Friday, November 4, 2011

फिल्म 'मोड़' : जैसे फिज़ा में एक प्यारी सी धुन



जैसा कि इस ब्लॉग का नाम है....यहाँ बस बातें ही होती हैं...और जब मैं फिल्मो की बातें करती हूँ तो फिर बातों-बातों में लोगो को फिल्म की  कहानी भी पता चल जाती है...और कुछ लोग ऐसा नायाब मौका हाथ से क्यूँ जाने दें...कह डालते हैं..'हमें तो कहानी पता चल गयी'...भले ही उस फिल्म का नाम भी ना सुना हो...और उनके शहर के थियेटर में आने की उम्मीद भी न  हो...

यही वजह थी..जब एक मित्र से फिल्म 'मोड़' की प्रशंसा कर रही थी तो उन्होंने कहा...' इस पर पोस्ट क्यूँ नहीं लिखतीं?'...और मैने मजबूरी जता दी..बेकार ही लोगो को कहने का मौका क्यूँ दूँ...."येल्लो कहानी बता दी'

उन्होंने बड़ी गंभीरता से कहा...'लोग आपकी पोस्ट..आपकी शैली के लिए पढ़ते हैं....आपका  लिखा उन्हें पसंद आता है.." woww..  good  to know कि हमारी कोई शैली  भी है...फिर भी मन मुतमईन नहीं हुआ...जब सहेली से इसकी चर्चा की ....तो उसका भी कहना था..."तुम्हे लिखना चाहिए ...कई लोगो को इस फिल्म के बारे में तुम्हारी पोस्ट से पता चलेगा..शायद  उनकी रूचि जागे और वे,ये फिल्म देखना चाहें...वगैरह..वगैरह.."

अब मुझे बातें करने के साथ लिखने का भी मर्ज है तो देर काहे  की....हाँ, जिन्हें ऐतराज हो...उनके लिए ये पोस्ट यहीं समाप्त होती है :)

जब से नागेश कुकनूर की हैदराबाद ब्लूज़ देखी...उनकी दूसरी फिल्मो का इंतज़ार होने लगा था...डोर .इकबाल..तीन दीवारें...रॉकफोर्ड  ने उनसे उम्मीदें और जगा दीं ...पर 'हॉलीवुड-बॉलिवुड;...'आशायें' ..बॉम्बे टू बैंगकॉक' जैसी फिल्मो ... ने निराश ही किया...लेकिन उनकी नई फिल्म मोड देखने की इच्छा थी...एक तो इसमें आएशा टाकिया  थीं..और प्रोमोज में 'पेड़.. झरने.. धुंध से घिरा एक ऊँघता सा पहाड़ी शहर और चश्मा लगाये...सीधे-सादे रणविजय सिंह  और ताजे गुलाब सी खिली आएशा टाकिया को देख..लगा कोई संजीदा सी कहानी जरूर है. ..और उम्मीद के दिए रौशन रहे.

बड़ी प्यारी सी फिल्म है...हकीकत में ऐसा शायद ना होता हो...पर यकीन करने का मन होता है कि हकीकत कुछ ऐसी ही हो..झरने के पास बैठी हार्मोनिका (माउथ ऑर्गन) बजाती ओस की बूँद सी मासूम लड़की और गहरे बादल सा खुद में कई राज़ समेटे गंभीर सा  सीटी में कोई धुन बजाता लड़का. लड़का, गाहे-बगाहे उसे कविता की पंक्तियाँ सुनाता है...लड़की की सुन्दर सी पेंटिंग्स बनाता है ...लड़की को सिर्फ एक बेइंतहा प्यार करनेवाला कोई चाहिए...वो लड़के की पर्सनालिटी...बैंक-बैलेंस कुछ नहीं देखती..सिर्फ उसका दिल देखती है. अपनी बुआ के पूछने पर कहती है..."अब तक कोई नहीं मिला...जो सिर्फ मेरे लिए जीना चाहे..."

अरण्या घड़ी रिपेयर करती है..अकेले रहती है. उसके पिता संगीत के उपासक हैं..किशोर कुमार के पुजारी...उनका एक ऑर्केस्ट्रा है...पर शराब की लत भी है..इसी वजह से बेटी ने शर्त रखी है..वे शराब छोड़ने के बाद ही घर में रह सकते हैं...पर बेटी उन्हें प्यार भी बहुत करती है..सुबह-सुबह चाय लेकर,बाहर उठाने  जाती है...रघुवीर यादव ने बहुत ही अच्छी एक्टिंग की है...जब भी मौका मिले वे मासूमियत से पूछ बैठते हैं..'अब,घर आ सकता हूँ..?"

अरण्या के पास एक लड़का रोज अपनी घड़ी रिपेयर करवाने आता है....जबतक अरण्या घड़ी रिपेयर करती है...वह रुपये को मोड़ कर एक ख़ूबसूरत हंस की शक्ल दे देता है..और उसके सामने रख कर चला जाता है...फिर एक दिन कह देता है कि वो उसकी दसवीं कक्षा का सहपाठी 'एंडी' है...और उसका बचपन से ही उसपर क्रश है...अपने प्रति उसका यूँ समर्पण देख..अरण्या को भी लगता है..उसे बस उसका ही इंतज़ार था...अरण्या की  बुआ तन्वी आज़मी एक रेस्तरां चलाती हैं,जहाँ अरण्या उनकी मदद करती है...(पर इस  फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि  दक्षिण के एक पहाड़ी शहर में स्थित है....क्यूंकि गाड़ियों के नंबरप्लेट...दक्षिण के हैं...पर उस रेस्तरां में इडली- डोसे की जगह पनीर और दम आलू मिलते हैं :)..अब फिल्म वाले इतना ध्यान थोड़े ही रखते हैं..) जब अरण्या  की बुआ एंडी से मिलने पर कहती है..'यही है तुम्हारा बॉयफ्रेंड ?'  तो वो एंडी  मासूमियत से पूछता है.." सचमुच मैं तुम्हारा बॉयफ्रेंड हूँ..जब चाहे तुम्हारा हाथ पकड़ सकता हूँ...?" {लड़के नोट करें..लडकियाँ पूर्ण समर्पण के साथ..ऐसे भोलेपन पर भी फ़िदा होती हैं :)}

एक दिन अरण्या , उस लड़के को बाज़ार में देखती है..पर उसकी वेशभूषा..चाल-ढाल... बॉडी लेंग्वेज सब अलग होता है...वो आवाज़ देने पर अरण्या  को पहचानता भी नहीं...उसका पीछा करने पर उसे एक मेंटल हॉस्पिटल में जाते हुए देखती है...वहाँ भी वह बेलौस अंदाज़ में वाचमैन से.. नर्स से मजाक करता रहता है. 

अरण्या परेशान होकर पुराने स्कूल में जाकर उसका पता ढूँढने की कोशिश करती है तो पता चलता है..कि दस साल पहले एंडी की मौत हो चुकी है. फिर भी वह उसके घर जाकर उसके माता-पिता से मिलती है...वहाँ वह एंडी की तस्वीर इस लड़के के साथ देखती है...और एंडी की माँ बताती है कि ये अभय है...एंडी का बेस्ट फ्रेंड और एंडी की  मौत से उसके दिमाग पर ऐसा असर पड़ा है कि वह  split  personality  का शिकार हो गया है...वह बीच बीच में एंडी की तरह ही बर्ताव करने लगता है...उसकी तरह का पहनावा वेशभूषा...मेंटल हॉस्पिटल से भागकर उनके घर भी आ जाता है और उन्हें माँ कहकर बुलाता है....बहुत छोटा सा रोल है ' एंडी की माँ के रूप में  सफल मराठी अभिनेत्री 'प्रतीक्षा लोनकर 'का पर वे एक माँ के दिल की कशमकश बयाँ करने में सफल रही हैं...जहाँ अपने बेटे के रूप में अभय को देख उनके माँ के दिल को सुकून भी मिलता है..वे उन पलों को जीना भी चाहती हैं पर फिर कर्तव्य का ध्यान कर वे डॉक्टर को खबर कर देती हैं...डॉक्टर अरण्या  को देखकर सब कुछ समझ जाते हैं और उसे पूरी हकीकत बताते हैं कि एंडी का अरण्या  पर जबर्दस्त क्रश था..और यह बात उसके बेस्ट फ्रेंड अभय को पता थी...इसीलिए वह जब एंडी के रूप में आता है तो अरण्या  के साथ समय बिताना चाहता है...और चिंता की बात ये है कि आजकल वो ज्यादा से ज्यादा समय एंडी के रूप में ही रहने लगा है. इसलिए अरण्या को उस से मिलना बंद करना होगा." अरण्या   के सामने ही अभय को दौरे पड़ते हैं...और वह एंडी से अभय के रूप में लौट आता है...( split   personality  विषय पर  Sidney  Sheldon  की एक बहुत ही प्रख्यात पुस्तक है. "If  Tomorrow Comes  "  इस किताब पर फिल्म भी बनी है....जहाँ नायिका के  अंदर ढेर सारे कैरेक्टर रहते हैं...और वह समय  समय पर उस कैरेक्टर के अनुरूप  ही व्यवहार करने लगती  है) .. अभय, अरण्या  को एंडी की मौत का जिम्मेवार मानता है...अभय  भी मन ही मन अरण्या  को प्यार करता था पर एंडी की तरह कन्फेस नहीं कर पाता  था..इसीलिए उसने मजाक में एंडी से कहा कि तुम्हारे जैसे सीधे-सादे लड़के से अरण्या  प्यार नहीं कर सकती....तुम अपना प्यार साबित करना चाहते हो तो...तो कुछ कर के दिखाओ...उस ऊँचे पत्थर से पानी में कूद जाओ ..और एंडी जब सचमुच कूदने लगता है तो अभय उसे चिल्लाकर बहुत रोकने की कोशिश करता है...पर एंडी कूद  जाता है...और उसकी मौत हो जाती है. यह सब बताते हुए ,अभय बहुत वायलेंट हो जाता है...और उसे अब इलेक्ट्रिक शॉक  दिए जाने लगते हैं. 

आएशा टाकिया, नागेश कुकनूर, रणविजय सिंह 
फिल्म में इस मुद्दे को भी उभारा गया है कि कैसे बड़े बड़े बिल्डर इन पहाड़ी शहरों की खूबसूरती को नष्ट कर बड़े बड़े रिसौर्ट बनाने की कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए वहाँ के निवासियों  के घर मुहँ मांगी  कीमत पर खरीद लेते हैं. फिल्म में तो अरण्या और उसकी बुआ एक मुहिम चला कर बिल्डर को वापस जाने पर मजबूर कर देती हैं..पर वास्तविक जीवन में शायद ऐसा ना होता हो.

अब अरण्या  को अभय से प्यार हो जाता है...और वो छुप छुप कर  खिड़की से उसे देखने...उस से मिलने की कोशिश करती है. इलेक्ट्रिक शॉक देने की वजह से अभय मानसिक और शारीरिक रूप से बिलकुल कमजोर हो जाता है...उसकी ये हालत दस साल से उसकी सेवा करने वाली नर्स...अरण्या ..उसके पिता और उसकी बुआ से नहीं देखा जाता और वे सब मिलकर अरण्या को अभय को भगाने में मदद करते हैं.

ट्रेन चल पड़ती है...अभय नासमझ सा बैठा हुआ है..और अरण्या हार्मोनिका निकाल कर बजाने लगती है....अभय के चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आती है और वो सीटी में एक धुन बजा कर अरण्या का साथ देने लगता है. फिल्म इसी ख़ूबसूरत मोड पर ख़त्म हो जाती है.

फिल्म का छायांकन बहुत ही सुन्दर  है...पहाड़ी शहर के प्राकृतिक दृश्यों को बहुत खूबसूरती से कैमरे में कैद किया गया है. बैकग्राउंड में बजता गीत इतना सटीक है..जैसे ही दर्शकों को लगता है...फलां कैरेक्टर ये सोच रहा होगा...और उसकी सोच गीत की शक्ल में सुनायी देने लगती है. तन्वी आज़मी...रघुवीर सहाय...अनंत महादेवन सारे  मंजे हुए कलाकारों ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है..आयेशा  टाकिया...सुबह की ओस सी मासूम भी लगती हैं...और अभिनय भी लाज़बाब किया है..
पर सबे ज्यादा चौंकाया है. 'रणविजय सिंह ' ने...उनकी पहली फिल्म है, जिसमे इतना लम्बा रोल है...पर वे अपने कैरेक्टर से बिलकुल ही अलग नहीं लगते..एंडी के कैरेक्टर में बिलकुल खामोश से सीधे-सादे लगते हैं..वहीँ अभय के किरदार में आजकल के मॉडर्न युवा. 
दस साल पहले उन्हें  MTv   के कार्यक्रम रोडीज़ वन में देखा था...रोडीज वन जीतने के बाद वे   MTv   में    VJ  भी बन गए...और अब रोडीज़ के ऑडिशन भी लेते हैं...पर इस फिल्म में उनका अभिनय उनके इमेज से हटकर बहुत  ही संवेदनशील रहा. 

नागेश कुकनूर का निर्देशन बहुत ही सधा हुआ है...पर कहीं कहीं स्क्रिप्ट में थोड़ा ढीलापन  है...शायद आजकल के युवाओं में इतना धैर्य ना हो...बिना संवाद के लम्बे दृश्यों को झेलने का.


ये फिल्म ताइवान की फिल्म  CHEN SHUI DE QING CHUN ....अर्थात  KEEPING WATCH    पर आधारित है .

32 comments:

  1. इस विषय में मेरी नातज़ुर्बेकारी को ध्यान में रख कर सिर्फ हाज़िरी दर्ज कर लीजियेगा :)

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  2. कोमल भावनायें कहाँ अधिक रह गयी हैं फिल्मों में, यह बयार जैसी है।

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  3. फिल्म का रिव्यू इतना अच्छा नही था सो देखा नहीं.. लेकिन अब लग रहा है कि देखनी चाहिए थी... आपके हिसाब से साढ़े तीन स्टार तो मिलेंगे ही फिल्म को.... सुन्दर समीक्षा...

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  4. तारीफ तो हो गयी अब देखते हैं कि पिक्‍चर लगी हुई है या अब आएगी। क्‍योंकि हमारा शौक इधर कम ही है। या ऐसा कहना उचित होगा कि समय की किल्‍लत है, मुझे नहीं मेरे पतिदेव को। आपका आभार एक अच्‍छी फिल्‍म से परिचय कराने का।

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  5. आपका फिल्मों का चुनाव,आपकी शैली, विस्तृत समीक्षा के विषय में तो कुछ कहने को नहीं है... वैसे आपकी रिकमंड की हुयी फ़िल्में अमूमन देख ही लेता हूँ.. मुश्किल ये है कि मैं फ़िल्में थियेटर में नहीं देखता. सीडी खरीदकर (ओरिजिनल) इत्मिनान से देखता हूँ.. बिना किसी डिस्टर्बेंस के... नागेश कुक्कनूर की फिल्म है तो बस मेरे कार्ट में आ गयी समझिए!!

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  6. इतना बड़ा डिस्क्लेमर ? :)

    फिल्म देखने लायक लग रही है. जल्दी ही देखता हूँ.

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  7. abhi kuch hafte pehle he yeh film youtube per dekhi, bahut he pyari film hai. Aaj laga fir se ek baar dekh lee. Hope Mr Kukunoor never stop making such movies. They belong to a whole different world.

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  8. आपने बहुत सुन्दर समीक्षा की है ।
    विशेषकर आयशा टाकिया के निर्मल रूप का वर्णन कर फिल्म देखने की उत्सुकता बढ़ा दी ।
    स्प्लिट पर्सनालिटी सिजोफ्रेनिया का ही अंग होता है । इसमें मनुष्य रियलिटी से दूर हो जाता है ।

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  9. आपने मना किया था लेकिन फिर भी पढ़ लिया मैंने ;)
    फिल्म आज ही डाउनलोड कर के देखूंगा!! :)

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  10. वैसे दीदी बॉलीवुड-हॉलीवुड दीपा मेहता की फिल्म है...

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  11. चलिए अब फिल्म देखने की जरुरत ही नहीं रही वैसे यह यहाँ शायद ही लगे ...

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  12. फिल्‍में मैं देखती नहीं .. इनकी समीक्षाएं पढकर ही थोडी जानकारी मिल जाती है .. आपकी शैली वाकई लाजबाब होती है !!

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  13. फिल्म का विषय लीक से हट कर है ! आपकी समीक्षा बहुत सधी हुई है और आम फॉर्मूला फिल्मों से अलग कथानक मुझे आकृष्ट करते हैं तो आशा बन चली है कि यह फिल्म देख लूँगी ! वैसे यह भी सच है कि इस फिल्म के बारे में आज पहली बार आपकी पोस्ट पढ़ कर ही जानकारी हुई है ! सुन्दर एवं विस्तृत समीक्षा के लिये आभार !

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  14. रश्मि जी, ऐसी समीक्षा कि मूवी देखने की जिज्ञासा जाग गई....बधाई

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  15. आदरणीया रश्मि रविजा जी
    सस्नेहाभिवादन !

    अली भाई का कहा ही मेरा कहा मान लीजिएगा … :)


    वैसे इतना अवश्य कहूंगा कि आप पोस्ट लिखने में बहुत श्रम और लगन से काम करती हैं … आपके जज़्बे को सलाम !

    मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  16. कम या ज्यादा फ़िल्में देखने वालों के लिए ये समीक्षाएं बहुत उपयोगी होती है , कम देखने वालों को कहानी पता चल जाती है , ज्यादा देखने वालों के पैसे बच जाते हैं , दोनों का ही फायदा होता है !
    बहुत रोचक कहानी लग रही है , तुमने लिखा भी इतने बढ़िया तरीके से है कि पूरी फिल्म आँखों के सामने घूम गयी !
    कैसा संयोग है कि सिडनी सेल्डन का एक उपन्यास पढ़ा था , अब तक उसका हैंग ओवर चल रहा है , और अब तुम्हारी पोस्ट में भी इसका जिक्र है ...

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  17. रश्मी जी..सस्नेह
    आपने तो मूवी की कहानी बताकर
    देखने की जिज्ञासा बढा दी..आभार
    सुंदर पोस्ट ..
    मेरे नए पोस्ट में स्वागत है ....

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  18. thanks for the lovely review

    pls give me links whn u write these beautiful things frm the next time on - pleeeeeeeeeeez

    i mostly cant see many films (very few hindi movies come here - only the "bodyguard" type super hits ) - but i loved this story u shared here - thanks again

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  19. फिल्में अब कम देखती हूँ ....
    पर आपकी फिल्म समीक्षा गज़ब कि होती है ....
    अब आप इतनी फिल्मों कि समीक्षाएं कर चुकी हैं कि
    फिल्म समीक्षा का इक अलग ब्लॉग हो जाना चाहिए .....:))

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  20. अभी तक नहीं देख पाये इस फिल्म को...

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  21. फिल्म की समीक्षा इस अंदाज़ से लिखी गयी है कि फिल्म देखने के लिए उतवला हो उठा हूँ.... निराश हुआ तो जिम्मेवारी आपकी.

    बाकी
    @ abhi said...

    भैया हमें भी बता दीजिए फिल्म कैसे डाउन लोड होती है... मुफ्त में बुरा क्या है.:)

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  22. फिल्म आपको पसंद आयी है तो अपनी लिस्ट में भी आएगी ही

    @शायद आजकल के युवाओं में इतना धैर्य ना हो...बिना संवाद के लम्बे दृश्यों को झेलने का.

    ओ के, अच्छा हुआ पहले बता दिया , अब रोज आधे घंटे का एपिसोड बना कर देखेंगे :)
    [ये मेरा पुराना तरीका है ]

    अब आप ये बताइये की अगर इस फिल्म को आप नंबर [१०० में से] देंगी तो इस फिल्म को कितने नंबर मिलेंगे ?

    और हाँ ....नोट करने वाली बातें नोट कर ली हैं :)

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  23. बहुत सुन्दर फ़िल्म है, या तुम्हारी समीक्षा ने उसे ज़्यादा रोचक बना दिया, या दोनों ही :)
    सच कहूं रश्मि तो कई फ़िल्में, मैने तुम्हारी समीक्षाएं पढने के बाद ही देखीं. सतना जैसे मध्यम शहर के सिनेमाघरों में ऐसी फ़िल्में ग़लती से ही आ पाती हैं :(, ऐसे में तुम्हारी पोस्ट निश्चित रूप से उस फ़िल्म को देखने का मन बना देती है. इसी तरह बेहतरीन फ़िल्मों की जानकारी देती रहो, थैंक्स भी बोलूं क्या?

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  24. क्या समीक्षा लिखी है एक समां सा बांध दिया लगता है पिक्चर भी ऐसी सुंदर होगी.

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  25. @अभी

    सही कहा..'हॉलीवुड बॉलिवुड' दीपा मेहता की फिल्म है..उसके अंतिम दृश्य में नागेश कुकनूर ने अभिनय भी किया है....और ..नागेश कुकनूर की फिल्म का नाम था,'बॉलिवुड कॉलिंग' इसीलिए कन्फ्यूज़ कर गयी...'बॉलिवुड कॉलिंग' तो अच्छी लगी थी...

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  26. @राजेन्द्र जी,

    जाने क्यूँ लोगो को लगता है की मैं अपनी पोस्ट पर मेहनत करती हूँ....जबकि इस तरह की पोस्ट तो बस एक बार लिखना शुरू किया और कब अंत आ गया..पता ही नहीं चलता...

    हाँ, किसी मुद्दे पर लिखने के लिए आंकड़े इकट्ठे करने होते हैं...तो शायद वक़्त लगता है..पर वैसे पोस्ट कम ही लिखती हूँ...

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  27. @गौरव,

    बड़ी अच्छी बात है कि आपने नोट करने वाली बातें नोट कर ली....अमल में लाना भी ना भूलियेगा :)

    और जहाँ तक फिल्म को नंबर देने का सवाल है...वो मैं नहीं कर सकती....क्यूंकि ये कोई एक कम्प्लीट फिल्म नहीं है...ऐसी भी नहीं कि हर वर्ग के दर्शकों को पसंद आए....बहुत सारी खामियां भी हैं इसमें...पर कई बार किसी को imperfect चीज़ें भी अच्छी लगती हैं...ये उनकी अपनी पसंद होती है...और जरूरी नहीं कि सब उनकी पसंद से इत्तफाक रखें.

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  28. बहुत अच्छी समीक्षा !

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  29. हम्म्म्म मुझे पक्का पता था की आप ऐसा ही कुछ कहेंगी , फिर ही ट्राई करने में क्या जाता है ? :)

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  30. आपकी समीक्षा पढ़ के मज़ा आ गया ... हमारे दुबई में तो ये फिल्म आने से रही ... किसी नेट से डाउन लोड करनी पढेगी ... नाज़ुक से प्यार को अगर सफलता से कैद किया है कैमरे में तो फिल्म सच में कमाल की हो सकती है ...

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  31. बेहद खूबसूरत फिल्म है। उससे भी खूबसूरत है आपकी शब्दों की जादूगरी। पारखी नजर (इडली-डोसा)की भी दाद देनी होगी। फिल्म देखी नहीं है, लेकिन इस तरह की फिल्में पसंद बहुत हैं।

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