Tuesday, March 16, 2010

'जब वी मेट' के निर्देशक 'इम्तियाज़ अली' एक फिल्म और बना सकते हैं 'जब वी फेल'


'जब वी मेट' फिल्म युवाओं और बच्चों की ख़ास पसंद है. मुझे भी बहुत अच्छी लगी थी, जाहिर है, कई महिलाओं को भी पसन्द आई होगी. तकरीबन हर उम्र के लोगों ने पसंद किया और इसी वजह से इतनी सुपर डुपर हिट हुई .और इसका सारा श्रेय उसके युवा डाइरेक्टर 'इम्तियाज़ अली' को जाता है.

'जब वी मेट' के पहले भी इम्तियाज़ अली ने एक फिल्म बनायी थी ,'सोचा ना था' यह सुपर हिट तो नहीं हुई पर कई लोगों के फेवरेट फिल्म की फेहरिस्त में शामिल है.(मेरे भी ) बॉलीवुड का रुख करने से पहले, 'इम्तियाज़ अली' सात साल तक टेलिविज़न से जुड़े रहें. जी.टी.वी. के लिए 'कुरुक्षेत्र और स्टार प्लस के लिए 'इम्तहान' सीरियल का निर्देशन किया था.

पर इन सारी कामयाबियों की जड़ में उनकी एक बहुत बड़ी असफलता भी दुबकी हुई है. और उनका जीवन 'असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी है' इस कथन को पूरी तरह चरितार्थ करता है.' बचपन में इम्तियाज़ पढने में बहुत अच्छे थे उन्हें डबल प्रमोशन भी मिला पर टीनेज़ आते ही पढाई की तरफ ध्यान कम हो गया और नवीं कक्षा में वे फेल हो गए. यह उनके ज़िन्दगी का 'टर्निंग पॉइंट' था.

टीनेज में वह बहुत ही शर्मीले और संवेदनशील किशोर थे. संवेदनशील तो अब भी हैं और यह उनकी बनाई फिल्मों से झलक जाता है. उस उम्र में नवीं में फेल हो जाना वो भी को-एड स्कूल में.बहुत बड़ा धक्का था ,उनके लिए. पर उनके माता-पिता ने उनको बहुत सहारा दिया. उनक मन बदलने को उन्हें 'कश्मीर' घुमाने ले गए. यहाँ माता-पिता की भूमिका बहुत अहम् हो जाती है. ऐसी स्थिति में किसी भी माता-पिता को कुछ ऐसे ही कदम उठाने चाहिए ना कि बच्चे को शर्मिंदगी महसूस करवाते रहना चाहिए.

काश्मीर ट्रिप के बावजूद..इम्तियाज़ अंदर से बिलकुल टूट गए थे. यह सोच कि सारे दोस्त अगली क्लास में चले गए होंगे और उन्हें अपने जूनियर के साथ,बैठना पड़ेगा और वे उन्हें एक फेलियर समझेंगे और वैसा ही व्यवहार करेंगे.यह ख़याल ही उन्हें कचोट डालता. स्कूल शुरू होने पर चार दिन तक वे स्कूल नहीं गए. फिर सर झुकाए क्लास में दाखिल हुए. नए क्लास में उनका कोई दोस्त नहीं था.
माता-पिता का सपोर्ट था और उस क्लास में बस एक दोस्त बना उनका.पर इम्तियाज़ को पता था,उन्हें अपनी मदद आप ही करनी है इम्तियाज़ अली ने एक और चीज़ की तरफ इशारा किया है.उनके रिपोर्ट कार्ड में लिख होता था,Imtiaz Ali ( R) यानि Repeater अगर ऐसी परंपरा आज भी कायम है तो स्कूल वालों को इसका ध्यान रखना चाहिए. हमेशा यह अहसास दिलाते रहना कि वह एक 'फेलियर'या 'रिपीटर' है...बच्चे के कोमल मन पर घातक प्रभाव डाल सकता है...

उनका कहना है कि फेल होने पर ही उन्हें समझ में आया कि उन्होंने अपना दिमाग कभी इस्तेमाल ही नहीं किया. एक रूटीन की तरह स्कूल जाते रहें. रूटीन की तरह होमवर्क करते रहें,खेलने जाते रहें. हर काम एक पैटर्न के तहत करते रहें. पर मन से उसे ही जीवन मान कभी कुछ नहीं किया. एक ही कक्षा में दुबारा पढने की मजबूरी ने उन्हें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया. और वह हर चीज़ को बहुत बारीकी से देखने लगे. अपने काम पर पूरी तरह ध्यान केन्द्रित कर लगन से उसे अंजाम देने लगे. उन्होंने एक बहुत ही सटीक बात कही है, "अगर आप पूरी लगन से कोई काम नहीं करते तो ज़िन्दगी उलझ सी जाती है.जिसे आपको ही सुलझाना पड़ता है. और यही सुलझाने की प्रक्रिया,आपकी ज़िन्दगी की कहानी बन जाती है " इम्तियाज़ ने अपनी ज़िन्दगी को बारीकी से परखा, अपनी कमियों को समझा और फलस्वरूप कॉलेज में तीन साल तक टॉप किया. तीन साल तक 'नेशनल जूनियर बास्केट बाल' टीम के सदस्य रहें. कॉलेज में कई नाटक किये और सबकी खूब प्रशंसा बटोरी.

इम्तियाज़ अली का कहना है कि अगर वे नवीं में फेल नहीं करते तो ज़िन्दगी को कभी इतनी गंभीरता से नहीं लेते,अपनी खूबियों को नहीं पहचान पाते और एक साधारण सी आम ज़िन्दगी जी रहें होते.

इतियाज़ अली की ज़िन्दगी के इस हिस्से के बारे में मैंने इसीलिए लिखा है कि हम भी ये सारी बातें जानते हैं पर जब अपने सामने कोई ऐसा उदाहरण देखते हैं तब जाकर इसे अच्छी तरह समझ पाते हैं कि कैसे कभी कभी असफलता हमारे व्यक्तित्व के पूर्ण विकास में सहायक हो जाती है. इसलिए असफल होने पर ना तो माता-पिता को बहुत चिंता करने की जरूरत है,ना ही बच्चों को परेशान होने की. बल्कि अभिभावकों के स्नेहिल हाथों का सहारा ले वे कदम ब कदम सफलता की सीढियां तय कर सकते हैं.

28 comments:

  1. लेख के बिना टिप्पणी है। चित्र के लिए। कितना प्यारा बनाया है।

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  2. फिल्मी दुनिया के बारे में लिखना और पढ़ना मेरा सबसे पहला शौक है। इम्तियाज अली के बारे में पढ़कर बेहद अच्छा लगा। ऐसे लेख आप लिखते रहें, सच में बहुत एनर्जी प्रदान करते हैं, मेरे जैसे नासमझ को।

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  3. मेने तो वो फ़िल्म देखी नही, लेकिन आप का लेख बहुत अच्छा लगा

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  4. picture mujhe bhi achhhee lagee..aapka kahna sahee hai...maata pita ko bachchon ke har achche - bure samay me saath dena chahiye...vo hee taane denge, ya support nahi karenge to kya koi bahar se aaege?

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  5. बहुत प्रेरक पोस्ट डाल दी आज तो.." जब वी मेट " मुझे भी अच्छी लगी थी..हम अपनी असफलताओं से वाकई बहुत कुछ सीख सकते हैं..और वो हमारे लिए टर्निंग पॉइंट हो सकतीं हैं..इम्तियाज़ अली साहब के बारे में बताने का शुक्रिया

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  6. शुक्रिया कुलवंत जी, चलिए किसी ने नोटिस तो की उमर खय्याम वाली पेंटिंग :)

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  7. जनाब / जनाबा!! अगर हर विधा में लिखने का गुर लेना चाहें तो आप बे हिचक रश्मि जी के ब्लॉग की तरफ रुजूह हों.
    ढेरों लोग हैं आज ब्लॉग-जगत में सभी अपनी अपनी भड़ास निकाल रहे हैं.कुछ लोग तो लठ-बल्लम लेकर कूद पड़े हैं.लेकिन रश्मि जी के अंदाज़ और शिल्प की बानी बहुधा दुर्लभ है.
    अली साहब की अंतिम पंक्तियाँ प्रेरक :

    असफल होने पर ना तो माता-पिता को बहुत चिंता करने की जरूरत है,ना ही बच्चों को परेशान होने की. बल्कि अभिभावकों के स्नेहिल हाथों का सहारा ले वे कदम ब कदम सफलता की सीढियां तय कर सकते हैं.

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  8. शहरोज़ भाई.,आपने तो कुछ ज्यादा ही तारीफ कर दी...हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया...

    और वो पंक्तियाँ प्रेरक हैं या नहीं, नहीं पता...पर मैंने अपनी तरफ से लिखी है...अली जी की कही पंक्तियाँ इसके ऊपर हैं.

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  9. Rashmi ji
    pichhle kuchh dino se aapke blog ke sampark mein aayi hun..dono hi blogs bahut uchch koti ke hain.."man ka pakhi" aur "apni ,unki ,sabki baatein "..aapka laghu upanyas 'aur wo chala gaya' ek sitting mein padha ..ghar ke pukarte kaamon ke liye indriyaan band kar ..bahut touchy tha.. khaastaur par sharad aur neha ki jang par jaane se pehle ki mulakaat aankhein nam kar gayi ..aur aapka ye article imtiyaaz sahab ke jeevan ki ek ghatna ko le kar jeevan ki ek mehatvpoorn seekh de raha hai..

    surkharu hota hai insaan thokre khane ke baad ..
    rang laati hai hina paththar pe pis jaane ke baad ..

    bahut bahut badhayi ....
    Regards
    Mudita

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  10. प्रेरणादायक लेख.....सच है असफलता के समय माता पिता का दायित्व बच्चे के प्रति बढ़ जाता है...इम्तियाज़ अली के बारे में जानकारी मिली शुक्रिया

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  11. Hi ji..

    Sarvpratham mai kshma prarthi hun ki Hindi meri matr bhasha hone ke bavajud main yah tippani Devnagri main nahi post kar paa raha.. Aasha hai aap aur aapke pathak mujhe kshama karene..

    Jeevan ke bare main kaha gaya hai..
    " Jeena jise kahte hain, aasan nahi hota..
    Kanton se guzarna hai, daaman bhi bachana hai..
    Asafalta aur safalta ek sikke ke do pahlu hain.. Par donon nitant alag.. Hain...
    Ek maan ki anubhuti karata hai, to dusra apmaan ki.. Har asafalta vyakti ko kuch kuch seekh deti hai.. Jo seekh le leta hai wo safal vyaktiyon ki shreni main gina jaane lagta hai.. Jo nahi seekhta.. Dhere dhere nakami ke andhere main gum ho jata hai..

    Aur wo parivar ka sahyog vyakti ko mansik aur samajik har antarvirodh ko ladne/ sahne ke liye sahas pradan karta hai..

    Aapka shahar to aise asankhya udaharanon se bhara pada hai.. Sabse jwalant udaharan hai Sh Amitabh Bachan ji ka.... Unki company ABCL ne unhen se etne bure din dikhaye.. Par parivar ke sahyog ne unhe na sirf punah sthapit kiya balki kahan se kahan la diya.. Agar Imtiaj Ali ji ke parents ki tarah Sh Amitabh ji ka bhi parivar support nahi karta to kya aaj wo etne buland ho pate..

    Gyan vardhak aalekh.. Wah..

    DEEPAK SHUKA,

    Behtaree kahani.

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  12. अभी जल्दी मे हूँ ठीक से पढ़ा नही है लिखूंगा ..." जब वी रीड "

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  13. जब वी मेट का तो वाकई कोई जवाब नहीं.. मैंने कितनी बार देख ली.. मुझे याद भी नहीं.. लेकिन इम्तियाज़ अली की कहानी वाकई उन बच्चों के लिए सबक है, जो ज़रा सी बात पर मौत को गले लगा लेते हैं... आपने जिस तरह से सिलसिलेवार तरीके से लिखा है.. उसका भी कोई जवाब नहीं.. शहरोज़ जी की बात से मैं तो सौ फीसदी मुत्तफिक हूं...

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  14. जब वी मेट देखी थी लेकिन कहीं कुछ कमी सी लगी थी..जाने क्या...खैर, आपके आलेख को पढ़ना अच्छा लगा. आज जरा अलग सा लगा आपका लेखन.


    उमर खय्याम वाली पेंटिंग हमारी नज़र में आई..:)

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  15. रश्मि! निशब्द । बहुत प्रेरक पोस्ट है। शुभकामनायें

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  16. फिल्‍म के बारे में तो कुछ नहीं लिखूंगी लेकिन इम्तियाज अली के बारे में आपने लिखा कि असफला ही कई बार सफलता के द्वारा खोलती है, यह सच है। कई बार जीवन का टर्निंग पोइन्‍ट असफला से ही गुजरता है।

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  17. गिरना गलत नहीं है.. पर गिर के नहीं उठना गलत है..
    इम्तियाज अली के बहाने से आपने काफी गहरी बात कही है,. यक़ीनन स्टुडेंट के नाम के आगे आर लिखना गलत है.. लेख बढ़िया दिशा में है..

    और हाँ सोचा ना था मेरी भी फेवरेट फिल्मो में से एक है..

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  18. bahut hi prerak lekh.........isiliye kaha gaya hai ki asafalta bhi safalta ki kunji hai kyunki jab tak thokar nhi khayenge sambhlenge kaise aur sikhenge kaise aur ye mantra zindagi mein har mod par sahayak hai.

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  19. अच्छा और प्रेरक लेख है ,, फिल्म तो मैंने नहीं देखि और की फिल्म की सफलता और असफलता से किसी व्यक्तिव का निर्धारण नहीं किया जा सकता मगर इस से सहमत हूँ की असफलता सफलता के लिए सीढ़ी तैयार करती है ,,,
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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  20. बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  21. "अगर आप पूरी लगन से कोई काम नहीं करते तो ज़िन्दगी उलझ सी जाती है.जिसे आपको ही सुलझाना पड़ता है. और यही सुलझाने की प्रक्रिया,आपकी ज़िन्दगी की कहानी बन जाती है "...
    इस पोस्ट की सबसे महत्वपूर्ण पंक्तियाँ है ....
    इम्तियाज अली की "जब वे मेट" मेरी पसंदीदा फिल्म है ...यदि " जब वो फेल बनायेंगे " तो वो भी हिट ही होगी ...उन्हें बनानी चाहिए " 8th में 8बार फेल "

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  22. प्रेरक उदाहरण। शुक्रिया।

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  23. असफल होने पर ना तो माता-पिता को बहुत चिंता करने की जरूरत है,ना ही बच्चों को परेशान होने की. बल्कि अभिभावकों के स्नेहिल हाथों का सहारा ले वे कदम ब कदम सफलता की सीढियां तय कर सकते हैं.

    बड़े पते की बात कह दी रश्मि जी इम्तियाज अली का उदहारण दे .......!!

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  24. एक अच्छी पोस्ट,बहुत बहुत आभार...

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  25. हर लेख में जो सीख छुपी होती है, वही तुम्हारी खाशियत है. चित्रकार रश्मि और ब्लॉगर रश्मि का संयोजन सराहनीय है. हर असफलता एक पाठ होती है कि उसको दुहराना सबसे बड़ी भूल है. जो भूलों से सीखते हैं वे फिर कभी उस भूल को भूलते भी नहीं हैं.

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  26. सच में कभी-कभी असफलता, जीवन में सफलता से भी बड़ी भूमिका निभाती है. बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट. इम्तियाज़ की पहली फ़िल्म ’सोचा न था’ मेरी भी मनपसंद फ़िल्म है. और इम्तियाज़ भी अच्छे लगते हैं. ये तो बता देतीं कि उनकी कोई गर्लफ़्रैन्ड है कि नहीं...just joking !!1

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  27. @मुक्ति
    मुक्ति बस दो दिन दो....अभी जासूस लगा देती हूँ...और फिंगर क्रॉस करके रखो कि वो कहीं Gay ना हो...हा हा
    वैसे शिखा पहले से ही क्यू में है हा हा हा

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  28. Imtiyaaz bhai vastav me kai logon ke liye prernasrot hain.. shayad jaldi hi unse personally mil sakoonga. bataunga aapko. :)

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