Wednesday, October 13, 2010

गरबा - डांडिया की कुछ खुशनुमा यादें

(संयोग कुछ ऐसा है कि एक साल  पहले यह पोस्ट मैने ज़ायका बदलने के लिए डाली  थी...और आज भी,.. कुछ गंभीर आलेखों के बाद हल्का-फुल्का पोस्ट करने का मन था. नवरात्रि भी चल रही है सो मौका भी सही है और दस्तूर  भी... यह मेरे पिछले ब्लॉग की तीसरी पोस्ट थी,जिसे बहुत ही कम लोगों ने पढ़ा होगा...आज यहाँ पोस्ट कर रही हूँ.)

पिछले पोस्ट की चर्चाएं कुछ संजीदा और बोझिल सी हो चली थी.और हवा में से नवरात्र की खुशबू भी बसी हुई  है.लिहाज़ा सोचा नवरात्र की कुछ रोचक यादों का जिक्र बेहतर रहेगा.

वह मुंबई में मेरा पहला नवरात्र था. चारों तरफ गरबा और डांडिया की धूम थी.मैंने भी इसका लुत्फ़ उठाने की सोची और 'खार जिमखाना' द्वारा आयोजित समारोह में पति और बच्चों के साथ पहुँच गयी.चारो तरफ चटख रंगों की बहार थी.शोख रंगों वाले पारंपरिक परिधानों में सजे लोग बहुत ही ख़ूबसूरत दिख रहें थे.दिन में जो लडकियां जींस में घूमती थीं,यहाँ घेरदार लहंगे में ,दोनों हाथों में ऊपर तक मोटे मोटे कड़े पहने और सर से पाँव तक चांदी के जेवरों से लदी, गुजरात की किसी गाँव की गोरीयाँ लग रही थीं. चमकदार पोशाक और सितारों जड़ा साफा लगाए लड़के भी गुजरात के गबरू जवान लग रहें थे..स्टेज के पास कुछ जगह घेरकर प्रतियोगिता में भाग लेने वालों के लिए जगह सुरक्षित कर दी गयी थी.इसमें अलग अलग गोल घेरा बनाकर लड़के लड़कियां बिजली की सी तेजी से गरबा करने में मशगूल थे.इतनी तेजी से नृत्य करते हुए भी उनके लय और ताल में गज़ब का सामंजस्य था. पता चला ये लोग नवरात्रि के ३ महीने पहले से ही ३-४ घंटे तक रोज अभ्यास करते हैं. और क्यूँ न करें,ईनाम भी तो इतने आकर्षक होते हैं.प्रथम पुरस्कार यू.के.की १० दिनों की ट्रिप. द्वीतीय पुरस्कार सिंगापूर के १० दिनों की ट्रिप,बाकी पुरस्कारों में सोना, टी.वी.,वाशिंग मशीन, मोबाइल फोन्स की भरमार रहती है.

मेरा कोई ग्रुप तो था नहीं और बच्चे भी छोटे थे लिहाज़ा मैं घूम घूम कर बस जायजा ले रही थी.सुरक्षित घेरे के बाहर अपने छोटे छोटे गोल बनाकर लोग परिवार के साथ, दोस्तों के साथ कभी गरबा तो कभी डांडिया में मशगूल थे.यहीं पर मुझे डांडिया और गरबा में अंतर पता चला. गरबा सिर्फ हाथ और पैर की लय और ताल पर करते हैं और डांडिया छोटे छोटे डांडिया स्टिक को आपस में टकराते हुए की जाती है.स्टेज पर से मधुर स्वर में गायक,गायिकाएं  एक के बाद एक मधुर गीतों की झडी लगा देते हैं.यह भी उनकी एक परीक्षा ही होती है.जैसे ही उन्हें लगता है लोग थकने लगे हैं,वे कोई धीमा गीत शुरू कर देते हैं.सैकडों लोगों का एक साथ धीमे धीमे इन गीतों पर लहराना बताने वाली नहीं बस देखने वाली चीज़  है.

एक जगह मैंने देखा,एक अधेड़ पुरुष अपनी दो किशोर बेटियों और पत्नी के साथ एक छोटा सा अपना घेरा बना डांडिया खेल रहें थे. बहुत ही अच्छा लगा ये देखकर .हम उत्तरभारतीय तो अदब और लिहाज़ का लबादा ओढे ज़िन्दगी के कई ख़ूबसूरत क्षण यूँ ही गँवा देते हैं..हम इसी में बड़प्पन महसूस करते हैं कि हम तो पिताजी के सामने बैठते तक नहीं,उनसे आँख मिलाकर बात तक नहीं करते.सम्मान जरूरी है पर कभी कभी साथ मिलकर खुशियों को एन्जॉय भी करना चाहिए.खैर अगली पीढी से ये तस्वीर कुछ बदलती हुई नज़र आ रही है.

मैं सबका नृत्य देखने में खो सी गयी थी कि अचानक संगीत बंद हो गया.स्टेज से घोषणा हुई 'महिमा चौधरी' तशरीफ़ लाईं हैं. उन दिनों वे बड़ी स्टार थीं. उन्होंने सबको नवरात्रि की शुभकामनाएं दीं और कहा कि 'मैं दिल्ली से हूँ इसलिए मुझे डांडिया नहीं आती,आपलोगों में से कोई दो लोग स्टेज पर आएं और मुझे डांडिया सिखाएं'...मैं यह देखकर हैरान रह गयी पूरे १० मिनट तक कोई अपनी जगह से हिला तक नहीं बल्कि म्यूजिक बंद होने पर सब अपनी नापसंदगी ज़ाहिर कर भुनभुना रहें थे.बाद में शायद आयोजकों को ही शर्म आयी और वे लोग दो छोटी लड़कियों को पकड़कर स्टेज पर ले गए. मैं सोचने लगी,अगर यही बिहार या यू.पी.का कोई शहर होता तो इतने लोग दौड़ पड़ते, 'महिमा चौधरी' को डांडिया सीखाने कि स्टेज ही टूट गयी होती.

धीरे धीरे मुंबई में मेरी पहचान बढ़ी और हमारा भी एक ग्रुप बन गया जिसमे २ बंगाली परिवार और एक-एक राजस्थान ,पंजाब ,महाराष्ट्र ,यू.पी.और बिहार के हैं.आज भी हम हमेशा होली और नव वर्ष वगैरह साथ में मनाते हैं. हमलोगों ने मिलकर फाल्गुनी पाठक के शो में जाने की सोची,फाल्गुनी पाठक डांडिया क्वीन कही जाती हैं.यहाँ भी वही माहौल था,संगीत की लय पर थिरकते सजे धजे लोग. मैंने कॉलेज में एक बार डांडिया नृत्य में भाग लिया था,लिहाजा मुझे कुछ स्टेप्स आते थे और मुंबई के होने के कारण महाराष्ट्रियन कपल्स भी थोडा बहुत जानते थे. बाकी लोगों को भी हमने सादे से कुछ स्टेप्स सिखाये और अपना एक गोल घेरा बनाकर डांडिया खेलना शुरू किया. इसमें पुरुष और महिलायें विपरीत दिशा में घुमते हुए डांडिया टकराते हुए आगे बढ़ते रहते हैं. (अब तो टी.वी. सीरियल्स में देख-देख कर पूरा भारत ही अवगत है इस से ) थोडी देर में दो लड़कियों ने मुझसे आकर पूछा,"क्या वे हमारे ग्रुप में शामिल हो सकती हैं?".मेरे 'हाँ' कहने पर वे लोग भी शामिल हो गयीं.जब घूमते हुए वे मि० सिंह के सामने पहुंची तो उन्होंने घबराकर अपना डांडिया नीचे कर लिया और विस्फारित नेत्रों से चारो तरफ घूरने लगे. अपने सामने एक अजनबी चेहरा देखकर उन्हें लगा वे गलती से किसी और ग्रुप में आ गए हैं. बाद में देर तक इस बात पर उनकी खिंचाई होती रही.


इसके बाद भी कई बार डांडिया समारोह में जाना हुआ.पर दो साल पूर्व की डांडिया तो शायद आजीवन नहीं भूलेगी.मेरे पास की बिल्डिंग में ३ दिनों के लिए डांडिया आयोजित की गयी.संयोग से उस बिल्डिंग में मेरी कोई ख़ास सहेली नहीं है.बस आते जाते ,हेल्लो हाय हो जाती है.अलबत्ता बच्चे जरूर आपस में मिलकर खेलते हैं.उनलोगों ने मुझे भी आमंत्रित किया.दो दिन तो मैं नहीं गयी पर अंतिम दिन उनलोगों ने बहुत आग्रह किया तो जाना पड़ा.फिर भी मैं काफी असहज महसूस कर रही थी,लिहाज़ा एक सिंपल सा सूट पहना और चली गयी.

मैं कुर्सी पर बैठकर इनलोगों के गरबा का आनंद ले रही थी पर कुछ ही देर में इनलोगों ने मुझे भी खींच कर शामिल कर लिया. और थोडी ही देर बाद,बारिश शुरू हो गयी. कुछ लोगों ने अपने कीमती कपड़े बचाने के ध्येय से और कुछ लोग भीगने से डरते थे...लिहाजा कई लोग शेड में चले गए.पर हम जैसे कुछ बारिश पसंद करने वाले लोग बच्चों के साथ,बारिश में भीगते हुए गोल गोल घूमते दुगुने उत्साह से गरबा करते रहें. थोडी देर बाद आंधी भी शुरू हो गयी और जोरों की बारिश होने लगी...बच्चों को जैसे और भी जोश आ गया,उनलोगों ने पैरों की गति और तेज कर दी. आस पास के पेडों से सूखी डालियाँ गिरने लगीं. अब गरबा की जगह डांडिया शुरू हो गया. डांडिया स्टिक कम पड़ गए तो लड़कियों और बच्चों ने सूखी डालियों को ही तोड़कर डांडिया स्टिक बना लिया और नृत्य जारी रखा. इस आंधी पानी में पुलिस भी अपनी गश्त लगाना भूल गयी और समय सीमा पार कर कब घडी के कांटे साढ़े बारह पर पहुँच गए पता ही नहीं चला.किसी ने पुलिस को फ़ोन करने की ज़हमत भी नहीं उठायी. वरना एक दूसरी बिल्डिंग के स्पीकर्स कई बार पुलिस उठा कर ले जा चुकी थी. किसी को सचमुच परेशानी होती थी या लोग सिर्फ मजा लेने के लिए १० बजे की समय सीमा पार हुई नहीं कि पुलिस को फ़ोन कर देते थे.और पुलिस भी मुस्तैदी से रंग में भंग डालने चली आती थी. जबकि मुसीबत  के वक़्त ये सौ बहाने बनाएं और समय से दो घंटे बाद पहुंचे. वैसे टीनेज़ बच्चों के पैरेंट्स ने इस समय-सीमा से राहत की सांस ली है. बच्चे समय से घर आ जाते हैं.

उस रात गरबा का भरपूर लुत्फ़ उठाया हमने.... मन सिर्फ आशंकित था कि इतनी देर भीगने के बाद कहीं कोई बीमार न पड़े. पर कुदरत की मेहरबानी,बुखार तो क्या किसी को जुकाम तक नहीं हुआ

36 comments:

  1. भींगते हुए गरबा खेलना...इससे रूमानी और क्या हो सकता है, ;)
    मेरे मामा रहते हैं अहमदाबाद में, तो मामा और मामी से जानता रहता था गरबा के बारे में...
    लेकिन मुझे कभी गरबा खेलने का मौका नहीं मिला....कभी आसपास हुआ ही नहीं...हाँ, लेकिन गरबा और डांडिया टी.वी पे बहोत देखा है और जितना देखा है उतना खेलने का मन भी हुआ है....

    इस बार दशहरा में मैं गुजरात जाने वाला था...नहीं जा पाया...जाता अगर तो जरुर गरबा का आनंद लेता....

    बड़े अच्छे से आपने गरबे से जुड़ी हर बात बताई है....

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  2. और सच में अगर महिमा चौधरी बिहार में होती तो लोग स्टेज को तो तोड़ ही देते...अरे बिहार रहने दीजिए,जहाँ से मैंने इंजीनियरिंग किया है, उस कॉलेज में गलती से महिमा चौधरी आ जातीं,तब तो लड़के जान तक देने को तैयार रहते ;)

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  3. हमरा त एगो बचपन का दोस्त है गुजराती... हालाँकि अब त ऊ ठेठ बिहारी हो गया है... मगही अईसा बोलता है जईसे सात पुस्त से बिहार में रह रहा हो... मगर धरा जाता है जब कहता है कि चलो कुछ स्नेक्स (snacks = snakes) खाते हैं अऊर ऐसही बहुत सा सब्द जिसमें ‘ऐ’ का मात्रा लगता है.. उसी से गरबा अऊर डांडिया का फरक पता चला था.. आपका झाँकी त डाइरेक्ट पण्डाल में ले गया हमको... बहुत सुंदर, रोचक अऊर जानकारी पूर्ण!!

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  4. पिछले वर्ष इसी समय गुजरात में थे, माहौल देख कर आनन्द आ गया था।

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  5. मुंबई की बारिश में गरबा ...क्या बात है परफेक्ट सीन है.और महिमा चौधरी वाह.
    आजकल यहाँ भी गरबे की धूम है पर यहाँ इतना प्रोफेशनली नहीं होता काफी अन्फोर्मल माहोल होता है मस्त एकदम ..
    जय माता दी !

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  6. अभी तक बस फिल्‍मों सीरियलों में देखा है डांडिया .. वास्‍तविक जीवन में देखने का कभी तो मौका मिलेगा ही .. वैसे आपका जीवंत विवरण अच्‍छा लगा!!

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  7. गरबा और डांडिया का मनमोहक विवरण ।
    हमने तो कभी देखा भी नहीं ।

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  8. गरबा और डांडिया के बारे सुना तो बहुत हे लेकिन कभी देखा नही आज आप के लेख से महसुस जरुर कर लिया सुंदर विवरण ओर सुंदर चित्र, धन्यवाद

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  9. सही कहा दी बारिश में तो गरबे का मज़ा ही दोगुना हो जाता है....मुंबई आने के बाद हर त्यौहार को जम कर एन्जॉय किया है....अभी बेटी के स्कूल में गरबा compitition होने वाला है सभी मम्मियों के बीच....रोमांचकारी होगा ये गरबा भी :)

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  10. रशिमीजी
    आनन्द अ गया डांडिया गरबा के आपके संस्मरण पढ़कर |मै तो पीछे ३६ साल पहले पहुच गई जब मै मलाड में रहती थी और शादी के बाद पहली नवरात्रि आई |हमारे शहर में तो सिर्फ महिलाओ का गरबा रास देखा था वो भी एक जगह जहन एक गुजरती महिला को देवी आती थी और वो गरबा रमती थी साथ में उनके ही परिवार की कुछ महिलाये भी खेलती थी |जब बम्बई में हमारी कालोनी (पवन बॉग )में बड़े स्टार पर बड़ी शालीनता से पहले गरबा होता था ५ गीतों पर और फिर डांडिया जिसमे स्त्री पुरुष बच्चे सभी भाग लेते थे |एक तो दादी और पोता पोती साथ साथ रात २ बजे तक गरबा खेलते थे |उन दिनों समय की पाबंदी नहीं थी |बस फिर क्या था हमभी खूब खेले है डांडिया और गरबा |नवमी के दिन रात भर गरबा होता था |चाय होती थी और सुबह सुबह नाश्ता |बहुत अच्छा माहोल हुआ करता था |और भी बहुत सी यादे है |
    कुछ ज्यादा ही यद् दिला दी आपकी इस खुबसूरत पोस्ट ने |
    आभार

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  11. पहले भी पढ़ा था.... आज फिर से पढ़ लिया।

    डांडिया आदि से तो अपन कोसो दूर हैं...इसलिए जिस किसी की शामत आई हो वही आएगा हमसे खेलने। पता चला हमारी उंगलियां तो ठीक हैं लेकिन एक दो की उंगलियां चोटिल हो गई हैं ऐसे डम्पलाट खिलाडी हैं हम तो :)

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  12. हमें भी याद दिला दिये आपने हमारे मुम्बई के दिन जब पूरे नवरात्रे डांडिया करते बीतती थी रातें...

    बेहतरीन संस्मरण.

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  13. @शुभम
    खूब अच्छा खेलना...और बाकी मम्मियों की छुट्टी कर देना .
    और पूरी रिपोर्ट का इंतज़ार रहेगा..तस्वीरों के साथ

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  14. @सतीश जी,
    ये सही कहा...नए खेलने वालों के साथ...उंगलियाँ बड़ी जख्मी होती हैं...:)
    आप डांडिया नहीं..गरबा ही कीजियेगा बस...

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  15. अरे वाह, हम अभी गरबा से ही लौटे, और तुम्हारी पोस्ट मिली, आती हूं कल अभी बहुत देर हो गई है :)

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  16. मुंबई में रहने वाली अपनी चाची और कजिन से जाना था डांडिया और गरबे के बारे में कि किस तरह हर नवरात्र में बिल्डिंग के सभी परिवार साथ साथ डांडिया खेलते हैं ...
    बारिश में भीगते हुए तो पहली बार तुम्हारी पोस्ट में पढ़ा ...वाकई मधुर स्मृति ही है ...
    इस वर्ष क्या ख़ास रहा , बताना अपनी किसी पोस्ट में ...!

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  17. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    साहित्यकार-6
    सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  18. @ रश्मि जी.
    मुझे इसके बारे नहीं पता था पर आपके ब्लॉग के जरिये जानकारी मिल गई बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    मेरे ब्लॉग पर आने ने लिए आभार
    सादर,
    संजय भास्कर

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  19. mai delhi se hu, north india mei dandiya or garba koi khelta hee nahi, maine bhopal mei garba dekha tha mazza aa gaya tha.

    Ye garba aur dandiya jaise festival samaj ko jodke rakhte hai,
    Mujhe aisa bhi lagta hai kee uttar bharat ke mukabale madhya bharat mei jyada ekta aur samajik khulapan hai.
    Jo hona bhi chahiye.
    Waise dandiya ke liye aapko badhai,

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  20. सुन्दर संस्मरण और उतना ही सुन्दर प्रस्तुतिकरण्।

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  21. गरबा सचमुच मस्ती का मेला है। और मस्ती के मेले में जुकाम बुखार का क्या काम?
    ................
    वर्धा सम्मेलन: कुछ खट्टा, कुछ मीठा।
    ….अब आप अल्पना जी से विज्ञान समाचार सुनिए।

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  22. Garba ki Masti .. aur Baarish ka Romani andaaz .... aur kya chaahiye ... fir aapka vayakt karne ka Andaaz .... Bahut khoob :)

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  23. बहुत बढ़िया संस्मरण ...बस पिक्चर या टी वी पर ही देखा है डांडिया... आज पढ़ भी लिया ...

    नवरात्रि की शुभकामनायें

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  24. गरबा का उन्माद बहुत प्रबल होता है ।

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  25. वैसे तो सभी त्योहार बहुत अच्छे से मनाए जाते हैं दुबई में पर दांडीया का खेल तो विशेष बहुत उलास से मनाया जाता है .... बहुत से स्टार ... गायक और नये कलाकार आते है इन दिनों ... पता ही नही चलता की आप भारत में है या विदेश में ....

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  26. अब गरबा और डांडिया सभी जगह आयोजित होने लगा है , उत्तर भारत में भी. तुमने दोनों के अंतर से वाकिफ करवा दिया नहीं तो मुझे नहीं पता था. करना तो बहुत दूर की बात है. वैसे समय के साथ साथ पूरे भारत के उत्सव हर कोने में मनाये जाने लगे हैं. हम अपने दूसरे कोनेकी संस्कृति से कम से कम भिज्ञ तो हो रहे हैं. जो नहीं भी होते हैं वे हमारे ब्लोगर्स अपने ब्लॉग पर डाल कर हमें उसकी जानकारी दे देते हैं जो वास्तव में महत्वपूर्ण है. इसलिए हम जिस देश में रहते हैं उसके सारे उत्सव और प्रथाओं से वाकिफ तो रहें.
    इस आलेख के लिए धन्यवाद.

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  27. nice to see you enjoying life.
    thanks.
    WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

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  28. यह सही है कि हम उत्तरभारतीय कुछ ज्यादा ही मर्यादा ढोते हैं ! इसमें आनंद के क्षण छूट जाते हैं ! पर हौसला बजाप्ता वही रहता है जिसे सतीश जी ने व्यक्त किया है !

    गरबा और डांडिया पढ़कर बढियां लगा ! इस उत्साह में आंधी-पानी भी गरबा करने लगे ! तब भला काहे किसी को जुखाम-बुखार होता !

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  29. इधर बिना गरबा डांडिया सर्दी जुकाम का माहौल हो गया है फिर आप की हिम्मत की दाद देनी होगी जो भीगम भाग में यह सब किया !

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  30. हम तो आज तक ना नाच पाए ! मतलब वही डांडिया और गरबा :)

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  31. आपने भीगते हुये खेला हम तो सूखे मे भी नही खेल पाये। भला अब तुम से ईर्षा न हो तो क्या हो?। खुश रहो शुभकामनायें

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  32. रश्मि जी ,
    मैं तो डांडिया और गरबा से ज्यादा आपकी लेखनी से प्रभावित हूँ .....
    वर्ना मैं लम्बी पोस्ट पढने से डरती हूँ ..समय भी बहुत कम मिल पाता है ...
    आप तो सच्च में जिंदादिल इंसान हैं ....
    बहुत अच्छा लगता है आपका व्यक्तित्व .....
    शुक्रिया ...!!

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  33. रश्मि दीदी,
    सर्वप्रथम नवरात्रि की शुभकामनाएं ...
    मुझे भी आज हीं पता चला की गरबा और डांडिया में क्या अंतर है...अपने भारत देश की बात करें तो एक एक उत्सव भारत की अखंडता एवं एकता के प्रतीक के रूप में दिखता है..हम सभी में सिखने की कला यहीं से जन्म होती है नहीं तो कहाँ गुजरात और कहाँ महाराष्ट ...और दीदी आपने बिलकुल सही कहा है की हम अदब और लिहाज़ का लबादा ओढे ज़िन्दगी के कई ख़ूबसूरत क्षण यूँ ही गँवा देते हैं पर नयी पीढ़ी अपने में एक बदलाव ला रही है..और आपको ज्यादा ख़ुशी होगी की ये नयी पौध अपनी पुरानी मान्यताओं को भी भली भाती समझते हुए जीवन के आनंद और कर्तव्य का पालन कर रही है....

    आपका लेखन घटनाओं को जीने जैसा आनंद दे जाता है..और जिस उत्सव का आपने जिक्र किया वहां नहीं रहते हुए भी मैने खुद को वहां पाया...

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  34. अच्छी लगी ये गरबे की याद जब से दिल्ली आ गए हैं बच्चे गरबे की ही याद करते हैं चाहें माहि सागर हो, या ओढ़नी ओढू तो उड़ी उड़ी जाय, पंखिड़ा उड़ी ज जों पावा गढ़ रे मरी माहि काली ने कह दो गरबा रमे रे आवाज़ आते ही पांव थिरकने लग जाते हैं

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  35. मजेदार पोस्ट रही।

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