Wednesday, June 22, 2011

एक पिता के प्यार, विश्वास और धैर्य की जीत

इच्छा तो थी कि 'शर्मीला इरोम'  से सम्बन्धित ही कुछ और लिखूं...परपिछली पोस्ट में टिप्पणियों में ही काफी विमर्श हो गया... और शायद लोग अब और ना पढना चाहें...(फिर भी कुछ दिन बाद उन टिप्पणियों के आधार पर ही कुछ लिखूंगी, जरूर) पर ये पोस्ट भी कहीं ना कहीं उन मुद्दों से ही सम्बंधित है.

"शर्मीला इरोम'
के सन्दर्भ में कुछ सज्जनों का कहना था  कि अकेला कोई व्यवस्था से नहीं  लड़ सकता...एक व्यापक जन-समूह की जरूरत होती है. कानून बहुत चिंतन-मनन के बाद बनाए जाते हैं. उन्हें नहीं बदला  जा सकता. अभी हाल में ही देखा...कपिल सिब्बल ने भी  बरखा दत्त को दिए अपने इंटरव्यू में कहा, "हमारा संविधान कई  महान लोगो ने काफी  विचार-विमर्श के बाद बनाए हैं...उसकी धाराएं यूँ ही नहीं बदली जा सकतीं. " (जबकि लगभग ९० बार क़ानून की धाराओं में संशोधन हो  चुका है...ये अलग बात है...तब राजनीतिज्ञ  इसमें अपना फायदा देखकर इसका समर्थन  करते रहे )

Father's  Day  भी अभी अभी गुजरा है...और इस पोस्ट में एक सच्ची घटना के ऊपर बनी फिल्म की चर्चा है...जिसमे तीन बातें मुख्य रूप से उभर कर आती हैं.

प्रथम, एक पिता का अपने बच्चों को पाने का संघर्ष (अक्सर कहानियाँ, सिर्फ माँ के संघर्ष को लेकर ही लिखी जाती हैं )
 

द्वितीय, उसका अकेले ही व्यवस्था के खिलाफ लड़ना
 

तृतीय, अपने जुनून से कानून में परिवर्तन करवाने में सक्षम होना,

 Evelyn एक अंग्रेजी फिल्म है...जो Desmond Doyle  की सच्ची कहानी पर आधारित है...जिसमे  1954   में उसने अपने बच्चों को  वापस अपनी कस्टडी में लेने के लिए  Irish court में केस लड़ा था  और जीत भी  गया था. Irish Children's  Act  में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए.

एवलिन एक सुनहरे लम्बे बालों वाली प्यारी सी बच्ची है. उसके पिता डेसमंड डोएल की नौकरी छूट  जाती है और उसकी माँ एवलिन और उसके दो छोटे भाइयों को छोड़कर किसी और पुरुष के साथ घर छोड़कर चली जाती है. डेसमंड पैसे और घर पर किसी महिला के अभाव में बच्चों की अच्छी तरह देखभाल नहीं कर पाता और जैसा कि विदेशों में नियम हैं..ऐसे हालात में बच्चों को प्रशासन अपनी देख-रेख में ले लेता है. चर्च द्वारा संरक्षित अनाथालय में गर्ल्स होस्टल में लड़की और बोयज़ हॉस्टल में लडको को भेज दिया जाता है.


स्वाभाविक रूप से बच्चे डरे हुए हैं. एवलिन को हॉस्टल छोड़ने उसके दादा जी आए हैं. वे  घबराई हुई एवलिन को पेडों से छन कर आती हुई सूरज की रोशनी की ओर देखने को कहते हैं...और बताते हैं
"ये Angel Rays हैं..और हमेशा तुम्हारी रक्षा करेंगी " इसके बाद जब भी  एवलिन किसी मुश्किल में पड़ती है...उदास होती है..वो Angel  Rays की तरफ देखती है..और उसे संबल मिलता है.  किसी भी  तरह की आस्था और विश्वास कितनी ही कठनाइयों से  लड़ने की हिम्मत पैदा कर देती है.

डेसमंड इसे  टेम्पररी व्यवस्था समझता है..और एक पब में गाना गा कर पैसे कमाना  शुरू कर देता है..इसके बाद जब वो बच्चों को लाने जाता है...तो उसे बच्चे नहीं सौंपे जाते.वो  केस कर देता है...पर जज कहते हैं..."तुम्हारे पास नौकरी नहीं है...रात में अपने पिता के साथ एक पब में गाते हो...(उसके पिता वायलिन बजाते हैं...और डेसमंड गाना गाता है) और शराब पीते हो. ऐसे हालात में बच्चों को तुम्हे नहीं सौंपा जा सकता .


डेसमंड अब शराब छोड़ देता है...और छोटे-मोटे काम..पेंटर-डेकोरेटर का काम शुरू कर देता है.चौबीसों घंटे काम करता है...अब एक अच्छा  वकील कर के अपने बच्चों की कस्टडी के लिए  याचिका दायर करता है. पर आयरिश क़ानून में बच्चों को पिता की देखभाल  में छोड़ने के लिए माँ की सहमति जरूरी होती है.  अगर माँ की मृत्यु हो गयी हो...उसी स्थिति में सिर्फ पिता की सहमति चाहिए होती है.पर यहाँ एवलिन की माँ जिंदा है...लेकिन कहाँ है...कोई खबर नहीं. डेसमंड फिर से केस हार जाता है,..और इस बार जज उसे सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की अनुमति भी नहीं देते.

अब कौन सा  उपाय है.??.पूछने पर वकील कहता है..अगर कानून में ही संशोधन की अपील की जाए तो कुछ संभव है..पर उसके लिए किसी बैरिस्टर को केस सौंपना होगा और बहुत सारे पैसे लगेंगे. डेसमंड फिर से दुगुनी मेहनत कर पैसे  जमा करता है...और वकील से समय ले मिलने जाता है. वकील एपोएंट्मेंट  कैंसल कर अपने फ़ार्म हाउस में छुट्टियाँ बिता रहा है. डेसमंड कंटीले तारों वाली बाउंड्री फलांग कर...अंदर जाने की कोशिश करता है...वकील के बड़े बड़े कुत्ते उसका पीछा करते हैं. किसी तरह भागते हुए वो नदी के बीच में जाकर वकील से मिलता  है..जहाँ वकील अपने एक दोस्त के साथ...एक नाव में फिशिंग कर रहा है
.

वकील के कहने पर कि ये केस किसी तरह भी हम नहीं जीत सकते हैं...डेसमंड उसे चैलेन्ज करता है..कि मैं अपने बच्चों को वापस लाने के लिए कुछ भी  करूँगा. वकील का मित्र अमेरिका से क़ानून की पढ़ाई करके आया है...वो ये केस लड़ने की पेशकश करता है...क्यूंकि अपने डिवोर्स में वो भी अपने बेटे की कस्टडी हार गया था...और एक पिता के दर्द को समझता है.


सरकार भी अपनी तरफ से केस जीतने की पूरी कोशिश करती है..और जिस जज ने इसके विरुद्ध फैसला दिया था उसे अब हाइ-कोर्ट से प्रमोट कर सुप्रीम कोर्ट में ले आती है. डेसमंड के वकील कानून मंत्री को भी विटनेस  बॉक्स में बुलाते हैं...और उन्हें बाइबल से उद्धरण पढ़ने को कहते हैं...(जिसपर, वहाँ का कानून आधारित है) जिसमे लिखा है...कि "बच्चों को  अपने घर से बढ़कर खुशियाँ कहीं नहीं मिल सकतीं". माँ की अनुपस्थिति के लिए भी ये लोग तर्क देते हैं कि चर्च  में हमेशा प्रार्थना करते  वक्त कहते हैं.....
..In  The  Name   of  The  Father  and  the  Son and the Holy Spirit  इसका अर्थ है कि एक पिता भी बच्चों की परवरिश करने में सक्षम है.

केस में कई उतार चढ़ाव  आते हैं...एवलिन की एक नन द्वारा पिटाई करने पर डेसमंड का गुस्से में नन का गला पकड़ लेना..डेसमंड के खिलाफ जाता है. फिर फैसले का दिन आ जाता है.
 

तीन जज में से हाईकोर्ट वाले जज तो इसके विरुद्ध फैसला देते हैं..जबकि बाकी दोनों जज इसके पक्ष में. उनका कहना है..कि "अब तक ऐसा उदाहरण नहीं है...लेकिन उदाहरण नहीं है तो उदाहरण बनाना चाहिए."
 

इस दौरान पूरे देश की  जनता, डेसमंड के साथ रहती ... अखबारों में रेडियो पर उसके इंटरव्यू लिए जाते हैं...उसे Best Man of  the Year का अवार्ड भी दिया जाता है. केस की एक एक पल की खबर की कमेंट्री की जाती है... पूरा आयरलैंड रेडिओ से कान लगाए बैठा होता है...एक टीचर के साथ एवलिन और तीन लडकियाँ भी खबरे सुन रही हैं...जैसे ही जीत की खबर आती है...एक लड़की भागती हुई जाती है...और हॉल में इकट्ठे हुए बच्चों से चिल्ला कर कहती है..."Now  We  All  can go Home"                         
 

जनमत डेसमंड के साथ था...पर इस से केस प्रभावित नहीं हुआ.पूरी न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही डेसमंड डोएल ने ये केस लड़ा और जीता और अगली क्रिसमस में बच्चे उसके पास थे.

शर्मीला इरोम
अपने लिए नहीं...दूसरों के लिए लड़ रही हैं...उनके आन्दोलन के सामने ये एक बहुत छोटा सा उदाहरण है..पर हिम्मत करनेवालों की कभी  की हार नहीं होती...

किसी शायर ने कितना सही कहा है...
 
जज़्बा कोई अख़लाक से बेहतर नहीं होता।
कुछ भी यहां इंसान से बढ़कर नहीं होता।
कोशिश से ही इंसान को मिलती है मंजिलें,
मुट्ठी में कभी बंद मुक़द्दर नहीं होता।

35 comments:

मनोज कुमार said...

इस आलेख में आपने सामाजिक सरोकारों के साथ फ़िल्म की कहानी की समीक्षा लिखी है। डोयाएल की कहानी हमें दिखाती है कि समस्याएं कितनी ही जटिल क्यों न हों अगर आपका इरादा सही है तो सफलता मिलेगी ही, देर या सवेर। देश में जो हालत हैं, उसे देख कर तो यही लगता है कि इन मुद्दों पर लिखने की ज़रूरत है – सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था की चक्की के नीचे आम आदमी पिसता जा रहा है।

शिवम् मिश्रा said...

एक और बेहद उम्दा आलेख ... यह फिल्म देखनी होगी ... आभार आपका !

इंदु पुरी said...

मैं इस फिल्म को देखना पसंद करूंगी.वो फिल्म के नायक की अपने बच्चो को अपनी कस्टडी में लेने की लड़ाई नही एक पिता की लड़ाई और उसकी जीत है.
नियमों में संशोधन होते रहे हैं.प्रयास करने होते हैं.ऐसे ही एक मामलों को उठाते हुए मैंने राजस्थान के कानूनी परिभाषा में 'अनाथ' की परिभाषा में परिवर्तन करवाया.यहाँ हमारा नाम कहीं नही आता.उसका क्रेडिट लेने को बहुत लोग बैठे हैं किन्तु ईश्वर और श्रीमती वसुंधराराजे पूर्व मुख्य मंत्री राजस्थान इस बात को जानती है.माता पिता दोनों के जीवित ना होने पर बच्चे को अनाथ माना जाता है किन्तु कई पिता माँ के मरने पर दुबारा शादी करते है.आने वाली उसकी पत्नी जब बच्चो की 'माँ' नही बन पाती या पिता के मरने पर माँ बच्चो को छोड़ कर दूसरी शादी कर लेती है दोनों स्थितियों में बच्चे अनाथ हो जाते है किन्तु नियमानुसार पेरेंट्स में से एक जीवित है इसलिए बच्चो को प्रशासनिक सहायता नही मिलती.
मुझे मात्र एक पत्र लिखना पड़ा और फोन पर ये बात उन्हें समझानी पड़ी.नियम बदल गए.हम घबरा कर कि कौन फटे में पाँव फँसाये पहल ही नही करते.नायक की पहल काश समाज में ,समाज के लिए किसी ने नायक बन इसे सत्य किया होता.
किन्तु ऐसी फिल्म्स सोच का एक रास्ता खोल देती है इसमें कोई शक नही.रश्मि! आपने इस माध्यम से ही सही एक अलख जगाने का प्रयास किया है.कम से कम ऐसे आर्टिकल्स पढ़ कर मैं यही सोचती हूँ.साधुवाद की पात्र हो.जियो.

राजेश उत्‍साही said...

कामना यही है कि सदा सत्‍य की जीत हो।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

एक प्रेरणादायी कहानी वाली फिल्म की सुंदर समीक्षा की आपने.....

Sadhana Vaid said...

मानवीय संवेदनाओं से भरपूर एक बहुत ही संघर्षमयी कहानी है फिल्म की और यह एहसास कि यह सत्य है मन को कहीं गहराई तक उद्वेलित कर जाती है ! जिस पिता ने और बच्चों ने इस दर्द को झेला होगा और लंबी लड़ाई के बाद विजय पाई होगी उन्हें नमन करने का मन होता है ! एक माँ और बेटी के संघर्ष पर आधारित अभी एक बेमिसाल उपन्यास पढ़ा है मैंने "Not without my daughter" उसकी याद हो आई ! यह भी सत्य घटना पर आधारित है ! हो सकता है आपने भी पढ़ा हो यदि नहीं तो समय निकाल कर ज़रूर पढियेगा ! आपने इतनी उत्सुकता जगा दी है कि यह फिल्म ज़रूर देखनी होगी ! आपकी पसंद और चयन बहुत बढ़िया होता है ! धन्यवाद !

Rahul Singh said...

वाह डेसमंड, लगा कि फिल्‍म में न्‍याय-व्‍यवस्‍था, प्रक्रिया और वात्‍सल्‍य को समांतर बखूबी उभारा गया है.

Sadhana Vaid said...

आपने आयरलैण्ड के पिता की कहानी सुनाई है मैंने जिस उपन्यास का ज़िक्र किया है वह अमेरिकन है ! देश कोई भी हो बच्चों के प्रति प्यार, ममता और दुनिया की कड़ी धूप से बचा कर उन्हें अपने पास अपने संरक्षण में रखने का जज्बा किसी सीमा को नहीं जानता ! यह निश्चित ही विरला दृष्टान्त रहा होगा जिसकी वजह से आयरलैंड के क़ानून को ही बदलना पड़ा ! ऐसे पिता को और उसके संघर्ष को जितना भी सराहा जाये कम ही होगा !

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रयास से सब संभव है।

Arvind Mishra said...

हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती -एवलिन की विस्तृत सुन्दर समीक्षाके लिए आभार

rashmi ravija said...

@साधना जी,
"Not without my daughter" मेरी फेवरेट किताब है.....इसे मैने पढना शुरू किया ...और रात के ३ बजे ख़त्म किया..जबकि सुबह ५ बच्चे उठ कर बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना था. पता नहीं कितने लोगो को रेकमेंड कर चुकी हूँ, इसे पढ़ने को...जब से ब्लॉग बनाया है...उस किताब के ऊपर लिखने का मन है...लेकिन आप देख ही रही हैं...नए-नए विषय आते रहते हैं. जल्दी ही विस्तार से लिखूंगी इस पर.

बड़ी ख़ुशी हुई जान कि ये आपको भी उतनी ही प्रिय है. इस किताब पर इसी नाम से फिल्म बनी है.

abhi said...

जज़्बा कोई अख़लाक से बेहतर नहीं होता।
कुछ भी यहां इंसान से बढ़कर नहीं होता।
कोशिश से ही इंसान को मिलती है मंजिलें,
मुट्ठी में कभी बंद मुक़द्दर नहीं होता।

क्या बात कही है दीदी..
ये फिल्म के बारे में बताकर अच्छा किया, अब देखता हूँ फिल्म.."Not without my daughter किताब भी देखता हूँ, मिल जाए तो पढता हूँ.

Sonal Rastogi said...

फिल्म देखने के बाद टिपण्णी दूँगी ..अभी लेख नहीं पढ़ रही हूँ

वाणी गीत said...

पिता का बच्चों के लिए लड़ना और जीतना , नया विषय है ....
जहाँ लड़ने का हासला है , वहां जीत भी है !
थोडा ज्यादा समय हो गया ...एक पिता की व्यथा कथा पढ़ी थी , अपनी बच्ची से मिलने के लिए तड़पता पिता ने अखबार के माध्यम से उसने रो रोकर अपनी बात कही की कस्टडी नहीं तो कम से कम उसे अपनी बच्ची को देखने का मिलने का मौका तो मिले !
मन कैसा कैसा हो जाता है यह सब पढ़ कर ...

ajit gupta said...

दुनिया में कुछ प्रतिशत ऐसे लोग हैं जिन्‍हें किसी न किसी बात का जुनून होता है। ये लोग ही दुनिया को उन्‍नत करते हैं। एक वैज्ञानिक अपना सारा जीवन होम कर देता है और प्रयोगशाला में बैठा रहता है लेकिन उसके अविष्‍कार के कारण ही हम सुख पाते हैं। ऐसे ही कितने ही सामाजिक चिंतन वाले लोग किसी एक समस्‍या को अपने जीवन का लक्ष्‍य बना लेते हैं और वे सभी के लिए नवीन दे जाते हैं। आपने शर्मिला के सदर्भ में यह फिल्‍म की कहानी बतायी, सच है आज लगता है कि शायद शर्मिला अपना जीवन बर्बाद कर रही है लेकिन पता नहीं उसका आंदोलन कितने लोगों को नया जीवन देगा। बहुत ही प्रेरणास्‍पद फिल्‍म और आपकी पोस्‍ट।

???????????? said...

रश्मि जी कोई क्या कहता है यह उसकी अपने सोच होती है इस के वारे में हमें नहीं सोचना चहिये अपना कम पूरी सिद्दत के साथ करना कहिये
.. कोई दुसरो के लेख पढ़ कर अपने अप को जादा बुदिमान साबित करना चाहता है तो कोई अपने लेख तक दुसरो को लेजाने का प्रयाश करता है तो तो कोई अपने विचारो को लिखता है
यह इंसानी सोच होती है और आप उसे बदल नहीं सकते ! हमारी उप ने एक कहावत कही जाती है " चिल्वन खातिर कथरी थोरी छोड़ दयबेय" अर्थात दुसरो के करना अपने विचार बदलना गलत है !

वैसे आप के सारे लेखा हम है और हमें आचे लगता आहे क्यों की अप दुसरो से अलग लिखते हो आप समाज वाद में लिखते हो


इस आलेख में आपने सामाजिक सरोकारों के साथ फ़िल्म की कहानी की समीक्षा लिखी हैवो भी अद्भुद है

मीनाक्षी said...

एक अकेली लड़ती इरोम और इस फिल्म की समीक्षा.. दोनों विषयों को जोड़ कर जो लेख लिखा काबिले तारीफ़ है...हमेशा की तरह पढ़ कर बहुत कुछ करने सोचने को मिल जाता है ..

वन्दना said...

बहुत सुन्दर विवेचन किया है और सही है बदलाव तो करने ही पडेंगे फिर चाहे व्यवस्था हो या कानून या संविधान्…………संशोधन वक्त के अनुसार करने ही पडते हैं।

Sawai Singh Rajpurohit said...

पोस्ट करने के लिए आभार

सतीश पंचम said...

पारिवारिक मसले अक्सर काफी संजीदा किस्म के होते हैं, तिस पर तलाक, अलगाव आदि के चलते बच्चों और उनके माता-पिता के बीच जो भावनात्मक कशमकश चलती है तो उसके बारे में अब क्या कहा जाय.....

इंदु जी का प्रयास पढ़कर अच्छा लगा। एक आमिर खान की फिल्म थी नाम याद नहीं लेकिन उसमें भी बच्चे को लेकर ऐसी ही जद्दोजहद बताई गई थी।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


मैं समय हूँ ...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .

रश्मि प्रभा... said...

कोशिश से ही इंसान को मिलती है मंजिलें,
मुट्ठी में कभी बंद मुक़द्दर नहीं होता।...
film ki kahani, aapka prastutikaran , sab badhiyaa

शुभम जैन said...

bhaut achchi samiksha...film to dekhugi hi saath hi iske jariye jo alakh jaga rhi hai aap wo bhi kabile tarif hai...

aabhar.

आशा said...

बहुत अच्छे मुद्दे उठाए हैं आपने |सटीक लेख |
आशा

डॉ टी एस दराल said...

सच है , हौसला बनाये रखना ज़रूरी है । हालाँकि यही काम सबसे मुश्किल होता है ।
सार्थक पेशकश ।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

आपकी फिल्म समीक्षाएँ पढकर लगता है कि बस फिल्म सामने से गुज़र रही हो और आप साथ बैठी समझा रही हों एक एक दृश्य!!

डा० अमर कुमार said...

मुद्दों पर जीतने के लिये हार न मानने की जिद ज़रूरी है ।
इस फ़िल्म की कहानी के माध्यम से आपने अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है !
यह स्वतः ही एक गोल्डेन पोस्ट बन गयी है ।

anshumala said...

रश्मि जी

जो आप कहना चाह रही है वो मै समझ रही हूँ फिर भी यह कहती हूँ की शर्मीला जी जिस कानून को बदलने की बात कर रही है और फिल्म में जिस कानून की बात हो रही है उनमे जमीन आसमान का फर्क है फिल्म में कानून सामाजिक मुद्दों पर है जिसको बदलवाना आम आदमी के बस में जो उसे बदलने के लिए हर हद तक जाने को तैयार हो फिर जिन जगहों पर आप के पास क़ानूनी तौर पर लड़ाई की जगह हो वहा काम और आसन हो जाता है जैसे की फिल्म में है | हमारे समाज में भी ऐसे कई कानून बनाये गए है और जरुरत पड़ने में उसे बदला भी गया है | किन्तु शर्मीला जी जिस कानून को बदलने की बात कर रही है वो असल में देश की आतंरिक सुरक्षा और एकता से सम्बंधित है जिसको हम क़ानूनी रूप से अदालत में चैलेन्ज भी नहीं कर सकते है | ऐसे कानूनों में देश को सर्वोपरी रखा जाता है देशवासी को पीछे , फिर जहा देशवासी ही गौढ़ हो जाये तो उसमे इस तरह के आंदोलनों का कोई असर सत्तासीन लोगो पर नहीं होता है और ज्यादा व्यापक रूप में देखा जाये तो पूरा मामला कानून का गलत प्रयोग सेना को मिली असीम शक्तियों का दुरुपयोग का है वहा तो फिर भी शांति नहीं है किन्तु देश के बाकि हिस्सों में जहा शांति है वहा क्या कानून का दुरुपयोग नहीं होता है क्या टाडा , पोटा और मकोका जैसे कानूनों का दुरुपयोग नहीं क्या जा रहा है | पर हम में से कोई भी इनके खिलाफ कुछ नहीं कर सकता बदलाव तब ही आया जब राजनीतिक रूप से इसकी जरुरत महसूस हुई | इसलिए मैंने भी भीड़ , वोट बैंक को आगे आने की बात कही थी मिल कर लड़ने की बात कही थी बदलाव तो तभी संभव है |

rashmi ravija said...

@अंशुमाला जी,
मैने खुद ही यह बात पोस्ट में कह दी है...

शर्मीला इरोम अपने लिए नहीं...दूसरों के लिए लड़ रही हैं...उनके आन्दोलन के सामने ये एक बहुत छोटा सा उदाहरण है..

यहाँ बात, मैने ज़ज्बे की ...हार नहीं मानने की....वस्तुस्थिति को चुपचाप स्वीकार नहीं करने की ...व्यवस्था के सामने घुटने नहीं टेकने की....की है..

मैने पिछले पोस्ट में भी यह बात बार-बार कही है...कि यह मुद्दा देश के जनमानस से नहीं जुड़ा है...इसलिए देश की जनता भी विमुख है...और जैसा कि आपने कहा...
"
इसलिए मैंने भी भीड़ , वोट बैंक को आगे आने की बात कही थी मिल कर लड़ने की बात कही थी बदलाव तो तभी संभव है | "

शर्मीला इरोम के आन्दोलन को इतना बड़ा समर्थन तो निकट भविष्य में दिखता नहीं...तो क्या किसी को आवाज़ उठानी ही नहीं चाहिए.....कोई कोशिश करनी ही नहीं चाहिए ???

संजय @ मो सम कौन ? said...

ऐसे विषय पर ही बनी कमल हासन की 'चाची 420' और उसकी इंगलिश मूल फ़िल्म ’Mrs. Doubtfire'जिसमें Robin Williams हैं, अपनी बहुत पसंदीदा फ़िल्म रही हैं। ये हल्की फ़ुल्की फ़िल्में थीं, Evelyn निश्चित रूप से एक गंभीर फ़िल्म है। आपकी समीक्षा जबरदस्त होती है।
अखबार में ’जय प्रकाश चौकसे’ वाला कालम सबसे पहले पड़ता था मैं, यहाँ भी पढ़ तो पहले लिया था लेकिन बार बार आने से कमेंट्स भी जानने को मिलते हैं। इंदु पुरी जी का कमेंट और सफ़ल प्रयास ऐसी पोस्ट के महत्व को द्विगुणित कर देता है।
फ़िल्म अपनी विशलिस्ट में जोड़ ली है, शुक्रिया।

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतर तरीके से इस फिल्म की समीक्षा को शर्मिला के केस से जोड़ा है...

Evelyn अभी तक नहीं देखी किन्तु अब देखने की इच्छा हो चली है.

amrendra "amar" said...

behtreen samiksha.........

shekhar suman said...

इंटरनेट की परेशानी के कारण आजकल फिल्में नहीं देख प् रहा हूँ...मौका मिलते ही देखूँगा...

Er. सत्यम शिवम said...

आपका स्वागत है "नयी पुरानी हलचल" पर...यहाँ आपके पोस्ट की है हलचल...जानिये आपका कौन सा पुराना या नया पोस्ट कल होगा यहाँ...........
नयी-पुरानी हलचल

दिगम्बर नासवा said...

ये सिर्फ एक फिल्म की कहानी नहीं ... जूनून , लगन और ध्येय की लिए लड़ी गई लड़ाई की दास्तान है ... संवेदनाओं से भरी इस फिल्म को देखना पढ़ेगा ...
जहां तक कपिल सिब्बल की टिपण्णी का सवाल है ... मुझे नहीं लगता संविधान बनाने वालों ने विशिष्ट विचार-धारा, ब्रिटिश क़ानून से अलग हट के ... नए रूप से भारतीय संस्कृति को या सामाजिक परिवेश को पूर्णतः ध्यान में रख कर संविधान बनाया है ...