Tuesday, June 29, 2010

ये पैरेंटिंग नहीं आसां....



मेरी  पिछली  पोस्ट  पर  जो  प्रतिक्रियाएँ आयीं, उनमे सबलोग इस बात से सहमत थे कि नई पीढ़ी, ज्यादा जागरूक है, दुविधाग्रस्त  नहीं हैं,खुलकर अपनी बात रखते हैं, अपने समय का उपयोग कैसे करें ये जानते हैं...बंधी बंधाई  लीक पर नहीं चलते...आदि आदि.

पर यह ख़याल भी बार बार आता है कि नई पीढ़ी  की ऐसी सोच के पीछे कुछ टी.वी...आस-पास के .माहौल आदि का हाथ तो है ही साथ में हम अभिभावकों का योगदान भी कम नहीं. और इस योगदान की प्रक्रिया में अभिभावकों को जिस जद्दोजहद से गुजरना होता है.यह उनके सिवा और कोई नहीं समझ सकता,और खासकर माताओं को,क्यूंकि ज्यादा से ज्यादा समय वे ही गुजारती हैं,उनके साथ.

आज हम कोशिश करते हैं कि बच्चे दोस्त की तरह व्यवहार करें,पर इस चक्कर में दोस्त और पैरेंट्स के बीच लकीर कहाँ खींचनी है, बच्चे कई बार ,ये नहीं समझ पाते और हमें ये स्थिति नागवार गुजरती है. हम दूसरे ही पल संभल जाते हैं,पर एक झटका तो लगता ही है. जैसे मेरे बेटे ने एक बार फिल्म देखते हुए सहजता से कह दिया,"उन दोनों के बीच तो अफेयर था, ना" और इस "अफेयर' शब्द ने मुझे जड़ कर दिया.हम तो अपने माता-पिता से ऐसी बातें करने की सोच ही नहीं सकते थे. पर फिर अपने आपको संभालना पड़ता है ,ताकि वे अपनी सारी बातें निस्संकोच शेयर कर सकें. कभी बिंदास कह देंगे, " ये ड्रेस तुम पे बिलकुल अच्छी नहीं लग रही" फिर वही ख़याल,हमने तो अपनी माँ से इस तरह कभी बात नहीं की.

वाणी ने कहा है कि "बेटी रात भर पढ़ती और सुबह देर तक सोती है ...शुरू शुरू में बहुत अजीब लगता क्यूंकि हमारे घर में देर तक सोना अच्छा नहीं माना जाता .." यही समस्या मेरे साथ भी है,कईयों के साथ होगी. मेरा बेटा भी पूरी रात पढता है फिर दस,ग्यारह बजे सो कर उठता है. मैं कहती हूँ सुबह उठकर फ्रेश होकर ,नाश्ता कर के फिर से सो जाओ.पर ये  कभी नहीं होता. और हमें ही स्थिति स्वीकार करनी पड़ती है.

हमारे समय स्टुडेंट लाइफ में ज्यादातर,सीधे सादे, फैशन से दूर रहने वालों को ही अच्छा समझा जाता था. पर आज स्कूल से ही डियो, नए डिजाइन के कपड़े, हेयर स्टाइल की शुरुआत हो जाती है.एक रोचक बात का जिक्र करती हूँ , मेरे बेटों के शब्दों  में " वो जैसे ही  क्लास में आया मैं समझ गया..स्कॉलर है ये तो, पूरे  स्लीव की शर्ट, गले  तक  बंद बटन , पेट तक पैंट और मांग निकाल कर बाल...एकदम स्कॉलर" (किसी को बुरा लगे तो क्षमा याचना). और हमारी  रोज-रोज उनके कपड़ों,हेयर जेल,डियो पर बहस हो जाती है. लड़कियों की माओं का भी यही हाल है. लोग कह सकते हैं, बहस क्यूँ,उनकी मर्जी का करने देना चाहिए,फिर तो महानगरों के बच्चे कानों में कुंडल पहन और टैटू बनवा कर आयेंगे.

आज बच्चे इतनी निर्भीकता  से अपने मन की बात रखते हैं, कि हम सोचते रह जाते हैं,हमारी तो सारी ज़िन्दगी, सबको खुश करने में ही गुजर गयी. इन्हें जहाँ जाना नहीं पसंद, खुलकर बता देंगे. जब मैं कहती हूँ, कि तुमलोग कुछ घंटों के लिए मना कर देते हो, और मुझे हॉस्टल से आने के बाद भी कभी,चाचा,मौसी,दादी,नानी अपने साथ ले जाती थीं. मन ना होते हुए भी मैं सोचती ,उनका दिल कैसे दुखाऊं? तो वे कहते हैं , "कहना  चाहिए था, that was Ur  loss " .

आज बच्चों को all rounder होना चाहिए. हर पैरेंट्स की यही इच्छा है. लेकिन बिलकुल पढ़ाई वाले महौल से और अनुशासन में बंधा बचपन गुजारने वाले पैरेंट्स के लिए कितना मुशकिल हो जाता है यह सब स्वीकारना,जब आप बच्चे को पढ़ाई में टाल मटोल करते और पढाई को इतना lightly  लेते देखते हैं. पर स्थिति स्वीकार करनी ही पड़ती है.

महानगरों के पैरेंट्स को कुछ और समस्याएं  भी आती हैं.यहाँ देर तक पार्टियों का चलन है, रात के ग्यारह बजे तक बर्थडे पार्टी चल रही है. हमारी small town mentality स्वीकार नहीं कर पाती और फोन खटका ही देती हूँ. 

हमने भी एम.ए तक इतने इम्तिहान दिए हैं.और हमेशा रिजल्ट  के पहले एक डर,एक उद्विग्नता रहती थी. अभी मेरे साहबजादे के भी बोर्ड का रिजल्ट  आया ,रिजल्ट  के एक दिन पहले बेटे ने कहा,"हम सब फ्रेंड्स कॉफी शॉप  में मिल रहें हैं क्यूंकि कल,पता नहीं किसका, कैसा रिजल्ट आए,कैसा मूड हो,कौन किस कॉलेज में एडमिशन ले " मुझे कुछ अजीब लगा,पर CCD मेरे घर से चार कदम पर है,मना करने का सवाल ही नहीं था.बाकी सब दूर से आ रहें थे. और 16 लड़के लड़कियों ने पिज्जा और कोल्ड कॉफी विद आइसक्रीम पर दूसरे दिन के रिजल्ट का चिंतन-मनन किया. वहाँ से आया और लैपटॉप खाली देख झट फेसबुक पे दोस्तों को शुभकामनाएं देने बैठ गया. सुबह 5 बजे ही उसकी नींद खुल गयी, कम्प्यूटर पर थोड़ी देर गेम खेला और साढ़े छः बजे फुटबौल खेलने चला गया. अब मैं कैसे कहूँ कि रिजल्ट के पहले एक तरफ मुहँ लटका कर बैठते हैं,..हमने तो यही किया है. (भले ही नंबर कभी बुरे नहीं आए)

मानती हूँ,यह जेनेरेशन गैप ही है. पर इतना लंबा गैप??....या फिर हमारे माता-पिता को भी कुछ ऐसे ही अनुभवों से गुजरना पड़ा था .पर तब तो हम फेंस के उस तरफ थे...हमें क्या पता..??

अभी तो बस यही ख़याल आता है...
"ये पैरेंटिंग नहीं आसां.... "

37 comments:

  1. bilkul sahi baat ki aapne
    samay ke hisab se sab kuchh badal gaya hain, aaj bachcon ki aur mata-pita dono ki din charya main kafi badlav aa gaya hai,

    http://sanjaykuamr.blogspot.com/

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  2. शुक्रिया ,संजय जी....आप भी सहमत हैं, इन बातों से

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  3. सच है बहुत कुछ बदल गया है....और हमारा वक्त तो और भी पीछे का है...पर ये फोन खटखटाने पर बेटी से ही ज्यादा भाषण सुन चुकी हूँ.. :):) अब देर हो जायेगी तो फोन तो करेंगे ही ना..पर बच्चों को आखर जाता है कि हर वक्त आपको रिपोर्ट ही करते रहो...सार्थक लेख

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  4. रश्मि जी , ज़रा सोचिये --हम और आप जब कॉलिज में पढ़ते थे तब क्या कलर टी वी , मोबाईल , कंप्यूटर , लैपटॉप , इंटरनेट , कारें , यहाँ तक कि खाने की दुकाने जैसे मैकडोनाल्ड , पिज्जा हट , डोमिनोस आदि थे । पब्लिक स्कूलों में पढने वाले भी कुछ ही होते थे । लेकिन अब बच्चा बच्चा प्राइवेट स्कूलों में पढता है । बस में बैठकर स्कूल जाता है ।
    दूर संचार बढ़िया होने से विश्व से जुदा रहता है ।
    जेनेरेशन गैप तो होगा ही । लेकिन इस लिबरेशन को भी एन्जॉय करना चाहिए । बस थोडा गाइडेंस की ज़रुरत ज़रूर रहती है ।

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  5. ये पेरेंटिंग नहीं आसान ..बिलकुल सही बात है ..किसी दौर में नहीं थी और हर दौर के माता पिता यही कहते पाए जाते हैं " उफ़ आजकल के बच्चे ..हम तो ऐसे न थे ".
    जेनरेशन गैप ही है और हर माता पिता को ये अपने समय से ज्यादा लंबा लगता है :) जरा अपना बचपन याद कीजिये ऐसी बहुत सी बातें होंगी जहाँ आपकी माताजी भी यही कहती होंगी :) डॉ. दराल की बात से १००%सहमत एन्जॉय कीजिये :) .और आपके बच्चे तो माशाल्लाह बहुत समझदार हैं :)

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  6. ये गैप लम्बा इस लिये हुआ कि हमारे जमाने मे टी.वी आदि पर ऐसे प्रोग्राम नही आते थी पैसे से अधिक महत्व भावनाओं का होता था। इन्तर नेट जैसीसुविधाओं आदि से एक दम सभी क्षेत्रों मे विस्फोट सा हुया है। सब कुछ इतनी जल्दी हुया इस लिये गैप भी इतना बढा है। माँ बाप की मुश्किलें भी अब बहुत बढ गयी हैं। मगर बदलाव तो दुनिया का नियम है मान कर चल रहे हैं। अच्छा आलेख है शुभकामनायें

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  7. सही है.. कुछ भी करें जनरेशन गेप तो रहेगा...

    कभी लगता था की अगर values ठीक है तो कोई फर्क नहीं पडता.. सफलता तो क्षापेशिक है.. पर अभी लगता है की values भी तो क्षापेशिक है...

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  8. माता पिता का दायित्व और बच्चों का कर्तव्य समय के साथ बढ़ता है और पल्लवित होता है । ध्यान देना आवश्यक भी है और सहज भी ।

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  9. @संगीता जी, सही कहा, कभी कभी तो फोन करना ही पड़ता है.

    @दराल जी एवं शिखा...ऐसा नहीं है कि enjoyable momens नहीं आते......स्कूल कॉलेज की एक एक घटनाएं,मय-अभिनय के जब सुनाते हैं तो हँसते हँसते पेट में बल पड़ जाते हैं. शायद हमारी पीढ़ी इतनी करीब नहीं थी,अपने पैरेंट्स के.

    पर कई बातें,हमारे समय से बहुत अलग है...और वो रस्साकशी भी चलती रहती है....आजकल सभी सहेलियों के बच्चे टीन एज में आ गए हैं....और सबके अनुभवों पर आधारित यह आलेख है...उदाहरण भले ही मैने अपने ही बच्चों का दिया है.

    बच्चे समझदार हैं या नहीं ये तो नहीं पता....पर हाँ ,उनसे यह क्रेडिट नहीं ले सकती कि बड़े बेटे कि इच्छा थी,एयर फ़ोर्स पायलट बनने की,और छोटे की मर्चेंट नेवी या होटल मैनेजमेंट करने की...पर दोनों ने पैरेंट्स की इच्छा का सम्मान करते हुए इंजनियरिंग की पढाई करना स्वीकार कर लिया.बड़े बेटे की तो फर्स्ट इयर कम्प्लीट भी हो गयी...छोटा भी इंजीनियरिंग की ही तैयारी कर रहा है.

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  10. Time has changed. Children are way more free and smarter than expected. I am loving the change.

    Beautiful post as usual !

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  11. रश्मिजी, मेरा यह मानना है कि जेनेरेशन गेप हर युग में रहा है। बच्‍चे हमेशा ही नये के प्रति आ‍कर्षित होते हैं लेकिन इस युग में जेनेरेशन गेप की जगह संस्‍कृति का बदलाव आ गया है। इस कारण जहाँ हमारे मन में बड़ों के प्रति अनुशासन और डर का भाव था आज वो समाप्‍त हो गया है। इसी कारण आज बड़े उपेक्षित अनुभव कर रहे हैं। पहले हमेशा बच्‍चों के मन में डर रहता था लेकिन आज उनके मन में डर नाम की चिडिया फुर्र हो गयी है और यह डर बड़ों में समा गया है। एक उदाहरण देती हूँ कि जैसे पहले रेडियो था तब यदि हम उस पर कोई गाना सुन रहे होते थे तो पिताजी के आने के बाद उन्‍हें समाचार सुनने को दे देते थे लेकिन आज यदि बच्‍चा कुछ टीवी पर देख रहा है तो बच्‍चा नहीं हटेगा अपितु पिता को ही हटना पड़ेगा। इसलिए प्राथमिकताएं बड़ों के हटकर बच्‍चों पर आ गयी हैं।

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  12. बहुत रोचक अंदाज में पोस्ट लिखी है।

    ये तो सच है....जनरेशन गैप तो वाकई में कुछ ज्यादा ही बदलाव की बयार लिए है।

    मैने अपनी दसवीं वाले रिजल्ट के दिन पहली बार थियेटर में कदम रखा था और आमिर खान की दिल फिल्म देखी थी :)

    एक वह भी समय था।

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  13. Didi, aapke anubhavo se bahut kuch sikhne mil rha hai...meri 4 saal ki beti abhi se apni choice ki hi dress pahnegi...fir apne din yaad aa jate hai hum to aise nahi the fir bhi maa kaha karti thi chote bachcho ko to daant dapat kar paal lo bade bachcho ko palna bahut hi mushkil hai...wo tab ke din the us samay bhi parenting itni hi mushkil lagti hogi humare parents ko...aaj to bahut kuch badal gya hai na jane agle 10 saal me kitna badlaw aane wala hai...kaise sambhalugi mai apni beti soch kar hi ek sihran si daud jati hai....

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  14. Didi, aapke anubhavo se bahut kuch sikhne mil rha hai...meri 4 saal ki beti abhi se apni choice ki hi dress pahnegi...fir apne din yaad aa jate hai hum to aise nahi the fir bhi maa kaha karti thi chote bachcho ko to daant dapat kar paal lo bade bachcho ko palna bahut hi mushkil hai...wo tab ke din the us samay bhi parenting itni hi mushkil lagti hogi humare parents ko...aaj to bahut kuch badal gya hai na jane agle 10 saal me kitna badlaw aane wala hai...kaise sambhalugi mai apni beti soch kar hi ek sihran si daud jati hai....

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  15. अब मैं कैसे कहूँ कि रिजल्ट के पहले एक तरफ मुहँ लटका कर बैठते हैं,..

    हा...हा...हा.....जब किसी बात का डर ही नहीं तो मुंह क्यों लटकाएं ....??
    बच्चे जानते हैं वे फेल तो होने वाले नहीं .....

    बहुत ही बढ़िया लिखने लगीं हैं आप ....इस मेहनत की सफलता की बधाई .....!!

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  16. यह तो हमेशा से चलता आया है जी, जो फ़ेशन हम करते थे वो हमारे मां बाप को पसंद नही होता था उस जमाने के लोगो को पसंद नही होता था, लेकिन हमारे मा बाप भी हम से कभी ना कभी कही ना कही सहमत हो जाते थे, जेसे हम

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  17. kuwaara hi sahi lekin aapki baat se sehmat hu.
    mere do bhatije jinme se ek 5th se aur ek 8rth se sath me hi rahe hain ar unke mom dad alag shahar me. so kai bar to school me mai hi gaya tha parents meeting me,

    vakai result ko lekar jitna tension ham me hota tha, utna kabhi in bachcho me nahi dekha.....

    bahut kuchh hai kahne ke liye to bachaho k bare me....... aaj dekhiye sab bhatije kahi na kahi job me pahuch gaye hain.......khair.

    aapke dhyey vakya se to sehmat hu.....

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  18. आपने तो सब कह ही दिया है और हमने पैरेन्टिग के प्वाईन्ट्स नोट कर लिये है.. टिप्पणियो से भी सीख ली है..

    बस एक बात और जोडनी है कि नयी जेनेरेशन जैसी भी हो... बहुत कनफ़्यूज़्ड है... बहुत स्ट्रेस्ड है... उन्हे फ़ैसले लेने दे लेकिन अपनी बात समझाने से भी न चूके... बस स्पून फ़ीड न करे... शायद उन्हे अच्छा न लगे लेकिन शायद कायदे से रखी आपकी हर बात उन्हे समझ मे आयेगी.. ऎसा मुझे लगता है..

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  19. आज की पीढ़ी सच में बहुत समझदार है. मैं भी डॉ. दराल की बात से सहमत हूँ. वैसे पैरेंटिंग के ये टिप्स मैंने भी नोट कर लिए हैं. पंकज की तरह..:-)

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  20. Hi..

    Sahi kahti hain aap..aaj ke bachche wo bachche nahi rahe.. Ab parants ka adab hai bas, dar bilcul nahi..unhen sab pata hai, aur jo nahi pata use puchhne main koi sankoch nahi.. Wo chahe kuchh bhi ho.. Mera bhateja kai baar vibhinna vigyapan dekh aise sawal kar deta hai jiske jawab jaanne aur samajhne ki uski umar nahi hai..aur hum sab kinkartavavimodh baithe rah jaate hain ki use kya jawab den.. Aur to aur 08 saal ki umar main hi wo apni mummy se puchhta hai ki papa ko kya salary milti hai..? Kya us jamane ke kisi bachche ke dimag main kabhi aisa sawal aaya hoga..!

    Kair jamana badal raha hai.. TATA docomo ke advertisement main ek ladki apni peeth pas tatto karwa kar aati hai aur apni budhi maa ko dikhati hai.. Uski maa dekhkar gussa nahi hoti balki kahti hai..."very good" shayad aaj ke parants ke pass yahi option bacha hai..bachchon ki rai se ettefak rakho aur unke man ki karo..

    Aaj ke bachche bade ho gaye hain aur bade shayad bachche..apne jamane ke..sabki baat manne wale..

    Sundar aalekh..

    Deepak..

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  21. हमेशा से दो पीढियों के बीच विचार द्वन्द चलते रहे है, जो काल परिवर्तन का सूचक है. , विचारो में सामंजस्य एवं बच्चो से मित्रवत व्यहार बनाकर चलना ही बुद्धिमानी का प्रतीक एवं समय की मांग है... अच्छा आलेख.

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  22. थोडा सा इंतज़ार कीजिये, घूँघट बस उठने ही वाला है - हमारीवाणी.कॉम

    आपकी उत्सुकता के लिए बताते चलते हैं कि हमारीवाणी.कॉम जल्द ही अपने डोमेन नेम अर्थात http://hamarivani.com के सर्वर पर अपलोड हो जाएगा। आपको यह जानकार हर्ष होगा कि यह बहुत ही आसान और उपयोगकर्ताओं के अनुकूल बनाया जा रहा है। इसमें लेखकों को बार-बार फीड नहीं देनी पड़ेगी, एक बार किसी भी ब्लॉग के हमारीवाणी.कॉम के सर्वर से जुड़ने के बाद यह अपने आप ही लेख प्रकाशित करेगा। आप सभी की भावनाओं का ध्यान रखते हुए इसका स्वरुप आपका जाना पहचाना और पसंद किया हुआ ही बनाया जा रहा है। लेकिन धीरे-धीरे आपके सुझावों को मानते हुए इसके डिजाईन तथा टूल्स में आपकी पसंद के अनुरूप बदलाव किए जाएँगे।....

    अधिक पढने के लिए चटका लगाएँ:
    http://hamarivani.blogspot.com

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  23. बहुत सही विषय को उठाया है, इसी को जेनरेशन गैप कहते हैं. सब कुछ बदल रहा है, हमारे समय में घर से बाहर जाना है तो किसी को साथ होना चाहिए जैसे छोटी बहन हो या कोई और. अकेले नहीं जाना. बस कॉलेज तक जाने कि इजाजत थी. अब उसको कैसे लागू किया जा सकता है. बच्चे बाहर पढेंगे और रहेंगे तब. अगर हम अपनी पैरेंटिंग में उनके साथ नहीं चले तो फिर बीच का गैप बढ़ जाएगा. इसलिए अपनी निगरानी में भी उनकी जायज बातों को स्वीकार करो और नजर फिर भी रखो. हर वक्त कि टोकाटाकी से अच्छा है कि उन्हें सारीबातें
    समझा दी जाएँ.

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  24. aisi koi baat nahi hai..........ye generation gap har pidhi ke sath aata hai aur har kisi ki yahi samasya hoti hai bas aaj ke waqt ki demand hai ki usi ke anusar apne ko dhal lena chahiye .......ye baat alag hai tab parents kam compromise karte the magar aaj pahle se thode samajhdar ho gae hain.

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  25. रश्मि, समय बहुत बदल गया है. हमारे बच्चों की सोच और रहन-सहन में ठीक उतना ही फ़र्क है,
    जितना हम लोगों की मां और हमारी सोच या हमारे रहन-सहन में है. कई बार उन बातों की ओर निश्चित रूप से ध्यान जाता है, जिन्हें हम अपने माता-पिता से नहीं कह पाते थे, लेकिन क्या हमें बुरा लगता है बच्चों का खुल के बोलना या अपनी बात कहना? बच्चे उच्छृंखल न हो जायें, बस इतना हमें ध्यान रखना है. बाकी तो आज सैटेलाइट चैनल्स की कृपा से हमें कुछ सिखाने की ज़रूरत ही नहीं है.

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  26. आप सबका शुक्रिया,अपनी व्यस्तता से समय निकाल यह पोस्ट पढने और अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए.

    शुभम जान कर ख़ुशी हुई तुम एक प्यारी सी गुड़िया की माँ हो....(जबकि खुद भी गुड़िया सी ही दिखती हो :) )....और शुभम चिंता क्यूँ करनी है...बस थोड़ा अधिक सजग रहना है...यानि अपने toe पर...parenting की यही मांग है :)

    मुक्ति ,पंकज मैने पैरेंटिंग के कहां कोई टिप्स दिए?...तुमलोगों तक आते आते,दुनिया थोड़ी और बदलनी है...कोई टिप्स मिल भी गए तो काम नहीं आयेंगे :)

    पंकज, मुझे नई पीढ़ी कन्फ्यूस्ड तो नहीं लगती हाँ,स्ट्रेस्ड जरूर है...( तुमने एक टॉपिक भी दे दिया लिखने को...शायद लिख ही डालूँ :) )
    और स्पून फीडिंग तो अब दो साल के बच्चे भी नहीं चाहते....बड़े बच्चे कहाँ से मानेंगे. पर इस बात से सहमत हूँ कि ढेरों ढेर तर्क और धैर्य से समझाओ तो ये पीढ़ी भी बात समझ जाती है.

    वंदना वक्त कितना बदल गया है....इसी बात पे तो मैने यह पोस्ट लिखी है.
    और यह कोई शिकायत नहीं थी...बस उन अनुभवों को बांटना ही था कि कितना कुछ बदल गया है....और इसे स्वीकारने के लिए हमें अपने मन को तैयार करना होता है.

    बच्चों का खुल कर बोलना और अपनी बात कहना,बुरा क्यूँ लगेगा...यही कोशिश रहती है कि वे अपनी सारी बातें,शेयर करें....बस उनकी उनकी बातें चौंका देती हैं....यही बात की मैने.

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  27. मै बहुत देर बाद ही आपके ब्लॉग पर आती हूँ इसका फायदा ये होता है की अच्छी अच्छी और मूल्यवान टिप्पणियाँ पढ़ ने को मिल जाती है और नुकसान ये है की इतना सब कुछ लिखा होता है की मै कुछ लिख ही नहीं पाती |खैर ये तो ऐसी ही बात है \आज के इस हॉट विषय को बहुत ही सुन्दर तरीके से प्रस्तुत किया है आपने और उसी में कुछ हल भी निकाले है |इतना भी तय है की अपने घर के परिवेश को देखकर माता पिता के आचरण को देखकर बच्चे अपने ममता पिता के नजदीक ही रहते है मन से और ये नजदीकियां ही उन्हें कुछ भी गलत करने से रोकती है |और आज जब बछे सब कुछ बांटते है तो डरने की बात कहाँ ?
    अच्छा आलेख |

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  28. There is a book by Chiristine Hassler - 20 something 20 everything... I haven't read it yet but heard that book is good...

    link for the same is : http://www.christinehassler.com/generation-x/twenty-something-books/

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  29. जेनरेशन गैप के कारण होने वाली समस्याएं हर पीढ़ी के साथ होती हैं ...
    सचमुच पैरेंटिंग बहुत ही मुश्किल कार्य है विशेषकर बढती उम्र के बच्चों के साथ ...ऐसे में बच्चों से दोस्ती बनाये रखना बहुत कारगर सिद्ध होता है ....दोस्ती के साथ उचित दूरी ,बच्चों से कभी प्यार से कभी थोडा सख्त व्यवहार ही उनके सुन्दर और दृढ व्यक्तित्व को बनाने में मददगार होता है ...
    फोन करने पर परेशान होने वाले बच्चों को कभी कभी जानबूझकर फोन नहीं करना भी इनको कण्ट्रोल में रखने के लिए सही होता है ....तब इनको इन फोन काल्स का महत्व पता चलता है ..:):)
    रोचक अंदाज में एक जिम्मेदारी भरी पोस्ट !

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  30. bilkul sahi bat hai , sirf 10 salon me hi dunia itni badal gayi ki aashcharya hota hai . 10 sal pahle jab ham college me padhte the, to bahut si bate pasand na hone par bhi man liya karte the, ki kisi ko dukh na ho aur aaj ki pidhi jara bhi adjustment nahi karna chahti hai ..
    aapne bahut achha likha hai..

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  31. बच्चे पालना सबसे जिम्मेदारी का काम है जो सबसे लापरवाही से किया जाता है।

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  32. हाँ दी ये जनरेशन गैप अब गैप ऊप्स मेरा मतलब खाई होता जा रहा है.. परिवर्तन संसार का नियम है सुना था लेकिन अब लगता है कि परिवर्तन ही संसार हो गया है.. नहीं हुआ तो कुछ दिनों में हो जाएगा..

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  33. बिलकुल सही अनुभवों को आपने बाटा है -यहे सब हम भी झेल रहे हैं -कारण यही कि इनके बचपन से निर्णय लिया की इनके साथ मित्रवत रहेगें लेकिन अब कभी कभी इस निर्णय पर पछतावा भी होता है -ऐसी बातें ये बोल देते हैं की जी धक् से कर जाता है -जीने की कला तेजी से बदल रही है ...अब तो मैंने पूरी तराह रिजायीं कर दिया है जैसे जीना हो जीयो ..मेरी बला से ...

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  34. आपका अनुभव इस बात की पुष्टि करता है की समय बदल गया है ... बहुत ही तेज़ी के साथ बदल भी रहा है .... नेट और मीडीया की तेज़ी ने पूरी दुनिया की समेत दिया है .. आज के पेरेंट्स को भी तेज़ी के साथ चलना पढ़ता है ... अब से ३०-४० साल पहले और फिर २०-३० और आज १०-२० वर्ष पहले वाले पेरेंट्स में भी बदलाव सॉफ नज़र आ जाता है ....

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