Wednesday, September 28, 2011

अशोक कुमार पाण्डेय की कुछ बेहतरीन कविताओं का संकलन 'लगभग अनामंत्रित '


कविता प्रेमियों के लिए 'अशोक कुमार पाण्डेय' जाना पहचाना नाम है. ब्लॉगजगत में जिन लोगों की कविताएँ पढ़ती हूँ और जिनकी नई कविता का इंतज़ार रहता है...अशोक जी का नाम उनमे प्रमुख है. उनके ब्लॉग 'असुविधा' पर कई कवितायें पढ़ी हैं. कुछ दिनों पहले ही उनका कविता -संग्रह ' लगभग अनामंत्रित' पढ़ने का सुयोग प्राप्त हुआ. इस संकलन की हर कविता नायाब है.

युवा कवि एवं आलोचक 'महेश चन्द्र पुनेठा जी' ने अशोक जी की कविताओं के विषय में कहा है..."अशोक की कविताओं में काव्यात्मकता के साथ-साथ संप्रेषणीयता भी है। वह जीवन के जटिल से जटिल यथार्थ को बहुत सहजता के साथ प्रस्तुत कर देते हैं।उनकी भा्षा काव्यात्मक है लेकिन उसमें उलझाव नहीं है। उनकी कविताएं पाठक को कवि के मंतव्य तक पहुंचाती हैं। जहां से पाठक को आगे की राह साफ-साफ दिखाई देती है। यह विशेषता मुझे उनकी कविताओं की सबसे बड़ी ताकत लगती है। अच्छी बात है अशोक अपनी कविताओं में अतिरिक्त पच्चीकारी नहीं करते। उनकी अनुभव सम्पन्नता एवं साफ दृष्टि के फलस्वरूप उनकी कविता संप्रेषणीय है और अपना एक अलग मुहावरा रचती हैं।
उनकी कविताएं अपने समय और समाज की तमाम त्रासदियों-विसंगतियों -विडंबनाओं - अंतर्विरोधों -समस्याओं पर प्रश्न खड़े करती है तथा उन पर गहरी चोट करती हैं। यही चोट है जो पाठक के भीतर यथास्थिति को बदलने की बेचैनी और छटपटाहट पैदा कर जाती है। यहीं पर कविता अपना कार्यभार पूरा करती है।

लगभग अनामंत्रित में 48 कविताएं संकलित हैं. इन कविताओं में जीवन की विविधता दिखाई देती है."

मुझमे कविताओं पर कुछ लिखने की योग्यता नहीं है. बस उन्हें पढना अच्छा लगता है....सोचा एकाध कविताएँ ,यहाँ शेयर की जाएँ.
महेश चन्द्र पुनेठा जी द्वारा इस पुस्तक की विस्तृत समीक्षा यहाँ देखी जा सकती है.

वैसे तो उनकी हर कविता पढ़ कर देखनी चाहिए...इस पते पर यह पुस्तक मंगवाई जा सकती है.

शिल्पायन
10295
लें न. 1 , वेस्ट गोरखपार्क,
शाहदरा, दिल्ली-110032
दूरभाष :011 - 22326078

काम पर कांता

सुबह पांच बजे...

रात
बस अभी निकली है देहरी से
नींद
गांव की सीम तक
विदा करना चाहती है मेहमान को
पर....
साढ़े छह पर आती है राजू की बस !

साढ़े आठ बजे...

सब जा चुके हैं !
काम पर निकलने से पहले ही
दर्द उतरने लगा है नसों में
ये किसकी शक्ल है आइने में ?
वर्षों हो गये ख़ुद का देखे हुए
अरे....पौने नौ बज गये !

दस बजे...

कौन सी जगह है यह?
बरसों पहले आई थी जहां
थोड़े से खुले आसमान की तलाश में
परम्परा के उफनते नालों को लांघ
और आज तक हूं अपरिचित !

कसाईघर तक में अधिकार है कोसने का्… सरापने का
पर यहां सिर्फ़ मुस्करा सकती हूं
तब भी
जब उस टकले अफ़सर की आंखे
गले के नीचे सरक रही होती हैं
या वो कल का छोकरा चपरासी
सहला देता है उंगलियां फाईल देते-देते
और तब भी
जब सारी मेहनत बौनी पड़ जाती है
शाम की काॅफी ठुकरा देने पर !


शाम छह बजे...

जहां लौट कर जाना है
मेरा अपना स्वर्ग

इंतज़ार मंे होगा
बेटे का होमवर्क
जूठे बर्तन / रात का मेनू
और शायद कोई मेहमान भी !

रात ग्यारह बजे...

सुबह नसों में उतरा दर्द
पूरे बदन में फैल चुका है
नींद अपने पूरे आवेग से
दे रही है दस्तक
अचानक करीब आ गए हैं
सुबह से नाराज़ पति
सांप की तरह रेंगता है
ज़िस्म पर उनका हाथ

आश्चर्य होता है
कभी स्वर्गिक लगा था यह सुख !


नींद में अक्सर...

आज देर से हुई सुबह
नहीं आई राजू की बस
नाश्ता इन्होने बनाया
देर तक बैठी आईने के सामने
नहीं मुस्कराई दफ़्तर में
मुह नोच लिया उस टकले का
एक झापड़ दिया उस छोकरे को
लौटी तो चमक रहा था घर
चाय दी इन्होने
साथ बैठकर खाए सब
आंखो से पूछा
और.... काग़ज़ पर क़लम से लगे उसके हांथ !


"मैं धरती को एक नाम देना चाहता हूँ"


मां दुखी है
कि मुझ पर रुक जायेगा ख़ानदानी शज़रा

वशिष्ठ से शुरु हुआ
तमाम पूर्वजों से चलकर
पिता से होता हुआ
मेरे कंधो तक पहुंचा वह वंश-वृक्ष
सूख जायेगा मेरे ही नाम पर
जबकि फलती-फूलती रहेंगी दूसरी शाखायें-प्रशाखायें

मां उदास है कि उदास होंगे पूर्वज
मां उदास है कि उदास हैं पिता
मां उदास है कि मैं उदास नहीं इसे लेकर
उदासी मां का सबसे पुराना जेवर है
वह उदास है कि कोई नहीं जिसके सुपुर्द कर सके वह इसे

उदास हैं दादी, चाची, बुआ, मौसी…
कहीं नहीं जिनका नाम उस शज़रे में
जैसे फ़स्लों का होता है नाम
पेड़ों का, मक़ानों का…

और धरती का कोई नाम नहीं होता…

शज़रे में न होना कभी नहीं रहा उनकी उदासी का सबब
उन नामों में ही तलाश लेती हैं वे अपने नाम
वे नाम गवाहियाँ हैं उनकी उर्वरा के
वे उदास हैं कि मिट जायेंगी उनकी गवाहियाँ एक दिन


बहुत मुश्किल है उनसे कुछ कह पाना मेरी बेटी
प्यार और श्रद्धा की ऐसी कठिन दीवार
कि उन कानों तक पहुंचते-पहुंचते
शब्द खो देते हैं मायने
बस तुमसे कहता हूं यह बातकि विश्वास करो मुझ पर ख़त्म नहीं होगा वह शज़रा
वह तो शुरु होगा मेरे बाद
तुमसे !

तुम्हारी दुनिया में इस तरह

सिंदूर बनकर
तुम्हारे सिर पर
सवार नहीं होना चाहता हूं
न डस लेना चाहता हूं
तुम्हारे कदमों की उड़ान को

चूड़ियों की जंजीर में
नही जकड़ना चाहता
तुम्हारी कलाईयों की लय
न मंगलसूत्र बन
झुका देना चाहता हूं
तुम्हारी उन्नत ग्रीवा
जिसका एक सिरा बंधा ही रहे
घर के खूंटे से

किसी वचन की बर्फ़ में
नही सोखना चाहता
तुम्हारी देह का ताप

बस आंखो से बीजना चाहता हूं विष्वास
और दाख़िल हो जाना चाहता हूं
ख़ामोशी से तुम्हारी दुनिया में
जैसे आंखों में दाख़िल हो जाती है नींद
जैसे नींद में दाख़िल हो जाते हंै स्वप्न
जैसे स्वप्न में दाख़िल हो जाती है बेचैनी
जैसे बेचैनी में दाख़िल हो जाती हैं उम्मीदें
और फिर
झिलमिलाती रहती है उम्र भर.

35 comments:

  1. वाह दीदी क्या बात है..इतनी कवितायें एक पोस्ट में...मन खुश हो गया...
    थैंक्स फॉर दिस पोस्ट!!

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  2. सभी कवितायें सुन्दर हैं लेकिन मुझे पहली वाली कविता सबसे अच्छी लगी।

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  3. अच्छी बात है , अशोक जी ने आपको संग्रह भेज दिया और आपको कवितायें अच्छी लगीं । मैं अशोक की कवितायें अन्यत्र भी पढ़ता रहता हूँ । यह संग्रह अशोक अभी तक भेज नहीं पाये हैं और शिल्पायन वाले शायद मेरे संग्रह के साथ ही भेजेंगे ( ?) तब तक यहीं कवितायें पढ़ लेते हैं वाया रश्मि रविजा । बहरहाल इन कविताओं के लिये की गई मेहनत के लिये बहुत बहुत धन्यवाद ।

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  4. बहुत बहुत धन्यवाद अशोक जी की पुस्तक से रूबरू करवाने का :) बहुत अच्छा लिखते हैं वे.

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  5. एक कमाल के कवि से परिचय कराने के लिए आभार!

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  6. अशोक पाण्डेय जी की कवितायेँ पढ़ती रही हूँ ...
    यहाँ उनका परिचय और चुनी हुई कवितायेँ पढना बहुत अच्छा लगा ...
    बहुत शुभकामनायें!

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  7. अक्सर लगता है कि कवियों को बूझना कितना कठिन होता है ! उनकी कवितायें सहल को दुश्वार कर अक्सर बौना कर देती हैं हम जैसों की समझ को ! हमेशा एक ही दुविधा कि जो अर्थ हमने निकाले क्या वाकई में कवि वोही कहना चाहता है ?

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  8. अच्‍छी प्रस्‍तुति। कविताएं समाज की मानसिकता को आईना दिखाती हुई है। बधाई अशोकजी को।

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  9. मां उदास है कि उदास होंगे पूर्वज
    मां उदास है कि उदास हैं पिता
    मां उदास है कि मैं उदास नहीं इसे लेकर
    उदासी मां का सबसे पुराना जेवर है
    वह उदास है कि कोई नहीं जिसके सुपुर्द कर सके वह इसे.....
    इन पंक्तियों से समझा जा सकता है संग्रह की विशेषता को , और आपने कहा है तो सत्य के सिवा और क्या !

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  10. एक साथ इतनी और 'इतनी अच्छी' कविताएं परोसने के लिए आभार. अशोक विचारवान कवि हैं, और उस रूप में मुझे प्रिय भी. समकालीन कविता पर, बिना इन्हें शामिल किए, कोई सार्थक विचार नहीं हो सकता.

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  11. बहुत अच्छा संकलन है...

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  12. बहुत धन्यवाद अशोक जी की पुस्तक से रूबरू करवाने के लिये………बहुत सुन्दर लिखते हैं।

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  13. किताब के लिए अशोक जी को बधाई | कविता की इतनी समझ नहीं है की कुछ ज्यादा टिप्पणी करू बस अच्छी लगी |

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  14. अशोक जी की कविताओं और उनके इस संग्रह से परिचय है. मेरी निजी पुस्तकालय में भी आ गई है यह . अशोक जी हिंदी मूल धारा की कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं...

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  15. अशोक जी की कवितायें सच में सरलता से मन को छू लेती हैं. उनकी संप्रेषणीयता अद्भुत है. आपका आभार दी कि आपने उनके कविता-संग्रह का परिचय यहाँ दिया. बहुत दिनों से इसके बारे में सुन रही थी, पता नहीं कब पढ़ पाऊँगी.

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  16. अशोक जी को अक्सर पढता हूँ ब्लॉग में और सोचता हूँ कितना विस्तृत आकाश है उनकी सोच का ... आपने जो भी कवितायें लिखी हैं वो शायद एक झलक है उनकी किताब की ... पता नहीं किताब क्या कर जायगी ... शुक्रिया इस लगभग अनामंत्रित में आमंत्रित करने का ...

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  17. अशोक जी से परिचित करवाने का आभार..

    "मैं धरती को एक नाम देना चाहता हूँ"

    बहुत उम्दा कविता लगी.

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  18. "लगभग आमंत्रित" की कवितायें ब्लॉग पर हों या घर में बुक शेल्फ पर... पाठक को भीतर बुला उसकी सोई छटपटाहट को जगाना उनकी नियति है ...

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  19. आराधना की फेसबुक से ये लिंक मिला... ये किताब मेरे पास है.. मैं भी इस पर लिखना चाहता था लेकिन मामला अधर में लटक गया. पहली ही कविता धूमिल की याद दिलाती है... कवि ने पहले ही कबूल कर लिया है कि आलोक धन्वा, धूमिल और कुछ लोगों को पढ़ कर ही उन्होंने कविता का शिल्प सीखा या कहना सीखा... पिछले कुछ दिनों से उनके फेसबुक अपडेट्स भी देखता हूँ... अपडेट देख कर ही समझ आता है कि ये प्रतिरोध कहाँ से निकलता है. बेहद जागरूक हैं वो सबसे अच्छी बात निर्बल और असहाय को शब्द दे रहे हैं. आपने अपने मन के मुताबिक तीन कवितायेँ लगायीं मुझे इसका टाइटिल कविता बहुत पसंद आई कुछ और भी हैं जैसे अच्छा आदमी ... कुछ और भी जो पढ़ते ही उनको फोन मिलाया था...

    वो लिख रहे हैं और बेहतर लिख रहे हैं... शुभकामनाएं ... लेकिन उन्होंने बड़ी कठिन राह चुनी है... अगर लड़ते रहे तभी मैं उनको पढता रहूँगा... छोटे और प्यारे होने के कारण कुछ अधिकार भी उनपर जमा लेता हूँ... और दो बात बढ़ कर कह भी देता हूँ पर मैं उनसे प्यार करता हूँ... उनमें कविता, सामयिकता और क्रांति की स्पष्ट परिभाषा और उनके अर्थ की भी समझ है.

    आपने ठीक ही लिखा. ये बस एक ब्लॉगर के रूप में शेयर किया हुआ ही है. शुक्रिया.

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  20. एक गलती कर गया... पहली कविता पाश की याद दिलाती है 'सपने हर किसी को नहीं आते' वाली की.

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  21. @सागर
    मुझे भी उनकी कविता, 'अच्छे आदमी' पसंद है...कुछ और कविताएँ काफी पसंद हैं..

    पर वही ब्लॉग की मजबूरियाँ हैं....

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  22. बेहतरीन कवितायेँ ... टाइटल कविता " लगभग अनामंत्रित " तो एकदम लाजवाब है, मेरी पसंदीदा है.

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  23. बेहतरीन कविताओं के इस संकलन को पढ़ने की उत्कंठा है । शिल्पायन का सम्पर्क सूत्र पकड़ता हूँ । आभार ।

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  24. अशोक जी की नायाब कविताएं एक जगह एक साथ पढकर बहुत अच्छा लगा, बहुत आभार आपका.

    रामराम.

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  25. आप सबका आभार..रश्मि जी का भी. किताब "lalit sharma" , पर मेल कर वी पी पी से मंगाई जा सकती है.

    आप सबकी प्रतिक्रियाओं ने मेरे विश्वास को और मज़बूत किया है...बहुत-बहुत आभार.

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  26. सभी कविताएँ बहुत अच्छी लगीं, यहाँ सहजः करने के लिए आभार।

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  27. रश्मि जी,
    सचमुच अनूठापन मिला पाण्डेय जी की कविताओं में. जो बानगी आपने प्रस्तुत की उससे उनके भावों के विस्तार का पता चलता है!! आभार!

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  28. आपके आलेख के माध्यम से अशोक कुमार पाण्डेय जी की बेहतरीन रचनाओं को पढने का सुखद संयोग मिल सका इसके लिये आपकी आभारी हूँ ! उनकी रचनाएं अनुपम हैं ! उनके बारे में जान कर हार्दिक प्रसन्नता हुई ! नव रात्रि की हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार करें !

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  29. अशोक जी एक बहुत विचारवान और सशक्त कवी हैं. उनकी कवितायेँ पढवाने के बहुत-२ धन्यवाद.

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  30. bahut badhiya likha hai rashmi ji aapne. thoda aur vistar deejiye to ise blog ki duniya se nikalkar bahar laya jaye...baki Ashok ji ki kavitaon se purana parichay sa ho gaya hai...unka swar bhi..tewar bhi! ek bar aur badhai!

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  31. मैने उनकी कविताएं छुटपुट ही पढी है...
    अशोक कुमार पांडे जी के लिखे में बहुत कुछ निहित होता है...और होती है उनकी संबद्ध मानवीय संवेदनाएं.अपनी संवेदनाओं को वे ज़ाया नहीं होने देते...विकट परिस्थितियों से जूझते लोगों की निस्सहायता को शब्द देते हैं. निर्णायक शब्द, अनुगुंजित शब्द, शब्द जो लिए होते हैं साहित्यिक आयाम भी.

    उनकी कविताओं में आज की विकट आर्थिक परिस्थितियों में पिस रहे लोगों का दर्द और छटपटाहट है... अशोक कुमार पांडे जी के सरोकारों और उनकी संलग्नता ही उनकी कविताओं में प्रतिपादित है. उनकी पक्षधरता
    जैसे हमारा समय बोध हो...

    आज हमारे प्रतिकार की भाषा भी कहीं-कहीं कुछ पुरानी-सी पुनरावृत-सी लगे. लेकिन अशोक जी की अभिव्यक्ति में हमें भाषाकीय ओज और नयापन दिखे...

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  32. बहुत अच्छा लगा अशोक भाई की कवितायें पढ़कर...जरुर प्राप्त किया जायेगा यह संकलन!!!

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  33. वाह अशोक जी की कवितायेँ पढकर दिल खुश हो गया. अच्छी पोस्ट और सुन्दर जानकारी के लिये बधाई.

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