Saturday, July 31, 2010

द डे व्हेन एवरीथिंग वेंट रॉंग.....वेल..नॉट एवरीथिंग :)

घड़ी पर नज़र डाली, छः बजकर बीस मिनट, और मैने मोबाइल हाथों में लिया,मेसेज टाइप करने को कि I  m ready  और तभी घंटी बज उठी. सहेली का मिस्ड कॉल था. मोबाइल वहीँ रखा, क्यूंकि तेज बारिश हो रही थी. घर की चाबी उठायी, छाता लिया और दरवाजा खींच कर निकल आई, मॉर्निंग वाक के लिए. गेट के सामने सहेली  की गाड़ी नहीं दीखी.सोचा, शायद अभी आई नहीं है. उसकी बिल्डिंग की तरफ बढ़ चली, पर ना रास्ते में उसकी कार दीखी ना अपने युज़ुअल पार्किंग प्लेस पर. वह हमेशा मेरा इंतज़ार करती है. फिर सोचा शायद बेटे को देर हो रही होगी,फूटबाल प्रैक्टिस के लिए.इसलिए निकल गयी होगी. अभी छोड़ कर आ जाएगी.मैं सड़क पर अकेले ही थोड़ा आगे निकल गयी. थोड़ी देर बाद लौट कर आई,अब तक नहीं आई थी वो. मैं फिर दूसरी तरफ निकल गयी. थोड़ी देर बाद फिर उसकी  बिल्डिंग में आकर देखा,अब तक नहीं. मैं तो मोबाइल घर पर छोड़ कर आई थी.सोचा उसकी बिल्डिंग में हूँ,उसके घर जाकर ही उसकी बेटी को कहती हूँ, उसे कॉल करके देखे. पर उसकी लिफ्ट बंद थी. सातवीं मंजिल तक  चढ़ कर जाना गवारा नहीं हुआ.
लौट कर आई  तो वाचमैन दिखा, बोला "हाँ, मैडम तो बेटे को लेकर उसे छोड़ने गयी हैं "
थोड़ी देर फिर मैं घूम कर आई, अब तक वह नहीं लौटी थी.

अब मुझे चिंता भी होने लगी. सात बज गए थे. घर आई ,उसका मिस्ड कॉल देख थोड़ी शांति मिली कि सब ठीक हैं पर गुस्सा बहुत आया.

उसे फोन मिलाया,मैं कुछ कहती इसके पहले ही वो बरस पड़ी, "
"अभी नींद खुली?? मैं फोन करके परेशान हूँ"

"मैं तुम्हारी बिल्डिंग के चार चक्कर लगा कर आ रही हूँ, हो कहाँ तुम?"

"मैने तो कितनी देर तुम्हारे गेट पर इंतज़ार किया"

"मैं तो तुम्हारा मिस्ड कॉल देखते ही निकल पड़ी"

"तुम्हे मेरी गाड़ी कैसे नहीं दीखी?"

"तुम्हे गेट से निकलती मैं, कैसे नहीं  दीखी?"
........
.......
बाय
बाय

दरअसल मुझे मिस्ड कॉल देने के बाद ,उसे थोड़ी देर लगी नीचे उतरने में और उसकी गाड़ी,दूसरी जगह पार्क थी. (ऐसा पहली बार हुआ था )मैं थोड़ी जल्दी निकल गयी और उसकी कार जगह  पर ना देख...यह सोचा कि वह चली गयी है. उसने गेट पर पहुँच कर मुझे फिर से फोन किया और सोचा शायद मै सो रही हूँ,इसलिए फोन नहीं उठा रही. और मैं सेल भी साथ में नहीं ले गयी थी.उसने बेटे को स्कूल छोड़ा और वहीँ पास के पार्क में ही घूमने चली गयी. और मैं उसका इंतज़ार करती रही.

दोनों को अपनी गलती का अहसास हुआ और फिर एक-एक सॉरी मेसेज भेजा.फिर थोड़ा रुक कर इन्बौक्स से ढूंढ अच्छे अच्छे दोस्ती के मेसेज भेजे एक दूसरे को और बारह बजते बजते हमलोग एक दूसरे से बात करते हंस रहें थे. हम दोनों के पतिदेव शहर से बाहर  गए हुए थे. बच्चों की कोचिंग क्लास थी .शनिवार का दिन हमारा ऐसा ही बेकार गुजरने वाला था.

उसने प्रस्ताव रखा,"चलो मूवी चलते हैं."

"पर इतनी बारिश हो रही है?"

"इतने दिन मुंबई में रहकर भी बारिश से डरती हो ..लेट्स गो"

"हम्म ओक्के"

हम महिलाओं का फिल्म देखने जाना इतना आसान नहीं. एक तो बहुत कम फिल्मे ही अच्छी लगती है. फिर थियेटर पास होना चाहिए. टाइमिंग सूट करनी चाहिए. क्यूंकि शाम तक घर भी वापस आना होता है.
जल्दी जल्दी पेपर पलटे गए. थियेटर,फिल्म निश्चित की  पर बारिश बढ़ती  ही जा रही थी. दोनों जन आधी आधी छतरी में.....ना अपनी अपनी छतरी में भीगते हुए निकल पड़े. मुंबई की बारिश में छतरी और भीगने का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है.आप बारिश में निकलेंगे तो छतरी जरूर लेंगे और यहाँ की बारिश ऐसी होती है कि बिचारी छतरी कुछ नहीं कर पाती,और आप भीगने से नहीं बच सकते.

थियेटर पहुँचते -पहुँचते तो लगा,अब ये बारिश रुकने वाली नहीं. हम डर गए. कहीं ऐसा ना हो, हम तीन घंटे तक फिल्म देखते रहें और बाहर निकले तो पता चला,पूरी मुंबई डूब गयी. एक दूसरे का मुहँ देखा और सर हिलाया, "ना कभी और देखते हैं...आज तो घर वापस चले जाते हैं. " हमने टिकट नहीं लिया पर सोचा.एक एक कॉफी तो पी ली जाए कम से कम.
गीले कपड़ों में ठंढ भी लग रही थी.पर अंदर की ए.सी. में ठंढ और बढ़ गयी,कॉफी ने भी कुछ काम नहीं किया. कॉफी पीते हम निराश आँखों से बाहर देखते रहें. बारिश काफी कम हो गयी थी,सिर्फ हमारी फिल्म कैंसिल करवानी थी उसे. हमने तय किया 'लिंकिंग रोड' पर  थोड़ी शॉपिंग कर ली जाए.' पर जब कॉफी शॉप से बाहर  निकले तो इतने सुहाने मौसम में सेल्समैन से झिक झिक कर कुछ  खरीदने का मन नहीं हुआ.लिंकिंग रोड इसीलिए कुख्यात है.  आठ सौ की चीज़  दो सौ तक लाने में हमारे सौ दो सौ शब्द तो खर्च हो ही जाते हैं.

फिल्म भी कैंसल हो गयी. शॉपिंग का मूड नहीं और  बारिश  की रफ़्तार भी धीमी हो गयी और घर वापस जाने का भी मन नहीं हो रहा. हमने तय किया बैंड स्टैंड चलते हैं,वहाँ प्रेमी युगल ही जाते हैं तो क्या दो सहेलियां नहीं जा सकतीं?. फैमिली के साथ तो वहाँ से कार से गुजरने पर भी मन होता है मुहँ फेर लें..ऐसे दृश्य होते हैं.

और हम पहुँच गए ,उन पत्थरों पर सर पटकती लहरों की फ़रियाद  सुनने. जिसे ना वह बेजान पत्थर सुनता है और ना अहसास से धड़कते एक दूसरे में खोये दो दिल. पर हम भी ठीक से कहाँ सुन पाए. अपनी छतरी ही संभालने में लगे रहें. इतनी हवा थी कि छतरी ने भी नाराज़ होकर आकाश की तरफ मुहँ  मोड़ लिया. ऐसे में वो गाना जरूर याद आ जाता है ,"छतरी ना खोल...उड़ जाएगी..हवा तेज़ है...." अब  भी ये गाना उतना ही बेक्कार  लगता है,जितना पहले लगता था..पर याद जरूर आ जाता  है.

ब्लॉग पढनेवाले तो सब एडल्ट ही हैं इसलिए बताया जा सकता है ,पहली बार एक 'गे' कपल को भी देखा.और बेवकूफों की तरह कितना भी हम कोशिश करते  आकाश से गिरती बूंदे जो लहरों के पत्थर से टकराने के बाद उडती बूंदों से  एकाकार हो रही थीं,उन्हें देखें..पर नज़र  जिद्दी बच्चे सी बार बार उधर ही  लौट जाती.आखिर कार हमने नज़रों को सिगड़ी में सिकते भुट्टो का लालच दिया और कोशिश कामयाब हुई. जब भी समंदर  के किनारे भुट्टे खाने का आनंद उठाती  हूँ. दूर अमेरिका में बैठी अपनी कजिन से हुई बहस याद आ जाती है.वहाँ के 'बीचेज' की बड़ी बखान करती, इतना नीला पानी है,इतना साफ़ सुथरा....और मैं कहती.."वहाँ  धीमी आंच  में सिकते भुट्टे मिलते हैं??"और वह सबकुछ भूल ,भुट्टे के साथ,गोलगप्पे...भेलपूरी सब याद करने लगती.

दिन की शुरुआत तो बड़ी खराब हुई थी पर अंत उतना ही अच्छा रहा...
इसलिए भी कि दिन का अंत अपने ब्लॉग जगत के सभी साथियों को " Happy Friendship Day "  कह कर कर रही हूँ. वैसे तो दोस्ती का कोई ख़ास दिन मुक़र्रर नहीं पर ज़माने के साथ भी चलना है..तो ये रस्म भी क्यूँ ना निभाएं...एक सुन्दर सा मेसेज ,सबकी नज़र है
A quote said by a friend to his best friend after  both got busy in their lives and dnt contact each other..'I MISS UR SMILE ALLOT ......BUT I MISS MY OWN  SMILE EVEN MORE."

Wednesday, July 28, 2010

आवाज़ देकर क्यूँ छुप जाती है, ज़िन्दगी....



सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर दूँ...कि  अपने आलेख में ,समाज में व्याप्त किसी समस्या,  कुरीतियों, भेदभाव का जिक्र अगर मैं करती हूँ तो व्यापक रूप में जो मेरी नज़रों से जो गुजरता  है वही लिखती हूँ....अपवाद तो सौ साल पहले भी होते थे और सौ साल बाद भी होते रहेंगे.

पिछली पोस्ट में मैने एलेक्स का जिक्र किया और आज सचमुच अधिकाँश नवयुवक उस जैसे ही हैं. जबकि आज से 15,20 साल पहले,
युवक युवतियां प्रेम तो करते थे पर माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध जाने की हिम्मत उनमे नहीं होती थी. और वे इसमें गौरवान्वित महसूस करते थे कि
माता-पिता की  इच्छा को  सर्वोपरि माना. पर यह बात तो कदम बढाने के पहले सोचनी थी.

करीब 18 साल   पहले का वाकया है. मैं अपने तीन महीने के बेटे को लेकर पापा की पोस्टिंग पर  गयी हुई थी. उसी कालोनी  में एक नए नए डॉक्टर भी रहने आए. उनकी भी चार महीने  की बेटी थी जो अपनी नानी के पास रहती थी. क्यूंकि उनकी पत्नी मेडिकल के थर्ड इयर में थी. अक्सर वे मेरे बेटे के साथ खेलने आ जाया  करते. उसका ख़याल भी रखते. उसकी टॉनिक,दवाइयां  भी बताते रहते.

एक दिन बातों बातों में उन्होंने अपनी शादी की बात बतायी. उनका  अपनी एक बैचमेट के साथ अफेयर था, शादी भी पक्की हो गयी. डॉक्टर साहब के पिता की  मृत्यु इस से दो वर्ष पूर्व हो गयी थी. सारा इंतज़ाम हो गया.शादी की तैयारियों की खबर सुन, उनके पिता के एक मित्र, उनके घर आए. उन्होंने उनकी माँ से बोला, " आपके पति ने मुझसे वादा किया था  कि वे अपने बेटे की शादी मेरी बेटी से करेंगे."
माँ ने कहा "अगर ऐसा है तो ठीक है....आपकी बेटी से ही मेरे बेटे की शादी होगी...आप तैयारियां शुरू कीजिये"
जब ये महाशय कॉलेज से छुट्टी लेकर घर पहुंचे तो इनके बड़े भाई,रिश्तेदार सबलोग डर रहें थे कि शायद ये बगावत कर दें, और माँ की बात ना माने .

पर उन्होंने  बड़े शहीदाना भाव अख्तियार करते हुए हमें  बताया," मैने कहा, 'ना...अब माँ ने कह दिया है और पिताजी ने वादा कर दिया था, फिर तो मैं वहीँ शादी करूँगा. मैने अनु (उस लड़की का नाम ) को फोन करके बता दिया कि मैं शादी नहीं कर सकता. और मैने पिताजी के मित्र की लड़की से शादी कर ली."
मैं तो गुस्से से मुट्ठियाँ भींचे बैठी थी और वो महाशय  सोच रहें थे, हमलोग बहुत इम्प्रेस हो रहें हैं. उन्होंने कहना जारी रखा, "कॉलेज में गया तो एक फ्रेंड ने जो शादी में नहीं आया था,उसे लगा मेरी शादी अनु से ही हुई है. मुझे बधाई देने लगा, जब मैने उसे सच बताया तो बोला..'अभी मैं अनु को भी कौन्ग्रेचुलेट करके आ रहा हूँ"

बस अब मेरा चुप रहना मुश्किल हो गया, ( अभी भी, वही हाल है...ये चुप रहना ही कठिन है, सिर्फ weighing  scale पर digit बढ़ रहें हैं...बाकी कुछ नहीं बदला :( ) मैने उन्हें काफी कुछ सुना डाला शब्द तो नहीं याद..भाव यही होंगे..कि "आपने बहुत गलत किया, उस लड़की का क्या कुसूर"..वगैरह वगैरह.
बाद  में ममी से बहुत डांट भी खाई कि इतना हार्श होने की क्या जरूरत थी??  उस दिन के  बाद से उन्होंने मेरे रहते मेरे घर का रुख नहीं किया.( वैसे भी पता नहीं क्यूँ ज्यादातर ,डॉक्टर लोगों से मेरी नहीं जमती :)) जब pram में मेरे बेटे को लेकर प्यून घुमाने ले जाता तो वे कभी कभी बाहर ही बेटे के साथ खेल लेते. मुझे थोड़ी और डांट पड़ती, "बेचारा अपनी बेटी को याद करके खेल लेता था थोड़ी देर." पर ममी लोगों  का तो काम ही है डांटना. कितनी परवाह करे कोई.

हो सकता है कुछ लोग सचमुच उन्हें श्रद्धा  की दृष्टि से देखें, कि इतना लायक लड़का था , बिलकुल श्रवण कुमार , पिताजी के वायदे का , माँ की बात का कितना मान रखा .पर मुझे अच्छा नहीं लगा. वो लड़की किस  मानसिक यंत्रणा से गुजरी होगी??  आज जरूर वो भी कहीं सुखी वैवाहिक जीवन गुजार रही होगी. पर कुछ महीने या साल जो वज्र बनकर टूटे होंगे उस पर,उसका हिसाब कौन देगा?? ये महाशय तो नई पत्नी के साथ खुश हो गए. श्रवण कुमार होने का तमगा अलग से मिल गया. घरवालों, रिश्तेदारों की नज़रों में ऊपर उठ गए. पर उस  लड़की को क्या मिला??

ऐसा नहीं कि पहले सिर्फ लड़के ही दोषी होते थे. कई बार डर कर लडकियाँ भी पीछे हट जाती थीं. एक महाशय थे, माता-पिता के इकलौते सुपुत्र. बड़ी मुश्किल से माँ-बाप को बंगाली लड़की से शादी करने को राजी किया पर बाद में लड़की ही डर कर पीछे हट गयी.

कभी कभी लगता है क्या ,प्रेम विवाह ही इस दहेज़ , जाति, दिखावे ,पैसे की बर्बादी से बचने का हल है?? क्यूंकि महानगर में मैं देख रही हूँ हर परिवार के बच्चे,दक्षिण भारतीय, बंगाली,मराठी, पंजाबी , जाति-प्रदेश कोई बंधन नहीं मान रहें. पर हमारा देश सिर्फ चार महानगरों से तो नहीं बना.  ऐसा नहीं कि छोटे शहरों और कस्बों  में अब लड़के लडकियाँ साथ, नहीं पढ़ते  या काम नहीं करते. यहाँ तक कि छोटे शहरों से आए नवयुवक भी ज्यादातर  अरेंज्ड मैरेज ही करते हैं.पता नहीं हिम्मत की कमी है या मिस्टर/मिस राईट उनकी आँखों के सामने होते हैं और वे पहचान नहीं पाते.या फिर किसी परफेक्ट  मिस/मिस्टर राईट की प्रतीक्षा में होते हैं. पर हाँ, मिस/मिस्टर राईट मिल भी गए तो युवजनों को अपने संबंधों को गंभीरता से लेना होगा और अपने वचन के प्रति सच्चाई बरतनी होगी.

Saturday, July 24, 2010

ज़िन्दगी की कड़ी धूप और कांच के शामियाने

अक्सर देखने में आता है, कि लोग कहते हैं 'नई पीढ़ी नहीं जानती प्रेम किस चिड़िया का नाम है, 'प्रेम' को एक टाइम-पास या खेल की तरह लेती है', 'अपने वायदे पर कायम नहीं रहती वगैरह..वगैरह.पर कई बार मुझे  लगता है, नई पीढ़ी (30 तक की आयु के ) ज्यादा ईमानदार है. उसकी कथनी और करनी में ज्यादा   फर्क नहीं है. कम से कम महानगरों में तो देखा है कि जब प्रेम किया तो उसे निभाते हैं.और अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेने की अपनी शक्ति भर पूरा  प्रयास करते हैं.

कई उदाहरण देखे हैं, एक युवक ने छः साल तक इंतज़ार करने के बाद,अपने माता-पिता की अनुमति से ही शादी की. एक ने चार साल, इंतज़ार किया. एक मेरा करीबी ही है,बारहवीं से उसका प्रेम चल रहा है आज दोनों नौकरी में आ गए हैं पर लड़की के माता-पिता को मनाने की कोशिश  जारी है. एक मित्र दुबई  में है,लड़की भारत में,दोनों के परिवार नहीं तैयार पर दोनों ही प्रयासरत हैं उन्हें मनाने को.

जबकि पुरानी पीढ़ी (45,50 से ऊपर ) प्रेम करने में  पीछे नहीं रही पर जब शादी का वक़्त आता था तो श्रवण कुमार, बन माता-पिता की इच्छा से विवाह कर लेते थे.

एक मेरी परिचिता हैं, एक प्रतिष्ठित स्कूल में अध्यापिका हैं. कभी कभी 3 महीने तक हमारी सिर्फ हाय-हलो ही होती है और कभी
मिलते हैं तो 3 घंटे में भी  हमारी बातें ख़त्म  नहीं होती. हाल में ही वे मेरे घर आई थीं और अपने बेटे की शादी की जो बातें बताईं , सुन मैं आवाक रह गयी, आज के युग में, मुंबई जैसे महानगर में, एक क्रिश्चन लड़का ऐसा हो सकता है??

एलेक्स  एक गोरा-चिट्टा,लम्बा  बहुत ही हैंडसम  लड़का है. इंजिनियर है. एक मल्टीनेशनल कम्पनी में कार्यरत है. नौकरी लगने के छः महीने बाद ही उसने अपने माता-पिता को बताया कि वो नेट पर किसी लड़की से मिला  है और शादी करना चाहता है. लड़की मंग्लोरियन क्रिश्चन है  और ये लोग गोवन क्रिश्चन हैं.( इनमे भी बहुत जातिवाद है.) पैरेंट्स ने बिलकुल मना कर दिया. लड़की उनकी जाति की  भी नहीं थी और बहुत ही साधारण शक्ल सूरत की और सामान्य परिवार से थी. चर्च में रोज ही, एलेक्स  के लिए बहुत अच्छे रिश्ते आ रहें थे. पर वो अपनी जिद पर अड़ा रहा.

आखिरकार ,पिता ने कहा हम तुम्हारी शादी में एक पैसा भी खर्च नहीं करेंगे और उस से शादी की तो किसी भी घर मे नहीं घुसने देंगे. (उनके इसी कालोनी में एक पैतृक आवास और २ फ्लैट्स हैं  ) एलेक्स  ने चर्च में शादी, एक क्लब में रिसेप्शन, सबका इंतज़ाम खुद से किया. ऑफिस के पास ही किराए का घर लिया और माता-पिता को शादी में शामिल हो, आशीर्वाद देने का आग्रह किया. जिसे समाज का ख़याल कर, ये लोग मान गए.

शादी हो गयी. हमलोग भी शामिल हुए  ,पर अंदर की  बातें हमें क्या पता? एलेक्स  वहीँ से अपने नए घर में चला गया .लेकिन हर शनिवार ,अपने पैरेंट्स को मनाने आता. माँ तो मान गयी थीं पर पिता दृढ थे. उस से बात भी नहीं करते. छः महीने बाद क्रिसमस  आया . इनलोगों  में यह मान्यता है कि क्रिसमस वाले सप्ताह में अगर कोई  भी आ जाए तो उसके लिए दरवाजे बंद नहीं करते. चाहे वह आपका कितना भी बड़ा दुश्मन हो, उसका सत्कार करते हैं.  एलेक्स ने फोन किया, वह क्रिसमस के एक दिन पहले अपनी पत्नी के साथ आ रहा है. पर माँ ने मना कर दिया कि "pls  dont spoil our Christmas"  मैं यह सुन इतनी आहत हुई.."ऐसा भी कोई दिन आ सकता है जब अपने बच्चे के आने से त्योहार खराब  हो जाये ??   बच्चे का घर आना ही एक त्योहार नहीं?''. पर उनकी भी पता नहीं क्या मजबूरियाँ रही हों. शायद पति का मूड देख मना कर दिया हो.कि वे फिर 'मिडनाईट मास' में भी नहीं जाएंगे.पर उसने कहा 'ठीक है पर क्रिसमस के दिन लंच पर पत्नी के साथ आऊंगा '.

अब माँ ने पति की बड़ी बहन ,बड़े भाई  को फोन कर समझाने को कहा. उनलोगों  के समझाने पर कि 'यह आखिरी मौका है. अगर आज भी तुमने अच्छा सुलूक नहीं किया तो फिर हमेशा के लिए बेटा खो दोगे' .पति ने कुछ कहा नहीं पर अपने कमरे से बाहर नहीं निकले. लंच के बाद एलेक्स, उनके पास जाकर बैठा रहा. बता रही थीं कि 'वो आंसुओं से रो रहा था' पर पता नहीं पिता का दिल किस पत्थर का  हो गया था कि पिघल ही नहीं रहा था. फिर एक घंटे बाद अपनी पत्नी को लेकर गया. दोनों उनके पास खड़े, हाथ जोड़े, घंटों उन्हें मनाते रहें और माफ़ी मांगते रहें.तब जाकर पिता, पिघले.आज एलेक्स एक प्यारी सी 4 महीने की बच्ची का पिता है और हर इतवार पत्नी के साथ ,माँ के पास आता है.

वे बता रही थीं कि देखो मैने कितनी मुश्किल से अपने बच्चों को क्रेच में डालकर नौकरी की. और आज मेरी बहू ने नौकरी छोड़ दी है और इतने बड़े घर ,गाड़ी का सुख  उठा रही है.यह भी बताया कि जब एलेक्स नौकरी के इंटरव्यू के लिए गया तो उस बोर्ड के एक मेंबर का बेटा उनकी स्कूल में पढता था और वे उसकी क्लास  टीचर भी  थीं. एलेक्स को नौकरी मिलने में यह पहचान भी काम आई.
उसका कैम्पस सेलेक्शन हो गया था पर उसने यूनिवर्सिटी में टॉप किया तो दूसरी कंपनियों से बड़े पैकेज
के ऑफर मिलने लगे, फिर पिता ने एक लेटर ड्राफ्ट करके दिया कि इतनी सैलरी देंगे तभी वो पुरानी कंपनी में काम करेगा. पर हमने उसका एक पैसा नहीं जाना. जब वे यह सब बता रही थीं तो मुझे लग रहा था कि ये एक बड़े स्कूल की कोई टीचर मेरे सामने बैठी हैं या किसी गाँव की कोई अनपढ़ औरत.

हो सकता है ये उनके क्षणिक विचार  हों. पर उनके मन में यह मलाल तो है कि हमने बेटे के लिए इतना किया और बेटे ने अपनी  पसंद की लड़की से शादी कर ली  जो आज उसके घर पर  राज कर रही है. ऐसे वे  सचमुच बहुत अच्छी हैं, बहुत सारे सोशल वर्क करती हैं, हमेशा किसी की मदद को तैयार  रहती हैं. बहू की भी बार बार तारीफ़ की कि 'बहुत अच्छी है, नाज़-नखरे नहीं हैं,सिंपल सी है, घर अच्छे से संभाल लिया है...बस मेरे हैंडसम बेटे की टक्कर  की नहीं है.

पर आज तक, दुनिया की कोई लड़की, किसी माँ को, अपने बेटे के लायक लगी है?? :) :)


(चित्र गूगल से और नाम काल्पनिक है)

( इस से बिलकुल उलट, बीस साल पहले की एक शादी का जिक्र अगली पोस्ट में )

Wednesday, July 21, 2010

जावेद अख्तर की तरकश से एक और ख़ूबसूरत तीर

अब जबतक जावेद अख्तर की 'तरकश' मेरे पास रहेगी और दूसरे ब्लॉग पर कहानी चलती रहेगी आपलोगों  को उसमे की चुनिन्दा नज्में पढवाती रहूंगी


मुअम्मा ( पहेली )

हम दोनों जो  हर्फ़  थे

हम इक  रोज़ मिले

इक लफ्ज़ बना

और हमने इक माने पाए

फिर जाने क्या हम पर गुजरी

और अब यूँ है

तुम इक हर्फ़ हो

इक खाने में

मैं इक हर्फ़ हूँ

इक खाने में

बीच में

कितने लम्हों के खाने खाली हैं

फिर से कोई लफ्ज़ बने

और हम दोनों इक माने पायें

ऐसा हो सकता है

लेकिन सोचना होगा

इन खाली खानों में हमें भरना क्या है

(हर्फ़- अक्षर) (लफ्ज़ -शब्द) (माने-अर्थ)

Saturday, July 17, 2010

कितने युग और लगेंगे इस मानसिकता को बदलने में??


कोई भी घटना जब अपने चरम पर पहुंचती है तभी अखबारों की सुर्खियाँ बनती है. लेकिन उन सुर्ख़ियों तक पहुँचने की नीचे वाली पायदानों तक भी बहुत  कुछ घटित होता रहता है, समाज में. हम, अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में लिप्त,अपने समान विचारों वाले लोगों के बीच उठते बैठते,सीमित दायरे में क़ैद , यह जान ही नहीं पाते कि अभी तक कितनी ही कुरीतियों , उंच-नीच ,भेदभाव, और संकीर्ण मानसिकता से आप्लावित है हमारा ,दूसरे क्षेत्रों में तेजी से प्रगति करता समाज.

महानगरों की छोड़ दें तो बड़े शहरों में भी अभी तक 90% शादियाँ, अरेंज्ड ही होती हैं. और यहाँ वर पक्ष हमेशा विशिष्ट माना जाता है. लड़कीवाले उनके सामने बिछे जाते हैं और लड़के वालों के नखरों का अंत ही नहीं होता. कभी कभी तो ऐसी घटनाएं घटती हैं आँखों के समक्ष कि बार बार खुद को याद दिलाना पड़ता है कि यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं...सच है.


करीब तीन साल पहले, मैं एक लड़की की शादी में शामिल हुई थी. लड़केवाले बहुत अमीर घराने से थे. लड़कीवालों ने पटना के सबसे अच्छे 'मौर्य' होटल में बहुत अच्छा इंतज़ाम किया था. बारात आई. बारात की सारी महिलायें लग रहा था अपना लॉकर पहन कर चली आई हैं. इतने सारे सोने के आभूषणों से लदी थीं. जयमाला हुई और अचानक चारों तरफ पुलिस मैन भर गए.पता चला उनके दो साथी नेता, अपने बौडी गार्ड एवं चमचों के साथ तशरीफ़ लाये हैं. तिल भर भी जगह नहीं बची हॉल में. हॉल के बाहर, पीछे, सब तरफ लोग ही लोग. लड़कीवाले दूसरे शहर से आकर शादी कर रहें थे,उनके मेहमान वैसे भी  काफी कम थे. जो थे, वो भी दीवारों से लग कर खड़े हो  गए.

जयमाल के बाद फोटो खिंचवाने का कार्यक्रम काफी देर तक चला. फिर बाराती, खाना खाने के लिए चल पड़े. हम महिलायें बैठकर बातें कर रही थीं. अचानक शोर सुनायी दिया. देखा दुल्हे के पिता एवं भाई गुस्से में दनदनाते हुए चले आ रहें हैं. पता चला,लड़के वाले 250  बाराती कह कर 500 बाराती ले आए और अब खाना कम पड़  गया है. जब लड़के के परिवार वाले खाना खाने गए, तब तक खाना ख़त्म हो चुका था.इसीलिए वे गुस्से में हैं...होटल वालों ने और खाना तैयार करने की मोहलत मांगी है और कुछ डिश बनाने में अपनी असमर्थता जताई  क्यूंकि उनके पास अब सामग्री नहीं थी.

पर ये लोग तो लड़के वाले थे. लड़के के पिता कह रहें थे ,बारात वापस जाएगी अब..दो-चार महीने बाद शादी की डेट फिक्स करेंगे. लड़की वाले सकते में आ गए. यहाँ दुल्हन मंडप में बैठी, रस्म का इंतज़ार कर रही थी. और लड़का उसी होटल के एक कमरे में (जो उन्हें आराम करने के लिए दिया गया था ) अपने दोस्तों के साथ बैठा था. कमरा अंदर से बंद था. मोबाईल का ज़माना है..शायद उसके पिता भाई ने मना कर दिया आने से. लड़की का भाई दरवाजा खटखटा कर परेशान, वहीँ सीढियों पर बैठ गया. लड़की के पिता एक तरफ सर पे हाथ धरे बैठे थे. लड़की की माँ ,रोती रोती बेहोश हो गयीं थीं. और लड़की के चाचा, उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़े  थे और बाकी रिश्तेदार उन्हें मनाने  में जुटे थे.

होटल वालों ने आ कर खबर भी दे दी...कि खाना तैयार है.पर वे मानने को तैयार नहीं. यहाँ तक कि लड़के वालों की  तरफ से भी  एक बुजुर्ग उन्हें  समझा रहें थे. पर  वे लोग लड़कों वाले के गुरूर में इतने मदमस्त थे कि कुछ सुनने को तैयार नहीं.

यहाँ लड़की वालों की तरफ से एक बच्चे ने भी नहीं खाया था,कुछ भी. इस मान मनौव्वल  में रात के दो बज गए. उनकी  एक रिश्तेदार लन्दन से छुट्टियों में आई हुईं थीं, वे भी शादी में शामिल होने आई थीं और उसी होटल में रुकी हुई थीं. उनकी छोटी बेटी ने कहा, "मम्मा भूख लगी है.." और उसने अपनी बड़ी बेटी को बुला कमरे की चाबियाँ दीं और कहा,मेरे बैग में बिस्किट के दो पैकेट्स पड़े हैं वो ले आओ . फिर देखा रात के दो बजे, सजे-धजे दस-बारह बच्चे (मेरे बेटे भी शामिल थे,उनमे  ) एक गोल घेरा बना एक-एक बिस्किट खा रहें हैं. वो दृश्य जैसे स्थिर है, अब तक आँखों के सामने.

 3 बजे के करीब सबके मनाने  पर वे लोग माने और खाना खाने गए. बस एक पगड़ी नहीं रक्खी गयी, उनके पैरों पर, बाकी हर उपाय किए.(वो भी शायद इसलिए कि किसी ने पहनी नहीं थी वरना शायद वह भी रख देते.)  इसके बाद लड़के को बुलाया गया. और जल्दी जल्दी में सारी रस्मे निबटाईं गयीं. बाद में भी उनलोगों के बहुत नखरे रहें, जैसे लड़की  को मायके ना भेजना...उसी शहर के  रिश्तेदारों से ना  मिलने देना, वगैरह. पर सुकून की बात बस यही रही कि लड़की को कोई तकलीफ नहीं दी. क्यूंकि वह अब उनके घर की हो गयी थी.कम से कम इतना सोचना ही काफी था.

और ऐसा नहीं कि बिहार बहुत पिछड़ा प्रदेश है इसलिए वहाँ ऐसी घटना हुई. इस तरह की घटनाएं थोड़ा रूप बदल कर हर बड़े शहरों में देखने को मिल जाती हैं. ये "लड़के वाले " होने की मानसिकता इस युग में भी नहीं बदली.  आज तो लडकियां भी समान रूप से  शिक्षा ग्रहण कर रही हैं. माता-पिता उनकी शिक्षा में भी उतना ही खर्च करते हैं .पर जब दहेज़ और शादी में किए गए खर्च   की बात आती है , तो यह खर्च लड़की वालों को ही वहन करना पड़ता है.

और यह सब सिर्फ शादी तक ही नहीं सीमित नहीं रहता,आजीवन जैसे लड़कीवाले,लड़केवालों के कर्ज़दार होते हैं. इतनी सारी रस्में बनी हुई हैं, किसी ना किसी बहाने लड़कीवाले उनकी मांगे पूरी करते रहते हैं. शादी में दान-दहेज़ दिए, बच्चे के जन्म पर उपहार,बच्चे के अगर ऊपर के दांत आ गए तो मामा, चांदी की कटोरी में खीर खिलायेगा. गुजरात के एक सम्प्रदाय में  तो एक साल का होने तक बच्चा ननिहाल के कपड़े ही पहनता है. तीज-त्योहार पर कपड़े,पैसे भेजना.यहाँ तक कि शादी के 25 साल बाद भी बच्चों की शादी में , पूरे खानदान के कपड़े ननिहाल से आते हैं, जिसे यू.पी.में 'मामा का भात' कहते हैं. वृद्धावस्था  के कगार पर पहुंचे माता-पिता के लिए , अपने नाती-नातिनों की शादी में इतना कुछ जुटाना एक अतिरिक्त भार होता है,फिर भी लोग निभाते जाते हैं यह रस्म.

आखिर और कितने युग लगेंगे  इस मानसिकता को बदलने में??

Monday, July 12, 2010

क्या सचमुच कहीं, कुछ बदला है ??


मेरी कहानी की  नई किस्त में  बाबूजी की  मृत्यु के बाद सजने संवारने का शौक रखनेवाली
अम्मा जी का जीवन बिलकुल. बदल जाता है.शादी -ब्याह में भाग लेना,चूड़ियाँ,बिंदी, रंगीन कपड़े पहनना ..सब बंद हो जाता है. उस किस्त पर एक मेरी बहुत ही प्यारी सहेली (जो मेरे लेखन की नियमित पाठिका है और तारीफ की ऐसी गंगा बहाती है कि  मुश्किल होता है उसकी तेज धार में बहने से खुद को रोकना :)) के कमेन्ट के एक अंश ने कुछ सोचने को मजबूर कर दिया.

उसने लिखा था ,"हाँ आज समय बदल गया है ...अपने आस पास इतने तलाक और पुनर्विवाह के किस्से देख रही हूँ ...मगर तुम्हारी कहानी जिस समय के लिहाज़ से है ...पति पत्नी के रिश्ते की यही तुलना ठीक लग रही है "
पर क्या सचमुच समय बदल गया है?? पति को खोने के बाद स्त्रियों की स्थितियों में कोई परिवर्तन आया है? मुझे तो नहीं लगता. जबकि मैं खुद महानगर में रहती हूँ. मेरे बहुत सारे रिश्तेदार बड़े शहरों में हैं. ढेर सारी सहेलियां हैं उनके  रिश्तेदार हैं. पर अगर कहीं भी किसी स्त्री ने अपना पति खोया है तो ये सारी पाबंदियां  उसके साथ लागू हो जाती हैं.

इस 31 मई 2010 की एक घटना का जिक्र करती हूँ. मेरी एक सहेली की बेटी की मेहंदी की रस्म थी. लेडीज़ संगीत भी था. खूब नाच-गाना चल रहा था. उसकी ससुराल में उसकी ननदों को बहुत शौक है इन सब का. 4,5  साल पहले उसकी एक छोटी ननद के पति गुजर गए.वो भी वहाँ थी. काले बौर्डर वाली ग्रे कलर की साड़ी में. गले में  पतली चेन, छोटे से टॉप्स कानो में, जैसे हम  बाज़ार जाते वक़्त तैयार होते हैं.बाकी सारे लोग चमचमाती लाल-नीली-गुलाबी साड़ियों में थे, गहनों से लदे. उसके आस-पास बैठी सभी औरतों को परिवारवाले  खींच कर डांस  करने के लिए ले जा रहें थे.पर उसे कोई नहीं बुला रहा था. जबकि सहेली ने बताया था,वह बहुत अच्छा नाचती थी. वहीँ कुर्सी पर बैठी वह बच्चों को दिखा रही थी..ऐसे डांस करो....क्या उसका मन नहीं हो रहा होगा?

जब हम सहेलियों को सब बुलाने लगे तो हम लोगों  ने उसे भी जबरदस्ती उठाया और अपने साथ ले गए.पर वह जरा सा हिल कर वापस चली गयी.वहाँ मौजूद उसकी भाभियों,बहनों, भतीजियों ,भाइयों ने कोई इसरार नहीं किया कि नहीं तुम भी हमारे साथ डांस करो. जब मायके में ये हाल है तो ससुराल की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते. और यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है.

पिछले साल मैं अपने एक रिश्तदार की बेटी की शादी में पटना गयी थी.वहाँ मटकोर की रस्म के लिए  सारी औरतें,बाहर जा रही थीं. एक जिठानी और ननद को एक तरफ बैठे देख ,मैने उन्हें भी चलने को कहा,पर उनलोगों  ने जब इशारे से मना कर दिया तब मुझे ख़याल  आया कि इनका तो किसी रस्म में भाग लेना वर्जित है.मैं भी यह कहती वहीँ बैठ गयी..."बहुत भीड़ है..मैं भी नहीं जाउंगी "...लेकिन कुछ  औरतों ने पलट कर मुझे  देखा और मुझे जबरदस्ती साथ में ले गयीं. जिठानी लन्दन में अपने बेटे के साथ रहती  हैं और वो ननद एक स्कूल की प्रिंसिपल हैं. पर जब किसी ब्याह शादी में शामिल होने की बात आती है तो पुरानी परिपाटी ही निभायी जाती है.

ये महिलायें भी खुद से शामिल नहीं होना चाहतीं,एक तो समाज का डर और फिर दूसरा अंधविश्वास. किसी विधवा माँ को देखती हूँ, कितनी दौड़ धूप करके, कितनी परेशानी से वो बेटी या बेटे की शादी ठीक करती  है,सारे इंतज़ाम करती है.पर रस्मे सारी कोई चाचा -चाची निभाते हैं. ये लोग भी हिम्मत नहीं करती किसी चीज़ को हाथ भी लगाने की, अगर शादी के बाद वर -वधु को जुकाम भी हुआ तो इसका दोष, उन बेचारी महिलाओं  के सर जायेगा.

जबकि पत्नी की मृत्यु हो जाए तब भी पुरुष के किसी भी रस्म में भाग लेने की कोई मनाही नहीं है. जिस रस्म में माता-पिता दोनों की जरूरत होती है, वहाँ पत्नी की जगह एक लोटा रख दिया जाता है और सारी विधि निभाई  जाती है. यानि की स्त्री का अस्तित्व  एक निर्जीव लोटे से ज्यादा कुछ नहीं??

पति के जाते ही, जैसे  उनकी ज़िन्दगी रुक सी जाती है. बनना-संवारना नहीं, चूड़ियाँ,बिंदी,लिपस्टिक, लाल-गुलाबी,पीले-नारंगी रंग..सब अलविदा हो जाते हैं उनकी ज़िन्दगी से. आज जमाना बदल गया है.स्त्रियाँ हर जगह पति के साथ ही नहीं जातीं. नौकरी करती हैं, घर के सौ काम निपटाती हैं. बच्चों के स्कूल ,बैंक सब जगह जाना पड़ता  है पर वही महिला, इन सारी जगहों पर इतने बन संवर कर जाती  थी अब हलके, धूसर रंग  के कपड़े,  हाथों में एक कड़ा,और एक छोटी सी काली बिंदी. इस से ज्यादा श्रृंगार मैने  किसी विधवा स्त्री का नहीं देखा.(यह शब्द भी मुझे लिखने का मन नहीं होता...पूरी कहानी में मैं लिखने से बचती  रही) उन्हें भी तो एक ही ज़िन्दगी मिलती है. पर उन्हें  अपनी सारी इच्छाओं का गला घोंटना पड़ता है. यह समाज क्या अब भी यही सोचता है कि स्त्री का श्रृंगार सिर्फ पुरुष को लुभाने के लिए होता है. अपनी संतुष्टि के लिए उसे सजने संवारने का कोई अधिकार नहीं?
पति को खोने का दुख तो उसे हर पल रहता है, और  रोम रोम से महसूस करती है. पर जैसे खाना-पीना नहीं छोड़ सकती तो ख़ुशी ख़ुशी जीना छोड़ने पर उसे क्यूँ  मजबूर किया जाता है??

उनके खाने पीने पर भी रोक लग जाती है. नौन-वेज़ की कितनी भी शौक़ीन हों पर अब नहीं खा सकतीं. बंगालियों में मछली के बिना उनके एक शाम का खाना नहीं होता पर विधवा स्त्री मछली नहीं खा सकती. एक बुजुर्ग महिला ने अपने अनुभव बांटे थे. संयुक्त परिवार था, बता रही थीं, जैसे ही  मटन-चिकन बनने  लगता, उसकी सुगंध से ,उनमे तीव्र इच्छा जगती, खाने की. फिर उन्होंने साईं बाबा की शरण ली. और रो रो कर बाबा से कहा, "इतना बड़ा आधार छीन  कर, इस तुच्छ इच्छा को क्यूँ नहीं छीन  रहें" और उनका कहना था ,साईं बाबा ने उबार लिया. उनकी आराधना में मन रम गया और अब उनकी इच्छा नहीं होती.  मैं चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी.पर सोच रही थी,यह तो सहज स्वाभाविक है. कल तक जो महिला इतने शौक से बनाया करती थी, शौक से खाया करती थी. अचानक छोड़ देना कितना मुश्किल है.
 
पुनर्विवाह की अगर सोची भी जाती है तो बस उन महिलाओं के लिए ,जिनकी शादी को मुश्किल से एकाध साल हुए हों.और जिनकी कोई संतान ना हो.

यह सही है,इतना परिवर्तन तो आया है कि अब दुर्व्यवहार नहीं होते, उनके साथ .वैसे ऊपर से ऐसा दिखता है..अंदर की बातें तो भुक्त-भोगी महिला ही बता सकती है कि रोज कैसे कहाँ, वह अपमान झेलती है और कैसे रोज  मर मर कर  जीती है.
और अगर उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं भी होता...दुख नहीं दिए जाते फिर भी दुख की अनुपस्थिति ,सुख की गारंटी तो नहीं है??

कुछ बदलाव तभी आएगा ,जब हम अपने परिवार में ,पड़ोस में, रिश्तदारों में किसी भी ऐसी महिला को देखें तो पूरी कोशिश करें कि वे एक सामान्य जीवन बिताएं  और उनके होठों की हंसी कायम ही ना रहें बल्कि वो हंसी होठों से चलकर आँखों में झलके.

Friday, July 9, 2010

जावेद अख्तर की एक नज़्म

आजकल पाठक ही मुझसे एक कहानी लिखवाए जा रहें हैं....हाँ , सच...जिस  कहानी को दो कड़ियों में समेटने की सोची थी...पाठकों को इतनी अच्छी लग रही है कि मैं भी बस लिखती जा रही हूँ...पर उसकी वजह से इस ब्लॉग पर कुछ नहीं लिख पा रही...पहले ही दो कड़ियों में ज्यादा अंतराल, पसंद नहीं आ रहा उन्हें. :)

एक बार, इस ब्लॉग पर जावेद अख्तर की  एक नज़्म डाली  थी और रंगनाथ सिंह जी ने ये फरमाईश की थी.
"जावेद अख्तर की 'वो कमरा' कविता बहुत पसंद है मुझे। आपके पास हो तो कभी लगाएं। मेरे पास उनका संग्रह 'तरकश' अब नहीं रहा वरना मैं स्वयं लगाता।"

मेरे पास भी तरकश नहीं है पर मेरी एक सहेली के पास 'Quiver' है . वो हिंदी नहीं पढ़ पाती पर कविताओं की दीवानी है और हिंदी कविताओं और  उर्दू गजलों और नज्मों के अंग्रेजी अनुवाद  पढ़ती है .लीजिये आप भी एक बार फिर से आनंद उठाइए, उस कविता का.

वो कमरा याद आता है


मैं जब भी


ज़िन्दगी की चिलचिलाती धूप में तपकर

मैं जब भी

दूसरों के और अपने झूठ से थक कर

मैं सब से लड़के और खुद से हार के


जब भी उस इक  कमरे में जाता था


वो हलके और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरा


वो बेहद मेहरबाँ कमरा


जो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता था


जैसे कोई माँ


बच्चे को आँचल में छुपा ले

प्यार से डांटे


ये क्या आदत है

जलती दोपहर में मारे मारे घूमते हो तुम


वो कमरा  याद आता है

दबीज़* और खासा भारी

कुछ जरा मुश्किल से खुलने वाला


वो शीशम का दरवाज़ा


कि जैसे कोई अक्खड़ बाप


अपने खुरदुरे सीने  में

शफ्कत* के समंदर को छुपाये हो.


(दबीज़ - ठोस,  शफ्कत - स्नेह)