  23. राजीव घुटनों के बल पेट पर चढ़ गया .... इसे जानवर कहने पर जानवर को भी बुरा लगेगा वे भी इससे अच्छे होते ही है .... !

    शायद ईसा मसीह की तरह हर लड़की को अपना क्रॉस खुद ही ढोना पड़ता है...कोई उसकी मदद को नहीं आता.... बिलकुल सही कही आपने .... !!

    ReplyDelete
  24. मार्मिक कहानी। वाणी जी की कविता पढ़कर यहाँ आ पाया। कहानी पर आए कमेंट भी लाज़वाब हैं। अपने विचार फिर कभी।

    ReplyDelete
  25. अविश्वसनीय सी लगने वाली बातें भी समाज की कड़वी सच्चाई हैं। कितने कानून भी ऐसे अपराध रोकने के लिये ही बने हैं मगर दूसरा पक्ष यह है कि उन कानूनों का दुरुपयोग करने वाले भी हैं, हमारे बीच में। अंत में बात वहीं आती है कि दुष्टों से डील कर पाना आसान नहीं होता, जिन पर पड़ती है, वही जानते हैं। बहुत अच्छी कहानी है, लेखिका को बधाई!

    ReplyDelete
  26. हमारे ग्रुप में एक लेडी थीं, MNIT इलाहाबाद में फिजिक्स की गेस्ट लेक्चरर, वो बंगाली थीं. इंटरनेट के माध्यम से इलाहाबाद के एक व्यवसायी से मित्रता हुयी, फिर प्रेम हुआ. और वो अपने माँ-बाप के विरुद्ध प्रेम-विवाह कर इलाहाबाद चली आयीं. कुछ दिन तक तो सब ठीक-ठाक रहा, फिर पति के घरवालों को ये बात सताने लगी कि कोई दहेज नहीं मिला है. और धीरे-धीरे पति ने भी मारपीट शुरू कर दिया. दस साल की शादी, अक्सर पति से पिटना, और हमारे लाख कहने और समझाने पर भी पति का घर ना छोड़ना. वो इसलिए अपने मायके नहीं जा रही थीं क्योंकि उन्होंने उनके विरुद्ध जाकर प्रेम-विवाह किया था. पर अकेली तो रह सकती थीं, लेकिन वो भी संभव नहीं था इलाहाबाद जैसे शहर में...हम मदद करने को तैयार थे, पर वो लेने को नहीं तैयार थीं.
    क्या कहेंगे इसको? ये कि सिर्फ पढ़ाने-लिखाने से कुछ नहीं होता. हमें अपनी बेटियों को मानसिक और भावनात्मक रूप से सशक्त बनाना होगा...कभी-कभी समझ में नहीं आता कि करें क्या ?

    ReplyDelete