Wednesday, January 27, 2010

निर्मल साफ़ पानी सा बच्चों का ये मन...


अक्सर कई ब्लोग्स पर देखा है और मुंबई ब्लॉगर्स मीट में एक साथी ब्लॉगर ने भी बताया कि वे अक्सर इमेल में आये अच्छे विचारों या बोध कथाओं या चुटकुलों का हिंदी रूपांतरण कर अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर देते हैं. मुझे भी एक ख़याल आया पर यहाँ स्थिति थोड़ी सी अलग थी.. एक घटना हुई और करीब साल भर बाद ,ठीक उस से मिलता जुलता एक मेल मेरे पास आया.और देख सुखद आश्चर्य हुआ...कहने को देश,भाषा संस्कृति सब अलग हैं...पर पूरे विश्व में मनुष्य की संवेदनाएं एक जैसी ही हैं.पहले घटना का जिक्र करती हूँ फिर इमेल का.

कुछ साल पहले की घटना है.मेरे छोटे बेटे कनिष्क के स्कूल में फुटबाल टूर्नामेंट्स शुरू हो गए थे.पर इस बार मुझे थोड़ी राहत थी क्यूंकि पास में ही रहने वाली मेरी सहेली का बेटा भी फ़ुटबाल टीम में शामिल हो गया था.और हमने तय किया कि मैच ख़त्म होने के बाद ये दोनों बच्चे एक साथ ऑटो से आ सकते हैं.वरना मुझे ही लेने जाना पड़ता था.हमने आपस में बात करके दोनों को ५०-५० रुपये दे दिए थे.ताकि मन हो तो कुछ खा लेँ.वैसे हम टिफिन तैयार करके देते थे.पर घर का बना, कब भाता है,बच्चों को.


दिन में ३ बजे के करीब इनलोगों ने फोन किया कि हम मैच खेल कर स्कूल पहुँच गए हैं और अब ऑटो से घर आ रहें हैं.हमने जल्दी जल्दी खाना गर्म किया कि बच्चे भूखें होंगे.देर हो रही थी,पर यही सोचा कि शायद ऑटो नहीं मिल रहा होगा. बेटे ने घर में कदम रखा और जब मैंने कहा जल्दी से नहा कर कपड़े बदलो और खाना खा लो तो उसने बोला,'मैं तो अभी अभी CCD (Coffee Cafe Day ) में खा कर आ रहा हूँ". CCD मेरे घर से चार कदम की दूरी पर है और वहाँ से चार कदम पर मेरी सहेली का घर.मैंने आश्चर्य से पूछा,'यहाँ आ कर खाया तुमलोगों ने??"...अब कनिष्क चुप. दरअसल पहली बार अकेले आने का मौका मिला.पास में पैसे भी थे.और मैच ख़तम होते ही कोच ने स्कूल बस में बिठा दिया.इन्हें पैसे खर्च करने का मौका ही नहीं मिला. जाहिर है मुझे गुस्सा आना ही था और उसे जम कर डांट पड़ी.तभी मेरी सहेली का भी फ़ोन आया,'सुना रश्मि ,क्या किया इन दोनों ने?"..थोड़ी देर हम फ़ोन पर ही इनकी शैतानी का जिक्र करते रहें फिर फ़ोन रख कर अपने अपने बेटे की तरफ मुखातिब हो गए,डांटने को.

थोड़ी देर बाद जब वह फ्रेश हो कर आया तब मैंने पूछा,'तुमलोगों ने CCD में खाया क्या?" क्यूंकि वहाँ तो एक कॉफ़ी ही ६५ रुपये की मिलती है.और इनके पास ज्यादा पैसे तो थे नहीं.धूल धूसरित दोनों को CCD वालों ने अन्दर ही कैसे आने दिया ,यही आश्चर्य था.पर ऐसी जगहों पर आपने टूटी चप्पल या फटे कपड़े पहने हों कोई फर्क नहीं पड़ता अगर आपको अच्छी अंग्रेजी आती हो.कनिष्क ने बताया २० रुपये ऑटो में देने के बाद इनके पास ८० रुपये बचे थे.ये लोग 'मेन्यु कार्ड' गौर से पढ़ रहें थे और कुछ इनकी जेब के लायक मिल ही नहीं रहा था.तब एक वेटर ने पास आकर पूछा,'आपलोगों का बजट क्या है?' इनके बताने पर उसने सलाह दी या तो ४० रुपये की पेस्ट्री ले लो या ३५ रुपये का सैंडविच.मैंने पूछा,'हम्म तो तुमलोगों ने पेस्ट्री ली होगी.'क्यूंकि सैंडविच तो ये दोनों घर में भी खाना पसंद नहीं करते.कनिष्क ने बताया ,'नहीं हम लोगों ने सैंडविच लिया. क्यूंकि फिर वेटर को टिप देने के पैसे कहाँ से बचते और उसने हमारी इतनी मदद की थी.इसलिए दस रुपये हमने टिप में दे दिए"

इमेल में अमरीका के एक 8 साल के बच्चे का जिक्र था,उसने अपने पिग्गी बैंक से सारे चेंज ले जाकर काउंटर पे रखे.वेटर ने भी उसकी मदद की गिनने में.उसने आइक्रीम कोन का दाम पूछा.वेटर ने बोला.इतने में आ जायेगा.फिर उसने आइसक्रीम कप का दाम पूछा.उसका मूल्य थोड़ा कम था.उसने आइसक्रीम कप ऑर्डर किया.वेटर को थोड़ा आश्चर्य हुआ.फिर भी उसने कप ले जाकर उसे दिया.उस बच्चे ने आइसक्रीम खाया और जाने लगा तो बाकी चेंज टेबल पर टिप के रूप में छोड़ कर चला गया.

दुनिया के किसी कोने में हो सारे बच्चों के दिल यकसाँ होते हैं.धीरे धीरे वक़्त की धूप उन्हें मजहब,देश,रंग की लकीरें खींचना सीखा देती है.और बंद कर देती है, उन दिलों को अलग कटघरों में. निर्मल साफ़ पानी सा होता है,इनका मन ...और इनमे तरह तरह के विचारों को धोकर इसे कितना प्रदूषित कर देते हैं हम.

कहीं पढ़ा एक शेर याद आ रहा है,

"बच्चो के छोटे हाथो को चांद सितारे छूने दो
चार किताबे पढ़ लिख कर ये भी , हम जैसे हो जायेंगे"

28 comments:

shikha varshney said...

बिलकुल सच कहा बच्चे कहीं भी हों एक जैसे ही होते हैं...मन के सच्चे..सरल..
.
"हमें भी फिर से बच्चा बना दे या खुदा.
तेरी बालिग दुनिया में अब जिया जाता नहीं "....आदाब...ही ही

बहुत बढ़िया पोस्ट है जी..

HARI SHARMA said...

बच्चे मन के सच्चे

जब तक ये रहते बच्चे
रहते है सचमुच अच्छे
जैसे जैसे बडे हो रहे
बनते अकल के कच्चे

सैयद | Syed said...

सच है... जब कभी अपनी बच्ची को शरारत करते देखता हूँ तो कभी कभी ऐसा महसूस होता है की हम बड़े क्यूँ हुए ?

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सच है, बच्चे इतने ही निर्मल हृदय के होते हैं. झूठ, कपट चोरी या हमारा-तुम्हारा तो वे बहुत बाद में अपने बडों से ही सीखते हैं.
बहुत सार्थक और सहज पोस्ट. मन खुश हो गया.

शहरोज़ said...

शे'र निदा फ़ाज़ली का है!! आपने यही न कहा , बचपन के दिन भुला न देना!!
खूब तालमेल बिठाया है आपने.घर से अमरीका_बच्चे ही बच्चे!!
ज़िन्दगी के सबसे हसीं पल होते हैं, यही तो!!

हाँ !! मुबारकबाद देना भूल ही गया आज राष्ट्रिय सहारा में आपकी पिछली पोस्ट प्रकाशित हुई है.स्कैन कराकर मेल कर दूंगा.

Kulwant Happy said...

बहुत अद्भुत। आदत न गई टिप देने की।

sangeeta swarup said...

बहुत अच्छी घटना का ज़िक्र किया....सच है बच्चों के मन में निर्मल विचार होते हैं.....

सुन्दर लेख..कहूँ या संस्मरण...बहुत अच्छा

arun pandey said...

बिलकुल सही ,
बच्चे अपनी अभिलाषाएं तो पूर्ण करेंगे ही ,फर्क इतना ही है की ये मन से वास्तव में निर्मल होते है ,
और बड़े तो बड़ी चतुराई में ही लगेंगे ,
ध्यान देने की बात है कि पैसे चाहे जितने ही थे ,इन दोनों ने वेटर को इसलिए पैसे देने अनिवार्य समझे
कि उसने इनलोगों को बजट में खिला सकने में मदद की , इनलोगों ने उसके लिए स्नेह या आभार
प्रकट किया , यहाँ पर बड़े लोग वेटर को पहली प्राथमिकता शायद नहीं देते
"बच्चे मन के सच्चे " १००% सिद्ध होते है

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर् लगी यह बात,

Mithilesh dubey said...

बच्चे तो होंते ही है मन के सच्चे , लेकिन हमारा दुषित वातावरण इन्हे दुषित कर देता है । बहुत बढिया लिखा है आपने ।

वाणी गीत said...

सच ही बचपन निर्मल होता है और बच्चे दिल के सच्चे और पूरी दुनिया में एक जैसे ....
बस समय की तेज रफ़्तार और समाजों के उसूलों की भट्टी में पककर अलग रंग रूप धर लेते हैं ....!!

Udan Tashtari said...

बच्चे तो बच्चे हैं..साफ हृदय!!


राजेश रेड्डी का एक शेर याद आया:

मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा,
बड़ों की देख के हालत बड़ा होने से डरता है ...

वन्दना said...

tabhi to kaha gay ahai .........bachche man ke sachche..........kachchi mitti ki tarah hote hain jo chahe rang bhar do.........hum insaan hi galat khad , pani se sinchna shuru kar dete hain aur apne jaisi podh taiyaar kar dete hain..........ek bahut hi sundar lekh ............badhayi.

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

वास्तविकता है रश्मि जी बच्चे कही के हो सब एक जैसे ही होते है, फर्क तो हमारा समाज और मान्यताये बनाता है,,,
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

रेखा श्रीवास्तव said...

हाँ ये बच्चे सरल होते हैं , लेकिन इनके पीछे घर और माता - पिता के स्वभाव और व्यवहार का भी पूरा पूरा प्रभाव होता है. फिर माता - पिता जब उनको अपनी इच्छा के अनुरूप नहीं पते हैं तो शिकायत करते हैं लेकिन ये नहीं सोचते कि हम ने क्या किया है? और हम क्या चाहते हैं?
इन निर्मल मानों को ईश्वर निर्मल ही रहने दे. यही दुआ है.

Dr. Smt. ajit gupta said...

बढ़िया पोस्‍ट।

Arshad Ali said...

Waw Didi!
kamal ka subject,Kamal ki lekhani

Papa ek baar mujhse puchhe..

Tumme aur Airaf Raihan (Mera bhanja 5 years) me kaya antar hay.
Maine kaha Mujhme aur Airaf Raihan me bas umar ka antar hay dono ka man ek jaisa hin hay..

Fir papa ne Airaf Raihan se puchha ...Beta tumme aur mamu me kaya antar hay
Usne kaha- WO mujhe hamesha buddhu banate hayn magar mai unko nahi banata..

papa ne puchha aisa kayon tum bhi mamu ko buddhu bana sakte ho..to Airaf ne kaha buddhu banana to bado ka kaam hay..mai kaise banaunga.

'अदा' said...

कहते हैं बच्चे ईश्वर के प्रति रूप होते हैं..
एकदम पाक साफ़ ..
जीवन के स्वर्णिम दिन भी वही दिन होते हैं..
बहुत सुन्दर आलेख..
हमेशा की तरह..!!

दीपक 'मशाल' said...

काश हम बड़े भी बच्चों से कुछ सीख पाते...
जय हिंद...

सारिका सक्सेना said...

रश्मि जी!
आपके इस ब्लाग के बारे में पता ही नहीं था। आज जाने कहां से घूमते हुये यहां आ पहुंचे।

बहुत अच्छा लिखा है हमेशा की तरह।

हिमांशु । Himanshu said...

संवेदनाएं तो निश्चय ही एक-सी ही हॊंगी न हर जगह ! उस मुक्तता का अनुभव करिये, फिर उनकी चातुरी का ! मैं तो लहालोट हो रहा हूँ उनके कृत्य पर ! सहज-सजग बच्चे !
आभार ।

alok said...

bahut khub ...tip dene ke maamle main bhi bangle jhaanktaa hoon!!! haan per kisi achche ruaab waale jagah per binaa diye jana jaise aapne khud ko fakeer bataaa diyaa per CCD aur dusre saare cafes mein main tip ke khilaaf hi rahtaa hoon aksar agar khulle bach gaye toh theek aur agar card se diyaa toh phir tip ki baat ho kahaa .....liked ur insight!!!! we all see and hear things but very few of us make a note of the same ....jo banaate hain unhe ho kahte hain shanshaah :D

Megha said...

Sahi baat hai bachche man ke sachche hotei hai.........Mujhe khud ko dekh kar believe he nahi hota ki hum bhi kabhi bachche thei. Bahut Khoobsurat post hai.

निर्मला कपिला said...

्रश्मि पहले तो क्षमा चाहती हूँ इस ब्लाग पर आ नही पाई । हर इन्सान जब बच्चा होता है मासूम होता है लेकिन जिस माहौल मे रहता है वैसे ही संस्कार उसमे आने लगते हैं समझ आने पर दुनिया को देख कर विकार भी बढने लगते हैं । और बहुत बार ऐसे दृ्ष्टाँत हमे देखने को मिलते हैं जो हम देख या भोग चुके होते हैं वैसी तुम ने भी देखा बहुत अच्छा लगा । शुभकामनायें

गिरिजेश राव said...

इतने अच्छे ब्लॉग पर पहले क्यों नहीं आया ?
... रिपोर्टिंग काम की चीज है :)
मच्छी के निर्मल हास्य को समझ गए।

शोभना चौरे said...

सच बच्चे इतने ही सच्चे होते है |पर आसपास का परिवेश वातावरण धीरे -धीरे उनके मानस पटल को उद्वेलित करता है और हमारे जीवन के दोहरे मापदंड़ो के बीच वो भी मुखौटा ओढना शुरू कर देता है |
अच्छा आलेख

महफूज़ अली said...

बहुत खूब लिखा है ..बहुत बढ़िया..... बच्चों में संवेदनाएं बहुत होती हैं.... जो कि उम्र बढ़ने के साथ साथ मतलबी होती जाती है... मुझे भी बहुत अच्छे से याद है ...मैं जब स्कूल में था तो पैसे बचा के होटल जाता था.... और टिप के लिए अलग से पैसे बचाता था...ताकि बेईज्ज़ती ना हो.... बहुत अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट...


नोट: लखनऊ से बाहर होने की वजह से .... काफी दिनों तक नहीं आ पाया ....माफ़ी चाहता हूँ....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सच कहा ... पढ़कर बहुत अच्छा लगा.