Monday, February 22, 2010

दर्शक से श्रोता में तब्दील होने की दास्तान




'स्पोर्ट्स डे' की तरह ही स्कूल के 'वार्षिक प्रोग्राम' की तैयारी भी बड़े लगन और मेहनत से की जाती है.पर इसमें सारा दारोमदार टीचर पर होता है.प्रोग्राम के चयन से लेकर सैकड़ों बच्चों में से कुछ को चुनना फिर रिहर्सल करवाना.कॉस्टयूम निश्चित करना..आजकल वार्षिक प्रोग्राम जैसे स्कूल का एक 'प्रेस्टीज इशु' बन गया है और स्कूलों में होड़ लगी होती है कि किनका प्रोग्राम सबसे अच्छा होता है.

जब पहली बार मैंने सुना कि वार्षिक प्रोग्राम प्रतिष्ठित 'भाईदास हॉल' में होगा तो बडा आश्चर्य हुआ था.स्कूल कम्पाउंड में 'स्पोर्ट्स डे' की तरह भी कर सकते थे.हज़ारों रुपये खर्च कर इतना शानदार हॉल लेने की क्या जरूरत.इस हॉल में 'जगजीत सिंह' जैसे बड़े बड़े कलाकारों के प्रोग्राम होते हैं.स्कूल से एक घंटा लग जाता है जाने में.पर देखने के बाद पता चला.इतना अच्छा 'साउंड एन लाईट इफेक्ट' ,बार बार बदलते दृश्य बिलकुल प्रोफेशनल अंदाज़ में.यह स्कूल के स्टेज पर मुश्किल था.मुंबई में ज्यादातर स्कूल दो शिफ्ट में चलते हैं.सुबह ७ से १ बजे तक पांचवीं से दसवीं कक्षा.फिर १ से ६ बजे तक पहली से चौथी तक.एक क्लास के ८ से १० डिविज़न होते हैं और हर डिविज़न में ६० बच्चे.अब सभी बच्चों के माता-पिता को तो आमंत्रित करना ही होता है.लिहाज़ा ३ दिन तक प्रोग्राम के दो शो किये जाते हैं.पहले तो कार्ड पर लिखा होता था केवल दो लोगों को ही अनुमति है..पर पिछले २,३, साल से पहचान पत्र लेकर जाना होता है और सिर्फ माता-पिता को ही प्रोग्राम देखने की अनुमति है.मुझे यह व्यवस्था थोड़ी खटकती है, क्यूंकि जिन बच्चों के नाना-नानी,दादा-दादी साथ रहते हैं.उनकी भी तो इच्छा होती होगी कि अपने नौनिहालों का प्रोग्राम देखें.पहले फिर भी जो लोग नहीं जाते उनसे कार्ड लेकर उन्हें ले जाया जा सकता था .पर मुंबई की अपनी मजबूरियाँ हैं.

यहाँ स्कूलों में वार्षिक प्रोग्राम को इतनी गंभीरता से लिया जाता है कि नाटकों के लिए बाकायदा रंगकर्मी और नृत्य के लिए कोरियोग्राफर बुलाये जाते हैं.इच्छुक बच्चों का ऑडिशन लिया जाता है और उपयुक्त पाने पर ही उन्हें चुना जाता है.किसी पक्षपात की कोई गुंजाईश नहीं रह जाती वरना, टीचर्स बेचारों पर यह आरोप लग ही जाता था कि अपने, पडोसी,या फ्रेंड के बच्चे हैं, इसीलिए लिया है.ज्यादातर डांस फ़िल्मी गाने पर ही होते हैं यह बात नहीं जमती,इतनी भाषाओँ में ढेर सारे लोकगीत हैं.जिका उपयोग किया जा सकता है.

यहाँ विशेष अतिथि के रूप में 'फिल्म स्टार' को बुलाने का चलन है.एक बार मेरे पैरेंट्स यहाँ थे तो मैं दूसरों से एक्स्ट्रा कार्ड लेकर उन्हें भी साथ ले गयी थी.'गोविंदा' को मुख्य अतिथि के रूप में देखकर पापा बहुत नाराज़ हुए थे कि किसी शिक्षाविद को बुलाना चाहिए.मुझे भी ऐसा ही लगता था पर जब मैंने गोविंदा की बातें सुनीं तो लगा..शायद यही कोई शिक्षाविद कहते तो बच्चे बिलकुल ही नहीं सुनते.गोविंदा ने कहा कि 'बच्चों तुमने भगवान को तो नहीं देखा है पर माता-पिता तुम्हारे सामने हैं उन्हें ही अपना भगवान समझो.' बच्चों के साथ ये फिल्मस्टार नाचते हैं गाते हैं..पलभर को जैसे अपना बचपन भी जी लेते हैं बच्चों के बीच.जब जैकी श्रौफ़ ने अपने परिचित अंदाज़ में कहा था,"कैसा है बीड़ू?"तो सारे बच्चे खी खी कर हंस पड़े थे.

बच्चों का वार्षिक प्रोग्राम यानि पैरेंट्स की मुसीबत.एक बार छोटा बेटा 'कनिष्क' ,बाल मजदूर का रोल कर रहा था.डाइरेक्टर ने एक गन्दा शर्ट लाने को बोला.मैं जितने शर्ट भेजती सब लौटा देते 'नहीं और गन्दा चाहिए'.मेरी परेशानी देख सहेलियों ने कहा,ऐसा करो एक शर्ट से घर में पोछा लगा लो और वही सुखा कर भेज दो.अब यह तो नहीं कर सकती सो जानबूझक बर्तन जलाए कालिख बनाई और शर्ट से पोछा.पेंट से मिटटी जैसा रंग बना कर लगाया.उसके बावजूद स्टेज पर जाने से पहले उसके सर ने कहा बाहर जाकर लॉन से ढेर सारी मिटटी,अपने शर्ट,और हाथ मुहँ पर लगा कर आ जाओ.यही उसका मेकअप था.फिर भी सहेलियों ने कहा ये तो एकदम 'well fed' मजदूर है.इसके मालिक इसका अच्छा ख्याल रखते हैं.

कई बातें अब भी सीखने को मिल जाती हैं.एक बार किंजल्क' एंकर' था और उसे टाई सूट पहननी थी.मैंने सूट से मैच करता हुआ 'ग्रे कलर' का टाई दे दिया पर स्टेज पर देखते ही मेरी सहेली ने कहा.तुम्हे रेड कलर की टाई देनी चाहिए थी.दूसरे शो के लिए रेड दे देना.सचमुच फीका सा लग रहा था..उसने 'शाईमक डावर' की क्लासेस कीं थीं और बता रही थी कि शो के पहले ग्रीन रूम में शाईमक चिल्लाते रहते हैं,'आई वांट मोर कलर ..आई वांट मोर ग्लिटर '.स्टेज पर चटकीले और भड़कीले रंग ही अच्छे लगते हैं.

और एक मजेदार वाकया हुआ.मैंने अपने बेटे को ही नहीं पहचना.घर आकर उसने पूछा,'मेरा डांस कैसा था?'..जब मैंने कहा,'पर तुम तो एंकरिंग कर रहें थे' तब उसने बताया कि वह टाइम पास के लिए प्रैक्टिस में दोस्तों के बीच घुसकर डांस भी करता था .स्टेज पर जाते समय टीचर ने कहा,'तुम भी चले जाओ..बस कोट उतार कर रख दो.टाई ढीली कर लो,एक तरफ की शर्ट बाहर कर दो और बाल बिखेर लो. हो गया,'दस बहाने कर के.....' का कॉस्टयूम.पर मेरी सहेली ने उसे पहचान लिया था और बाद में बताया कि मैंने डर के मारे तुमसे नहीं कहा कि बोलोगी मेरे बेटे को भी नहीं पहचानती'


यहाँ सिर्फ स्कूलों में ही नहीं कोचिंग क्लास के भी वार्षिक प्रोग्राम होते हैं और मैंने नोटिस किया है कोचिंग क्लास के वार्षिक प्रोग्राम बच्चे ज्यादा एन्जॉय करते हैं क्यूंकि यहाँ उतना अनुशासन नहीं होता और टीचर्स ज्यादा फेंडली होते हैं.मैं किंजल्क से बहुत नाराज़ थी क्यूंकि बोर्ड एग्जाम सर पर था और वह रिहर्सल में लगा हुआ था.मैंने कह रखा था,'मैं देखने नहीं आउंगी'.फिर भी मुझे जाना ही था और उसे भी यह बात पता थी.ऑडिटोरियम में घुसते ही मैंने देखा किंजल्क स्टेज पर है. जाने पर पता चला वह 'impromptu speech' था.जिसमे स्टेज पर ही चिट उठाकर बोलना होता है.किंजल्क को विषय मिला था,'माँ की ममता' और माँ उस से इतनी नाराज़ थी.पर प्राइज़ उसे ही मिला..मैंने अपने workaholic husband के लिए बगल की कुर्सी खाली रखी थी कि यह प्रोग्राम तो रात में है,आ सकते हैं.और उसका नाटक शुरू होने के पहले आ भी गए.और हम दोनों स्तब्ध देखते रहें.किंजल्क जमूरा बना था,बालों में तेल लगाए,घुटने तक की पैंट पहन रखी थी, शर्ट कीबांह एक आधी और एक पूरी.इस गेटअप में भी वह किसी भी स्टेज फ्रायीट से बेखबर अपने अभिनय में मशगूल था.मेरे पति ने सिर्फ इतना कहा ,'अब बेटा बड़ा हो गया है'

किंजल्क स्कूल से निकल गया और कनिष्क के स्कूल के अंतिम वर्ष(9th ) में वार्षिक प्रोग्राम कैंसिल कर वे पैसे २६ /११ के विक्टिम्स को डोनेट कर दिए गए.

इसके बाद से मेरी भूमिका दर्शक से श्रोता की हो गयी.

चेतन भगत की Five Point Someone (जिसपर थ्री इडियट्स फिल्म बनी है) की शुरुआत में ही लिखा है."अगर आप इंजिनियर बनना चाहते हैं तो दो साल के लिए किताबों के साथ एक कमरे में खुद को बंद कर चाभी बाहर फेंक दें".और मैंने यह आँखों के सामने घटित होते भी देख लिया.दो साल किंजल्क सिर्फ किताबे,क्लासेस,होमवर्क और टेस्ट का ही होकर रह गया.

पर एक बार मनपसंद स्ट्रीम और मनपसनद कॉलेज में एडमिशन के बाद तो जैसे उसने कॉलेज एक्टिविटीज़ में खुद को डूबा लिया है.मेरे सामने भी एक नयी दुनिया खुलती जा रही है.नाटकों के इतने प्रकार होते हैं.spoof,situational drama ,hollywood-.bollywood.आदि .नुक्कड़ नाटक में ७,८,कलाकार होते हैं और एक कलाकर को ५,६ अलग अलग किरदार निभाने होते हैं और इसका प्रदर्शन किसी माल में या सडक के किनारे करना पड़ता है.जज भी भीड़ में ही खड़े होते हैं.और यह कोशिश करनी होती है कि सचमुच उनके नाटक से आकर्षित होकर भीड़ जुटे. हॉलीवुड-बॉलीवुड में एक हिंदी,एक अंग्रेजी फिल्मों को मिलाकर एक नयी कहानी बनानी होती है.situational acting में इन्हें किसी भी फिल्म के दो मिनट का सीन दिखाया जाता है और आगे ८ मिनट की कहानी खुद बनानी पड़ती है और आज शाम सीन दिया जाता है,दूसरे दिन प्रदर्शित करना होता है. रात के दस,ग्यारह बजे तक ये सीढियों पर रिहर्सल करते हैं.मेरी थोड़ी असहमति थी पर इनके टीम में लडकियां भी इतनी रात तक होती हैं.और प्रोग्राम भी हमेशा क्लासेस के बाद रात को ही होते हैं.बच्चे नाराज़ भी होते हैं कि ट्रॉफी तो कॉलेज वाले सजा लेते हैं पर रिहर्सल करने को एक कमरा भी नहीं देते.मुझे 'रंग दे बसंती' फिल्म याद आ गयी ,शायद हर कॉलेज में रिहर्सल सीढियों पर ही होती है

कई जगह इन्होने ईनाम भी जीता और ट्रॉफी और सर्टिफिकेट्स भी मिले.जब गिफ्ट वाउचर्स मिले तो ये बच्चे आश्चर्य में डूब गए.मुझे अपने दिन याद आ गए,रचना छप जाना ही बड़ी बात थी,जब १०० रुपये का चेक मिला था तो सुखद आश्चर्य हुआ था. इन्हें हज़ार- हज़ार रुपये के ३ गिफ्ट वाउचर्स 'लोखंडवाला' के जूते,घडी और कपड़ों के शोरूम के मिले. पर जब किंजल्क अपने भाई के बर्थडे में गिफ्ट करने को एक घडी लेने गया तो पता चला,वहाँ शुरुआत ही १५०० रुपये से थी.


यहाँ जज में अनुराग कश्यप,डौली ठाकुर,एलेक पद्मसी जैसी हस्तियाँ आती हैं.मैंने कह रखा है, कहीं से कोई ऑफर मिले तो ध्यान मत देना,बेसिक एडुकेशन बहुत जरूरी है.फिर भी यकीन नहीं था.पर जब डौली ठाकुर ने इनके नुक्कड़ नाटक (विषय था..'पप्पू कांट वोट.....")से प्रभावित होकर कहा कि वे महाराष्ट्र सरकार को लिख देती है."तुम लोग, जनता को जागरूक करने के लिए जगह जगह जाकर इसका प्रदर्शन करो' तो सब बच्चों ने मना कर दिया.'एलिक पद्मसी' ने भी पृथ्वी थियेटर का एक ग्रुप ज्वाइन करने को कहा तब भी इनलोगों ने इनकार कर दिया कि पढ़ाई पर बहुत असर पड़ेगा. और शायद ये बच्चे हकीकत से वाकिफ भी हैं क्यूंकि आसपास ही देखते हैं कितने ही टी.वी. कलाकार दो महीने तो दिन रात काम करते हैं,बर्थडे 'फाइव स्टार' में मनाते हैं और अगले चार महीने गार्डेन में बैठे गिटार टुनटुनाते रहते हैं और ढाबे में खाना पड़ता है.इसीलिए शायद ग्लैमर का आकर्षण थोड़ा कम है.

फिर भी मैंने फिंगर क्रॉस करके ही रखी है कि इसका मन कभी ना डोले और कोई ऑफर भी ना मिले.

25 comments:

  1. बहुत सधी हुई शैली में ये दास्तान लिखी है....और बच्चों के बारे में जान कर बहुत अच्छा लगा....आज बच्चे अपने भविष्य के प्रति जागरूक हैं...और हर क्षेत्र में आगे बढने का प्रयास करते हैं.... इससे उनका व्यक्तित्त्व निखरता है.....सुन्दर लेख के लिए बधाई

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  2. मैं अभी पढ़ रहा हूँ....

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  3. बाप रे आपने तो आँखें सी खोल दी ...वार्षिक उत्सव इतना पोश ?महंगे हाल ,करियोग्रफर ,फिल्म स्टार और न जाने क्या क्या... मैने यहाँ सुना था की अब भारत के स्कूल भी पश्चिमी स्कूल की तर्ज़ पर ही चलते हैं ....परन्तु लगता है वहां पश्चिमी सेलेबुस तो अपना लिया गया है पर मानसिकता नहीं....यहाँ इस तरह के किसी भी कार्यक्रम में इतना पैसा नहीं खर्च किया जाता ..बहुत ही सादगी से सारे कार्यक्रम होते हैं...यहाँ तक की कॉस्टयूम के मामले में ही घर और स्कूल में जो होता है उन्हीं से काम चलाया जाता है ....अलग से बनवाने तक की डिमांड नहीं की जाती.. ..
    पर आपकी दर्शक से श्रोता तक की ये यात्रा काफी रोचक थी...एक के बाद एक दिलचस्प वाकये बस पढ़ते चले जाओ .. बस अब ये उँगलियाँ क्रास करे ही रखिये कुछ समय तक :) मुंबई की हवा बहुत तेज़ है सुना है :).....wish you all the very best..

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  4. संस्मरण बहुत अच्छा लगा.... यह तो है कि बच्चों को उनके टैलेंट के हिसाब से से ही ट्रीट करना चाहिए.... जो कि आपने बखूभी निभाया है.... लगन का होना बुत ज़रूरी है.... किंजल्क का अंदाज़ बहुत अच्छा लगा....बहुत टैलेंटेड बच्चा है.... यह भी आपने बिलकुल सही कहा...कि बेसिक एजुकेशन बहुत ज़रूरी है.... बिना इसके तो कुछ हो ही नहीं सकता.... आप फिलहाल फिंगर क्रोस ही रखिये.... लाइफ में सिक्युरिटी बहुत ज़रूरी है...जो कि बेसिक एजुकेशन से ही आती है....

    संस्मरणात्मक रूप से यह पोस्ट बहुत अच्छी लगी....

    10 / 10.....

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  5. @शिखा
    I need ur wishes badly..:)ये तो सही कहा तुमने...मुझे भी इतना दिखावा बिल्ल्कुल पसंद नहीं आता..वो innocense नहीं रहता....और costumeपर खर्च किये गए पैसे भी बेकार जाते हैं.बच्चे तो बस कठपुतली ही बने रहते हैं...उनकी अपनी क्रियेटिविटी उभर कर नहीं आती सामने.

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  6. अरे वाह महफूज़...पढ़ भी लिया..स्पीड इतनी अच्छी है....और कमेन्ट भी लिख दिया...क्या कहने

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  7. अरे बाप रे ...भारत में अब तो हर बात का मापदंड फिल्म ही होकर रह गया है...हमारे यहाँ भी सब कुछ बहुत ही साधारण होता है...ज्यादा तवज्जो performance पर होता है न कि हाल या वेन्यू पर....
    बच्चे आपके बहुत होनहार हैं इसमें कोई शक है ही नहीं....आप पर जो गए हैं...:)
    बहुत अच्छी पोस्ट..

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  8. @अदा
    अदा,अब मेरी leg pulling मत करो :)....मुझे लगा रहा है....कहीं मुझे Empty nest syndrome तो नहीं हो रहा...बस बच्चों के स्कूल की बातें ही याद आती रहती हैं..

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  9. बच्चें बढ़ें, पढ़ें, हर ऊंचाई तक चढ़ें...क्या ज़रूरी है कि फ़िल्म-टीवी की तरफ ही दौड़ें. हमेशा की तरह सरस लिखा. बधाइयां हज़ार।

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  10. आपके लिखने में सिर्फ रस ही नहीं
    इन पर संयम का पूरा बस भी है
    हमें कहीं भी विवश नहीं होना चाहिए
    जीवन में सबका ऐसा ही विश चाहिए।

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  11. थ्री इडियट्स का गोल्डन फंडा...

    आदमी को सक्सेस के लिए नहीं, एक्सेलेंस के लिए हर वक्त ट्राई करते रहना चाहिए...एक्सेलेंस आ गई तो सक्सेस को खुद-ब-खुद पीछे आना पड़ेगा...रश्मि बहना यही हमें भी अपने बच्चों को सिखाना चाहिए...

    जय हिंद...

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  12. बच्चे तो प्रतिभावान होंगे ही..लेकिन इतना ताम झाम..सुन पढ़ कर ही हैरान रह गये.

    अच्छा लगा पढ़ना.

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  13. अब लगता है हम युरोप से आगे निकल रहे है, हमारे यहां तो यह सब बहुत ही साधारण ढंग से होता है, खाने पीने का समान भी बच्चो के मां बाप घर से बना कर लाते है ओर फ़िर वहा स्टाल लगा कर कुछ मां बाप उन्हे बेच देते है, ओर जो पेसा आता है वो स्कुल के खाते मै जमा होता है, ओर उस दिन सफ़ाई भी बच्चे ओर बच्चो के मां बाप करते है, क्या ऎसी सोच है इन आधुनिक बनाने वाले लोगो मे???? सब गोल माल है जी...

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  14. वार्षिक उत्सव में सिर्फ दो लोगों को आमंत्रित किया जाए ...ये तो फिर भी ठीक है ...मेरी बेटी के स्कूल में तो जो बच्चे वार्षिक कार्यक्रम में हिस्सा नहीं ले रहे ...उन्हें तक नहीं बुलाया जाता ...!!
    अभी कुछ महीनो पहले बेटी को एंकरिंग की ऑफर आई थी ...मगर अपने बुस्य शेड्यूल के चलते उसे मना करना पड़ा ...तुम्हारी तरह फिंगर क्रोस करने वाली कई हैं ...:):)

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  15. महगे आयोजनो और ताम्झाम को परे रख दे तो मुझे तो बहुत बढिया लगता है कि बच्चे अपनी अवस्था और रुचि के अनुरूप गतिविधियो मे भाग ले. जैसे जैसे बच्चे बडे होते है माता पिता के भूमिका मे बदलाव आना शुरु हो जाता है. क्रोस फ़िन्गर करके हम मै से अधिकतर माता पिता को बैठना होता है.

    आपके प्रतिभाशाली बच्चे जीवन की हर चुनौती पर खरे उतरे और जीवन के हर पल का आनन्द ले यही शुभकामना है.

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  16. रश्मि दीदी,
    कहते ही न शब्दों को जोड़ कर वाक्य वाक्यों को जोड़ कर एक सुन्दर आलेख बनाया जा सकता है वैसे हीं बुद्धिजीवी सोंच प्रतिभावान आकान्छाएं जो बच्चों में दिखती ही वो एक माँ के के कई लाख छोटे छोटे प्रयासों का नतीजा होता है.

    विद्यालय,बच्चों की कार्यस्थली से कहीं ज्यादा प्रदर्शित होती है,बच्चे कई छोटे छोटे कार्यक्रम में भाग लेकर जहाँ अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लेते है वहीँ कभी कभी माँ पिता भी अपने बच्चों को नए रूप में देख कर इतना कहने पर विवस हो जाते हें की बच्चे बड़े हो गये ..बिद्यालय की भूमिका बच्चों के जीवन में क्या है उसे परिभाषित करना कठिन है..क्यों की स्कूल बच्चों के बिकास के लिए अंत तक के प्रयास करते हें..अब गोविंदा को बुलाना पड़े या जैकी दादा को..

    मुझे लगता है सारे प्रयास कामयाब हो जाते है अगर माँ पिता का बच्चों के प्रति आपके जैसा सोंच और सुलझी हुई भावनाएं रखें ..मै बच्चों को बधाई दूंगा की आपके जैसी माँ उनका बहुत ख्याल रखती हें..
    दुनिया की सभी माँ के लिए खुदा से इतना ही कहूँगा
    नींद अपनी भुला कर
    सुलाया हमको
    आंसू अपनी गिरा कर
    हसाया हमको
    भूखे खुद को रख कर
    खिलाया हमको
    दर्द ना देना उस माँ को खुदा
    जिसने दुनिया के रंगों को
    दिखाया हमको ...

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  17. ये बच्चों के धीरे धीरे बड़े होने का और फिर उसके बाद घर से बाहर जाकर पढने का दर्द तो अब शुरू हो चुका है, उसके लिए बस ये दास्ताँ ही सबसे अच्छी यादगार बन सकती है. बहुत अच्छा लिखा. हम एक एक लिम्हें हो जैसे जीते हैं वैसे ही तुमने शब्दों में पिरो कर यादों की माला बना कर सबको पहना दी.
    खूबसूरत रचना !

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  18. aapne itni sundar shelly mein likha hai ki ek saans mein poora padha hai..........bachchon ko sahi disha mein agrsar karna parents ka hi kaam hai aur jahan parents apne bachchon ke is tarah dhyan dete hain wahan aise hi honhar bachche hote hain............bahut khoob.

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  19. ओहो.... बच्चों के भीतर अभिनय का वायरस प्रवेश कर गया । यह अच्छा भी हुआ और बुरा भी । अब यह जीवन भर चैन नही लेने देगा । मेरे भीतर भी यह बचपन में प्रवेश कर गया था । अभी तक पीछा नहीं छूटा है । अभी पिछले दिनों ही एक नुक्कड किया है और अब प्रोसेनियम ( मंचीय नाटक ) की तैयारी चल रही है । हाँ यह तो मै भी कहूंगा कि कैरियर पहले ज़रूरी है । बस उन्हे यह सद्बुद्धि कोई न दे कि नाटक और फिल्म को अपना कैरियर बनाने के बारे में सोचे इसलिये कि यह दुनिया अब स्टार पुत्रों ने हथिया ली है और अन्य लोगों का अब वहाँ गुजारा नही है ।
    खैर लेखन अभिनय इसलिये भी ज़रूरी है कि यह इंसान को जीने का आनन्द देते हैं ।
    इसलिये इंसान को एक बार नाटक मे काम ज़रूर करना चाहिये ।
    कपडे मैले करने वाले किस्से से एक अपना किस्सा भी याद आ गया जब मैने भिखारी के रोल के लिये साफ सुथरी धोती को सड-अक पर बिछाकर मैला किया था ..और
    बस ठीक है इससे ज़्यादा पकाना ठीक नहीं..

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  20. वाह रश्मि जी आप के संस्मरण पढ़ते पढ़े मै तो उनमे खोता सा जा रहा हूँ कई किस्त में पढ़ा मगर आज पूरा ही कर लिया ,, बस इतना कहूँगा प्रतिस्पर्धा योग्यता के लिए हो शान के लिए नहीं
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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  21. बहुत शानदार और विस्तृत विवरण. मज़ा आ गया.रश्मि जी, स्कूलों के पास आज भरपूर पैसा है लिहाजा वे वार्षिक उत्सव पर दिल खोल के खर्च करते हैं.वैसे कई स्कूल तो इस प्रोग्राम के नाम पर अच्छा-भला पैसा भी बच्चों से ही ले लेते हैं.
    ये एकदम सच है किसी भी सेलिब्रिटी की बात बच्चे ज़्यादा ग़ौर से सुनेंगे, किसी शिक्षाविद की तरह. गम्भीर किस्म के लोग आज की पीढी को धिक्कारने का काम ज़्यादा करती है. आज कमरतोड पढाई के दौर में ये कार्यक्रम बच्चों को मानसिक राहत देते हैं.कहीं कहीं बहुत अच्छे बिम्ब बने हैं जैसे- " मेरी सहेली ने उसे पहचान लिया था और बाद में बताया कि मैंने डर के मारे तुमसे नहीं कहा कि बोलोगी मेरे बेटे को भी नहीं पहचानती'"
    एक समय के बाद चर्चा का विषय बच्चे हो ही जाते हैं. बहुत शानदार वर्णन. बधाई.

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  22. बहुत अच्छा लगा संस्मरण रश्मि जी मुझे पिछले दो तीन दिन इन समारोहों मे जाने का अवसर मिला तो फाईवस्टार जैसा तो नही मगर बहुत अच्छा प्रोग्राम था मगर छोटे छोटे बच्चों को फिलमी गीतों की धुनो पर गाते देख बहुत बुरा लगा और मैने उनसे कह दिया अपनी जज्मेन्ट मे भी लिख दिया कि बच्चों के देशभक्ति आदि के अच्छी गीत तैयार करवाया करो नही तो अगली बार मुझे मत बुलायें। देख कर दुख होता है केवल फिल्मों की सीरियल्स की ही नकल करवाते हैं। वैसे अपने देश मे प्रतिभाओं की कमी नही बस उन्हें दिशा की जरूरत है
    आपके बच्चों के बारे मे जान कर खुशी हुयी। संस्कार इन्हें ही कहते हैं । बहुत अच्छा लगा आपका संस्मरण शुभकामनायें

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  23. Interesting write up.feels like we saw all your kids annual days and other events.Keep it up!!!

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  24. Di is post me 1-2 nahin balki kai saari aisee baten mileen jo sochne ko majboor kar gayeen. jaankar achchha laga ki Kinjalk ko bhi acting ka bahut shauk hai...

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  25. Please jahan wo jana chahte hain jane diziye.. unkee mahatwakaankshaaon ko apnee ummeedon ke paron ke sath na baandhiye. aapne to '3 Idiots' dekhi hai na.. :)

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