Friday, October 29, 2010

पेंटिंग की बदौलत मिले कुछ यादगार पल..

पिछली पोस्ट में पेंटिंग का जिक्र था और कई लोगों ने सलाह दी...कि पेंटिंग को यूँ दरकिनार नहीं करना चाहिए.,उसे भी जारी रखूं. खैर मन में तो चलता ही रहता है कि 'हाँ ,पेंटिंग करनी है'. और पेंटिंग  ने कई यादगार क्षण भी दिए हैं...उसे कैसे भूल  सकती हूँ. एक तो, जब मैं एक पेंटिंग  में फ्रेम लगवाने गयी थी तो SNDT कॉलेज की प्रिंसिपल भी उसी आर्ट गैलरी में एक पेंटिंग खरीदने आई थीं. उन्हें मेरी पेंटिंग अच्छी लगी और उन्होंने  SNDT कॉलेज में  वोकेशनल कोर्सेस में पेंटिंग सिखाने का ऑफर दे दिया. पर मेरा बड़ा बेटा दसवीं में था, सो वो ऑफर नहीं स्वीकार कर  पायी. पेंटिंग की वजह से एक और दूसरा बहुत ही रोचक अनुभव हुआ.

मैने ये  संस्मरण कभी लिखने की नहीं सोची थी फिर एक बार प्रवीण पाण्डेय जी के ब्लॉग पर किसी का कमेन्ट पढ़ा कि "आप कहीं विशेष अतिथि बन कर जाते हैं..वह संस्मरण भी उसी सहजता से लिख देते हैं." उसके बाद ही मैने सोचा, इसमें आत्मविमुग्धता  जैसी कोई बात नहीं है...और शेयर की जा सकती है.

हमारी सोसायटी में ' डौन बास्को' स्कूल की एक टीचर रहती हैं. कभी कभी सोसायटी के  काम से मेरे घर पर  आती रहती थीं. बाहर मिल जातीं, दो चार बातें हो जातीं. बस, इस से ज्यादा परिचय नहीं था. एक दिन घर पर आई और बोलीं,  ' डौन बास्को' स्कूल के पचास साल पूरे होने पर कई सारे समारोह आयोजित किए जा रहें हैं. उसमे से " ट्रेडिशनल ड्रेस कम्पीटीशन' में आपको जज के रूप में बुलाना चाहती हूँ " तब ,पता चला  वे मेरी पेंटिंग्स से बड़ी प्रभावित थीं. पर मैने पूछ डाला, "मुझे क्यूँ.?.मुझे तो कोई अनुभव नहीं " तो कहने लगीं, " आप पेंटिंग करती हैं,आपको कला की समझ (?) है " . मैने थोड़ी देर सोचा...और फिर यह सोचकर हाँ कर दी कि ऐसे  मौके बार-बार नहीं मिलते"

फिर कुछ दिनों बाद वो स्कूल डायरेक्टर की तरफ से 'निमंत्रण पत्र ' लेकर आयीं और कहा कि कुछ पंक्तियों में अपना परिचय लिख कर दे दें . परिचय में तारीफ़ ही होती है. अब खुद से कैसे लिखूं? बड़ी मुसीबत थी. उन्होंने हंस कर कहा ,"आस्क योर हसबैंड टु  राइट " अब ये तो और बड़ा रिस्क. कही वे अपने मन की भड़ास निकाल दें तो?  उनसे भी कह दिया. वे हंसती हुई चली गयीं. खैर पतिदेव  तो अपनी व्यस्तता में इस सुनहरे अवसर से वंचित रह गए.

बेटे को कहा तो उसने उन पंक्तियों में अपना सारा अंग्रेजी ज्ञान उंडेल दिया. जैसे सुननेवाले ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स  हों. उसे भाषण दे ही रही थी कि 'भारी भरकम शब्दों के प्रयोग को अच्छा लेखन नहीं कहते'..आदि आदि. बोल भी रही थी और अंदर से डर भी लग रहा था कि अभी कह देगा, "मैं नहीं लिखता " (पर एक बार भाषण मोड में चले जाओ..तो निकलना कितना मुश्किल है?..सब वाकिफ  होंगे :)).

तभी मेरे छोटे भाई का फोन आ गया. और मैने उस पर ये भार डाल  दिया कि तुम लिखकर भेज दो. उसने भी आनकानी की पर बड़ी बहन का आदेश मानना पड़ा और सहज शब्दों में उसने तीन sms में लिख कर भेज दिया. जिसे तुरंत  कॉपी कर, बेटा उन टीचर को दे आया.

अब  दूसरी परेशानी थी पोशाक कौन सी पहनी जाए? ये हम महिलाओं  के साथ बड़ी मुसीबत है.(सारी महिलाएं,मेरा दर्द समझती होंगी)  शाम पांच बजे का फंक्शन था और एक स्कूल में था, इसलिए साड़ी ही चुनी. जो बहुत सादी भी ना हो और तड़क-भड़क वाली  भी ना हो. घर की हल्की रोशनी में तो ठीक ही लग रहा था पर जब बाहर निकली तो चार बजे की धूप में बेतरह कॉन्शस हो उठी. इतनी धूप में कभी इतना तैयार होकर निकली ही नहीं. स्कूल में जाकर उन टीचर को ढूँढने के बाद पहला सवाल यही किया..." मैं कहीं overdressed तो नहीं लग रही?" उन्होंने आश्वस्त किया..."नो.. नो यू आर लुकिंग वेरी प्रिटी"( दरअसल ऐसे सवाल का हमेशा, यही जबाब होता है :) ) फिर जब बाकी टीचर्स को देखा तो पाया वे सब तो ऐसे सजी धजी थीं मानो किसी फैशन शो में आई हों "
हमें एक कॉन्फ्रेंस रूम में बिठाया गया.  बाकी दो जज भी आ गई थीं. एक किसी  कॉलेज की प्रिंसिपल थीं और दूसरी जे.जे आर्ट कॉलेज की एक लेक्चरर. मैं ही बस एक एमेच्योर पेंटर थी उनके बीच. दो PTA मेम्बर्स को हमारी देखभाल  के लिए सुपुर्द कर दिया गया. जो हमारी तरह ही किसी स्टुडेंट  की माँ  थीं.  वे हर तरह से हमारा पूरा ख़याल  रख रही थीं. बीच-बीच में टीचर्स आकर हमें नियम समझा जातीं कि इतने कॉलम्स बने हुए  हैं..' आत्मविश्वास, परिधान, जेवर , स्टेज प्रेसेंस वगैरह. उन कॉलम्स में ही नंबर देने होंगे. मैं सोच रही थी ,अपने बच्चों के स्कूल में तो कुछ पूछने को हमें टीचर के पीछे - पीछे  घूमना पड़ता है. आज पासा पलटा हुआ सा लग रहा है. PTA मेम्बर्स ने  चाय-बिस्किट भी मंगवाई...शाम का वक्त था, कंपनी भी अच्छी थी...मूड भी था फिर भी मैने चाय नहीं पी. क्यूँ नहीं पी??....एनी गेस?? चलिए ,अब ब्लॉग पर तो मन की बातें लिखनी होती हैं,इसलिए बता ही देती हूँ.."लिपस्टिक खराब ना हो जाए इस डर से :)..सोचा, अभी तो फंक्शन शुरू भी नहीं हुआ. सारी मेहनत बेकार हो जाएगी :)" बाकी दोनों में से भी एक ने कहा ,'एसिडिटी' है और दूसरी ने कहा.."पी कर आई हूँ " सच तो वहीँ जाने,शायद वजह वही हो जो मेरी थी. बस हम मिस इण्डिया स्टाईल में बिस्किट  कुतरते रहें.

फिर हमारी ग्रैंड एंट्री हुई, प्रिंसिपल,डायरेक्टर और मुख्य अतिथि के साथ.(मुख्य अतिथि एक  मंत्री थे ) . रेड कारपेट पर आगे  दोनों  किनारों पर बच्चे लेजियम बजाते हुए चल रहें थे (महाराष्ट्र में किसी का स्वागत
(दो साल तक मेरे बेटे ने भी दूसरों के स्वागत में लेजियम किया है )
लेजियम से ही किया जाता है ) . ओपन एयर में प्रोग्राम थे. दोनों तरफ फील्ड में लोग खचाखच भरे हुए थे .
मैने यूँ ही नज़र घुमाई और देखा, मेरी पास वाली  बिल्डिंग में रहने वाली  मारिया का मुहँ आश्चर्य से खुला हुआ है. वो समझ ही नहीं पा रही थी, "मैं कैसे वहाँ पहुँच गयी?"

दीप जलाने, मुख्य अतिथि के दो शब्द के बाद प्रोग्राम शुरू हुआ और अगली मुसीबत....जज में सबसे पहले मुझे ही बुलाया गया. परिचय पढ़ कर छोटा सा बुके दिया गया. अब मैं समझ नहीं पा रही थी दर्शकों का अभिवादन कैसे करूँ.? दीपिका पादुकोने  की तरह हाथ हिलाकर या झुक कर नमस्ते कर के. फिर नमस्ते ही की . और हमें अपनी कुर्सी तक ले जाया गया. इतनी निराशा हुई. स्टेज के सामने तीन कुर्सी-मेज अलग अलग रखे हुए थे. और हम सोच रहें थे कि टी.वी. प्रोग्राम की तरह तीनो जज एकसाथ बैठेंगे और हंसी-मजाक करते हुए अच्छा समय कट जायेगा. उसपर टीचर्स ने आकर सूचना दी कि खुला निमंत्रण होने से इतने प्रतियोगी आ गए हैं कि तीन राउंड करने पड़ेंगे.

सारे बच्चे देश के अलग-अलग राज्यों के परिधान में इतने सुन्दर लग रहें थे कि किसे ज्यादा नंबर दें,किसे कम. बहुत ही कठिन काम था ये. देख कर गर्व हो रहा था,अपने देश पर, इतनी विविधता है, हमारे  यहाँ. कोई कश्मीरी ड्रेस में था तो कोई राजस्थानी. पंजाबी, मराठी, बंगाली, हर राज्य के पारंपरिक परिधानो में सजे हुए थे बच्चे. आजकल किराए पर पोशाक और जेवरात दोनों मिलते हैं और इतने परफेक्ट होते हैं वे, कि एक नम्बर भी काटना मुश्किल. मैने आत्मविश्वास और स्टेज प्रेजेंस पर ही ध्यान  दिया.करीब  डेढ़  घंटे तक तो हमने सर नहीं उठाया. पर हमसे ज्यादा मुसीबत उन टीचर्स की थी..वो एक शीट पूरी होते ही ले जातीं और तीनो जजों द्वारा दिए नंबर, जोड़ने में लग जातीं. पहला राउंड ख़त्म हुआ तो कुछ नृत्य-संगीत का कार्यक्रम शुरू हुआ. मुझे हमेशा से ही ऐसे प्रोग्राम पसंद हैं. पर उस दिन तो वे मजा से ज्यादा सजा लग रहें थे. मुझे लगा था आठ बजे तक प्रोग्राम ख़त्म हो जाएगा . घर पर खाने का भी कुछ इंतज़ाम नहीं किया था और पता था 'थ्री मेन इन माइ हाउस...खुद से कोई उपक्रम नहीं करेंगे" इतने शोर में फोन करना भी  मुश्किल था,.शुक्र है बेटे को कुछ ही दिन पहले मोबाइल दिलवाई थी. उसे मेसेज किया कि बाहर से खाना ऑर्डर कर लो और जबाब आया, "डोंट वरी...वी विल मैनेज..यू एन्जॉय" .थोड़ी देर स्क्रीन घूरती रही, "वी विल मैनेज' यानि कि अब बच्चे बड़े हो  गए हैं...और अब मुझे 'यू एन्जॉय' भी कह सकते हैं.

दूसरा राउंड ख़त्म होने के बाद कुछ और गीत संगीत हुए. मैं बुरी तरह बोर हो रही थी. मेरी सहेली की कजिन उसी स्कूल में टीचर थीं. मैं उनसे मिल चुकी थी. सोचा उन्हें बुला कर थोड़ा गप्पे मारती हूँ. उन्हें sms किया .वे तुरंत  मिलने आ गयीं. मैं उन्हें देखते ही ख़ुशी से खड़ी हो गयी. तो उन्होंने धीरे से फुसफुसा कर, बिलकुल टीचर वाले  अंदाज़ में कहा.."प्लीज़ सिट ..यू आर अवर  गेस्ट हियर" और जब बैठने लगी तो पता नहीं कैसे कुर्सी उलट गयी और मैं गिर गयी. जल्दी से कुरसी सीधा कर वापस बैठ गयी. सोचा सबकी नज़रें तो स्टेज पर जमी हैं, किसी ने नहीं देखा होगा. वे भी दो मिनट में चली गयीं. कहने लगीं, "रुकुंगी, तो  सब समझेंगे , मैं किसी की सिफारिश करने आई हूँ."

 कुछ और गीत-संगीत और फिर फाइनल राउंड. पीठ  अकड़ गयी थी, बिलकुल. सोचा चलो अब निजात मिली. लेकिन नहीं, उनलोगों ने कहा, प्राइज़ भी जज के हाथों ही दिलवाएंगे. प्रोग्राम ख़त्म होते और प्राइज़ देते ,रात के ग्यारह बज गए.

दूसरे दिन से ही आस-पास के कई लोग   मिलने पर कहते  , "आपको उस प्रोग्राम में देखा था " मैं कहती, "हाँ एंट्री के समय देखा होगा " तो वे कहते ," नहीं बड़ी सी स्क्रीन लगी थी ,ना तो बार-बार जज लोगों पर भी फोकस कर रहें थे." अब ये बात तो मुझे पता ही नहीं थी. मैं सोचती रह जाती, " मैं बोरियत में ,पता नहीं ,कैसे कैसे मुहँ बना रही थी...सब देखा होगा लोगों ने...और अगर बदकिस्मती से उस समय कैमरा मेरी तरफ होगा तो फिर शायद कुर्सी से गिरते भी जरूर देख लिया होगा,  " आज भी सोच रही हूँ.:(

Monday, October 25, 2010

दरीचे से झांकती ,यादें ....कुछ मीठी ,कुछ कसैली

आजकल बिहार में चुनाव हो रहें हैं...और मुझे चुनाव के दौरान गुजरे कुछ दिन फिर से याद आ रहें हैं. अपने पहले  ब्लॉग के शुरूआती दिनों में एक पोस्ट लिखी थी...जिस तक बहुत कम लोग पहुंचे थे और जिन लोगों ने पढ़ा था उनमे  से अधिकाँश अब  मेरे ब्लॉग का रुख नहीं करते. {सो पोस्ट की रीठेल (ज्ञानदत्त पाण्डेय जी से उधार लिया शब्द ) सेफ है :) }

जब भी चुनाव का जिक्र आता है, एक पुरानी घटना, स्मृति के सात परदों को चीरती हुई बरबस ही आँखों के सामने आ जाती है.
मेरे पिताजी एक सरकारी पद पर कार्यरत थे. वे एक ईमानदार अफसर थे लिहाज़ा उनका ट्रांसफ़र कभी भी और कहीं भी हो जाता था. कभी कभी तो चार्ज संभाले ६ महीने भी नहीं होते और कोई न कोई शख्स अपना काम रुकता देख, उनका ट्रांसफ़र कहीं और करवा देता और पापा चल पड़ते अपने गंतव्य की ओर. ज़ाहिर है, मुझे और मेरे छोटे भाइयों को अपनी पढाई पूरी करने के लिए हॉस्टल की शरण लेनी पड़ी.

पापा की पोस्टिंग एक छोटी सी जगह पर हुई थी और मैं हॉस्टल से छुट्टियों में घर आई हुई थी. सात ,आठ  कमरों का बड़ा सा घर,आँगन इतना बड़ा कि आराम से क्रिकेट खेली जा सके.सामने फूलों की क्यारी ,मकान के अगल बगल हरी सब्जियां लगी थी...पीछे कुछ पेड़ और उसके बाद मीलों फैले धान के खेत. एक कमरे को मैंने अपनी पेंटिंग के लिए चुन लिया, कितना सुकून मिलता था उन दिनों.जब जी चाहे , ब्रश उठाओ,थोडा पेंट करो... और जब मन करे ,ब्रश, पेंट,तेल सब यूँ ही छोड़ चल दो ..फिर चाहे एक घंटे में वापस आओ या चार घंटे में चीज़ें उसी अवस्था में पड़ी मिलतीं. .आज मेरे दोस्त,रिश्तेदार यहाँ तक कि बच्चे भी शिकायत करते हैं--'पेंटिंग क्यूँ नहीं करती??'अपने इस  फ्लैट में पहले तो थोडी, खाली जगह बनाओ फिर सारी ताम झाम जुटाओ और जैसे ही ब्रश हाथ में लिया कि दरवाजे या फ़ोन की घंटी बज उठेगी.वहां से निजात पायी तो घर का कोई काम राह तक रहा होगा...फिर सारी चीज़ें समेटो. उसपर से घर के लोग हवा में बसी केरोसिन की गंध की शिकायत करेंगे.,सो अलग.(केरोसिन तेल,ब्रश से पेंट साफ़ करने के लिए उपयोग में लाया जाता है) लिहाजा अब साल में एक पेंटिंग का रिकॉर्ड भी नहीं रहा. ऐसे में बड़ी शिद्दत से याद आता है,बिना ए.सी.,बिना पंखे(क्यूंकि बिजली हमेशा गुल रहती थी) वाला वो बेतरतीब कमरा.

घर से पापा का ऑफिस दस कदम की दूरी पर था लेकिन दोपहर का खाना खाने वे ४ बजे से पहले, घर नहीं आया करते.और जब आते तो साथ में आता लोगों का हुजूम. उनलोगों को 'लिविंग रूम' में चाय पेश की जाती और अन्दर की तरफ बरामदे में लगे टेबल पर पापा जल्दी जल्दी खाना ख़त्म कर रहें होते. बरामदा,आँगन जैसे शब्द तो लगता है, अब किस्से,कहानियों में ही रह जायेंगे. और शहरों ,महानगरों में पनपने वाली पौध के लिए तो ये शब्द हमेशा के लिए अजनबी बन जायेंगे क्यूंकि 'हैरी पॉटर' और 'फेमस फाईव' में उलझे बच्चों का हिंदी पठन पाठन बस पाठ्य पुस्तकों तक ही सीमित है. उसकी सुध भी उन्हें बस परीक्षा के दिनों में ही आती है.

उन दिनों चुनाव की सरगर्मी चल रही थी और चुनाव का दिन भी आ ही गया. हमलोग पापा का खाने पर इंतज़ार कर रहें थे.पता था, आज तो कुछ और देर होनी है. ५ बजे के करीब पापा खाना खाने आये.और जाते वक़्त बस इतना ही कहा--"तुमलोग बाहर कहीं मत जाना ,मैंने आज एक क्रिमिनल को अरेस्ट  किया है " पापा पुलिस में नहीं थे पर चुनाव के दिनों में कई सारे अधिकार गैर पुलिस अधिकारीयों को भी प्रदान किये जाते हैं.हमलोग
सोचते ही रह गए,ऐसा क्यूँ कहा? हमलोग तो कहीं जाते ही नहीं थे. वहां तो हमारी दुनिया बस कैम्पस तक ही सीमित थी.कभी बाज़ार का भी मुहँ नहीं देखा. शॉपिंग  करने जाना हो तो जीप पर सवार हो, पास के बड़े शहर जाया करते थे. हमें लगा,शायद अतिरिक्त सावधानी के इरादे से कहा हो.

रात में भी पापा काफी देर से आये और आते ही सुबह ही पास के शहर जाने की तैयारी करने लगे क्यूंकि मतगणना होने वाली थी. उन दिनों 'इलेक्ट्रानिक मशीनों' के द्वारा नहीं बल्कि मतगणना 'मैनुअल' हुआ करती थी. एक एक मत हाथों से गिना जाता था. जबतक मतगणना पूरी न हो जाए कोई भी बाहर नहीं जा सकता था.करीब २४ घंटों तक मतगणना जारी रहती थी और अधिकारियों को अन्दर ही रहना पड़ता था.

हमें पता था ,पापा रात में,घर वापस नहीं आने वाले हैं. हमेशा की तरह बिजली भी गुल थी. मैं करीब १० बजे अपने कमरे में सोने चली गयी. अभी बिस्तर तक पहुंची भी नहीं थी कि घर के बाहर कुछ लोगों की "होsss..होsss" करके जोर से चिल्लाने की आवाज आई. मैं मम्मी के कमरे की तरफ दौडी. मम्मी पत्ते की तरह काँप रही थीं. उनको कंधे से थामा पर हम बिना आपस में एक शब्द बोले ही समझ गए, ये जरूर उसी बदमाश के आदमी हैं और अब बदला लेने आये हैं. दिमाग तेजी से दौड़ने लगा,बचने के क्या रास्ते हैं? पर तुंरत ही हताश हो गया. कोई भी रास्ता नहीं. सरकारी आवासों के दरवाजे तो ऐसे होते हैं कि एक बच्चा भी जोर से धक्का दे तो खुल जाए. और मजबूत कद काठी वाले ने अगर धक्का दिया तो किवाड़ ही खुलकर अलग गिर पड़ेंगे. पीछे की तरफ एक दरवाजा था तो,पर भागा कहाँ जा सकता था.चारों तरफ खुले खेत.पीछे की तरफ प्यून और सर्वेंट क्वाटर्स थे...पर कुछ दूरी पर थे.सामने वाला आवास एक डाक्टर अंकल का था,पर वे लोग किसी शादी में गए हुए थे.और अगर होते भी तो क्या मदद कर पाते? कहीं कोई उपाए नज़र नहीं आ रहा था. घर में कोई हथियार तो होते नहीं और एक सब्जी काटने वाले चाकू से ४,५, लोगों का मुकाबला करना ,नामुमकिन था. तभी मुझे पापा की शेविंग किट याद आई और किशोर मन ने आखिरी राह सोच ली. मैंने सोच लिया,अगर उनलोगों ने दरवाजे पर हाथ भी रखा तो बस मैं शेविंग किट से 'इरैस्मिक ब्लेड' निकाल अपनी कलाई की नसें काट लूंगी. किशोर मन पर,देखे गए फ़िल्मी दृश्यों का प्रभाव था या इसे छोड़ सचमुच कोई राह नहीं थी,आज भी नहीं सोच पाती. मम्मी शायद देवी,देवताओं की मनौतियाँ मनाने में लगीं थीं.

हमने खिड़की से देखा कुछ देर की खुसफुसाहट के बाद, वे लोग बगल की तरफ एक दूसरे अफसर के घर की तरफ बढे. वे अंकल, अकेले रहते थे और पापा के साथ ही मतगणना के लिए गए हुए थे. बस घर में उनके प्यून 'राय जी' थे. इलोगों ने उन्हें जगाया और थोडी देर बाद, राय जी हाथों में लालटेन लिए हमारे घर की तरफ आते दिखे. उन्होंने दरवाजा खटखटाया. मम्मी ने किसी तरह हिम्मत जुटा,कड़क आवाज़ में पूछा--"कौन है?...क्या काम है?" तब राय जी ने बताया ये लोग सादे लिबास में पुलिस वाले हैं और इनलोगों को हमारी हिफाज़त के लिए पुलिस अधिकारी ने भेजा है. ये लोग जोर से चिल्लाकर अपनी उपस्थिति जता रहें थे ताकि लोग समझ जाएँ कि हमलोग अकेले नहीं हैं.

यह जान, हलक में अटकी हमारी साँसे वापस लौटीं. रायजी ने कुछ दरी निकाल देने और एक लालटेन देने को कहा और वे लोग बाहर के बरामदे में सो गए. मैं तो यह सब सुन आराम से सो गयी लेकिन मेरी मम्मी की रात आँखों में कटी. उन्हें डर लग रहा था, क्या पता ये लोग झूठ बोल रहें हों और उसी बदमाश के आदमी हों. पर मम्मी की शंका निर्मूल निकली. वे सच में पुलिस वाले ही थे.

Wednesday, October 20, 2010

आँखों ,जुबां और कानों पर पड़े तालों को खोलने की....एक गुजारिश.

मेरी एक  पोस्ट "प्लीज़ रिंग द बेल" पर काफी अच्छा विमर्श हुआ और करीब करीब हर पहलू से समस्या को देखने की कोशिश की सभी ने. जिनलोगों ने विमर्श में भाग नहीं भी लिया उनलोगों ने भी दुसरो को यह पोस्ट पढने को रेकमेंड किया. लिखना सार्थक हुआ. पर अभी हाल में ही पड़ोस में एक ऐसी घटना घटी  कि फिर से सम्बंधित विषय पर लिखना लाज़मी लगा. हालांकि  पोस्ट करने में एक हिचकिचाहट थी कि कहीं विषय का दुहराव ना लगे पर कुछ ब्लोगर्स फ्रेंड्स ने जोर डाला कि ऐसे प्रसंग सामने आने ही चाहियें.

इसी 15 अक्टूबर की रात थी, अष्टमी का दिन. मेरा नवरात्र का फलाहार चल रहा था और उसपर अपनी उम्र के बढ़ते अंक भूल ३ घंटे तक गरबा करके आई थी. थक कर चूर , पति और बेटे को हिदायत दे कि बिना  वजह मेरे कमरे की बत्ती मत जलाना. मैं कमरा बंद कर गहरी नींद में सो गयी.

बेटे की देर रात तक पढने और पति के टी.वी. देखने की आदत से मुझे हमेशा शिकायत रही है.पर उस रात यही आदत किसी का सहारा बन गयी. अंकुर अपनी पढाई में डूबा था कि हमारे पीछे तरफ की बिल्डिंग के एक फ़्लैट से शोर शराबे की आवाजें आने लगीं. वही, कोई पुरुष अपनी पत्नी पर अपने पुरुषार्थ का जौहर दिखा रहा था. और आवाजें कुछ ऐसी भयावनी थीं की लग रहा था उस व्यक्ति के सर पर खून सवार है. अंकुर ने जल्दी से पुलिस का न. 100 और टी.वी. के विज्ञापन में बच्चों और स्त्रियों के रक्षार्थ जारी किए गए  न.103 को ट्राई किया. पर  पूरे भारत की पुलिस  के नंबर का एक ही हाल है. समय पर कभी नहीं लगता. चीखने,रोने, गिरने की आवाजें बढती जा रही थीं. उसने अपने पिता  को आकर बताया . उन्होंने भी टी.वी. बंद कर खिड़की से देखा और फिर पुलिस का नंबर मिलाते, दोनों नीचे उतर गए.

वाचमैन से पिछला गेट खुलवा कर जब तक ये लोग उसकी बिल्डिंग के नीचे पहुंचे , वह महिला  अपनी खिड़की के ग्रिल पकड़कर चिल्ला रही थी.."वाचमैन..वाचमैन  बचाओ....ये आदमी मुझे मार देगा...मेरे दो छोटे बच्चे हैं " अंकुर ने उसकी खिड़की के नीचे जाकर चिल्लाकर कहा, "आंटी, डोंट वरी..एम कॉलिंग द पुलिस" तबतक कई जगह फोन कर उस इलाके के पुलिस इन्स्पेक्टर का नंबर नवनीत को मिल चुका था. उन्होंने वहीँ से पुलिस को उस बिल्डिंग का एड्रेस दिया . रात के सन्नाटे में उस आदमी ने भी यह सब सुन लिया. उसने नीचे आकर गुस्से में वही सदियों पुराना जुमला दुहराया ," आपलोगों ने पुलिस को क्यूँ खबर की ....यह मेरे घर का मामला है...वो मेरी वाइफ है....वैसे ही नाटक करती है...मैने कुछ नहीं किया उसे"  इस पर अंकुर ने कहा.."हमलोग तब से सुन रहें हैं...आप हमारे सामने किसी की जान ले लोगे...और हम देखते रहेंगे " वह आदमी पलट कर कुछ कहता, इसके पहले ही नवनीत ने भी काफी भला-बुरा कहा उसे. इतने में मेरी बिल्डिंग से एक और सज्जन वहाँ आकर खड़े हो गए. अपने सामने तीन लोगों को खड़ा देख और पुलिस के आने की आशंका से वह आदमी वहाँ से दौड़ता हुआ दूसरी तरफ भाग गया. नवनीत और मिस्टर राव खड़े हो पुलिस का इंतज़ार करते रहें .( अक्सर, ऐसे मौकों पर पुलिस केस दर्ज नहीं करती, चेतावनी देकर चली जाती है.)

पर अंकुर इन सबसे इतना विचलित हो गया था कि सीधा मेरे कमरे में आकर बत्ती जलाई, उसने और फूट फूट कर  रो पड़ा. फिर सारी कहानी बतायी . उस महिला के रोने और बार-बार टकरा कर गिरने की बात बताते हुए उसके रोंगटे खड़े हो गए थे. करीब बीस मिनट लग गए, मुझे उसे समझा कर चुप कराने में. मैं यह सोच  रही थी, मेरा उन्नीस वर्षीय बेटा जिसने कभी उस महिला को देखा नहीं, जाना नहीं....सिर्फ आवाजें  सुनकर इस कदर विचलित हो सकता है तो उन दो मासूम बच्चों पर क्या  गुजरती होगी.अपनी आत्मा पर कैसा बोझ  और दिमाग पर कैसा असर लेकर बड़े होंगे वे....जो अपनी आँखों के सामने अपनी माँ को इस पशुता का शिकार होते देखते हैं.

यह पोस्ट मैने अपने बेटे की तारीफ़ के लिए नहीं लिखी. उसे तो कोई फर्क पड़ता नहीं. (क्यूंकि उसके पास समय ही नहीं है मेरी पोस्ट्स पढने का.."प्लीज़ रिंग द बेल' भी नहीं पढ़ी उसने ) और ना ही यह सब लिखने से मेरा कोई भाव बढ़ जायेगा या कम हो जायेगा. सिर्फ इसलिए इस घटना का विवरण लिखा कि जरा सी कोशिश से फर्क पड़ता है.  बहुत दुख भी होता है कि लोग चाहे इस महानगर में रहने वाले हों या सुदूर किसी गाँव में. सबकी मानसिकता एक जैसी है.

जब यह घटना मैने अपनी सहेली को बतायी तो उसने कहा ,"उस बिल्डिंग से एक महिला मेरी योगा क्लास में आती है...मैं उस से पूछूंगी " और दुख होगा सुनकर उक्त महिला का कहना था ,"हाँ ,उस फ़्लैट में तो अक्सर यह सब होता है...हमलोग कैसे इंटरफेयर  करें...वे अगर कह दें,हमारे घर की बात है" उस से भी बढ़कर एक दूसरी महिला ने अपनी बिल्डिंग की बात बतायी कि एक फ़्लैट में अक्सर रात में ऐसी ही आवाजें आती थीं. कभी-कभी तो  ऐसा लगता था वह अपनी पत्नी को बिना ग्रिल की खिड़की से नीचे फेंक देगा" (और आस-पास के सारे लोग कानों में शायद हेड फोन लगाए प्यार भरे नगमे सुनते रहें होंगे.) सहेली ने उन्हें भरसक समझाने का प्रयत्न किया. पर जबतक अपनी अंतरात्मा नहीं जागेगी, वह आवाज़ नहीं देगी...सब ऐसे ही  खामोश बैठे रहेंगे. अंकुर ने बताया था कि उक्त फ़्लैट की निचली  मंजिल पर एक महिला ने अपने कमरे की लाईट नहीं जलाई थी (कहीं कोई पहचान ना ले,) और जब वह  उस पिडीत महिला को आश्वस्त कर रहा था तो कह रही थी, "डोंट वेस्ट टाइम, बेटा...प्लीज़ कॉल द पुलिस" अंकुर गुस्से में भरकर कह रहा था,..मन हुआ कहूँ.."आप एक फोन भी नहीं कर सकतीं."  कम से कम आस-पास के पच्चीस-तीस फ्लैट्स तक आवाज़ जा रही होगी लेकिन सब खामोश बैठे थे.कुछ  लोगों ने तो सुना हगा..पर सबकी  संवेदना ही मर गयी हो जैसे.

जब से संयुक्त परिवार टूटने शुरू हो गए हैं. और यह फ़्लैट कल्चर बढ़ रहा है. मुझे लगता है, घरेलू हिंसा में इज़ाफ़ा ही हो रहा है. क्यूंकि अक्सर पुरुष देर रात घर आते हैं और सुबह चले जाते हैं. उनका आस-पास से कोई परिचय नहीं होता, इसलिए कोई झिझक, शर्म, डर भी नहीं होता. और अब फ़्लैट सिस्टम छोटे शहरों में भी बढ़ता जा रहा है. वहाँ अभी भी सामाजिकता है पर जिस तरह से महानगरों के लाईफ स्टाईल  की नक़ल हो रही है. कितनी देर लगेगी इन विकृतियों  के भी पैर पसारने में??.

Wednesday, October 13, 2010

गरबा - डांडिया की कुछ खुशनुमा यादें

(संयोग कुछ ऐसा है कि एक साल  पहले यह पोस्ट मैने ज़ायका बदलने के लिए डाली  थी...और आज भी,.. कुछ गंभीर आलेखों के बाद हल्का-फुल्का पोस्ट करने का मन था. नवरात्रि भी चल रही है सो मौका भी सही है और दस्तूर  भी... यह मेरे पिछले ब्लॉग की तीसरी पोस्ट थी,जिसे बहुत ही कम लोगों ने पढ़ा होगा...आज यहाँ पोस्ट कर रही हूँ.)

पिछले पोस्ट की चर्चाएं कुछ संजीदा और बोझिल सी हो चली थी.और हवा में से नवरात्र की खुशबू भी बसी हुई  है.लिहाज़ा सोचा नवरात्र की कुछ रोचक यादों का जिक्र बेहतर रहेगा.

वह मुंबई में मेरा पहला नवरात्र था. चारों तरफ गरबा और डांडिया की धूम थी.मैंने भी इसका लुत्फ़ उठाने की सोची और 'खार जिमखाना' द्वारा आयोजित समारोह में पति और बच्चों के साथ पहुँच गयी.चारो तरफ चटख रंगों की बहार थी.शोख रंगों वाले पारंपरिक परिधानों में सजे लोग बहुत ही ख़ूबसूरत दिख रहें थे.दिन में जो लडकियां जींस में घूमती थीं,यहाँ घेरदार लहंगे में ,दोनों हाथों में ऊपर तक मोटे मोटे कड़े पहने और सर से पाँव तक चांदी के जेवरों से लदी, गुजरात की किसी गाँव की गोरीयाँ लग रही थीं. चमकदार पोशाक और सितारों जड़ा साफा लगाए लड़के भी गुजरात के गबरू जवान लग रहें थे..स्टेज के पास कुछ जगह घेरकर प्रतियोगिता में भाग लेने वालों के लिए जगह सुरक्षित कर दी गयी थी.इसमें अलग अलग गोल घेरा बनाकर लड़के लड़कियां बिजली की सी तेजी से गरबा करने में मशगूल थे.इतनी तेजी से नृत्य करते हुए भी उनके लय और ताल में गज़ब का सामंजस्य था. पता चला ये लोग नवरात्रि के ३ महीने पहले से ही ३-४ घंटे तक रोज अभ्यास करते हैं. और क्यूँ न करें,ईनाम भी तो इतने आकर्षक होते हैं.प्रथम पुरस्कार यू.के.की १० दिनों की ट्रिप. द्वीतीय पुरस्कार सिंगापूर के १० दिनों की ट्रिप,बाकी पुरस्कारों में सोना, टी.वी.,वाशिंग मशीन, मोबाइल फोन्स की भरमार रहती है.

मेरा कोई ग्रुप तो था नहीं और बच्चे भी छोटे थे लिहाज़ा मैं घूम घूम कर बस जायजा ले रही थी.सुरक्षित घेरे के बाहर अपने छोटे छोटे गोल बनाकर लोग परिवार के साथ, दोस्तों के साथ कभी गरबा तो कभी डांडिया में मशगूल थे.यहीं पर मुझे डांडिया और गरबा में अंतर पता चला. गरबा सिर्फ हाथ और पैर की लय और ताल पर करते हैं और डांडिया छोटे छोटे डांडिया स्टिक को आपस में टकराते हुए की जाती है.स्टेज पर से मधुर स्वर में गायक,गायिकाएं  एक के बाद एक मधुर गीतों की झडी लगा देते हैं.यह भी उनकी एक परीक्षा ही होती है.जैसे ही उन्हें लगता है लोग थकने लगे हैं,वे कोई धीमा गीत शुरू कर देते हैं.सैकडों लोगों का एक साथ धीमे धीमे इन गीतों पर लहराना बताने वाली नहीं बस देखने वाली चीज़  है.

एक जगह मैंने देखा,एक अधेड़ पुरुष अपनी दो किशोर बेटियों और पत्नी के साथ एक छोटा सा अपना घेरा बना डांडिया खेल रहें थे. बहुत ही अच्छा लगा ये देखकर .हम उत्तरभारतीय तो अदब और लिहाज़ का लबादा ओढे ज़िन्दगी के कई ख़ूबसूरत क्षण यूँ ही गँवा देते हैं..हम इसी में बड़प्पन महसूस करते हैं कि हम तो पिताजी के सामने बैठते तक नहीं,उनसे आँख मिलाकर बात तक नहीं करते.सम्मान जरूरी है पर कभी कभी साथ मिलकर खुशियों को एन्जॉय भी करना चाहिए.खैर अगली पीढी से ये तस्वीर कुछ बदलती हुई नज़र आ रही है.

मैं सबका नृत्य देखने में खो सी गयी थी कि अचानक संगीत बंद हो गया.स्टेज से घोषणा हुई 'महिमा चौधरी' तशरीफ़ लाईं हैं. उन दिनों वे बड़ी स्टार थीं. उन्होंने सबको नवरात्रि की शुभकामनाएं दीं और कहा कि 'मैं दिल्ली से हूँ इसलिए मुझे डांडिया नहीं आती,आपलोगों में से कोई दो लोग स्टेज पर आएं और मुझे डांडिया सिखाएं'...मैं यह देखकर हैरान रह गयी पूरे १० मिनट तक कोई अपनी जगह से हिला तक नहीं बल्कि म्यूजिक बंद होने पर सब अपनी नापसंदगी ज़ाहिर कर भुनभुना रहें थे.बाद में शायद आयोजकों को ही शर्म आयी और वे लोग दो छोटी लड़कियों को पकड़कर स्टेज पर ले गए. मैं सोचने लगी,अगर यही बिहार या यू.पी.का कोई शहर होता तो इतने लोग दौड़ पड़ते, 'महिमा चौधरी' को डांडिया सीखाने कि स्टेज ही टूट गयी होती.

धीरे धीरे मुंबई में मेरी पहचान बढ़ी और हमारा भी एक ग्रुप बन गया जिसमे २ बंगाली परिवार और एक-एक राजस्थान ,पंजाब ,महाराष्ट्र ,यू.पी.और बिहार के हैं.आज भी हम हमेशा होली और नव वर्ष वगैरह साथ में मनाते हैं. हमलोगों ने मिलकर फाल्गुनी पाठक के शो में जाने की सोची,फाल्गुनी पाठक डांडिया क्वीन कही जाती हैं.यहाँ भी वही माहौल था,संगीत की लय पर थिरकते सजे धजे लोग. मैंने कॉलेज में एक बार डांडिया नृत्य में भाग लिया था,लिहाजा मुझे कुछ स्टेप्स आते थे और मुंबई के होने के कारण महाराष्ट्रियन कपल्स भी थोडा बहुत जानते थे. बाकी लोगों को भी हमने सादे से कुछ स्टेप्स सिखाये और अपना एक गोल घेरा बनाकर डांडिया खेलना शुरू किया. इसमें पुरुष और महिलायें विपरीत दिशा में घुमते हुए डांडिया टकराते हुए आगे बढ़ते रहते हैं. (अब तो टी.वी. सीरियल्स में देख-देख कर पूरा भारत ही अवगत है इस से ) थोडी देर में दो लड़कियों ने मुझसे आकर पूछा,"क्या वे हमारे ग्रुप में शामिल हो सकती हैं?".मेरे 'हाँ' कहने पर वे लोग भी शामिल हो गयीं.जब घूमते हुए वे मि० सिंह के सामने पहुंची तो उन्होंने घबराकर अपना डांडिया नीचे कर लिया और विस्फारित नेत्रों से चारो तरफ घूरने लगे. अपने सामने एक अजनबी चेहरा देखकर उन्हें लगा वे गलती से किसी और ग्रुप में आ गए हैं. बाद में देर तक इस बात पर उनकी खिंचाई होती रही.


इसके बाद भी कई बार डांडिया समारोह में जाना हुआ.पर दो साल पूर्व की डांडिया तो शायद आजीवन नहीं भूलेगी.मेरे पास की बिल्डिंग में ३ दिनों के लिए डांडिया आयोजित की गयी.संयोग से उस बिल्डिंग में मेरी कोई ख़ास सहेली नहीं है.बस आते जाते ,हेल्लो हाय हो जाती है.अलबत्ता बच्चे जरूर आपस में मिलकर खेलते हैं.उनलोगों ने मुझे भी आमंत्रित किया.दो दिन तो मैं नहीं गयी पर अंतिम दिन उनलोगों ने बहुत आग्रह किया तो जाना पड़ा.फिर भी मैं काफी असहज महसूस कर रही थी,लिहाज़ा एक सिंपल सा सूट पहना और चली गयी.

मैं कुर्सी पर बैठकर इनलोगों के गरबा का आनंद ले रही थी पर कुछ ही देर में इनलोगों ने मुझे भी खींच कर शामिल कर लिया. और थोडी ही देर बाद,बारिश शुरू हो गयी. कुछ लोगों ने अपने कीमती कपड़े बचाने के ध्येय से और कुछ लोग भीगने से डरते थे...लिहाजा कई लोग शेड में चले गए.पर हम जैसे कुछ बारिश पसंद करने वाले लोग बच्चों के साथ,बारिश में भीगते हुए गोल गोल घूमते दुगुने उत्साह से गरबा करते रहें. थोडी देर बाद आंधी भी शुरू हो गयी और जोरों की बारिश होने लगी...बच्चों को जैसे और भी जोश आ गया,उनलोगों ने पैरों की गति और तेज कर दी. आस पास के पेडों से सूखी डालियाँ गिरने लगीं. अब गरबा की जगह डांडिया शुरू हो गया. डांडिया स्टिक कम पड़ गए तो लड़कियों और बच्चों ने सूखी डालियों को ही तोड़कर डांडिया स्टिक बना लिया और नृत्य जारी रखा. इस आंधी पानी में पुलिस भी अपनी गश्त लगाना भूल गयी और समय सीमा पार कर कब घडी के कांटे साढ़े बारह पर पहुँच गए पता ही नहीं चला.किसी ने पुलिस को फ़ोन करने की ज़हमत भी नहीं उठायी. वरना एक दूसरी बिल्डिंग के स्पीकर्स कई बार पुलिस उठा कर ले जा चुकी थी. किसी को सचमुच परेशानी होती थी या लोग सिर्फ मजा लेने के लिए १० बजे की समय सीमा पार हुई नहीं कि पुलिस को फ़ोन कर देते थे.और पुलिस भी मुस्तैदी से रंग में भंग डालने चली आती थी. जबकि मुसीबत  के वक़्त ये सौ बहाने बनाएं और समय से दो घंटे बाद पहुंचे. वैसे टीनेज़ बच्चों के पैरेंट्स ने इस समय-सीमा से राहत की सांस ली है. बच्चे समय से घर आ जाते हैं.

उस रात गरबा का भरपूर लुत्फ़ उठाया हमने.... मन सिर्फ आशंकित था कि इतनी देर भीगने के बाद कहीं कोई बीमार न पड़े. पर कुदरत की मेहरबानी,बुखार तो क्या किसी को जुकाम तक नहीं हुआ

Thursday, October 7, 2010

पैरेंट्स की प्यार भरी सुरक्षा किसी पेड़ जैसी हो या शामियाने जैसी ??

यह विषय काफी समय  पहले से ज़ेहन में हलचल मचा रहा था...पिछली पोस्ट में जब  बच्चों  के साथ प्यार भरे व्यवहार पर चर्चा हुई तो लगा यही उचित समय है, इस विषय को छेड़ने का .पर मैं खुद भी कन्फ्यूज्ड  सी हूँ....कि हल आखिर क्या है?

बच्चों को हर माता-पिता अपनी सीमा से बढ़कर सुख-सुविधाएँ देने का प्रयत्न करते हैं. उनकी राहों से  कांटे चुन लेने की कोशिश करते हैं. अपनी शक्ति भर प्रयास करते हैं कि उनके जीवन से दुख का साया भी दूर रहें. और वे उत्फुल्लता के साथ अपना जीवन व्यतीत करें.

पर हाल में घटी  कुछ घटनाओं ने यह सब सोचने पर मजबूर कर दिया कि यह कहाँ  तक सही है??
मेरे बेटे का कॉलेज खुला और  दो दिन बाद ही इंजीनियरिंग फाइनल ईअर के एक स्टुडेंट ने अपनी बिल्डिंग के टेरेस से कूदकर आत्महत्या कर ली. वह रात भर जागकर एक प्रेजेंटेशन तैयार कर रहा था , सुबह चार बजे तक मोबाइल के जरिये अपने दोस्तों के संपर्क में था. और सुबह छः बजे कॉलेज जाने से पहले...उगते सूरज के साथ ही अपने जीवन को अलविदा कह दिया.

वह लड़का, अकेलेपन का शिकार नहीं था..कई दोस्त थे उसके. सुना, माता-पिता भी इतने सख्त नहीं थे. सिर्फ एक अच्छे प्रेजेंटेशन की चिंता, अपनी इहलीला समाप्त करने की वजह बन गयी??. इतना अहम आ गया है बच्चों में...कि जरा सी असफलता की आहट भी ऐसे भयानक अंजाम तक पहुंचा देती है. कितना असुरक्षित महसूस करने लगे हैं वे कि अगर टॉप पर ना पहुंचे या अपने तय किए स्टैण्डर्ड से नीचे रह गए तो जीना ही व्यर्थ हो उठता है.

एक जगह कुछ ऐसी ही घटना के बारे में पढ़ा था, जो हमारे  अज़ीज़ पूर्व राष्ट्रपति, ए.पी.जे. कलाम जी के साथ हुई थी. उनके प्रदर्शन से उनके प्रोफ़ेसर खुश नहीं थे, और उन्हें चेतावनी दे दी थी कि "अगर दो दिनों के अंदर वे  अच्छा प्रेजेंटेशन तैयार नहीं करते तो वे अपनी स्कॉलरशिप खो बैठेंगे." दो दिन बिना पलक झपकाए , वे प्रेजेंटेशन तैयार करते  रहें. तीसरे दिन सुबह ,प्रोफ़ेसर उनके लैब में आए और उनका शानदार काम देख उन्हें गले से लगा लिया.

आखिर वो क्या चीज़ थी जो कलाम जी से रात-दिन मेहनत करवाती रही और इस बच्चे ने बदले में अपना जीवन ही त्याग  दिया . जबकि अगर इसका एक साल भी खराब हो जाता  तो माता-पिता की  इतनी हैसियत थी कि वे उसे पढ़ा सकें.

पर आज के युवाओं ,बच्चों में संघर्ष करने की क्षमता घटती जा रही है और कहीं इसके कसूरवार हम तो नहीं. हम सबकुछ उनके लिए इतना सुगम बना देते हैं. स्कूल में किसी टीचर ने डांट दिया... (हाथ लगाने की तो अब सोच भी नहीं सकता) पैरेंट्स लड़ने पहुँच जाते हैं. अच्छे नंबर नहीं आए, डोनेशन देकर मनपसंद स्कूल-कॉलेज में एडमिशन दिलवा देते हैं. दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं उनपर न्योछावर कर देते हैं. बच्चे इतने आदी हो जाते हैं, इन सारी सुविधाओं के कि एक बार भी अपने दम पर कुछ साबित करना हुआ और वे बिखर जाते हैं. ये  बच्चे इतनी कम उम्र के होते हैं कि जीवन का मोल नहीं समझ पाते.क्या इसलिए कि सबकुछ आसानी से मिल जाता है ?? पर पैरेंट्स भी क्या करें.....जानबूझकर तो बच्चों को सुख-सुविधा से वंचित नहीं रख सकते.

ये आत्महत्या की प्रवृत्ति तो इतनी बढती जा रही है कि माता-पिता की साँसे ही अटकी होती हैं. इतनी उम्र हो  जाने के बाद भी मैने  आत्महत्या की खबर सिर्फ अखबारों में ही पढ़ी थी. और वहीँ मेरे बेटे आठ  साल की उम्र से अपने आस-पास , परिचित चेहरों के आत्महत्या  की खबरे सुन चुके हैं. एक नवीं क्लास का लड़का..घर से स्कूल को निकला, पता नहीं माँ ने डांटा था पिता ने या क्या...हमारी दायीं तरफ की  बिल्डिंग के टेरेस से  जाकर कूद गया. बाईं तरफ  की बिल्डिंग का लड़का तो मेरे बच्चों के साथ खेलता था.  उसके पिता गल्फ में थे. यह अपनी माँ के साथ यहाँ रहता था. पिता ने वहाँ दूसरी शादी कर ली. पैसे भेजने बंद कर दिए. लड़के ने दसवीं के बोर्ड के इम्तहान दिए थे.मकान मालिक ने आकर धमकी दी, "घर खाली करो" और दूसरे  दिन इस लड़के ने भी टेरेस ही चुनी, उस जिल्लत से मुक्ति पाने के लिए. आस-पास की बिल्डिंग के बच्चे रोज शाम उसे याद करके रोते थे. मेरे बच्चे भी कहते, "वो पिज्जा  डिलीवरी बॉय का काम कर  सकता था..मैकडोनाल्ड ,CCD कहीं भी काम मिल जाता उसे....उसने ऐसा क्यूँ किया?? मैने भी उन्हें अपनी शक्ति भर समझाया कि यह बहुत ही कायरतापूर्ण कदम था.
पर खुद को नहीं समझा पायी. माना कि वह 16 साल का अबोध किशोर था. पर कितने ही किशोरों ने उसी उम्र से जिम्मेवारी संभाली है. पर आजकल युवाओं में संघर्ष करने का माद्दा ही नहीं रह गया है. सबसे आसान तरीका यही लगने लगा है. पहले बच्चे  मीलों दूर साइकिल चला कर जाते थे, रुखी-सूखी खाकर , दो कपड़ों में गुजारा करते थे .पर मानसिक अस्वस्थता से दूर होते थे. आज वे शारीरिक श्रम  में अपनी उर्जा नहीं खर्च  कर पाते और यह संचित उर्जा उनमे उग्रता को जन्म देती है. कोई फैसला शांत-चित्त मन से वे  कर ही नहीं पाते.
और ऐसे में सबसे जरूरी लगने लगता है "खेल-कूद की अनिवार्यता " . खेल  के मैदान में वे हारते भी हैं, साथी  खिलाड़ियों की डांट भी सुनते हैं. कोच कभी कभी हाथ भी चला देते हैं. मैच हारने पर दर्शकों  की हूटिंग से अपमान भी झेलना पड़ता है. यह सब उन्हें आनेवाले  जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार  कर सकता है.  पर कोई भी अनभिज्ञ  नहीं कि खेल-कूद को हमारे देश में कितना महत्त्व दिया जाता है. जिन स्कूलों में खेल की टीम बनायी भी जाती है उसमे अंडर 10, अंडर 12, अंडर 14 के वर्ग होते हैं . दो क्लास के बच्चे एक वर्ग के अंतर्गत आ जाते हैं. हर क्लास में आठ से दस डिविजन.एक डिविज़न में साठ बच्चे . यानि हज़ार -बारह सौ बच्चों के बीच खेलने का मौका मिलता है पच्चीस  बच्चों को, जिनमे ग्यारह ही नियमित रूप से खेल पाते हैं. बाकी बच्चे कहाँ से लें ये अनुभव? अगर गंभीरता से बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए कुछ कदम उठाने हैं तो मेरी समझ  से खेल-कूद को पढ़ाई से भी ज्यादा महत्त्व देना चाहिए.

आजकल रिअलिटी शोज़ में जिस तरह बच्चों को जज अपने कमेन्ट से एक सीमा तक अपमानित करते हैं, उस पर काफी लोगों ने अपना रोष जताया  हैं. मुझे एक बड़े पत्रकार की प्रतिक्रिया याद आती है. जिन्होंने कहा था, "आगे की ज़िन्दगी में पता नही कितनी बार अपमानित होना पड़ेगा, कितनी जिल्लतें उठानी पड़ेंगी, ये सारी नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ उन्हें आने वाली ज़िन्दगी के लिए तैयार कर रही है."  हालांकि ,यह भी कितना सही है...नहीं कहा जा सकता क्यूंकि डांस शो में भाग लेने वाली  एक १४ वर्षीया लड़की, ऐसे कमेंट्स सुन...कोमा में चली गयी  .पर बात फिर वही है कि अब तक उस लड़की ने अपने लिए कहीं कुछ नकारात्मक सुना ही नहीं होगा.

मैने पहले भी इसी "रुचिका-राठौर  केस" विषय पर एक पोस्ट लिखी थी, खामोश और पनीली आँखों की अनसुनी पुकार लेकिन तब इस समस्या को दूसरी दृष्टि से देखा था कि आस-पास वालों को पता भी नहीं चलता , बच्चे इतने डिप्रेशन से गुजर रहें हैं. वे इसे नज़रंदाज़ कर देते हैं या सीरियसली नहीं लेते. उन्हें बच्चों का ख़ास ख्याल रखना चाहिए. पर आज दूसरी तरह से इस समस्या को देखने की कोशिश की है कि जब बच्चे , डिप्रेशन से लोहा ले, हंस-खेल रहें हैं, स्कूल-कॉलेज जा रहें हैं, दोस्त बना रहें हैं....फिर ऐसे कदम उठाने के विचार को भी क्यूँ नहीं त्याग पाते. और पैरेंट्स ऐसे कदम से दूर रखने के लिए क्या करें?

आजकल पैरेंट्स का प्यार और देखभाल एक शामियाने जैसा हो गया है, जो बच्चों को जीवन की आंधी,तूफ़ान, बारिश, धूप से महफूज़ रखता है जबकि उनका साया एक पेड़ की तरह होना चाहिए, जो प्यार,ममता की शीतल छाया भी दे और उसके पत्तों से छन, ज़िन्दगी की धूप, बारिश ,आंधी भी उन्हें प्रभावित करती रहें तभी वे जीवन की कठिनाइयों से लड़ने को तैयार हो पाएंगे.


Monday, October 4, 2010

पिता का स्नेह भरा साथ कितना जरूरी...

   इसे कोई उपदेशात्मक पोस्ट ना समझ लीजियेगा....बस एक अच्छा आलेख पढ़ा तो हमेशा की तरह शेयर करने की इच्छा हो आई...और यह मौजूं भी था क्यूंकि विषय मेरी पिछली पोस्ट से मिलता-जुलता है.

पिछली पोस्ट में  मैने घरेलू हिंसा पर  बात की थी. उसका सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है. खासकर लड़कों पर क्यूंकि उनके  सबकॉन्शस में ही यह बात बैठ जाती है कि ऐसे सिचुएशन में इसी तरह रीएक्ट करना है. और पिता अपनी ज़िन्दगी के साथ साथ अपने बेटे की ज़िन्दगी को भी खुशहाल बनाने का रास्ता बंद  कर देता है क्यूंकि दुनिया तेजी से बदल  रही है...हमसे दो पीढ़ी पहले की  औरतें पति को परमेश्वर मानती थीं और पति द्वारा किए गए ऐसे व्यवहार को सर-माथे लेती थीं. उसके बाद की पीढ़ी समझने लगी थी कि ये गलत है फिर भी प्रतिकार नहीं  कर पाती थी. आज की पीढ़ी इसे बिलकुल गलत मानती है फिर भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ना होने के कारण यह पशुवत व्यवहार सहने को मजबूर हो जाती है लेकिन आनेवाली पीढियाँ , ना तो आर्थिक रूप से निर्भर होंगी किसी पर और ना ही चुपचाप ऐसा व्यवहार सहेंगी.इसलिए अनजाने में ही वैसे पिता ,अपने बेटे की ज़िन्दगी में भी कांटे बो रहें हैं.

शनिवार के बॉम्बे टाइम्स में छपे एक आलेख में, लिखा है कि अधिकांशतः बच्चे के पालन-पोषण में उसके माँ का हाथ होने की बात कही  जाती है परन्तु हाल में ही कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी के एक मनोवैज्ञानिक Melanie Mallers ने एक सर्वेक्षण किया कि बेटे के चरित्र निर्माण में पिता की कितनी भूमिका होती है. Mallers ने कहा ,"हमारे सर्वेक्षण से यह बात पता चली कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य मेंटल  हेल्थ) पर पिता की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रभावी होती है"
जिन पिताओं का अपने बेटे के साथ स्वस्थ और प्यार भरा रिश्ता होता है वे जीवन के संकटमय स्थिति  को ज्यादा अच्छी तरह हैंडल  कर सकते हैं.....जिनके रिश्ते में दूरी होती है. वे ऐसी परिस्थिति में बिखर जाते हैं.और कुशलतापूर्वक उस स्थिति का सामना नहीं कर पाते."

डॉक्टर बरखा चुलानी क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट  भी कहती हैं कि बेटे हमेशा पिता की नक़ल करना चाहते हैं.पिता जितना ही स्नेहमय होंगे, उनके बेटे का  जीवन उतना ही शांतिपूर्ण होगा और वे भी अपने बच्चे के साथ वैसा ही स्नेहभरा व्यवहार रखेंगे.

पिता से बेटे के रिश्ते का प्रभाव उसके इमोशनल प्रोग्रेस पर पड़ता  है. प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक सीमा हिंगोरानी का कहना है ,पिता का प्यार भरा व्यवहार, उन्हें इमोशनली स्ट्रौंग बनता है और दूसरों से उनके रिश्ते बनाने की प्रक्रिया पर बहुत असर डालता है. एक अच्छे मानसिक विकास के लिए पिता के साथ सुन्दर रिश्ता बहुत जरूरी  है" छोटे लड़के हर बात में अपने पिता की  नक़ल करते हैं, शेव बनाने से लेकर, अखबार पढने के अंदाज तक और अनजाने ही वे उसके सारे गुण- अवगुण आत्मसात करते जाते हैं.

यह बात मैं अपने अनुभव से कह  सकती हूँ, मेरे पति की  एक अच्छी आदत है  (बस एक ही..so sad :(  ) वे खाना खा कर अपनी प्लेट जरूर उठा कर सिंक में रख  देते हैं. मुझे अपने दोनों बेटों को एक बार भी यह नहीं कहना  पड़ा. बल्कि जब वे बहुत छोटे थे, उनके हाथों  से जबरदस्ती प्लेट  ले लेनी पड़ती थी  कि कहीं गिरा ना दें. लेकिन वही गीले टॉवेल बिस्तर, कुर्सी कहीं पर भी छोड़ जाने की  आदत भी पिता से ही ग्रहण कर ली है.चाहे मैं ३६५ दिन में दो बार चिल्लाऊं. कोई असर नहीं होता :(

रोज सुबह मेरे सामने वाली  बिल्डिंग के एक फ़्लैट की बालकनी में एक बड़ा ही प्यारा दृश्य देखने  को मिलता है. एक युवक ने कपड़े फैलाने की जिम्मेवारी अपने ऊपर ले ली है. उसका दो साल का बेटा भी साथ लगा होता है. उसे उसके पिता "विंडो सिल' पे खड़ा  कर देते हैं और वह भी अपने छोटे-छोटे हाथों से मोज़े, रुमाल फैलाने में अपने पिता की मदद करता है. उनकी पत्नी नौकरीपेशा नहीं है फिर भी सोचते  होंगे, ऑफिस जाने से पहले   काम का बोझ कुछ तो हल्का कर  दूँ. अब ये बच्चा जब बड़ा होगा, उसे घर के छोटे-मोटे काम में हाथ बटाने  कभी परहेज नहीं होगा. और जाहिर है ,घर वालों को ख़ुशी ही होगी.

इसलिए पिता लोगों को थोड़ा एक्स्ट्रा कॉन्शस रहना चाहिए.

अगर कोई बेटा अपने पिता से खुलकर बातें  करता है और अपनी समस्याएं शेयर करता  है तो वह अपनी किशोरावस्था में अपने भीतर आते परिवर्तनों से  अच्छी तरह डील कर सकता है.

अक्सर कठिन समय में बच्चे अपने माता-पिता की  तरफ देखते हैं. अगर वे देखते है कि पैरेंट्स , परेशानी को अच्छी तरह हैंडल  नहीं कर पा रहें. खुद पर से नियंत्रण खो दे रहें हैं तो उनकी भी प्रेशर का सामना करने की  क्षमता घट जाती है.

विशेषज्ञों  का कहना है कि अगर किसी  युवक में  डिप्रेशन, चिंता, सोशल स्किल्स की कमी पायी जाती है   तो ज्यादातर इसकी वजह उनके पिता से खराब रिश्ते होते हैं. और वहीँ एक स्वस्थ रिश्ता जो  बचपन की  मधुर यादों से भरा हो, बेटों को इमोशनली स्ट्रौंग बनता  है और जीवन की कठिन परिस्थितियों का  कुशलता से सामना करने के लिए तैयार करता है. 

इसलिए चिंता करने,, गुस्सा करने, किसी पर चिल्लाने से पहले यह देख  लीजिये  कि कहीं आपका छोटा बेटा ,आस-पास तो नहीं. पर महानगरों में बड़े होनेवाले बच्चे अपने पिता की  सूरत तक देखने  को तरस जाते हैं.वे जब सो रहें होते हैं तो पिता ऑफिस से आते हैं और जब सुबह बच्चे स्कूल जाते हैं तो पिता सो रहें होते हैं. पर वीकेंड्स में उसकी पूरी कसर निकाल  लेनी चाहिए.

 इसके पहले कि टिप्पणीकर्ता इस तरफ ध्यान दिलाएं कि यही सारी बातें माँ के साथ भी लागू होती हैं...बिलकुल स्वीकार करती हूँ... उनके भी सारे गुण-अवगुण बेटियाँ ग्रहण करती चली जाती हैं. अक्सर पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं होता और इसके विपरीत माँ अपने  बच्चों की ज़िन्दगी पर कुछ ज्यादा ही नियंत्रण की कोशिश करती है जिसकी वजह से कई  बार,लडकियाँ अपने पति के साथ एडजस्ट नहीं कर पातीं. छोटी से छोटी बात माँ से शेयर करती हैं और उसकी सलाह पर ही कार्य करती हैं. माताओं को भी बेटियों को पूर्ण आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश  करनी चाहिए.

इसलिए पैरेंट्स बनना कोई आसान कार्य नहीं. अपने व्यवहार के सबसे बड़े समीक्षक खुद ही होना पड़ता है. अपनी ज़िन्दगी तो जी ली (जैसी भी थी..). जब बच्चों को इस दुनिया में लेकर आए हैं तो उन्हें एक सुखमय, शांतिपूर्ण जीवन देने का वादा खुद से होना चाहिए.