Monday, February 28, 2011

एक यादगार नाटक : 'बस इतना सा ख्वाब है'

शेफाली शाह और किरण करमाकर
एक बहुत ही बेहतरीन नाटक देखने  का मौका मिला,"बस इतना सा ख्वाब है". यह प्रशांत दलवी द्वारा लिखित मराठी नाटक 'ध्यानीमणी' का हिंदी अनुवाद है. करीब 15 साल  पहले मराठी में इसका मंचन बहुत मशहूर  हुआ था. इसके करीब 500 शो हुए  थे .पर यह नाटक एक कालजयी रचना  है, किसी भी युग में.....किसी भी काल में अंतर्मन को मथ डालने की  सामर्थ्य रखता है. मशहूर  फिल्म निर्माता विपुल शाह ने इसका हिंदी में मंचन करने का निर्णय लिया और चंद्रकांत कुलकर्णी के निर्देशन में शेफाली शाह (विपुल शाह कि पत्नी)  ने इस नाटक के माध्यम से 10 वर्षों बाद हिंदी नाटको में वापसी की है.   शेफाली शाह  (हसरतें..जैसी सीरियल की मशहूर  टी.वी. कलाकार ) और किरण करमाकर ( घर-घर की कहानी के बड़े बेटे..पार्वती के पति) ने मुख्य भूमिका निभाई हैं.

शालिनी एक मध्यमवर्गीय गृहणी है....ढीली ढाली साड़ी जैसे बस किसी तरह लपेट कर, घर के काम में व्यस्त रहती  है. पर खुशमिजाज है, दफ्तर के लिए तैयार होते पति से लगातार बातें करती रहती है...बेटे के नए यूनिफॉर्म खरीदने  की बातें...शहर से दूर..एक रिसोर्ट में नौकरी करने की शिकायत.....पति के देर रात तक काम  करने की शिकायत....कोई पड़ोसी ना होने की शिकायत...बाप-बेटे के घर गन्दा करने की और दोनों के मितभाषी होने की प्यार भरी शिकायत. पति के बाथरूम में टॉवेल मांगने पर कह देती है...."लगता है पुरुष इसीलिए शादी  करते हैं कि बाथरूम में से टॉवेल मांग सकें."

उसी वक्त पति के एक दूर के  रिश्तेदार का बेटा अपनी पत्नी के साथ उनके घर पर मेहमान  के रूप में आता है. वह लड़का क्लिनिकल साइकोलॉजी में पी.एच.डी कर रहा है. पति तो ऑफिस चला जाता है पर शालिनी उनकी आवभगत करती है. जब पता चलता है कि उसकी पत्नी प्रेग्नेंट है तो उसे सौ हिदायतें देती है. अपना अनुभव भी बांटती है. पूरे समय अपने बेटे मोहित की बातें करती रहती  है कि कैसे उसे  बड़ा करने में कितनी मुश्किल हुई. आठवीं में पढता है पर अपने पिता  के कंधे तक आ गया है. जब वे पतिपत्नी बाहर घूमने जाने लगते हैं तो पूछते हैं...."मोहित को क्या पसंद है..उसके लिए क्या गिफ्ट लायें' तो शालिनी मना करती है...पर बातों बातों में कह देती है,'देखो सारा घर उसके खिलौनों से भरा  है फिर भी टेबल टेनिस के रैकेट लिए जिद करता है.'

दूसरे दृश्य में रात के ग्यारह बज गए हैं...शालिनी दरवाजे पर खड़ी इंतज़ार कर रही है, मोहित अब तक घर नहीं लौटा है. मेहमान भी परेशान से खड़े हैं. पति बाहर से उसे ढूंढ कर लौटते हैं तो बताते हैं...'मोहित के  दोस्त भी  अभी घर नहीं  लौटे हैं.' मेहमान सोने चले जाते हैं. तभी बिजली  गुल हो जाती है और अँधेरे में मोहित के आने की खटपट...शालिनी के डांटने की आवाज़ आती रहती है...."अभी तो आया और अब सुबह कराटे कैम्प जाना है...तू घर आता ही क्यूँ है"
यह सुन कर सोने के लिए गए मेहमान दंपत्ति सोचते हैं...मोहित को उसकी टेबल टेनिस  की रैकेट अभी ही दे दें कहीं वह उनके जागने से पहले ही ना चला जाए. जब वे दरवाज़ा खोल बाहर आते हैं तो देखते हैं..'वहाँ कोई मोहित नहीं है....शालिनी एक खाली कुर्सी को डांट रही है'

और सारे दर्शक  सहम से जाते हैं. शालिनी संतानविहीन है पर वह एक कल्पना की दुनिया बसा लेती है जिसमे
उसका बेटा बड़ा हो रहा है. सुबह भी वह वैसे ही मेहमान दंपत्ति से शिकायत  करती है कि 'मोहित रात को आया और सुबह चला गया.' प्रवीण को अपने डॉक्टर होने का दायित्व महसूस होता  है और वह शालिनी को  इस सत्य से अवगत कराने की  कोशिश  करता है, कि 'मोहित का कोई अस्तित्व ही नहीं है' इसपर शालिनी रौद्र रूप धारण कर लेती है और कहती हैं.."खबरदार जो  ऐसा कहा...तुम बताओ,तुम्हारा क्या  अस्तित्व है??...इसलिए कि मैं कह रही हूँ कि तुम प्रवीण हो?...तुम्हारी पत्नी कहती है..तुम्हारी माँ कहती है...ये तुम्हारे कपड़े हैं...ये तुम्हारी चीज़ें हैं...इसीलिए तुम्हारी पहचान है ना?...वैसे ही  मैं कहती हूँ कि मोहित है...ये उसके खिलौने हैं...ये उसके कपड़े हैं ...तो उसका अस्तित्व  है". बहुत ही गूढ़ बात कहलवा दी यहाँ लेखक ने शालिनी के मुख से....हमारा अस्तित्व किसी  की पहचान के बिना क्या है. शालिनी कहती है ,'घर में बच्चे होने का यही मतलब है ना...कि घर warmly disorganized रहता है...तो देखो मेरा घर भी  बिखरा हुआ है. यह भी warmly disorganized है.'

शालिनी के पति प्रवीण  को बताते हैं कि 'शालिनी का 'बस इतना सा ख्वाब पूरा नहीं हो सका कि वह अपने बच्चे की माँ बन सके. और इस वजह से पड़ोसी अपने बच्चों को हमारे घर नहीं भेजते थे कि कहीं उन्हें नज़र ना लग जाए. हमें बच्चे के जन्मोत्सव में नहीं बुलाते और शालिनी ने अपनी कल्पना की दुनिया बसा ली. अगर तुम उसे सत्य से अवगत कराना भी चाहते हो...उसकी आँखे खोलना भी चाहते हो तो खोल कर दिखाओगे क्या.??...यही कटाक्ष?...यही ताने? इस से अच्छा तो यह है कि वह इसी दुनिया में रहे और यही सोच, मैं भी उसका साथ देने लगा. यह समस्या मनोवैज्ञानिक से ज्यादा सामाजिक है"

दोनों पति-पत्नी ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे बेटा उनके घर में ही हो..
घर में साइकिल रखी  है, टेबल पर कंप्यूटर है....टेबल लैम्प जलता रहता है...छोटा सा टेबल फैन चलता रहता जैसे कोई बच्चा पढ़ रहा हो. बीच की  कुर्सी को इंगित कर वे आपस में बहस करते हैं कि  वह बड़ा होकर क्या बनेगा?...इस माध्यम से समाज के हर वर्ग पर गहरा कटाक्ष भी किया है..आखिर में शालिनी कहती है.. "तुम बस एक अच्छे भारतीय नागरिक बनना "
उसके पति जबाब देते  हैं,"हाँ, वहाँ काफी वेकेंसीज़ हैं..."

पति का प्रमोशन हो गया है...वह मिठाई और नई साड़ी लेकर घर आता है..बहुत खुश है कि अब काम का बोझ कम हो गया...अब अपनी पत्नी को ज्यादा समय दे पायेगा. वह पत्नी के नज़दीक जाना चाहता है तो वह मोहित की तरफ इशारा करती  है...आखिर पति साइकिल बाहर रख देता है और कहता है...'मोहित बाज़ार से कुछ सामान लेकर आओ' .फिर से नज़दीक जाना चाहता है तो शालिनी पति को ही 'मोहित समझकर संबोधित कर कहती है कि....'इतने बड़े हो गए हो..अब भी डर लगता  है..अपने कमरे में जाओ' .दरअसल शालिनी के मन में ये बात गहरे पैठ गयी है कि जब वह संतान को जन्म नहीं दे सकती तो पति के साथ की क्या जरूरत.

अब पति को लगता है...शालिनी से  मोहित को  दूर करने की जरूरत है. पहले, पति यह  बहाना बनाता है कि मोहित गलत संगत में पड़ गया है,ठीक से नहीं पढता उसे बोर्डिंग  भेज देना चाहिए .इस पर शालिनी उसके मेज के करीब सारा समय एक स्टूल लेकर बैठी  रहती है कि मैं इस पर नज़र रखूंगी. आखिरकार एक दिन पति गुस्से में दरवाज़ा बंद कर मोहित को मारने-पीटने  का अभिनय करता है और फिर कैंची से उसका खून कर देता है. खिड़की से सब देखती,शालिनी चिल्लाती रहती है. और बाद में कमरे में इस तरह रोती है कि शायद ही ऑडीटोरियम  में कोई आँख नम ना हुई हो.

इसके बाद पति को ही अपराध बोघ होने लगता है...उसे सब जगह खून बिखरा नज़र आता है...उसे जमीन पोंछते देख..शालिनी  उठकर आती है.और जब वह कहता है,"मैने मोहित का खून कर दिया..अब तुम कैसे रहोगी..तुम इतनी अकेली हो गयी" तो शालिनी कहती है..'अकेली कहाँ...आप हैं ना मेरे साथ "...नाटक का अंत थोड़ा अचानक (abrupt) सा लगता है...हो सकता है ...नाटककार को जो कुछ कहना था,वह कह चुका था...उसे नाटक को अब और नहीं खींचना  था या फिर शायद इस तरह का  शॉक लगने  के बाद ऐसे मरीज़ ठीक भी हो जाते हों.

शेफाली शाह और किरण करमाकर का अभिनय इतना जानदार है कि देखते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं. शेफाली शाह ने दो घंटे तक 'शालिनी' के  कैरेक्टर में रहकर , इस रोल को इतना आत्मसात कर लिया था कि नाटक ख़त्म होने के बाद दर्शकों का अभिवादन करते हुए भी मुस्कराहट नहीं आ पायी उनके चेहरे पर.
 

शेफाली शाह और विपुल शाह
ऑडीटोरियम से निकलते हुए दर्शक अपने में गुम...कुछ ग़मगीन से थे. शायद सबके दिमाग में चल रहा था कि  हमें हर चीज़ फॉर ग्रांटेड लेने की आदत है. बच्चों की शैतानी...उनकी शरारतों  से हम तंग आ जाते हैं....वहीँ ऐसे भी लोग हैं, जो उनकी एक शरारत की बाट जोह रहे होते हैं. शेफाली शाह ने  भी एक इंटरव्यू में कहा कि 'इस नाटक में अभिनय के बाद वे अपने बच्चों की अहमियत  समझने लगी हैं.'
 
 यह  नाटक बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर गया. यह विषय कुछ ऐसा है कि  इस पर संतानहीन  दंपत्ति और उनके करीबी लोग, दोनों ही आपस में खुलकर बात नहीं कर पाते. एक निश्चित फासले से अंदाज़ने की कोशिश की जाती है. पर मन में क्या चल  रहा है...कोई नहीं समझ पाता. लोग दया का पात्र ना समझ लें,यह सोच निस्संतान दंपत्ति अपना दुख नहीं बाँट पाते....और कहीं उन्हें कुछ बुरा ना लग जाए,यह सोच , बाकी लोग भी चुप रहते हैं.  लोग ,बड़ी आसानी से कह देते हैं , निस्संतान दंपत्ति कोई बच्चा गोद क्यूँ नहीं ले लेते. लेकिन उनके मन की क्या स्थितियाँ हैं. वे अपने मन को कितना तैयार कर पाते हैं ,किसी दूसरे का बच्चा गोद लेने  के लिए यह सब दूसरे नहीं समझ पायेंगे. बच्चा  गोद लेना या  न लेना यह उनका नितांत व्यक्तिगत निर्णय है   और उसका सम्मान किया जाना चाहिए.

Sunday, February 20, 2011

वे ठिठके पल...

देर तक  मुट्ठी  में बंद, उस 
चिपचिपी चॉकलेट का स्वाद
गेट से लौटती  नज़र
घड़ी की टिकटिक और 
कदमों तले चरमराते 
सूखे पत्तों की आवाज़

वो बेख्याली में आ जाना
परेशान करती,
सूरज की किरणों के बीच
और मेरे चेहरे से उछल कर
तुम्हारे काँधे पर जा बैठना 
खरगोश के छौने सा
उस  धूप के टुकड़े का
जरा सी तेज आवाज
और हडबडा कर,  उड़ जाना
उस पतली डाल से
झूलती बुलबुल का

नामालूम सा
अटका....पीला पत्ता
निकाल  देना बालों से
अनजाने ही,ले लेना
भारी बैग...हाथों से 

ठिठका पड़ा है वहीँ, वैसा ही  सब

अंजुरी में उठा, 
ले आऊं उन लमहों   को
पास  रखूँ
बतियाऊं उनसे, दुलराऊ उन्हें
पर वे उँगलियों  से फिसल 
पसर  जाते हैं, फिर से
उन्हीं लाइब्रेरी  की सीढियों पर

नहीं आना उन्हें,
इस सांस लेने को 

ठौर तलाशती
सुबह-ओ-शाम में
नहीं,बनना हिस्सा
कल के सच का
झूठे  आज में

सिर्फ
आती है,खिड़की से, हवा की लहर
लाती है
अपने साथ
हमारी हंसी की खनक
नल से झरझर बहते पानी में
गूंज जाता  है,
अपनी बहस का स्वर 

गैस की नीली लपट से 
झाँक जाती है, 
आँखों की शरारती चमक
 

सब कुछ तो है,साथ
वो हंसी..वो बहस...वो शरारतें
फिर क्या रह गया वहाँ..
अनकहा,अनजाना,अनछुआ सा
किस इंतज़ार में....

Thursday, February 17, 2011

टी.वी. सीरियल देखना....महिलाओं का शौक या मजबूरी.

पिछली पोस्ट में मैने आपत्ति जताई  थी..,टी.वी. सीरियल्स में दिखाए जा रहे उन दृश्यों पर  जो कभी हमारी संस्कृति का अंग थे ही नहीं.

टिप्पणियों में एक बात पर अधिकाँश लोगो ने जोर दिया कि महिलाएँ ये  सब  देखना पसंद करती  हैं...वे बड़े चटखारे लेकर बिना पलक झपकाए देखती हैं...और इसीलिए सीरियल निर्माता ये सब दिखाते हैं.
मैने टिप्पणियों के उत्तर में भी इस प्रश्न पर विचार करने की कोशिश की कि  आखिर महिलाएँ टी.वी. सीरियल्स देखना...इतना पसंद क्यूँ करती हैं?? फिर लगा विस्तार से इस विषय पर  पोस्ट ही लिखनी चाहिए
 

जैसा मेरा खयाल  है कि महिलाएँ टी.वी. सीरियल्स मजबूरी में देखती हैं. उनके पास मनोरंजन  के दूसरे साधन नहीं हैं. समय काटने का भी कोई बेहतर उपाय नहीं है.

आजकल सबलोग अपने-अपने घरो में सिमटते जा रहे हैं. बस किसी अवसर पर ही लोगो का मिलना-जुलना होता है. पहले की तरह महिलाएँ मिलकर अचार-बड़ियाँ-पापड़ नहीं बनातीं. पहले गाँव-मोहल्ले में किसी लड़की की शादी तय  हुई और पूरा महल्ला या गाँव ही लग जाता  था, शादी की तैयारियों में. कहीं महिलाएँ घर के कामो से बचे समय में पेटीकोट, ब्लाउज की सिलाई में जुटी हैं...तो कहीं कशीदाकारी में तो कहीं  लड़की को दिए जाने वाले तरह-तरह के हस्तकला से निर्मित वस्तुएं बनाने में.  इन सबके साथ, मंगल-गीत...हंसी मजाक भी चलता रहता था. शादी...जन्मोत्सव....तीज-त्योहा
र जैसे अवसर अक्सर आते ही रहते थे.
 
शादी-ब्याह ना हो तब भी महिलाओं को घर के काम में ही काफी वक्त लग जाता था. तब ये गैस के चूल्हे...मिक्सी..अवन नहीं हुआ करते थे. ब्रेड, मैगी  या बाज़ार का रेडीमेड नाश्ता उपलब्ध नहीं था . जो भी नाश्ता बनाना हो वे अपने हाथों से ही बनाया करती थीं. इन सबके बाद भी बचे हुए समय पर वे सिलाई मशीन पर काफी काम किया करती थीं...पेटीकोट-ब्लाउज...लड़कियों की फ्रॉक,  सलवार-कमीज़....पजामे सबकी सिलाई घर पर ही की जाती थी. पचास के दशक  में शायद हर घर में फूल कढ़े रूमाल और तकिये के गिलाफ जरूर नज़र आते थे. क्रोशिये का भी काफी काम किया जाता था. और यह सब सिर्फ शौक के तहत नहीं...हर महिला इन कामो में रूचि लेती थी या फिर उन्हें लेनी पड़ती थी.( कहीं पढ़ा था कि कढाई-बुनाई मेंटल थेरेपी का भी काम करती है. ). लिहाज़ा इन सब कामो में उलझी महिलाओं को खुद के लिए भी वक्त मयस्सर नहीं था.

पर आज परिदृश्य बदल गए हैं. गाँव में भी अब गैस के चूल्हे पहुँच गए हैं. मिक्सी..अवन..टोस्टर अब घंटो का काम मिनटों  में निपटाने लगे हैं. बच्चों के  लिए माँ, तरह-तरह के व्यंजन बनाने को तैयार है पर बच्चों को मैगी चाहिए. अब शायद माँ, तकिये के गिलाफ पर फूल काढ दे तो बच्चे सर रखने को तैयार ना हों. घर पर सिले कपड़े पहनने का चलन करीब-करीब बंद ही  हो गया है.वजह ये भी है कि बाज़ार में ,उस से कम पैसों में बिना मेहनत के रेडीमेड कपड़े उपलब्ध हैं.


शादी-ब्याह में भी अब सब कुछ कॉन्ट्रेक्ट पर होने लगा है...करीब पंद्रह साल  पहले मैंने गाँव में एक शादी अटेंड की थी और वहाँ, खाने का कॉन्ट्रेक्ट किसी एक को...मंडप सजाने का दूसरे को...और स्टेज सजाने का किसी तीसरे को दिया गया था. मिलजुल कर काम करनेवाली प्रथा ही विलुप्त  सी हो गयी है.


जिन महिलाओं के बच्चे छोटे हैं, उनके लालन-पालन में उनका काफी समय निकल जाता है.परन्तु जब बच्चे हाइ-स्कूल में पहुँच जाते हैं तो महिलाओं के पास ढेर सारा खाली  वक्त बच जाता है. अब बच्चे अपना सारा काम खुद करने लगते हैं. स्कूल छोड़ने -लाने की  जिम्मेवारी से भी  निजात मिल जाती है. पढ़ाई के लिए ज्यादातर ट्यूशन जाते हैं.

 

खासकर उन महिलाओं के पास ज्यादा वक्त होता है,जिनके बच्चे शहर से बाहर पढ़ने चले जाते हैं. ऐसी महिलाओं   में अक्सर, empty nest syndrome देखे जाते हैं.(जैसे पक्षियों के बच्चे घोंसला  छोड़ उड़ जाते हैं ) उनके पास अब बहुत सारा वक्त होता है...और साथ में अकेलेपन का अहसास भी. अक्सर वे अवसादग्रस्त भी हो जाती है. और टी.वी. सीरियल्स के पात्रों से इस  कदर जुड़ जाती हैं कि उनके दुख-दर्द..हंसी-ख़ुशी उन्हें अपनी सी लगने लगती है.

महिलाओं के पास अब वक्त तो बच जाता है. परन्तु इस वक्त के साथ क्या किया जाए..इसकी प्लानिंग किसी के पास नहीं है. लिहाजा वे टी.वी. देखकर ही समय काटती हैं. कई महिलाएँ कहती हैं...'हमें टी.वी. देखना नहीं पसदं...इतने समय में हम कुछ पढ़-लिख लेते हैं " पर सबको पढ़ने-लिखने का  शौक नहीं होता. सबका IQ लेवल अलग है. अगर वे टी.वी. देखकर ही समय काटना पसंद करती हैं तो हमसे कोई  कमतर नहीं हैं.

 

कई  पुरुष, कह बैठते हैं..." जरूरी काम पड़े रह जाते हैं...और वे टी.वी. देखती रहती हैं." काम तो वे हर हाल में निबटाती ही होंगी......शायद समय की उतनी पाबन्द नहीं हों. पर अगर दूसरा पक्ष देखा जाए तो उनका घरेलू काम कितना बोरिंग है...और वे इसे वर्षों से करती आ रही हैं. अब तक..मनों धूल साफ़ कर चुकी होंगी...लाखों रोटियाँ बना चुकी होंगी...कितने ही क्विंटल दाल-चावल-सब्जी बना चुकी होंगी. इनके बीच अगर कुछ इंटरेस्टिंग बदलाव मिले तो वे निश्चय  ही आकर्षित हो जायेंगीं.

घुघूती जी ने पिछली पोस्ट की टिप्पणी में कहा था कि 
"सीरियल तो अफ़ीम हैं.देखो और संसार की चिंताओं से मुक्त हो यहाँ के पात्रों के दुखों को जियो." परन्तु अफीम की एडिक्शन की तरह ही टी.वी. का एडिक्शन भी नहीं होना चाहिए. ईश्वर हर किसी को कोई ना कोई गुण प्रदत्त करता ही है. महिलाएँ अपने जीवन के  Best  Year घर-परिवार संभालने में लगा देती हैं. तो अब उनके पति-बच्चों की बारी है कि वे उन्हें कोई शौक अपनाने या किसी तरह का कार्य करने को प्रेरित करें.

म्युज़िक..बागबानी...सिलाई...कढाई...पेंटिंग...योगा...कई सारे शौक होते हैं...जो प्रोत्साहन के अभाव में असमय  ही कुम्हला गए होते हैं. अब, जब उनके पास समय है...फिर से उनके शौक को पल्लवित-पुष्पित किया जा सकता है. कुछ नया सीखा भी जा सकता है..सीखने की कोई उम्र नहीं होती...(हम सबने भी आखिर इस उम्र में कंप्यूटर चलाना सीखा,ना ) परन्तु हमेशा सबके लिए सोचती महिला..शायद ही अपने लिए कभी, खुद सोचे...और संकोच भी घेरे रहता है,उन्हें...इसलिए प्रोत्साहन की बहुत जरूरत है.


हमने पश्चिमी जीवन-शैली  तो अपना ली है...पर ये नहीं अपनाया...कि वहाँ किसी भी काम को छोटा नहीं समझा जाता.

 

मुंबई में ही देखती हूँ....महिलाएँ तरह-तरह के काम करती हैं..चाहे वो आर्थिक कारणों से करती हों...या समय के सदुपयोग के लिए ही. घर से इडली-चटनी...नीम-आंवले-करेले का जूस ...या घर की बनी रोटी-सब्जी की सप्लाई. बहुत सारे लोग देर से ऑफिस से आते हैं...या फिर अकेले रहते हैं...वे हमेशा होटल से ज्यादा घर के बने खाने को तरजीह देते हैं. बच्चों की बर्थडे पार्टी का ऑर्डर....टिफिन सर्विस तो एक बढ़िया बिजनेस है ही. फूलों के पौधों की नर्सरी खोलना...या योगा सीखकर...दूसरों को सिखाना...सिलाई-कढाई  सिखाना....ट्यूशन, ड्राइंग क्लासेस..प्ले स्कूल...डे-केयर......कितनी ही सारी चीज़ें हैं..जिनमे खुद को व्यस्त रखा जा सकता है. और पुरुषों को भी इसमें हेठी नहीं समझनी चाहिए कि वे क्या इतना नहीं कमाते कि पत्नी को काम करना पड़े. कई काम शौक के लिए भी होते हैं.

हर शहर -कस्बे में समाज-सेवी संगठनो का भी गठन होना चाहिए...जहाँ महिलाएँ जाकर अपना कुछ योगदान कर सकें...

हमारे राष्ट्र के उत्थान के लिए भी जरूरी है कि स्त्रियों  का भी इसमें योगदान हो. उन्होंने अपने बच्चों का सही ढंग से लालन-पालन  कर देश को अच्छे नागरिक तो दिए...लेकिन अब उनकी दूसरी पारी शुरू होती है...और उसमे यूँ निष्क्रिय बैठ सिर्फ..टी.वी. देखना सही नहीं है...स्कोर बोर्ड पर कुछ दिखना चाहिए.

Friday, February 11, 2011

डायना के जमाने में डायन की खोज

कुछ दिनों पहले तक लगता था एक शब्द से मेरा परिचय नहीं है.....और वो है, नफरत....घृणा....Hate.  ....गिरिजेश जी की एक पोस्ट जिसपर उन्होंने लिखा था...

"दुनिया हसीन रहे,
इसके लिए घृणा भी उतनी ही आवश्यक है, जितना प्रेम।
गुनहगारों!
मैंने तुम्हारे लिए सहेज रखा है। भूलना मेरी फितरत नहीं। 
 
 

उस पर मैं अपना ऐतराज जता आई थी कि....घृणा बहुत ही strong emotion है ...और उसे खुद से दूर ही रखना चाहिए. कभी कहीं भी बातचीत में कोई कहता.."मुझे तो ये बिलकुल पसंद नहीं...ये तो मेरे बर्दाश्त  के बाहर है "  तो मैं यही सोचती कि मेरी इतनी strong disliking  नहीं है. इस हद तक मैं किसी को नापसंद नहीं करती. चाहे किसी ने मेरे साथ कुछ बुरा ही किया हो...मैं उसकी तरफ से इतनी निस्पृह हो जाती... जैसे मेरे लिए अब उसका अस्तित्व ही नहीं है. पर नफरत जैसी भावना नहीं आती.

लेकिन कल तो जैसे दिलो जान से मैने ,पूरे एक घंटे तक बेइंतहा नफरत की है,किसी से ....पता नहीं आगे शायद ये भाव मंद पड़ जाए पर लिखते वक्त तो भी रत्ती भर भी ये भावना कम नहीं हुई है.


टी.वी. सीरियल्स नहीं ही देखती  हूँ. कभी-कभार चैनल सर्फ़ करते नज़र पड़ जाती है. और देखती हूँ....चमकदार साड़ियों में ..जेवरों से  लदे...खुले बाल, रसोई में काम करती औरतें....हुक्का पीते और रौबीले  आवाज़ में  आदेश देते...अठारवीं सदी के पुरुष...किसी अबला को सताती उसकी सास...या फिर चालें चलती भाभियाँ....और तुरंत ही चैनल बदल  देती हूँ.

कल भी ऐसे ही  चैनल बदलते.
..'कलर्स  चैनल' पर एक दृश्य देखा...किसी गाँव का दृश्य था...दुल्हन के जोड़े में, बेसुध सी एक लड़की को थामे एक महिला बैठी थी और कई सारे लोग उन दोनों को  घेर कर खड़े थे. एक सरपंच फरमान सुना रहा था, "ये लड़की डायन है...कल सुबह इसे पत्थर मार-मार कर मौत के घाट उतार दिया जाएगा. सुबह सारे गांववासी एक टीले पर इस लड़की को पत्थर मारने के लिए एकत्रित  हो जाएँ. गांवालों को नाश्ता पानी पंचायत की तरफ से दिया जाएगा."

और मेरी उंगलियाँ ठिठक  गयीं...रिमोट किनारे रख देखने लगी...कि आखिर ये कौन सा सीरियल है?...निर्देशक-प्रोड्यूसर क्या दिखाना चाह रहे हैं? यह सीरियल है
,'फुलवा'.....'कलर्स' चैनल पर आता है... शायद डाकू 'फूलन देवी' के जीवन से प्रेरित है और शायद वे यह दिखाना चाहते हैं कि अपने परिवार पर जुल्म के बदले में एक लड़की बन्दूक उठा, डाकू  बन जाती है. 'फुलवा' उस दुल्हन की छोटी बहन का नाम है.

पर किसी गरीब पर जोर-जुल्म दिखाने के लिए ये सीरियल निर्माता,लेखक..अब ऐसी कल्पनाओं का सहारा लेने लगे हैं? मुझे उस सीरियल के लेखक का नाम  जानने की इच्छा हुई..आखिर ऐसे वाहियात दृश्य किस कलम के अपराधी की उपज हैं.लेखक के नाम के इंतज़ार में मैंने  बाकी के दृश्य भी देख लिए. और देखना भी चाहती थी कि आखिर इस सीरियल के लेखक-निर्देशक की मानसिक विकृति कितनी दूर तक जा सकती है? और क्या क्या दिखा कर दर्शकों की भावनाओं से खेलना चाहते हैं? शायद चार-पांच  चार एपिसोड  में समेटा गया है इस पूरे प्रकरण को.  उस परिवार की बेबसी...घर की  रखवाली करते. ठहाके लगाते गाँव के छोकरे.....आँसू पोंछते हुए गड्ढा  खोदते उस लड़की के चाचा (पत्थर मार कर मौत की घाट उतार देने के बाद ,उस लड़की को दफनाने के लिए गड्ढा खोदने का जिम्मा उसके चाचा को दिया गया था) ...सबकुछ विस्तार से दिखाया गया है. लड़की को सुबह गाँव की स्त्रियाँ..सफ़ेद वस्त्र लाकर देती हैं...कि उसे पहन कर वह पत्थर खाने को तैयार हो जाए.(लेखक के मानसिक दिवालियेपन का एक और सुबूत)


इस तरह की ख़बरें पढ़ी है कि सुदूर गाँव में किसी औरत को डायन करार देकर उसके बाल उतार दिए गए...या कभी कभी वस्त्रहीन परेड करवाई गयी. यह जिल्लत भी कोई मौत से कम नहीं...पर पत्थर मार-मार कर मौत देने  की घटना तो कभी नज़र में नही आई.


ये सउदी अरब  में होता है और
Princess of Saudi Arabia  किताब में एक ऐसे प्रकरण का आँखों  देखा हाल लिखा है कि कैसे शहर से दूर एक निर्जन स्थान पर उस लड़की को लेकर जाते हैं और ट्रक में  पत्थर भरकर बहुत सारे  लोग भी जाते हैं. साथ में एक डॉक्टर भी होता है...जो थोड़ी थोड़ी देर बाद जाकर उस लड़की की नब्ज़ चेक करता है कि उसकी साँसें और पत्थर का इंतज़ार कर रही हैं या नहीं. करीब चार साल पहले पढ़ी थी ये किताब पर आज भी  याद कर रोम-रोम सिहर जता है... कितनी  ही रातों की नींद ले गया था यह प्रकरण...

पर हमारे देश में कम से कम ऐसी जघन्यता तो नहीं है. अब ये सीरियल लेखक 
क्या पूरे विश्व में से कहीं भी किसी कुरीति... किसी भी जघन्य  कृत्य को देखेंगे तो उसे हमारे जनजीवन में उतार देंगे?? और विद्रूपता ये कि प्रोग्राम के नीचे ये डिस्क्लेमर आ रहा था कि ' हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देना चाहते...केवल  दर्शकों के मनोरंजन के लिए  ये दृश्य प्रस्तुत  किए जा रहे हैं" इन पत्थर मारने के दृश्यों से दर्शकों का मनोरंजन हो रहा है?? इन्होने दर्शकों को इतना जाहिल समझ रखा है?? और यह कोई हमारी संस्कृति में भी नहीं था कि ये सब दिखा वे दर्शकों की जानकारी बढ़ा रहे हैं.
 

इस सीरियल के लेखक , 'सिद्धार्थ कुमार तिवारी' को गूगल  में सर्च किया. जनाब ने कई डिग्रियां ले रखी हैं. कई सारे अवार्ड जीते हैं...यानि कि सरस्वती माँ  की कृपा है, उनपर...लेकिन  इस तरह तो वे अपमान ही कर रहे हैं, उनका. (वो लिंक और तस्वीर जानबूझकर नहीं दे रही...किसी भी तरह का कोई प्रचार उन महाशय  को मिले...दिल गवारा नहीं करता) .एक सीरियल को बनाने में निर्माता-निर्देशक..कलाकार सबका सहयोग होता है.पर इस सीरियल का Concept and Story  इन्ही महाशय का है. और वे एक युवा हैं,जिनके कंधे पर देश का भविष्य होता है.

हमारे देशवासियों का एकमात्र प्रमुख मनोरंजन है, टी.वी. सीरियल्स. और पैसों की लालच में इस तरह की कहानियाँ लिख कर वे उनकी मासूम भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं, ये लेखक गण. सीरियल की टी आर पी अच्छी ही होगी....क्यूंकि .ढेर सारे विज्ञापन मिल रहे हैं, क्या इस लिए अब इस तरह के crude  scene डाले जाएँ. लगता  है जैसे एक , होड़ लगी हुई है,
मेरे सीरियल के चरित्र तेरे सीरियल के चरित्र से कम  क्रूर कैसे?? और इस तरह की क्रूरता के दृश्य कहीं से भी इम्पोर्ट किए जा रहे हैं.

एक बार लगा, मुझे ये सब नहीं लिखना चाहिए...व्यर्थ का प्रचार मिल जायेगा...पर इतना आक्रोश था...इस तरह, लेखनी के दुरूपयोग पर कि बच्चो जैसा मन किया  इन 'सिद्धार्थ कुमार तिवारी' के विरुद्ध एक "Hate Club " ही बना लूँ...तब शायद उसके कानो तक यह बात पहुंचे. पर फिर वही,बात ...जो लोग इस तरह के सीरियल्स देखते हैं...वे फेसबुक और ऑर्कुट पर नहीं होंगे...शायद हों भी.आजकल महिलाओं के दो अच्छे  टाइम-पास है...नेट और टी.वी. सीरियल्स. हो सकता है...पक्ष और विपक्ष में एक  अच्छी बहस हो जाती,वहाँ .
पर समय की बर्बादी होती..उन लेखक (?) महोदय को प्रचार मिल जता...निगेटिविटी आती सो अलग....इसलिए  बस ब्लॉग पर ही लिख कर संतोष कर लिया.

पर सचमुच किसी गाइड लाइंस की जरूरत अब इन टी.वी.सीरियल को जरूर है..पता नहीं हमारी सभ्यता-संस्कृति के प्रति किस तरह लोगो को गुमराह कर रहे हैं, ये .जिनकी मातायें ऐसे सीरियल्स देखती हैं , उनके छोटे-छोटे बच्चे भी साथ में देखते हैं...और उनके कच्चे मन पर यही प्रभाव पड़ता है कि हमारे देश के रीती-रिवाज़..परम्पराएं ऐसी ही हैं. क्यूंकि किताबें पढने का शौक तो अब बच्चों  में रहा नहीं. वे सीरियल  और फिल्मो में दिखाए गए गाँव को ही भारत की असली  तस्वीर समझ लेते हैं. 

ऐसा नहीं है  कि ये सब बातें ये सीरियल निर्माता नहीं जानते...पर उनकी आत्मा ही मर चुकी है. ये किसी अपराधी से कैसे कम हैं जो हमारी सभ्यता-संस्कृति के साथ ही खिलवाड़ कर रहे हैं??

Monday, February 7, 2011

'इंदिरा शेट्टी' की यादों में बसा....तालेगांव

एक शाम अपनी सहेली  इंदिरा शेट्टी के घर पर, हम सब चाय के लिए इकट्ठे हुए थे. पुट्टू...अप्पम...इश्टू, वडा साम्भर का स्वाद...इंदिरा के अनुभवों के खजाने में से निकलते यादों के मोतियों के आलोक में कुछ और बढ़ गया था. किसी भी घटना का वर्णन इंदिरा कुछ इतने रोचक अंदाज़ से करती है कि लगता है...हम उस कालखंड में पहुँच गए हैं और सबकुछ हमारी आँखों के सामने घटित हो रहा है. और उस दिन तो वे एक बीहड़ गाँव में अपनी पोस्टिंग का किस्सा बता रही थीं और हम सब आश्चर्य कर रहे थे कि बचपन से चेन्नई और मुंबई जैसे महानगर में पली-बढ़ी, महानगरीय जीवनचर्या की आदी इंदिरा ने कैसे वहाँ एडजस्ट किया होगा. 
पर ये किस्सा  सुनते हुए मेरे दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. इंदिरा बैंक में कार्यरत थीं. अभी हाल में ही उन्होंने VRS लिया है. वैसे वे काफी घूमती रहती हैं,(और हर जगह..दुबई...मिस्त्र..सिंगापुर..केरल...आदि से हमारे लिए नायाब तोहफे लाना नहीं भूलतीं...एक बार हम सब सहेलियों को एक सी केरल  की परम्परागत साड़ी भेंट की थी...जिनकी तस्वीरें यहाँ हैं ) फिर भी जब उनके पति टूर पर होते हैं तो काफी समय उन्हें अकेले बिताना पड़ता है. मैं यह सोच रही थी कि क्या ही अच्छा हो अगर वे अपने इन सारे अनुभवों को कलमबद्ध कर डालें...मैने  उन्हें एक अंग्रेजी ब्लॉग बनाने की सलाह दे डाली. उस वक्त तो उन्होंने टाल दिया..'अच्छा सोचूंगी'. पर बाद में भी कह दिया ब्लॉग  बनाना उनके वश का नहीं. तो मैने कहा , आप अपना यह अनुभव लिख कर मुझे भेज दीजिये. मैं अनुवाद करके अपने ब्लॉग पर 'अतिथि पोस्ट' के रूप में प्रकाशित करुँगी.

यह फरमाइश भी कई तकाजों के बाद पूरी हुई. जो लोग नहीं लिखते...उन्हें लगता है,जैसे लिखना कितना कठिन कार्य है...खैर एक दिन इंदिरा ने बस कलम उठायी और बेहद सहज और रोचक शैली में लिख डाला. वह रोचक संस्मरण उन्ही के शब्दों में.


अतिथि पोस्ट : इंदिरा शेट्टी

मेरी पदोन्नति बैंक मैनेजर के पोस्ट पर हो गयी थी और मैने इस पोस्ट पर काम करना शुरू ही किया था कि अचानक ट्रांसफर का फरमान आ गया. वह भी एक गाँव  'तालेगांव दाभाडे' में, जिस जगह का नाम मैने कभी सुना तक नहीं था. यह मुंबई से १३५ किलोमीटर दूर था. मेरे लिए  यह बहुत ही मुश्किल घड़ी थी क्यूंकि मेरी बेटी मुंबई में कॉलेज में पढ़ रही थी,उसे अकेला छोड़ना पड़ता.

मुझे विश्वास था कि आफिसर्स यूनियन जरूर हस्तक्षेप करेंगे, जिसके जेनरल सेक्रेटरी मेरे पति थे. क्यूंकि मेरे साथ ही दो और महिलाओं की पदोन्नति हुई थी और उन्हें अच्छी जगह पोस्टिंग मिली थी. और महिलाओं को अमूमन बीहड़ गाँव में नहीं भेजा करते. पर मेरी पोस्टिंग के पीछे कुछ पौलिटिक्स भी थी. मैनेजमेंट इस इंतज़ार में थी कि यूनियन अच्छी जगह पर पोस्टिंग का अनुरोध करें. पर मेरे सिद्धांतवादी पति ने कहा कि वे इसकी सिफारिश नहीं करेंगे ,और मुझे वहीँ ज्वाइन करना होगा.

परिवार को छोड़कर एक बिलकुल अनजान गाँव में जाना एक बहुत
ही कष्टदायक अनुभव था. मुंबई में रहकर भी...मलयालम..तमिल...अंग्रेजी पर ही मेरा अच्छा अधिकार है...मराठी तो ठीक से समझ में भी नहीं आती थी और..उस गाँव में सिर्फ मराठी ही बोली  और समझी जाती थी.
आज पुणे एक्सप्रेस हाइवे और वहाँ एक  मेडिकल कॉलेज खुलने की वजह से, तालेगांव बिलकुल एक शहर में तब्दील हो गया है पर १९९९ में, वहाँ सड़कें भी नहीं थीं. वहाँ ऑफिसर्स क्वार्टर नहीं थे. मुझे एक किराए के मकान में ठहराया गया, जहाँ कोई भी फर्नीचर नहीं था और पानी की सप्लाई तक नहीं थी. दरवाजे और खिड़कियाँ पूरी तरह बंद भी नहीं हो पाते थे .वहाँ अकेले रहना एक बहुत ही डरावना,अनुभव था..रात मेरी आँखों में कट जाती. एक महीने बाद मैने खुद ही एक कुछ ढंग का मकान ढूँढा और एक टेलीफोन भी लगवाया.पर वो ज्यादातर डेड ही रहता. बिजली अक्सर नहीं रहती. मेरे जैसे बात करने की शौक़ीन के लिए वो एक काले-पानी की सजा से कम नहीं था. शाम होते ही सबकुछ शांत और स्तब्ध हो जाता,रात के सन्नाटे में सिर्फ झींगुर की आवाजें गूंजती  रहतीं.

बैंक  का ब्रांच भी, वॉल्यूम, बिजनेस और मेरे ग्रेड के हिसाब से बहुत छोटा था.पर मैं धीरे-धीरे एडजस्ट  करने लगी थी. मुंबई में घर जाना भी महीने में एक बार ही हो पाता  क्यूंकि वहाँ तक की यात्रा बहुत ही कष्टदायक थी. ब्रांच बहुत ही इंटीरियर में था और वहाँ से, पुणे हाइवे तक आना पड़ता और फिर किसी भी सवारी को हाथ दिखा,लिफ्ट लेनी होती. उन दिनों एक्सप्रेस हाइवे नहीं शुरू हुई थी और खंडाला घाट में ट्रैफिक जैम में घंटो फंसे रहना पड़ता था.घर पहुँचने में कभी-कभी रात के बारह भी बज जाते.

इन सबका असर मेरे स्वास्थ्य पर भी पड़ने लगा, मेरा ब्लड प्रेशर बहुत ही हाइ रहने लगा. वहाँ मेडिकल फैसिलिटी बिलकुल ना के बराबर थी. एक गन्दा सा सरकारी अस्पताल था. दो बार मेरा ब्लड प्रेशर खतरनाक रूप से बढ़ जाने के कारण, उसी अस्पताल में एडमिट भी होना पड़ा.

बैंक में वर्कलोड भी बहुत ज्यादा था. पर अच्छी बात ये थी कि स्टाफ बहुत ही स्नेहिल और मदद करनेवाले थे. हालांकि शुरू-शुरू में एक महिला के अंडर में  काम करने में  उन्हें थोड़ी परेशानी हुई क्यूंकि अब तक कोई महिला अफसर उस बैंक में नहीं आई थी (और मेरे बाद कोई आज तक आई भी नहीं) लेकिन धीरे- धीरे  उन्होंने मुझे स्वीकार कर लिया और मेरा काफी ध्यान भी रखा. रोज मेरे लिए  कोई ना कोई लंच लेकर आता क्यूंकि उन्हें पता था, अकेली रहने के कारण, मैं अपने लिए कुछ ज्यादा बनाती नहीं थी. सारे कर्मचारी आपस में बहस करते कि 'आज तुमने लाया ना मैडम के लिए...कल मैं लेकर आऊंगा.' 

हमारे कार्यक्षेत्र में ग्यारह गाँव थे और मुझे नियमित रूप से हर गाँव में विजिट  करना पड़ता था. कई गाँव में सड़कें  नहीं थी और कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी नहीं. जहाँ पब्लिक ट्रांसपोर्ट थे भी, वहाँ  उस बस में बकरियाँ...मुर्गियाँ..साइकिल सब साथ में सवार होते.
दूसरा ऑप्शन था, अपने  ऑफिसर के जर्जर M 80 स्कूटर के पीछे बैठ कर  जाना. जिसपर मुझे और भी डर लगता. कुछ गाँवों में नाव से जाना पड़ता. आज यह सब लिखते वक्त, सब बहुत एडवेंचरस  लग रहा है...पर उस समय तो यह सब एक दुस्वप्न जैसा गुजरा.

गाँव वासी  मुझे बहुत ही स्नेह देते और आदर करते थे. मुझे  बिलकुल VVIP की तरह ट्रीट करते थे. सारे बच्चे और महिलाएँ मेरे इर्द-गिर्द जमा हो जाते थे. वहाँ बैठने के लिए एक कुर्सी भी नहीं होती थी. पर प्यार से चाय जरूर पेश करते थे. अक्सर चाय के कप टूटे हुए होते और उनके हैंडल  गायब..पर प्याला उनके स्नेह से लबालब भरा होता. उनका प्यार और स्नेह भावविभोर कर देने वाला था.

 कुछ गांववालों की मिटटी की झोपड़ी होती थी और उसी बरामदे  में उनके साथ उनके मवेशी भी रहते थे. एक बार मैं एक क्लाइंट से बात कर रही थी, अचानक लगा..मेरी साड़ी का पल्लू कोई खींच रहा है. मुड कर देखा तो एक गाय का बछड़ा मेरा आँचल चबा रहा था.:)

एक दिन मैं ऑफिस जा रही थी तो देखा, चौराहे  पर एक ब्लैक बोर्ड पर लिखा है..."इंदिरा शेट्टी के हाथों, नेत्र शिविर का उदघाटन " तालेगाँव में कोई भी कार्यक्रम हो तो चौराहे पर एक ब्लैकबोर्ड  लगा कर उस पर सूचना  लिख दी जाती थी. मैं हैरान हुई. पर ऑफिस में आकर लोगो ने बहुत आग्रह  दिया कि आपको चलना ही पड़ेगा. मुझे मराठी नहीं आती थी.....किसी तरह हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा में दो शब्द कहे, जिसका  मेरे बैंक कर्मचारी ने मराठी  में अनुवाद कर दिया.


इन सारी दिक्कतों के बावजूद , मेरा कार्य-प्रदर्शन बहुत  अच्छा रहा. और मेरे कार्यकाल के दौरान, उस ब्रांच का बहुत ही बढ़िया ग्रोथ हुआ. इसका इनाम ये मिला कि तीन साल  वहाँ काम करने के बाद, मुझे प्रमोट करके चीफ मैनेजर (एक्जक्यूटिव लेवल) के पद पर मुंबई में वापस स्थानांतरित कर   दिया गया.


उस गाँव की बहुत सारी मीठी यादें हैं. और आज पलट कर देखने पर लगता है...तालेगांव की पोस्टिंग ने मुझे बहुत ही आत्मविश्वास दिया और मेरे व्यक्तित्व को  मजबूती प्रदान करने में एक अहम् भूमिका निभाई.

Friday, February 4, 2011

मिस्र की क्रांति की आग को क्या 'आसमा महफूज़' के वीडियो ने चिंगारी दिखाई??

आज सारी दुनिया की नज़रें मिस्र में चल रहे आन्दोलन पर लगी हुई है. टी.वी. हो या अखबार, वहाँ के पल-पल बदलते हालात की खबर को प्रमुखता से स्थान दे रहे हैं. ऐसे में 'मुंबई मिरर' में छपी एक अलग सी खबर ने ध्यान खींचा. 'आसमा  महफूज़ ' के विषय में छपी इस खबर ने चौंकाया भी, अभिभूत भी किया..और गौरवान्वित भी. कि 'जहाँ चाह वहाँ  राह'...'मजबूत इरादे, आंधी का रुख भी बदल  सकते हैं'..जैसी उक्तियाँ सिर्फ उक्तियाँ नहीं हैं...कवि दुष्यंत ने यूँ ही नहीं कह दिया...
."कौन  कहता है आसमान में सूराख नहीं हो सकता,
 एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो"

जरूरत सिर्फ एक पत्थर उछालने के दृढ संकल्प  की है...


मिस्र में जनाक्रोश की जड़ें बहुत गहरी है और इसके अनेक कारण है जिसे
अशोक कुमार पाण्डेय  ने जनपक्ष पर विस्तार से लिखा है.

पर लोगो के मन में यह सवाल उठ रहे हैं कि..इस  क्रान्ति की आग को क्या छब्बीस वर्षीय
'आसमा महफूज'  के इस वीडियो ने चिंगारी दिखाई. आसमा महफूज़ ने 6 अप्रैल 2010 को सामान विचार के साथियों के साथ मिलकर ,'हुस्नी  मुबारक' के शासन के विरुद्ध एक मुहिम चलाई और "यूथ मूवमेंट' की स्थापना की . 18 जनवरी 2011 को उन्होंने बिलकुल जैसे ह्रदय के अंतरतम कोने से एक बहुत ही ओजस्वी अपील,अपने देशवासियों से की और उसे रेकॉर्ड करके  इंटरनेट पर अपलोड कर दिया.

उन्होंने इस वीडियो में कहा.है....." चार मिस्रवासियों ने आत्मदाह किया...इस आशा में कि शायद ट्यूनीशिया  की तरह उनके देश में भी क्रान्ति आए और उन्हें...स्वतंत्रता, न्याय और इज्ज़त की ज़िन्दगी मिले. आज उनमे से एक की  मृत्यु हो गयी. और लोगो की प्रतिक्रिया है कि, "अल्लाह  उन्हें इस पाप के लिए माफ़ करे...उसने व्यर्थ ही आत्महत्या की"

क्या लोगो में जरा भी संवेदना नहीं बची है...मैने नेट पर  लिख कर पोस्ट कर दिया ," मैं एक लड़की हूँ. और मैं आज 'तहरीर स्क्वायर' पर जाकर एक बैनर लेकर अकेली खड़ी रहूंगी . तब शायद लोगो की संवेदना जागे.

मैने अपना फोन नंबर भी लिख दिया था कि शायद लोग मुझसे कॉन्टैक्ट करें और साथ देने आएँ. पर केवल तीन लोग आए और तीन गाड़ियों में पुलिस भर कर आई. कुछ किराए के मवाली भी हमें डराने आए. वे पुलिस  ऑफिसर्स हमें समझाने लगे, कि जिन लोगो ने आत्मदाह कि वे लोग मनोरोगी थे."

नेशनल मिडिया के लिए तो जो भी विरोध करे वो मनोरोगी है.पर अगर वे मनोरोगी थे तो पार्लियामेंट बिल्डिंग में क्यूँ आत्मदाह किया.??

मैं ये वीडियो सिर्फ एक सिंपल मैसेज देने के लिए बना रही हूँ कि हमलोग २५ जनवरी को तहरीर स्क्वायर जाएंगे और अपना विरोध दर्ज करेंगे. हमलोग अपने मौलिक अधिकार की मांग करेंगे . राजनितिक अधिकार  नहीं सिर्फ, मानवीय अधिकारों की. ये सरकार...राष्ट्रपति...सुरक्षा बल... सब भ्रष्टाचारी हैं.

जिनलोगो ने आत्मदाह किए वे मृत्यु से नहीं  डरते थे बल्कि अपनी सुरक्षा बल से डरते थे. क्या आप इसकी कल्पना कर सकते हैं? क्या आप भी सुरक्षा बल  से डरते हैं? क्या आप भी आत्मदाह  करेंगे? या फिर आपको पता ही नहीं कि आप क्या करें.

मैं अकेली २५ जनवरी को 'तहरीर स्क्वायर' जा रही हूँ और गली-गली में पर्चे बाटूंगी. मैं आत्मदाह नहीं करुँगी.अगर सिक्युरिटी फ़ोर्स मुझे जलाना चाहे बेशक जलाए .लेकिन मैं चुप नहीं बैठूंगी.अगर आप एक सच्चे मर्द हैं तो मेरे साथ आइये.

कौन कहता है,औरतो को आगे नहीं बढ़ना चाहिए, क्यूँकि  उनकी पिटाई हो सकती है और ये शर्म की बात है...अगर ऐसा है  तो उन्हें शर्म आनी चाहिए जो पिटाई करें. अगर आप में खुद के लिए थोड़ी भी इज्जत और मर्दानगी है तो  मेरे साथ आइये.

लोग कहते हैं, मुट्ठी भर लोग क्या कर लेंगे? जो भी ये कहता है , मैं कहती हूँ..हम मुट्ठीभर हैं  हैं..आपकी वजह से. क्यूंकि आप हमारे साथ नहीं. आप  भी राष्ट्रपति और सुरक्षा सैनिक की तरह ही राष्ट्रद्रोही है. जो सड़कों पर अपने ही देश के नागरिको को पीटते हैं. आपके आने से फर्क पड़ेगा. हमारे साथ आइये.

अपने पड़ोसी, दोस्त, सहकर्मियों,सब से बात कीजिए और उन्हें अपने साथ आने के लिए तैयार कीजिए. उन्हें तहरीर स्क्वायर आने की जरूरत नहीं है. वे कहीं भी जा सकते हैं और 'हम आज़ाद हैं' के नारे लगा सकते हैं." सिर्फ घर में बैठ कर और न्यूज़ और फेसबुक पर हमारी गतिविधियाँ फॉलो करना शर्म की बात है.

अगर आप में सचमुच मर्दानगी है तो सडकों पर आइये मेरी सुरक्षा के लिए...मुझ जैसी कई लड़कियों की सुरक्षा के लिए. अगर आप घर में चुपचाप बैठे रहंगे और हमें कुछ हो गया तो हमारे  दोषी आप होंगे. हमारी रक्षा नहीं करने के लिए ,अपने देश के प्रति भी आप अपराधी होंगे.

गलियों में... सडकों पर जाइए...sms भेजिए... नेट पर पोस्ट कीजिए ...लोगो में जागरूकता लाइए. अपने परिवार..अपने दोस्त.....अपनी बिल्डिंग....अपनी कॉलोनी के लोगो को बताइए एक व्यक्ति अगर  पांच या दस लोगो को बताए फिर वो और दस लोगो को...तो क्रान्ति आने में देर नहीं लगेगी.
 

आत्मदाह करने से अच्छा है,कुछ सकारात्मक करें, जो बदलाव लाएगा...एक बड़ा बदलाव.
कभी ना कहें...कि "कोई आशा नहीं..जैसे ही यह कहा जाता  है..आशा वैसे ही गायब  हो जाती है" ( Never say there's no hope Hope  disappears only  when you say there's no hope )  जबतक आपलोग हमलोगों के साथ रहेंगे तब तक आशा बनी रहेगी

सरकार से मत डरिए सिर्फ अल्लाह  से डरिए...कुरान में भी कहा गया है,"अल्लाह तब तक किसी के हालात नहीं बदलते ,जबतक वह खुद अपनी हालात बदलने की कोशिश नहीं करता.

ये मत सोचिये कि आप सुरक्षित रहेंगे. कोई भी  सुरक्षित नहीं होगा.हमारे साथ आइये और अपने अधिकार...मेरे अधिकार..अपने परिवार के अधिकार की मांग करिए"
 

मैं २५ जनवरी को तहरीर स्क्वायर जा रही हूँ. और कहूँगी.. NO TO 

THIS CORRUPTION.... NO TO THIS  REGIME  

 

और छब्बीस जनवरी से  आन्दोलन शुरू हो गया....लाखों लोग सड़क पर 

उतर आए....आन्दोलन ने व्यापक रूप ले लिया है और अभी तक जारी है.

 
वह वीडियो इस लिंक पर देखी जा सकती है
http://www.youtube.com/watch?v=A8lYkrgKZWg

Wednesday, February 2, 2011

धोबी घाट : फिल्म या कैमरे द्वारा लिखी कोई कविता

{ धोबी-घाट फिल्म के ऊपर कई पोस्ट लिखी जा चुकी है....पर जब से यह फिल्म देखी है...इस पर कुछ  लिखने से खुद को नहीं रोक पायी...अब जिन्होंने ये फिल्म अब तक नहीं देखी और देखने का इरादा रखते हों ...वे इस पेज के  के राइट टॉप कॉर्नर में बने क्रॉस पर क्लिक कर लें :)}


मुझे तो धोबी घाट फिल्म बिलकुल एक कविता सी लगी... जिसके  अलग-अलग किरदार जैसे अलग-अलग stanza हों..पर मूल भाव एक ही हो...मुंबई में  ज़िन्दगी की जटिलताओं में उलझे  अलग -अलग तबके के लोग. हर चरित्र एक दूसरे से जुड़ा हुआ है...और इन्हें जोड़ता है मुंबई शहर.किसी शहर का इतना यथार्थपरक और ख़ूबसूरत चित्रण...शायद ही कभी देखने को मिला हो.
अरुण (आमिर खान) एक पेंटर है. हर कलाकार की तरह परले दर्जे का  मूडी. अपनी दुनिया में डूबा हुआ.....ना किसी का अंदर आना पसंद ना खुद इस से  बाहर निकलना चाहता है. और ऐसा लगता नहीं कि वो  कुछ मिस कर रहा हो......अकेलेपन की  मजबूरी कई लोगो की होती है...पर सब उसे एन्जॉय नहीं करते. पर अरुण  अपने अकेलेपन..अपनी उदासी...को शिद्दत से जीता है.....बिना किसी शिकयत के. {अरुण  के पास तो इस उदासी की एक वजह है...उसका  डिवोर्स हो चुका है.परन्तु कई युवा  भी इस मनस्थिति को एन्जॉय  करते हैं. एक ख़याल आता है...कहीं यह उनका ओढा हुआ अवसाद तो नहीं...और वे उसे सच मान बैठते  हैं...पर यह सिर्फ ख़याल ही है :)}

अरुण , एक बार  अपनी ही पेंटिंग की प्रदर्शनी में जाता है  और वहाँ उसकी
  मुलाक़ात अमरीका से आई हुई शाय(मोनिका डोंगरा) से होती है. जो एक इन्वेस्टमेंट बैंक में काम करती है...पर भारत को करीब से देखने और असली भारत की तस्वीरें लेने के लिए आई हुई है. कुछ शराब का सुरूर...इतने दिनों से किसी वार्तालाप से महरूम किसी लड़की की नजदीकियां....अरुण  के मन की परतें खुलती जाती  हैं और  घर पर म्युज़िक...पेंटिंग्स..अलबम...ढे र सारी बातों के बीच.... कब सारे बंधन टूट जाते हैं... ...उन्हें पता भी नहीं चलता.

लेकिन, सुबह अरुण  अपनी दुनिया में लौट चुका  हैं...वैसे ही अपनेआप में गुम. जबकि शाय  पर रात का सुरूर तारी  है..मुस्कान उसके चेहरे से मिटती नहीं. लेकिन अरुण  आँखे मिलाने को भी तैयार नहीं...बड़े अजनबीपन  से उसे चाय के लिए पूछता है ...और जब शाय  को सॉरी बोलता है ...तो वह नाराज़ हो जाती है...कि अरुण  को अपने मन का यूँ खोल कर रखने का ....वे ख़ूबसूरत पल बिताने का ....इन सबका अफ़सोस है..और वह वहाँ  से चली जाती है.

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शाय की  मुलाकात एक धोबी, मुन्ना(प्रतीक बब्बर)  से होती है. मुन्ना  का चरित्र बिहार ,यू.पी से आए हज़ारो युवको का प्रतिनिधित्व करता है...मुन्ना, कवियों -लेखकों की तरह गाँव को याद कर उदास नहीं होता क्यूंकि उसे गाँव के साथ ही याद आता है कि वहाँ भूख बहुत लगती थी और खाना नहीं मिलता था...आठ साल की उम्र में मुंबई आया और यहाँ के एक होटल में पेटभर कर खाना और मार दोनों खाया. फिर धोबी का काम करने लगा. अमेरिका से आई शाय, भेदभाव नहीं जानती..मुन्ना को भी अपने साथ की कुर्सी  पर बिठा चाय का ऑफर कर देती है. पर उसकी बाई उसके लिए  तो महंगे कप में पर मुन्ना के लिए एक ग्लास में चाय लेकर आती है...शाय पहले तो चेहरे के भाव से नाराज़गी प्रकट करती है..फिर वो ग्लास अपने लिए उठा लेती है..यही सब दृश्य  हैं जो किरण राव के निर्देशन की  बारीकियों की  तारीफ़ करने को मजबूर कर देते हैं.  मुन्ना शाय का कैमरा देखकर अपना एक पोर्टफोलियो तैयार करने का आग्रह करता है...फिल्म  में इस बिंदु  को भी छुआ है कि कैसे छोटे शहर वालों  के मन  में खुद को एक बार परदे पर देखने का सपना पलता रहता है. शाय कहती है..इसके  बदले उसे ,धोबी घाट लेकर जाना पड़ेगा ..और वो वहाँ की  तस्वीरें लेगी.

मुन्ना अपने छोटे से कमरे में एक्सरसाइज़ कर अपनी बॉडी बनाता है और मॉडल  की तरह अलग-अलग पोज़ में तस्वीरें खिंचवाता है. शाय अपनी हंसी रोकते हुए उसकी तस्वीरें लेती हैं..पर असली खूबसूरती उन तस्वीरों में है जो वह उसके कपड़े..धोते...फैलाते..तह करते और ...और इस्त्री करते हुए लेती है. पानी की उड़ती बूंदें और सफ़ेद झक्क कमीज़ के बीच ली मुन्ना की वे  तस्वीरें mesmerizing हैं. शाय मुन्ना के साथ..सब्जी मंडी..मच्छी  बाज़ार...झुग्गी-झोपडी..हर जगह जाती है. और ये सारी शूटिंग रियल लोकेशन पर की गयी हैं...जहाँ  के सारे लोग कोई एक्टर नहीं असली लोग  हैं. शाय का यूँ खुलकर बातें करना, उसके साथ बेझिझक  घूमना,  मुन्ना को उसके प्रति आकृष्ट करता है.


पर शाय अरुण  को नहीं भूल पाती....क्यूंकि उसे विश्वास नहीं होता...एक रात मन और तन से इतना करीब आ गया व्यक्ति ..सुबह होते ही अजनबी कैसे बन जा सकता है.वह किसी ना किसी बहाने उसे दूर से देखती रहती है और एक बार अरुण अचानक से सामने आ कर उसे अपने घर पर चाय की दावत देता है.....और अपने उस दिन के व्यवहार के लिए सॉरी भी बोलता है..तभी...मुन्ना कपड़े देने आता है. शाय को आमिर के साथ यूँ घुलमिलकर बातें करते देख उसे जलन होती है...और वह भाग जाता है....शाय को अपने प्रति मुन्ना की  भावनाओं का अहसास है...वह उसके पीछे जाकर उसे मनाने  की कोशिश करती है.


इस फिल्म के सबसे ज्यादा डायलॉग 'यास्मीन' (कीर्ति मल्होत्रा)  के हिस्से
आए हैं. अरुण  जब इस घर में शिफ्ट होता है  तो उसे  एक छोटे से बक्से में कुछ तस्वीरें और वीडियो कैसेट मिलते हैं. जो इस घर में उससे  पहले रहनेवाली यास्मीन के हैं. यास्मीन मुंबई से जुड़े अपने सारे अनुभव इन कैसेट्स में अपने भाई को भेजने के लिए रिकॉर्ड करती रहती है. यास्मीन आँखों में हज़ारो सपने लिए यू.पी.के एक छोटे से कस्बे से मुंबई आती है. शुरू में उसकी आवाज़ बहुत चहक भरी होती है...मैरीन ड्राइव...गेट वे...लोकल ट्रेन सबके बारे में उत्साह से अपने भाई को बताती है.... धीरे -धीरे अपने जीवन की एकरसता से उसकी आवाज़ पर उदासी की परत चढ़ती जाती है...और वो सवाल करती है..."शादी को इतना जरूरी क्यूँ समझा जाता है"
यास्मीन पर अपने शौहर की बेरुखी का राज़ ज़ाहिर हो जाता है. कई बार बरसो से मुंबई में रहनेवाले यहाँ शादी भी कर लेते हैं और फिर माता-पिता के दबाव में अपनी जातिवाली  से उनकी पसंद की लड़की भी ब्याह लाते हैं.यास्मीन आखिरी रेकॉर्डिंग करती है...और अपने भाई से कहती है.."मैने बहुत कोशिश की,पर अब हार गयी हूँ....अम्मी-अब्बू को संभालना और कहना मुझे माफ़ कर दें."
स्क्रीन ब्लैंक हो जाता है और आमिर की नज़र...छत की कुण्डी से लटकते तार पर जाती है...

हिन्दू- मुस्लिम एकता......गैंगवार...ड्रग्स का धंधा, अधेड़ अमीर औरतों के शगल जिगोलो...रात में चूहे मारते rat killers....रेलवे ट्रैक के पास बसी बस्तियां...इन सबका, जो मुंबई के अहम् अंग हैं...फिल्म में ,हल्का सा रेफरेंस है. मुन्ना अपने जिगरी दोस्त सलीम के परिवार को ही अपना परिवार मानता है..सलीम काला
धंधा करता है..और उस विवाद में ही दूसरे गैंग के लोग उसकी हत्या कर देते हैं और पुलिस के भय से सलीम के परिवार को दूर किसी फ़्लैट में शिफ्ट कर देते हैं.

मुन्ना और आमिर दोनों ने घर बदल  लिया है...शाय  दोनों को ढूंढती रहती है और एक दिन उसे मुन्ना मिलता है जो सारी हकीकत बताता है. वो शाय से कहता है..कि :लगता है तुम्हे अरुण  से प्यार हो गया है.." शाय उस से संपर्क में रहने का वादा ले...विदा लेती है. और उसकी कार आँखों से ओझल होने के बाद, मुन्ना  को जैसे होश  आता है..वो ट्रैफिक में किसी तरह दौड़ते हुए उसकी कार के समीप पहुँच खिड़की नीचे करने को कहता है......दर्शक समझते हैं...शायद अब वो..अपने प्यार का इज़हार कर देगा..लेकिन नहीं...वो शाय को आमिर के नए घर का पता दे देता है. इसके बाद का शॉट बेहतरीन  है...मुन्ना के झुके कंधे आत्मविश्वास से चौड़े हो जाते हैं. और चेहरे पर एक आत्मसंतोष से भरी कॉन्फिडेंट स्माइल होती है और चाल में लापरवाही. कुछ सार्थक करने के अहसास से लबरेज़.


सभी कलाकारों  ने जैसे अभिनय ना करके उन पात्रों को जिया है .किरण राव के बेहतरीन निर्देशन को कॉम्प्लीमेंट किया है. सुन्दर फिल्मांकन ने. मुंबई की मूसलाधार बारिश को खूबसूरती से कैप्चर करते हुए..मुन्ना की टपकती छत और उसी बारिश में भीगते हुए उसके  छत पर प्लास्टिक  बिछाने के दृश्य किसी फिल्म के नहीं...सच्चे से लगते हैं.