Thursday, March 25, 2010

क्यूँ मुश्किल है,पुरुष ब्लॉगर पर फिल्म बनाना

(सभी पुरुष ब्लॉगर्स से क्षमायाचना सहित ,यह केवल एक निर्मल हास्य है )

अपनी जुली न जूलिया की पोस्ट का लिंक जब मैंने buzz पर  डाला तो अविनाश जी और प्रवीण जी के ये कमेंट्स मिले
अविनाश वाचस्पति - एक ऐसी फिल्‍म भी बतलाएं जिसमें नायक को हिन्‍दी ब्‍लॉगर दिखलाएं
प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI - अविनाश जी की जिज्ञासा को हमारा भी वोट !

 और मन यह सोचने पर मजबूर हो गया कि अगर सचमुच हिंदी पुरुष ब्लोगर पर फिल्म बनायी जाये तो??. और मेरी  कल्पना के घोड़े दौड़ने लगे.वैसे भी  अब दौड़ते घोड़ों की पहुँच बस कल्पना तक ही रह गयी है..रेसकोर्स में भी तो अच्छी नस्ल वाले घोड़े ही दौड़ते हैं. बाकी सब तो कल्पना में ही दौड़ कर शौक पूरा कर लेते हैं.


खैर  तो कल्पना कीजिये कि ये एक पुरुष ब्लोगर पर बनी फिल्म है. उसे ब्लॉग के बारे में अखबार से या अपने मित्र से पता चलता  है.घर आता  है,लैपटॉप खोलता है. ब्लॉग बना डालता है. पत्नी बच्चों को डांटती  है, पापा काम कर रहें हैं शोर मत करो. और पत्नी,बच्चे सब दूसरे कमरे में चले जाते हैं.

सुबह भी वे अपना लैपटॉप खोलते हैं. चाय वही आ जाती है. ब्रेकफास्ट वहीँ आ जाता है. तैयार होकर ऑफिस जाते हैं. वहाँ जब थोड़े खाली हों,अपना ब्लॉग खोल लिया.या किसी मीटिंग में गए, बोरिंग लगी तो मोबाईल पर कोई पोस्ट खोल ली.
ऑफिस से आए वही रूटीन, चाय, नाश्ता, खाना ,ब्लॉग्गिंग . लीजिये फिल्म ख़त्म. कोई रोचक मोड़, जद्दोजहद, परेशानी, उल्लास  टेंशन हुई?? नहीं. तो फिल्म ४ मिनट की तो नहीं बन सकती .हाँ  पुरुष ब्लोगर कहेंगे ,महिलाओं को क्या पता, हमें कितनी टेंशन होती है. ई.एम. आई. भरना है, इतने सारे बिल भरने हैं..हम यह सब सोचते रहते हैं अब इस सोच को तो परदे पर प्रदर्शित नहीं कर सकते ना. अब ब्लॉग्गिंग पर फिल्म है तो...हीरो हीरोइन को ड्रीम सिक्वेंस में बगीचे में ...बारिश में गाना गाते भी तो नहीं  दिखा सकते.

अब यही देखिये किसी हिंदी महिला ब्लॉगर पर बनी फिल्म. अगर वह गृहणी है तो बच्चों से ,देवर से या पति से उसे ब्लॉग के बारे में पता चलता है. बड़े उत्साह से जाती है. जरा हेल्प करो,ना...अभी रुको जरा ये काम कर लूँ.उनके लिए ,अच्छी चीज़ें खाने को बनाती है, किसी चीज़ की जरूरत हो दौड़ कर ला देती है. सौ  अहसान जताते हुए वे ब्लॉग बनाने में हेल्प करते हैं.

सुबह उठती है..जल्दी जल्दी बच्चों को स्कूल भेजती है. बीच में थोड़ा सा वक़्त मिले तो कंप्यूटर खोल लेती है. एक पोस्ट पढ़ी नहीं कि पतिदेव की आवाज़ आ गयी..चाय देना..चाय देकर आती है..कमेन्ट टाइप करती है कि कामवाली आ जाती है. उसे थोड़ा निर्देश दिया ..फिर आकर कमेन्ट पोस्ट कर, कंप्यूटर बंद कर दिया.

फिर घर के काम निबटा, पति को ऑफिस भेज .कम्प्यूटर पर आ जाती है. जबकि घर के सौ काम राह देख रहें होते हैं. कपड़े समेटना है,डस्टिंग करनी है.वगैरह  वगैरह. एक पोस्ट लिखी जा रही है. और एक नज़र घड़ी पर है. बच्चों को बस स्टॉप से लाना है. पोस्ट पूरा किया पब्लिश बटन प्रेस किया.और कंप्यूटर बंद. बच्चों को खाना खिलाया, उनकी बातें सुनी. बाकी काम समेटे . बच्चों को पढने बिठाया फिर वापस कंप्यूटर. अपनी पोस्ट पे कमेन्ट पढ़े...दूसरों की पोस्ट पढ़ी, कमेन्ट किए. बैकग्राउंड में बच्चों का झगडा, उनका बार बार कुछ पूछना क्यूंकि ममी कम्प्युटर पर है. बच्चों को तो undivided attention चाहिए. जानबूझकर पूछेंगे, जरा ये बता दो..जरा ये समझा दो. रोना धोना सब. बच्चे अगर थोड़े बड़े हैं  तो उन्हें भी उसी वक़्त कम्प्यूटर चाहिए क्यूंकि स्कूल का कोई प्रोजेक्ट तैयार करना है. इनके बीच ब्लॉग्गिंग चलती रहती है.


जो महिला ब्लोग्गेर्स ऑफिस जाती हैं. वे तो घर से ऑनलाइन  होने की सोच भी नहीं पातीं. कभी कभार कोई विशेष पोस्ट लिखनी हो तो देर रात गए जागना होता है. पर दूसरे दिन सुबह उठकर ऑफिस जाने के पहले काम ख़त्म करने की चिंता हर घड़ी माथे पर सवार. ऑफिस से भी पुरुषों की तरह वे बेख़ौफ़ ऑनलाइन नहीं हो पातीं. कलीग्स या जूनियर थोड़ी कटाक्ष  कर ही जाते हैं. बीच में लंच टाइम में एक पोस्ट लिख कर डाल  दी. और उस पर मिले कमेन्ट दूसरे दिन लंच टाईम पर पढ़े .दूसरों की पोस्ट पढने और कमेन्ट करने का वक़्त तो मिल ही नहीं पाता.

इन सबके साथ, रिश्तेदारों का आगमन, बच्चों की बीमारी, डॉक्टर का चक्कर, बच्चों का बर्थडे ,तीज-त्योहार, घर मे पार्टियों की तैयारी, रिश्तेदारों के सैकड़ों फोन और उलाहने, जब से ब्लॉग्गिंग शुरू किया है,तुम्हारे पास तो टाइम ही नहीं.

तो इसलिए बनायी जाती है  महिला ब्लोगरों पर कोई फिल्म. क्यूंकि इतने सारे रंग हैं उनके जीवन में.जिन्हें फ़िल्मी कैनवास पर बखूबी उतरा जा सकता है.

Monday, March 22, 2010

एक खूबसूरत फिल्म जिसकी नायिका एक ब्लॉगर है



हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म "जूली एन जूलिया 'का रिव्यू पढ़ा तो तय कर लिया यह फिल्म तो हर हाल में देखनी ही है. पर वही बेटे के दसवीं के बोर्ड ने हर राह पर तालेबंदी कर रखी थी.उसकी परीक्षा ख़त्म हुई और मैंने अपने तमाम व्यस्तताओं को धता बताकर इसे देखने का समय निकाल ही लिया. आखिर आपलोगों के साथ बांटना भी तो  था :)

जूली एन जूलिया दो सच्ची कहानियों पर आधारित है.एक जूलिया चाइल्ड द्वारा लिखित "My life in France " और दूसरी जुडिथ पोवेल द्वारा लिखित Juli and Juliya ' ये दोनों ही किताबें उनके संस्मरणों पर आधारित हैं. Nora Ephron ने अपने  शानदार निर्देशन में बिलकुल सच्चाई  से उनकी  ज़िन्दगी को फ़िल्मी कैनवास पर उतारने की कोशिश  की है.,
Meryl Streep और  Amy Admas ने बहुत सधा हुआ अभिनय किया है

२००२ में २९ वर्षीय जूली ,एक पत्रिका में अपनी सब एडिटर की नौकरी छोड़, अपने पति के साथ उसके ऑफिस  के पास एक छोटे से फ़्लैट में शिफ्ट हो जाती है.वह एक कॉल सेंटर में काम करने लगती है, पर अनजान जगह,एक छोटा सा फ़्लैट और दिन भर लोगों  की समस्याओं से जूझना,ये सब मिलकर उसे बहुत परेशान कर देते हैं. उसे खाना बनाने का बहुत शौक है और वह रोज एक नयी रेसिपी ट्राई  करके अपनी थकान उसमे भुलाने की कोशिश  करती है.

एक बार वह अपनी पुरानी सहेलियों के साथ लंच पर जाती है.वे सब अपने अपने क्षेत्रों में काफी सफल हैं. वे सब एक अभिनेत्री के ब्लॉग की चर्चा करती हैं.जूली, घर आकर अपने पति को बताती है, कि वह उस अभिनेत्री से कहीं ज्यादा अच्छा लिख सकती है.
"हाँ, क्यूंकि तुम एक लेखिका हो " उसका पति कहता है.
"एक ऐसी लेखिका जिसका नॉवेल  नहीं छपा है. जबतक नॉवेल छपे नहीं उसे लेखिका नहीं कह सकते."
"तो फिर, तुम भी अपना एक ब्लॉग बना लो और उसमे लिखो"
"पर लिखूं क्या"
"हम्म इस जगह के बारे में कि तुम्हे ये कितना पसंद है"
"यह जगह मुझे नहीं पसंद"
"अपने जॉब के बारे में लिखो"
"और किसी  ऑफिस वाले ने पढ़ लिया तो मुझे नौकरी से निकाल देंगे.मैं कुछ ऐसा लिखना चाहती हूँ कि जिससे मुझे ख़ुशी मिले और मैं अपनी  दिन भर की परेशानी भूल जाऊं. जैसी ख़ुशी मुझे नए नए व्यंजन बनाने में मिलती है"
"तो अपने खाना बनाने के अनुभव के बारे में  लिखो"
और जूली तय करती है कि वह अपनी प्रिय लेखिका 'जूलिया चाईल्ड' की किताब से रोज कुछ  रेसिपी ट्राई करेगी और उसके अनुभव के बारे में अपने ब्लॉग में लिखेगी.वह एक डेड लाईन रखती है.३६५ दिन में ५२४ रेसिपी.
शुरुआत  में वह अपने पोस्ट के अंत में लिखा करती है. Are you listening? Whoever you are...या फिर  is there anybody ??somebody??anyone ??  वह अपने पति से कहती  है कि ऐसा लग रहा है मैं यह सब लिख कर शून्य में भेज रही हूँ.

जूली की माँ भी उसे फोन पर  डांटती  है कि वह क्यूँ अपना समय बर्बाद कर रही है. कोई उसे नहीं पढता"
"लोग पढेंगे  माँ "जूली कहती है.

दस दिन बाद उसे एक कमेन्ट मिलता है. वह खुश हो जाती है. पर वह उसकी माँ का कमेन्ट था और यही लिख था कि 'क्यूँ अपना समय बर्बाद कर रही है'.
एक महीने के बाद उसे १२ कमेन्ट मिलते हैं.वह अपने  पति को खुश होकर बताती है कि वह इनमे से किसी को जानती तक नहीं. दो महीने के बाद उसके ऑफिस में कदम रखते  ही उसकी सहेली बताती है. उसके लौब्स्टर वाली पोस्ट पर उसे ५३ कमेंट्स मिले हैं.वह ख़ुशी से  झूम उठती है.


फिल्म में जूलिया चाइल्ड की कहानी  भी साथ साथ चलती है कि कैसे १९४९ में जूलिया ४० साल की  उम्र में अपने पति के साथ फ्रांस आई और उसने समय काटने के लिए एडवांस्ड कुकिंग कोर्स  ज्वाइन किया.क्लास में सब पुरुष थे और किसी ना किसी होटल में शेफ थे.वे सब जूलिया को हिकारत से देखते थे क्यूंकि जूलिया उनकी तरह तेज़ी से प्याज नहीं काट पाती थी. जूलिया ने घर आकर करीब दस किलो प्याज काटकर अभ्यास किया. और अगले दिन क्लास में सबसे फुर्ती से प्याज काट कर रख दिए. इसी तरह वह हर कार्य में मेहनत करती और क्लास की सबसे तेज़ और मेहनती छात्रा बन गयी.
 

एक बार एक पार्टी में जूलिया को दो महिलायें  मिलती हैं.जो अंग्रेजी में फ्रेंच व्यंजनों की एक किताब लिख रही थीं.उनके निमंत्रण पर जूलिया भी उनके साथ हो गयी. पर प्रकाशक किताब छापने से मना  कर देते हैं कि यह बहुत बड़ी है.फिर  जूलिया अपने दम पर सारे व्यंजनों को नया रूप देकर, पका कर,चख कर ..उनकी रेसिपी लिख डालती है. इसमें उसे ८ वर्ष लग जाते हैं.एक दो जगह से रिजेक्ट होने के बाद यह किताब Masterin the Art of  French Cooking  के नाम से छपती है. आज तक इसके ४९ एडिशन छप चुके हैं.

इधर जूलिया का ब्लॉग पोपुलर होने लगा है. एक अखबार के रिपोर्टर ने उसके ब्लॉग के बारे में लिखना चाहा . जूलिया उसे खाने पर बुलाती है और यह सब अपने ब्लॉग में लिख देती है. वह एक बहुत ही कठिन रेसिपी बनाती है.जिसे पकाने में ढाई घंटे लगते हैं.वह  टाइमर लगा कर सो जाती है और वह व्यंजन जल जाता है. दूसरे दिन वह ऑफिस में फ़ोन कर देती है कि तबियत ख़राब है और फिर से वह व्यंजन बनाती है. लेकिन बारिश की वजह से वह रिपोर्टर नहीं आता. ये सारी बातें वह ब्लॉग में लिख देती है. दूसरे दिन उसके बॉस ने उसे बुलाकर जबाब तलब करते हैं  क्यूंकि उसके ब्लॉग में वे सारी असलियत पढ़ चुके थे. अब उसके ऑफिस के लोग थोड़ा उस से डरने लगे थे कि क्या पता वह उनकी बातें जाकर ब्लॉग में लिख देगी.

इस बीच कई दुखद क्षण भी आए. जब उसकी तबियत काफी खराब हुई...फिर भी पति के मना करने के बावजूद उसने पोस्ट लिखी,यह सोच कि उसके पाठक निराश हो जाएंगे.एक बार एक व्यंजन खराब हो जाने पर बहुत हिस्टिरिकल भी हो गयी. उसका पति उसे हर तरह से सहयोग  करता था. पर उस दिन नाराज़ हो गया कि उसका सारा ध्यान सिर्फ ब्लॉग में रहता है.और घर छोड़कर अपने ऑफिस में रहने चला गया.पर जाते जाते कह गया कि ये सब वह अपने ब्लॉग में मत लिख देना.

जूली सारी बातें तो नहीं लिखती,पर ये  लिखती है कि वह बहुत दुखी है .एक अच्छा इंसान नहीं बन पा रही. उसकी आदर्श जूलिया कभी कोई व्यंजन बिगड़ जाने पर इस तरह का व्यवहार नहीं करती. अपने पति का बहुत ध्यान रखती.उसका पति ये सब पढ़कर वापस आ जाता है.
उसका पति ऑफिस से फोन करता है कि जूलिया का ब्लॉग नेट पर पढ़े जाने वाला तीसरा सबसे लोकप्रिय ब्लॉग है. एक दिन न्यूयार्क टाइम्स का  एक रिपोर्टर उसका इंटरव्यू लेता है और वह पहले पेज पर प्रकाशित होता है.जूलिया ट्रेन में जा रही है और बगल में बैठे आदमी को अपने ऊपर लिख लेख पढ़ते देखती है. बाज़ार में प्लेटफ़ॉर्म पे कई जगह वह लोगों  को वो लेख  पढ़ते देखती है.
जब घर आती है तो उसके फ़ोन के आंसरिंग मशीन पर ६५ मैसेज पड़े होते हैं. पत्रिकाओं , अखबारों और ,पब्लिशिंग हाउस से उसे लिखने के ऑफर मिल रहें थे.इस बीच उसकी माँ का भी फोन था कि पडोसी, रिश्तेदार दोस्त सबलोग उसे फोन पर बधाई दे रहें हैं और वह बहुत खुश है.
४ दिन बाकी है ३६५ दिन पूरे होने में. और अपन कमिटमेंट पूरा कर जूली अपने दोस्तों को पार्टी देती है और सबके सामने कहती है कि "अपने पति एरिक के सहयोग के बिना वह यह सब नहीं कर पाती और ग्लास उठा कर टोस्ट करते हुए, वही शब्द दुहराती  है जो कभी जूलिया के पति ने जूलिया को कहे थे,"You are butter to my bread
                 You are life to my breath "
                                               
फिल्म में दोनों पुरुषों का किरदार बहुत ही पॉजिटिव  है. दोनों अपनी पत्नी को पूरा सहयोग देते हैं और वे जब भी निराश,हताश होती हैं तो उनका अपने में विश्वास जगाते हैं और उत्साह बढाते हुए कहते हैं कि वह अपने मकसद  में जरूर कामयाब होंगी.

आशा है  आपलोगों  को फिल्म अच्छी लगी होगी.:)

Thursday, March 18, 2010

सपनो के शहर मुंबई में सच होता एक सपना



आज Mumbai Mirror (लोकल अखबार) में एक खबर पढ़ी तो सोचा आप सब से बाँट लूँ. आजकल अखबारों में हत्या,लूटपाट,धोखा धडी की ख़बरों से ऐसा पटा होता है कि ऐसी कोई खबर पढो तो लगता है हाँ ज़िन्दगी सांस ले रही है. उम्मीद मिटी नहीं है.ईमानदारी, मानवता सब इस दुनिया में शेष हैं.अगर सपने देखो तो सच भी हो सकते हैं.

महादेव बिरादर जिसे सब प्यार से देवा बुलाते हैं. कर्नाटक के छोटे से गाँव से अपने पिता के साथ मुंबई चादर खरीदने आया था. उसके पिता मुंबई से चादरें खरीद कर ले जाते और गाँव गाँव घूम कर बेचते. जब दादर स्टेशन के पास उसने लोगों का ऐसा रेला देखा तो उस लगा कोई तो बात है इस शहर में जो लोग ऐसे खींचे चले आते हैं. और उसने निश्चय कर लिया कि वह भी अपनी किस्मत आजमाने जरूर आयेगा.

कुछ ही दिन बाद सिर्फ प्राइमरी पास २५ वर्षीय देवा एक छोटा सा बैग और आँखों में हज़ारो सपने लिए इस मायावी शहर में दाखिल हुआ. जैसा कि इन बाहर से आए युवकों के साथ होता है. वह भी फूटपाथ पर सोता और नौकरी ढूंढता. एक रेस्टोरेंट में उसे वेटर की नौकरी मिल गयी. वह पूरे लगन से काम करता. होठों पर मुस्कान सहेजे सबसे विनम्रता से पेश आता.

सड़क के पार एक रियल स्टेट का ऑफिस था.उसके मालिक रोज उस रेस्टोरेंट में आते.
वे देवा के व्यवहार से काफी प्रभावित हुए.. उन्होंने देवा को अपने ऑफिस के देखभाल की जिम्मेवारी सौंपी .क्यूंकि वे दूसरी जगह शिफ्ट हो रहें थे. देवा ने बहुत ईमानदारी से अपना काम निभाया. ऑफिस में करोड़ के करीब कैश पड़े रहते . क्यूंकि ये रियल स्टेट वाले लोग काफी रकम कैश में ही लेते हैं. लेकिन देवा ने कभी एक सौ का नोट भी नहीं छुआ. करीब एक साल बाद उन साहब ने अपना ऑफिस बेचने का फैसला किया. अब फिर से देवा के सड़क पर आ जाने के दिन थे. पर वे उसके काम और ईमानदारी से इतने खुश थे की उन्होंने थोड़ी रकम देवा को दी और कहा कि वो भी रियल स्टेट का काम शुरू करे. और अपना काम पूरे लगन और ईमानदारी करे. अपने एक मित्र के ऑफिस में उसे काम सीखने का अवसर भी दिया. मुंबई में फ़्लैट ,दुकान का खरीदना बेचना.किराये पर लेना. सब इन ब्रोकर्स के जरिये ही होता है. और खरीदने वाले और बेचने वाले दोनों को कुछ निश्चित रकम ब्रोकर्स को देनी होती है. इस काम में किसी शैक्षणिक योग्यता की जरूरत नहीं होती. बस काम की लगन, मेहनत और वाक्पटुता चाहिए होता है. देवा के पास इनमे से किसी का अभाव नहीं था. और एक साल के अंदर ही उसने एक साढ़े सात लाख की डील को अंजाम दिया. धीरे धीरे बस दो साल में बांद्रा के हिल रोड जैसे पौश इलाके में उसने अपना ऑफिस बनाया है. और हाल में ही एक घड़ी के शोरूम की डील, इलाके के सब रियल स्टेट्स वालों को पीछे छोड़ उसने हासिल कर ली .

उसके पुराने रेस्टोरेंट के मैनेजर "मारियो मेनेन्जस' का कहना है कि देवा के चलने बैठने ,खड़े होने का का अंदाज़ ही कुछ ही कुछ ऐसा था कि देखते ही लगता था उसमे काम करने के प्रति लगन है.. वह सिर्फ पेट भरने के लिए काम नहीं करता था बल्कि अपने काम को एन्जॉय भी करता था. जिन सज्जन ने देवा को पैसे दिए, उन्होंने अपना नाम बताने से इनकार कर दिया पर इतना कहा कि इतने पैसे यूँ खुले पड़े देख किसी का भी मन डोल सकता था पर इतनी कम उम्र में भी देवा के मन में कभी लालच नहीं आया.

पर वह अपने पुराने दिन नहीं भूला. उसने अपने साथ काम करने वाले वेटर्स को अपने ऑफिस में नौकरी दी है. और आज भी जब ए.टी. एम. के पास, जहाँ वह फूटपाथ पर सोता था.,गुजरता है तो एक मिनट को रुक कर उस जगह को जरूर याद कर लेता है.

जिनमे जज्बा हो, लगन हो, ईमानदारी हो,और जो परिश्रमी हों.उन्हें थोड़ी सी अच्छी किस्मत का साथ मिले तो , सफलता उनसे दामन नहीं छुड़ा पाती.

Tuesday, March 16, 2010

'जब वी मेट' के निर्देशक 'इम्तियाज़ अली' एक फिल्म और बना सकते हैं 'जब वी फेल'


'जब वी मेट' फिल्म युवाओं और बच्चों की ख़ास पसंद है. मुझे भी बहुत अच्छी लगी थी, जाहिर है, कई महिलाओं को भी पसन्द आई होगी. तकरीबन हर उम्र के लोगों ने पसंद किया और इसी वजह से इतनी सुपर डुपर हिट हुई .और इसका सारा श्रेय उसके युवा डाइरेक्टर 'इम्तियाज़ अली' को जाता है.

'जब वी मेट' के पहले भी इम्तियाज़ अली ने एक फिल्म बनायी थी ,'सोचा ना था' यह सुपर हिट तो नहीं हुई पर कई लोगों के फेवरेट फिल्म की फेहरिस्त में शामिल है.(मेरे भी ) बॉलीवुड का रुख करने से पहले, 'इम्तियाज़ अली' सात साल तक टेलिविज़न से जुड़े रहें. जी.टी.वी. के लिए 'कुरुक्षेत्र और स्टार प्लस के लिए 'इम्तहान' सीरियल का निर्देशन किया था.

पर इन सारी कामयाबियों की जड़ में उनकी एक बहुत बड़ी असफलता भी दुबकी हुई है. और उनका जीवन 'असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी है' इस कथन को पूरी तरह चरितार्थ करता है.' बचपन में इम्तियाज़ पढने में बहुत अच्छे थे उन्हें डबल प्रमोशन भी मिला पर टीनेज़ आते ही पढाई की तरफ ध्यान कम हो गया और नवीं कक्षा में वे फेल हो गए. यह उनके ज़िन्दगी का 'टर्निंग पॉइंट' था.

टीनेज में वह बहुत ही शर्मीले और संवेदनशील किशोर थे. संवेदनशील तो अब भी हैं और यह उनकी बनाई फिल्मों से झलक जाता है. उस उम्र में नवीं में फेल हो जाना वो भी को-एड स्कूल में.बहुत बड़ा धक्का था ,उनके लिए. पर उनके माता-पिता ने उनको बहुत सहारा दिया. उनक मन बदलने को उन्हें 'कश्मीर' घुमाने ले गए. यहाँ माता-पिता की भूमिका बहुत अहम् हो जाती है. ऐसी स्थिति में किसी भी माता-पिता को कुछ ऐसे ही कदम उठाने चाहिए ना कि बच्चे को शर्मिंदगी महसूस करवाते रहना चाहिए.

काश्मीर ट्रिप के बावजूद..इम्तियाज़ अंदर से बिलकुल टूट गए थे. यह सोच कि सारे दोस्त अगली क्लास में चले गए होंगे और उन्हें अपने जूनियर के साथ,बैठना पड़ेगा और वे उन्हें एक फेलियर समझेंगे और वैसा ही व्यवहार करेंगे.यह ख़याल ही उन्हें कचोट डालता. स्कूल शुरू होने पर चार दिन तक वे स्कूल नहीं गए. फिर सर झुकाए क्लास में दाखिल हुए. नए क्लास में उनका कोई दोस्त नहीं था.
माता-पिता का सपोर्ट था और उस क्लास में बस एक दोस्त बना उनका.पर इम्तियाज़ को पता था,उन्हें अपनी मदद आप ही करनी है इम्तियाज़ अली ने एक और चीज़ की तरफ इशारा किया है.उनके रिपोर्ट कार्ड में लिख होता था,Imtiaz Ali ( R) यानि Repeater अगर ऐसी परंपरा आज भी कायम है तो स्कूल वालों को इसका ध्यान रखना चाहिए. हमेशा यह अहसास दिलाते रहना कि वह एक 'फेलियर'या 'रिपीटर' है...बच्चे के कोमल मन पर घातक प्रभाव डाल सकता है...

उनका कहना है कि फेल होने पर ही उन्हें समझ में आया कि उन्होंने अपना दिमाग कभी इस्तेमाल ही नहीं किया. एक रूटीन की तरह स्कूल जाते रहें. रूटीन की तरह होमवर्क करते रहें,खेलने जाते रहें. हर काम एक पैटर्न के तहत करते रहें. पर मन से उसे ही जीवन मान कभी कुछ नहीं किया. एक ही कक्षा में दुबारा पढने की मजबूरी ने उन्हें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया. और वह हर चीज़ को बहुत बारीकी से देखने लगे. अपने काम पर पूरी तरह ध्यान केन्द्रित कर लगन से उसे अंजाम देने लगे. उन्होंने एक बहुत ही सटीक बात कही है, "अगर आप पूरी लगन से कोई काम नहीं करते तो ज़िन्दगी उलझ सी जाती है.जिसे आपको ही सुलझाना पड़ता है. और यही सुलझाने की प्रक्रिया,आपकी ज़िन्दगी की कहानी बन जाती है " इम्तियाज़ ने अपनी ज़िन्दगी को बारीकी से परखा, अपनी कमियों को समझा और फलस्वरूप कॉलेज में तीन साल तक टॉप किया. तीन साल तक 'नेशनल जूनियर बास्केट बाल' टीम के सदस्य रहें. कॉलेज में कई नाटक किये और सबकी खूब प्रशंसा बटोरी.

इम्तियाज़ अली का कहना है कि अगर वे नवीं में फेल नहीं करते तो ज़िन्दगी को कभी इतनी गंभीरता से नहीं लेते,अपनी खूबियों को नहीं पहचान पाते और एक साधारण सी आम ज़िन्दगी जी रहें होते.

इतियाज़ अली की ज़िन्दगी के इस हिस्से के बारे में मैंने इसीलिए लिखा है कि हम भी ये सारी बातें जानते हैं पर जब अपने सामने कोई ऐसा उदाहरण देखते हैं तब जाकर इसे अच्छी तरह समझ पाते हैं कि कैसे कभी कभी असफलता हमारे व्यक्तित्व के पूर्ण विकास में सहायक हो जाती है. इसलिए असफल होने पर ना तो माता-पिता को बहुत चिंता करने की जरूरत है,ना ही बच्चों को परेशान होने की. बल्कि अभिभावकों के स्नेहिल हाथों का सहारा ले वे कदम ब कदम सफलता की सीढियां तय कर सकते हैं.

Friday, March 12, 2010

बैगन की व्यथा कथा



आजकल एक मामूली सी उपेक्षित सी सब्जी बैगन ख़बरों में है.उस पर विदेशियों ने प्रयोग किये हैं और एक ऐसे बैगन(BT Brinjal ) की किस्म तैयार की है जिसमे कीड़े नहीं लगेंगे.और.(GEAC) ने अक्तूबर से इसके कमर्शियल रिलीज़ की अनुमति दे दी है.कृषि मंत्री 'शरद पवार' ने कहा है कि जबGEAC ने इसे स्वीकृति दे दी है तो सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती.पर पर्यावरण मंत्री 'जय राम रमेश' ने कहा है कि पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति जरूरी है. वे कई शहरों में मीटिंग कर रहें हैं और कई लोग BT Brinjal का विरोध कर रहें हैं.अभी तो बहस जारी है और किसी नतीजे पर सरकार नहीं पहुंची है.
बहरहाल मैं तो बहुत खुश हूँ कि मेरी प्रिय सब्जी इतनी चर्चा में है.मेरा बैगन प्रेम सर्वविख्यात(जितने लोगों तक मेरी पहुँच) है.

माँ ने मेरे बचपन का एक किस्सा सुनाया कि जब मैं शायद सिर्फ ढाई साल की थी. पापा हेड ऑफिस जा रहें थे,उन्होंने प्यार से पूछा "तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊं?"...लडकियां, गुडिया,चौकलेट,खिलौने की फरमाईश करती हैं. इतना मशहूर गाना भी है, "पापा जल्दी आ जाना छोटी सी गुडिया लाना"..और मैं बेवकूफ. मैंने कहा था,'बैंगन ले आना' (मन तो नहीं होता विश्वास करने का कि कभी इतनी बेवकूफ भी मैं थी, पतिदेव सुन लें तो कहेंगे "थी???") .मेरे पापा बहुत पेशोपेश में पड़े क्यूंकि बिहार में अफसरों की एक शान होती है ,वे कभी सब्जी नहीं खरीदते. इसके लिए सरकार उन्हें एक अर्दली और चपरासियों की एक फौज मुहैया करवाती है. वे तो क्या उनके घर का कोई भी सब्जी खरीदने नहीं जाता. मैंने भी शादी के पहले कभी सब्जी नहीं खरीदी.जब पहली बार शादी के बाद दिल्ली में 'वीर बाज़ार' में नीचे बैठकर तराजू पर आलू प्याज चढ़ाए वह तस्वीर अब भी आँखों के आगे स्थिर है.

खैर , पापा ने एक तरीका ढूंढ निकाला.उन्होंने एक फल वाले को बोला कि आधा किलो बैंगन खरीद कर रखे. शाम को ममी ने एक ब्राउन लिफ़ाफ़े(जिन्हें ठोंगा कहते थे) में से जब दो चमकते हुए बैगन निकाले तब उन्हें सारी कहानी पता चली.

जब थोड़ी बड़ी हुई तब सबके सामने 'बैगन' की शान में कसीदे पढ़ती रहती पर सब इसे . 'बेगुन' कहते और मैं इसे 'बहू गुण'.

आज भी जब सुबह मॉनिंग वाक से लौटते हुए सुबह की किरणें , गोल मटोल बैंगन पर पड़ते हुए देखती हूँ तो बरबस ही वह छटा मन मोह लेती है..मैं सहेली की तरफ देखती हूँ, "एक्चुअली सब्जी तो है फ्रिज में, पर ले लूँ?' वह बोलती है.."हाँ हाँ..बैंगन देख कर तुम कैसे रुकोगी' .कभी अगर बातचीत के दरम्यान कह दिया कि मुझे आलू,भिन्डी नहीं पसंद और एक ने पूछ लिया 'फिर तुम्हे पसंद क्या है ?" दूसरी सहेली तुरंत टपक पड़ती है..."अरे! इसे तो बैंगन पसन्द है बैंगन."

कल का अखबार खोला,तो बड़ा सुकून महसूस हुआ,अकेले मैं ही इस सब्जी की मुरीद नहीं .किसी सतीश शर्मा ने टाइम्स ऑफ इंडिया में ठीक एडिटोरियल के नीचे "बैगन का ब्लॉग 'नाम से एक लेख लिखा है और बैंगन की व्यथा कथा बैगन के ही शब्दों में ही बयाँ की है

बैगन उवाच ;

अब तक लोग मुझे घर की मुर्गी दाल बराबर समझते रहें .जब विदेशियों ने मुझपर प्रयोग किये तब मेरी महत्ता को समझा

मुझसे ये सौतेला व्यवहार क्यूँ करते हैं सब?.भारत में पूरब से पश्चिम,उत्तर से दक्षिण हर घर के किचेन में मेरा बसेरा है. पर जब देखो वे बस आलू प्याज के ही गुण गाते रहेंगे... और उनकी ही महंगाई का रोना.प्याज को तो इलेक्शन इशु तक बना डाला.

मैंने हमेशा गृहणियों का साथ दिया है.कभी इतना महंगा नहीं हुआ कि उनकी पर्स इजाजत ना दे.पर उन्हें भी मेरी कोई कद्र नहीं. कोई मेहमान आए तो आलू दम बनाएंगी, दोप्याजा बनाएंगी,भिन्डी भी बना लेंगी पर मुझ बैगन पर कोई रहमो करम नहीं.

कितनी फिल्मो में भी डायलॉग रहता है, "अरे बेटा भिन्डी खा लो भिन्डी' या फिर 'मटर पनीर पर कंसंट्रेट करो.' कभी नहीं सुना "और बैगन लो"

यहाँ तक कि चुनाव में आलू का एक गाना भी बना दिया, "जबतक रहेगा समोसे में आलू.." पर मुझ बैगन को किसी ने चुनाव चिन्ह तक बनाने की नहीं सोची. और ये समोसे में आलू ही क्यूँ भरते हैं?,बैंगन क्यूँ नहीं? पराठे भी बनायेंगे गोल गोल घी में तर पर मुझे बेसन में लपेट अजीब सी शक्लों में तल कर पकौड़े बना डालेंगे या फिर सीधा ही आग में जला डालेंगे. मेरी कोमल चिकनी त्वचा का क्या हाल कर डालते हैं.उस मटमैले रूखी त्वचा वाले आलू को तो पानी में डाल कर उबालते हैं.

मेरे पर एक कहावत तक नहीं.उस टेढ़ी मेढ़ी शक्ल वाले अदरक पर है.'बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद".उस मिटटी में लिपटी मूली के लिए है 'किस खेत की मूली हो" पर मेरे ऊपर इतना नेगेटिव कहावत, 'थाली का बैंगन"

मेरी सुन्दरता को भी नज़रंदाज़ कर दिया.सारे हरे रंग की सब्जियों के बीच मेरा रंग कितना सुन्दर लगता है,स्मूथ स्किन और स्लिम फिगर या फिर खाते पीते घर की गोल मटोल.विदेशियों ने तो 'एपल' और 'ब्लैक बेरी' पर सेल फोन लौंच किये तो मैंने बुरा नहीं माना.पर जब एक भारतीय ने लेमन को मेरे ऊपर प्राथमिकता दी तो ये गाने के सिवा कोई चारा ना रहा ,'जब दिल ही टूट गया..."

उस भिन्डी के ऊपर मुंबई में एक पूरा 'भिन्डी बाज़ार' है. दरभंगा में कोहंडा जैसी अजीब सी सब्जी के ऊपर 'कोहंडा बाज़ार' है पर मेरे इतने सुन्दर नाम बैंगन के ऊपर बरेली में एक गली तक नहीं.

बच्चे मेरा नाम सुनते ही कहते हैं,'मैं बैंगन नहीं खाता/खाती' ऐसा ही बच्चे पालक के लिए कहते थे और देखो विदेशियों ने एक कार्टून कैरेक्टर 'popeye 'ही बना दिया जो जैसे ही पालक (स्पिनेच ) खाता है उसे शक्ति आ जाती है.पर किसी ने नहीं सोचा कि मेरे ऊपर एक कार्टून कैरेक्टर बनाए जो बैगन खाता हो.

और अब देखो लोग मेरी ही चर्चा में अखबार रंगे जा रहें हैं..मैं तो अब सेलिब्रिटी बन गया हूँ. अब मैं अपना एक पी.ए.रखने जा रहा हूँ . अब कहीं कोई मेरे बारे में लिखेगा तो उसे पहले मेरी परमिशन लेनी होगी.(आलू,प्याज अपना आवेदन पत्र भेज सकते हैं)

Sunday, March 7, 2010

ऐसी है, आज की नारी

जब से ब्लॉगजगत में शामिल हुई हूँ, अपनी सहेली द्वारा वर्णित इस घटना के विषय में लिखने की सोच रही थी. और आज महिला दिवस के अवसर पर इसका जिक्र सबसे उपयुक्त लगा.

पहले अपनी सहेली का संक्षिप्त परिचय दे दूँ. (परिचय क्यूँ जरूरी है,आपको आगे पता चल जायेगा) . अंग्रेजी में बी.ए.(ऑनर्स) करने के बाद वह, इकॉनोमिक टाईम्स, आइलैंड, सोसाईटी जैसी पत्रिकाओं से पत्रकार के तौर पर जुड़ी रही. शादी के बाद भी काम करती रही, पर बच्चों के जन्म के बाद नियमित पत्रकारिता, छोड़,फ्रीलांसिंग अपना ली.पहले भी वर्क असाईमेंट पर अकेली,सिंगापुर,मॉरिशस वगैरह जाती थी, पर तब हफ़्तों के लिए जाती थी,अब हैदराबाद,दिल्ली वगैरह,सुबह जाकर शाम को चली आती है,वजह वही बच्चों की देखभाल.

जब मैंने कहा, 'तुम्हारा नाम लिख दूँ,ना?' तो बोली.."रहने दो, नाम से ज्यादा कथ्य महत्वपूर्ण है." इस आलेख में उसे मुदिता नाम से संबोधित करती हूँ, क्यूंकि उसे यह नाम बहुत ज्यादा पसंद है. जब मैंने पूछा, "इतना पसंद है,तो अपनी बेटी का क्यूँ नहीं रखा?."..बोली,"पति को 'अनघा' नाम ज्यादा पसंद था".(वे पुरुष,जो समझते हैं, आधुनिक स्त्रियाँ सिर्फ अपने मन का चलाती है , वे आश्वस्त हो जाएँ कि यह बस उनका भ्रम है. अगर वे स्त्रियों को इज्जत देते हैं तो दुगुनी इज्ज़त,उनसे पायेंगे.)

मुदिता के पिता ,काफी बीमार थे और ICU में एडमिट थे. जिनके भी प्रियजन, ICU में हों,उनके एक परिवारजन को चौबीस घंटे उनकी निगरानी के लिए रहना होता है. मुम्बई में ज्यादातर ये जिम्मेवारी औरतें ही निभाती हैं. एक बड़े से हाल में कुछ पतली बेंचें और आराम कुर्सियां पड़ी होती हैं.पूरा समय उन्हें उसी पर गुजारना पड़ता है,रात में भी उसी पर सोना पड़ता है,अधिकतर रात में भी औरतें ही,वहाँ सोती हैं क्यूंकि पति को दिन में ऑफिस जाना होता है,और उन्हें रात में पुरसुकून नींद की जरूरत होती है. मुदिता भी रोज रात वहीँ सोती थी. एक रात वह सोने की कोशिश कर रही थी कि उसे कुछ आभास हुआ.मध्यम रोशनी में उसने देखा, कोने में रखी 'ईसा मसीह' की मूर्ति के पास एक नारी आकृति घुटनों पर झुकी प्रार्थना में लीन है. पर उसके कंधे बार बार काँप रहें थे जिससे पता चल रहा था कि वह निशब्द रो रही है.

मुदिता ,उठ कर उसके पास गयी और उसके कंधे पर हाथ रखा तो वह बेआवाज़ ही फफक पड़ी. मुदिता उसके पास ही फर्श पर बैठ गयी.पूछने पर पता चला,वह सिर्फ मराठी ही बोल पाती है.मुदिता, दक्षिण भारतीय है और उसकी संपर्क भाषा ,अंग्रेजी है.पर मुंबई में पले ,बढे होने के कारण उसने दसवीं तक 'मराठी' भाषा पढ़ी थी.जो आज काम आ गयी.

मुदिता के स्नेह पगे स्वर और आत्मीय स्पर्श ने उसे अपना दिल खोल कर रखने पर मजबूर कर दिया.उसने बताया कि वह 'कोली' जाति की है (यह मछुआरों की जाति होती है ).उसके पूर्वजों ने क्रिश्चन धर्म अपना लिया था जिससे उसे ग्लोरिया जैसा सुन्दर नाम मिल गया.ग्लोरिया ने प्रेम विवाह किया था.उसका पति मुहँ अँधेरे उठ कर मछली पकड़ने जाता और दिन में ग्लोरिया वही मछली बाज़ारों में बेचने जाती.उनके दिन आराम से कट रहें थे. जीसस ने उन्हें दो बेटों से नवाज़ा और दंपत्ति अब तीसरी संतान के आगमन की प्रतीक्षा कर रहें थे. तभी ग्लोरिया का पति मलेरिया से ग्रसित हुआ और ईश्वर ने उसे अपने पास बुला लिया.वह बेटी का मुहँ भी नहीं देख पाया.

तीन बच्चों के लालन पालन की जिम्मेवारी,ग्लोरिया पर आ पड़ी.अब उसे कोई मछली पकड़ कर लाकर देनेवाला भी नहीं था.लिहाज़ा उसने सूखी,मछली बेचना शुरू किया.(मुंबई में सूखी मछली, मछली का अचार, मछली की चटनी बहुत प्रचलित है,उसपर एक पोस्ट फिर कभी ) ग्लोरिया के बच्चे अब स्कूल जाने लगे. यहाँ कई अच्छे स्कूल हैं,जिनकी फीस ७,८ रुपये है.उन स्कूलों में 'जेनेरल मैनेजर', डॉक्टर, इंजीनियरों के बच्चों से लेकर ऑटोवाले,कामवालियों के बच्चे भी पढ़ते हैं. लेकिन फीस के अलावा भी बच्चों की सौ जरूरतें होती हैं. ग्लोरिया ने घरों में बर्तन मांजने का काम भी शुरू कर दिया. अब वह दिन में घरों में काम करती और शाम को एक घंटे का सफ़र तय कर शाम ६ बजे से ९ बजे तक बड़े बाज़ार में मछली बेचने जाती. घर लौटने में रात के दस बज जाते.

ऐसे ही संघर्ष करते दिन बीत रहें थे.इस बीच, उसका १४ वर्षीय बेटा बीमार पड़ गया. एक दिन रात दस बजे लौटी तो देखा,बेटा बेहोश पड़ा है. पास के डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने बड़े अस्पताल में ले जाने को कहा. इस अस्पताल में उसे 'मेनिन्जाईटिस' रोग बता कर ICU में भर्ती कर लिया गया. इस अस्पताल में गरीबों के लिए खर्च में ५०% की कटौती की सुविधा है.फिर भी ग्लोरिया को २५ हज़ार रुपये का इंतज़ाम करना था.बेटा ICU में और वह पैसे के लिए दर दर भटकने लगी. दो-तीन चर्च में जाकर गुहार लगाई. चर्च में गरीबों के लिए एक कोष होता है, जिससे उसे काफी मदद मिली. कुछ पैसे महाजनों से भी लेने पड़े.

इन सब चक्करों में वह तीन दिनों तक घर नहीं जा पायी. घर पर दो छोटे बच्चे थे. पास में रहने वाली बहन ने उनकी देख रेख की. बहन की स्थिति भी 'रोज कुआं खोदो और रोज पानी पियो' जैसी ही थी. वह इस से ज्यादा ग्लोरिया की कोई और मदद नहीं कर सकती थी. ग्लोरिया के दिन भी कभी दो बिस्किट ,कभी एक बड़ा पाव पर कट रहें थे.

बेटे की स्थिति अब कुछ संभल गयी थी.पर इन परेशानियों ने ग्लोरिया की आँखों से नींद जुदा कर दी थी. वह आँखें बंद करती और सर दर्द से कराहते बेटे का चेहरा सामने आ जाता और नींद खुल जाती. मुदिता ने उसे बहुत समझाया कि उसका समय पर खाना खाना,पूरी नींद लेना, अपना ख़याल रखना कितना जरूरी है.तभी वह अपने तीनों बच्चों का ख़याल रख पायेगी.उन्हें एक अच्छा भविष्य दे पाएगी.उसे समझा बुझा कर सोने भेजने में रात के ३ बज गए.

सुबह ग्लोरिया ने बताया कि अरसे बाद उसे इतनी अच्छी नींद आई है और वह बहुत हल्का महसूस कर रही है.अब मुदिता ने ग्लोरिया का अलग ही रूप देखा.वह बहुत ही चुलबुली और बातूनी थी.सबके पास जाकर बैठती,उनके हालचाल पूछती.किसी की भी मदद को झट तैयार हो जाती. एक रात, करीब एक बजे एक सत्तर वर्षीया वृद्धा आयीं,जिनकी बेटी को दमे का अटैक पड़ा था और उसे ICU में भर्ती कर लिया गया था. वृद्धा बहुत ही परेशान दिख रही थीं. ग्लोरिया ने जब पास जाकर पूछा,तब उन्होंने बताया कि उनके साथ कोई नहीं है और उनका बेटे से कोई कॉन्टैक्ट नहीं हो पा रहा है जो काफी दूर रहता है,जाने में करीब २ घंटे लगते हैं.ग्लोरिया ने सबको जगा दिया.सबलोग मदद के लिए आगे आ गए. पर उन वृद्धा की मोबाईल की बैटरी ख़त्म हो गयी थी और बेटे का नंबर उन्हें याद नहीं था.एक सज्जन आगे आए (महिला दिवस है,पर हम किसी पुरुष द्वारा किया गया,सत्कार्य भी क्यूँ ना याद करें) जिनके पिता खुद ICU में थे और सीरियस थे.उन सज्जन के पास अपनी गाड़ी भी नहीं थी.फिर भी रात के दो बजे वे उन माता जी को साथ ले ऑटो से उनके बेटे के घर की खोज में चल पड़े. घबराहट में वे बार बार कॉलोनी का नाम ,बिल्डिंग,लोकेशन सब भूल जातीं.पर उन सज्जन ने धैर्य बनाए रखा और दो तीन ऑटो बदल कर भी माता जी के बेटे का घर ढूंढ निकाला.

मुदिता के पिता और ग्लोरिया का बेटा स्वस्थ होकर घर लौट आए. दोनों ने मोबाईल नंबर एक्सचेंज किया और संपर्क बनाए रखा. संयोग से मुदिता और ग्लोरिया का जन्मदिन भी एक ही दिन है. जब मुदिता ने उसे विश करने को फोन किया तो बेटे ने फोन उठाया और बोला, "आज तुमचा पण बाढ़दिवस(जन्मदिन) आहे,ना? माँ सुबह बता रही थी कि आपको फोन करेगी . अभी तो काम पर गयी है."

तो ये हैं, आज की आधुनिक और सम्पूर्ण नारियाँ, जिनेक दम पर भारतीय संस्कृति फल-फूल रही है और ये उस पर एक खरोंच भी नहीं आने देंगी.एक, दिन भर घर घर में बर्तन मांजती है, शाम को मच्छी बेचती है पर चेहरे पर मुस्कान सजाये हमेशा सबकी सेवा को तत्पर रहती है. और दूसरी, फाइव स्टार में पार्टी अटेंड करती है, जींस-स्कर्ट पहनती है, अक्सर प्लेन से ही सफ़र करती है पर जरूरत पड़ने पर नंगे फर्श पर बैठ एक मछुआरिन के दुःख दर्द में शामिल होने से गुरेज़ नहीं करती.

(और यह सब उस शहर में घटित होता है ,जिसे संवेदनाविहीन कंक्रीट जंगल कहा जाता है )

Tuesday, March 2, 2010

हिंदी ब्लॉगर्स, भी ले सकते हैं प्रेरणा, इन मराठी बंधुओं से



आज मॉर्निंग वाक पर मेरी सहेली ने २८ फरवरी के हिन्दुस्तान टाईम्स में छपे एक आलेख का जिक्र किया.मेरे अनुरोध पर उसने वह अखबार मुझे भेज दिया.इसमें मराठी के ब्लॉगर्स का जिक्र है कि कैसे जनवरी की एक दोपहर करीब ६० मराठी ब्लॉगर्स. पुणे के 'पी.एल.देशपांडे' उद्यान में एकत्रित हुए और उन्होंने ब्लोग्स पर उपलब्ध मराठी साहित्य पर विचार विमर्श किया.

उस दिन सर्वसम्मति से उनलोगों ने All India Marathi Literary Meet का एक प्रस्ताव पास किया.जिसकी बैठक २६ से २८ मार्च को पुणे में होगी.जिसमे ब्लॉग को मराठी साहित्य का एक माध्यम स्वीकार करने की मान्यता दिलाने पर विचार किया जायेगा.

इस समाचार से दुनिया भर में फैले मराठी के ब्लोग्गर्स बहुत हर्षित हुए.देश विदेश से सन्देश आने लगे और वे बेसब्री से उस ब्लोगर मिलन की प्रतीक्षा करने लगे. जिसे नाम दिया गया है ,'भुजपत्र ते वेबपेज प्रवास शब्दांचा' (शब्दों की यात्रा,भोजपत्र से वेबपेज तक" )

इस प्रोग्राम के पीछे यह मंशा निहित थी की सदियों से मराठी साहित्य विकास की यात्रा पर मनन किया जाए.
इस प्रोग्राम की संचालक 'किरण ठाकुर' ने बताया कि ऐसे कार्यक्रम का उद्देश्य ब्लॉग पर लिखे जा रहें मराठी साहित्य को मान्यता दिलवाना है.

१० साल के अपने ब्लॉगकाल में मराठी ब्लोग्स ने कुछ बहुत ही सुदृढ़,गंभीर अभिव्यक्ति का मार्ग प्रशस्त किया है.

प्रख्यात मराठी लेखक, 'मुकुंद टकसाले ' ने कहा ,"आज कल की पीढ़ी ब्लॉग पर जो साहित्य रच रही है,मेरी पीढ़ी उस तरह का साहित्य शायद कभी नहीं लिख सकती थी." उन्होंने कहा कि "ऐसा नहीं है कि सारे ब्लॉग , उच्च कोटि के हैं और उनपर उच्च कोटि का साहित्य ही उपलब्ध है..पर यह औसत दर्जे की रचना हर विधा में देखने को मिलती है.लेकिन समग्र रूप में यह बहुत ही उत्साहवर्धक है."

कुछ लेखक जिनका ब्लॉग भी है,नेट पर लिखना ज्यादा पसंद करते हैं क्यूंकि इस पर त्वरित प्रतिक्रिया मिलती है.'सुनील दोइफोडे 'जो राष्ट्रीय सुरक्षा, अनुसंधान एवं विकास संस्थान में वैज्ञानिक हैं.उन्होंने बताया कि २ उपन्यास लिखने के बाद वे अब सिर्फ अपने ब्लॉग पर ही लिखना पसंद करते हैं क्यूंकि उनके ब्लॉग को करीब ४००० हिट्स रोज मिलते हैं और प्रतिक्रियाएँ भी उतनी ही बहुतायत से मिलती हैं जो प्रिंट मीडिया पर कभी भी संभव नहीं था.

एक दूसरे लेखक 'अनिल अवाछात' जो अपने ब्लॉग पर लिखना पसंद करते हैं उन्होंने कहा "यह एक बहुत ही शुभ संकेत है .कि आज हर क्षेत्र में नयी पीढ़ी इतना पढ़ रही है और लिखने की कोशिश भी कर रही है.और मुझे पूरी आशा है कि आने वाले वर्षों में ये ब्लॉग बहुत ही उच्च कोटि का साहित्य प्रदान करने में सक्षम होंगे.

ये सारी बातें हिंदी ब्लॉग जगत के लिए भी सच हैं.फिर क्यूँ नहीं आपस की सारी खींचतान,सारे मन मुटाव मिटा सारे ब्लोगर्स संगठित होकर इसके विकास के लिए प्रयासरत होते हैं.हमें प्रिंट मीडिया से अनुमोदन क्यूँ चाहिए?प्रिंट मीडिया को भी चाहिए कि इस नए माध्यम को वह दोयम दर्जे का ना समझे और जिम्मेवारी भरा रवैया अपनाए,इसे देखने का.वैसे हम खुद को ही इतना शक्तिशाली बना लेँ कि यह अभिव्यक्ति का एक नया माध्यम बन कर उभरे.

लाहुल स्पीती यात्रा वृत्तांत -- 6 (रोहतांग पास, मनाली )

मनाली का रास्ता भी खराब और मूड उस से ज्यादा खराब . पक्की सडक तो देखने को भी नहीं थी .बहुत दूर तक बस पत्थरों भरा कच्चा  रास्ता. दो जगह ...