Friday, January 15, 2010

उफ्फ यह जाति की दीवार !!

कहते हैं 'Truth is stranger than Fiction ' .इस घटना पर यह उक्ति पूर्णतः खरी उतरती है.

काफी पहले की घटना है,मेरे गाँव से एक छोटे से लड़के को एक उच्च वर्ग वाले अपने शहर नौकर के तौर पर ले गए.उन दिनों ऐसा चलन सा था.पिता खेतों में काम करता और उनके बच्चे शहरों में किसी ना किसी के घर नौकर बन कर जाते.अब तो यह चलन समाप्तप्राय है.नयी पीढ़ी के नौजवान खुद ही पंजाब,असाम जाकर मजदूरी करते हैं. पर बीवी बच्चों को आराम से रखते हैं.

खैर, ऐसे ही हमारे 'शालिक काका' का बेटा 'शिव ज्योति ' किसी के साथ शहर गया और दो दिनों बाद ही वहाँ से भाग निकला.उसे ना शहर का नाम पता था,ना अपने घर का पता और वह गुम हो गया.गाँव में जब पता चला तो बहुत हंगामा मचा.उन महाशय के घर के सामने शालिक काकी (हम उन्हें यही,कहते थे) ने जाकर बहुत गालियाँ दीं.उन दिनों ऐसा ही करते थे,जिस से नाराजगी हो उसके घर के सामने जाकर चिल्ला चिल्ला कर खूब गालियाँ दीं जाती थीं.और बाकी पूरा गाँव तमाशा देखता था.'शालिक काका' ने भी अपने बाल और  दाढ़ी,मूंछ बढा ली थी . लोग कहते , उन्होंने कसम खाई है कि जिस शख्स की वजह से उनका बच्चा गुम हो गया है., उसका क़त्ल करने के बाद ही कटवाएँगे. उन महाशय का, जो 'शिव ज्योति ' को गाँव से लेकर गए थे का गाँव आना बंद हो गया.

इसके बाद तो इतनी अफवाहें उड़ने लगीं, जितनी धूल भी किसी  कच्ची मिटटी पर चलती कोई बस भी क्या उड़ाएगी .रोज नए किस्से.कोई कहता,  शिव ज्योति (वैसे उसके नाम का सही उच्चारण कोई नहीं  करता...कुछ लोग 'सिजोती' कहते पर ज्यादातर लोग 'सिजोतिया' ही कहते)  को सर्कस में देखा है,कोई कहता किसी बाज़ार में तो कोई कहता किसी प्लेटफ़ॉर्म पर.ढोंगी बाबाओं की भी खूब बन आई.पता बताने के बहाने उस गरीब से खूब रुपये ऐंठते.

ऐसे ही एक बार गाँव में साधुओं का एक दल आया. उसमे से एक किशोर साधू का चेहरा थोडा बहुत शिव ज्योति से मिलता था. फिर क्या पूरा गाँव उसके पीछे.संयोग से मैं भी उन दिनों गाँव गयी हुई थी.बड़े भाई' राम ज्योति' ने उस साधू का हाथ कस कर पकड़ रखा था.हमारे गाँव में उस जाति विशेष में कुछ ऐसी ही प्रथा थी.,बड़े बेटे का नाम 'राम' पर रखते और छोटे बेटे का 'शिव' पर . गाँव के सारे बच्चे, बड़े उसे घेर कर खड़े.सैकड़ों सवाल उस से पूछे जाते.और हर सवाल का मतलब अपनी तरह से लोग निकाल लेते.उस से पूछा "ये पास वाले खेत किसके हैं.?"..उसने कहा,"मालिक के"..और पूरा गाँव अश अश कर उठा क्यूंकि मेरे दादाजी को सबलोग मालिक कह कर बुलाते थे.आस पास के खेत उनके ही थे.ऐसे ही उसके शरीर पर के सारे चिन्ह लोगों को शिव ज्योति से मिलते जुलते लगे.

दिन भर यह तमाशा होता रहा.हार कर उसने मान लिया कि वही 'शिव ज्योति' है और कहा" ठीक है,चलो घर चलता हूँ".घर जाकर उसने खाना खाया अच्छे से बातें कीं और जब सब लोग सो गए तो रात के अँधेरे में उठ कर भाग निकला.उस फूस की झोपडी में कोई मजबूत दरवाजे और ताले तो थे नहीं.

सबने शालिक काका को समझाया जाने दो ,वो साधू बन गया है.संसार त्याग दिया है.अब उसे घर बार का मोह नहीं.शालिक काका ने भी अपनी जटा से निजात पा ली.और अब उनके बेटे को यहाँ वहाँ देखने के किस्से भी बंद हो गए.उन ढोंगी बाबाओं को जरूर तकलीफ हुई होगी.

काफी सालों बाद,संयोग से मैं गाँव में ही थी.उन्ही दिनों एक १७,१८ साल का एक सुन्दर नवयुवक अच्छे शर्ट पेंट,जूते पहने एक सज्जन के साथ नमूदार हुआ.उस से नाम और परिचय पूछने की जरूरत भी नहीं पड़ी क्यूंकि वह अपने भाई की कार्बन कॉपी लग रहा था.पूरे गाँव में शोर मच गया.
हमारे घर के बाहर के बरामदे में उसे कुर्सी दी गयी बैठने को,जबकि उसके पिता और भाई जिंदगी भर जमीन पर ही बैठते आए थे.पर वेश भूषा को ही तो इज्जत मिलती है.

उस सज्जन ने बताया कि बरसों पहले वह लड़का उन्हें अपनी मिठाई की दुकान के पास बैठा मिला था.जब दो तीन दिन लगातार उसे एक ही जगह पर बैठा देखा तो पूछताछ की पर उसे कुछ भी मालूम नहीं था.उन्हें दया आ गयी और दुकान पर छोटे मोटे काम के लिए रख लिया.धीरे धीरे उस से अपनापन हो गया और अपने बेटे जैसा मानने लगे.उसे स्कूल भी भेजा.पर उसने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी.

इन सज्जन की एक बेटी थी...अब ये सोचने लगे कि शिवज्योति की शादी अपनी बेटी से कर दें.पर अपने देश में शादी में सबसे पहले देखी जाती है 'जाति'.और उन्हें इस लड़के की जाति का कुछ पता नहीं.लड़के को अपना घर तक याद नहीं.उसे सिर्फ इतना याद था कि उसके गाँव के स्टेशन का नाम 'पिपरा' है और स्टेशन से थोड़ी ही दूर पर एक बरगद का पेड़ है.और पेड़ के सामने उसके मामा का घर.इतने से सूत्र से वे महाशय ढूंढते हुए सही जगह पहुँच गए.उन्हें लगा बरगद का पेड़ हर जगह तो नहीं होता.और उनका सोचना सही ही था.

पर इसके बाद जो कुछ भी हुआ...वह कल्पना से परे है.शालिक काका लड़के वाले बन गए और उन महाशय से जब जाति पूछी तो उनकी जाति शालिक काका की जाति से नीची थी.बस इनके भाई बन्धु सब कहने लगे नीचे घर की लड़की कैसे घर में लायेंगे?? मेरे दादाजी प्रगतिशील विचारों वाले थे .उन्होंने समझाने की बहुत कोशिश की.पर शालिक काका की बड़ी बड़ी काल्पनिक मूंछे निकल आई थीं.और उसपे ताव देते हुए, वे बेटे के बाप के गुरूर में मदमस्त थे. शिव ज्योति भी अपने आपको इतने लोगों के आकर्षण का केंद्र बना देख, उन सज्जन के किये सारे अहसान भुला बैठा.और बिलकुल श्रवण कुमार बन गया .नीची निगाह किये यही कहता रहता,'जो ये लोग बोलें'.जैसे आजकल के लड़के दहेज़ लेने के नाम पर श्रवण कुमार बन जाते हैं और सर झुकाए कहते हैं,"'हमें तो कुछ नहीं चाहिए,माता-पिता जानें".वे सज्जन,आँखों में आंसू भरे वापस लौट गए.

कुछ दिन तो शिव ज्योति गाँव का हीरो बना घूमता रहा.हर बड़े घर वाले लोग उसे अपने घर बुलाते .कुर्सी पर बिठाते,सारी कहानी सुनते.
घर की महिलाएं भी उसे आँगन में बुला उसकी खूब खातिर तवज्जो करतीं. पर कुछ ही दिन चला ये.सब फिर सबलोग अपने काम में मशगूल हो गए.शिवज्योति को गाँव का कठिन जीवन रास नहीं आया और वह बगल के शहर भाग गया और वहाँ अब रिक्शा खींचने लगा.

इस जाति की दीवार ने उस से एक अच्छे जीवन का सुख हर लिया.

30 comments:

  1. सामान्‍यतया लोग इतने बेवकूफ भी नहीं होते हैं .. यदि वैसा हुआ हो तो उनका बहुत बडा दोष है .. जहां लडके लडकियां और परिवार वाले जाति आधारित पेशे में हों .. वहां दोनो पक्ष के एक जैसे काम में पारंगत होने से जीवन कुछ सहज हो जाता है!!

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  2. जातिवाद की जडें इतनी गहरी हैं कि यदि आईडिया के ऐड के हिसाब से सब लोगों को नंबरों से पुकारा जाने लगे तो वहां भी यह पूछा जाएगा कि किस नंबर वाले हो, ज्यादा पीछे वाले नंबर से हो या एकदम से इकाई संख्या वाले शुद्ध नंबरी.....

    अच्छा संस्मरण।

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  3. एक कम पढा लिखा वालक जीवन की ऊच नीच और सामाजिकता का सह्वी विश्लेशन नही कर पाया लेकिन रश्मि जी गाव देहात का यही सच है. और पढे लिखे लोग भी सिर्फ़ विद्रोह करके और अपनो का अलगाव झेलकर ही जाति प्रथा और ऐसी अनेक समाजिक कारागारो से मुक्त हो पाये है.

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  4. और बिलकुल श्रवण कुमार बन गया .नीची निगाह किये यही कहता रहता,'जो ये लोग बोलें'.जैसे आजकल के लड़के दहेज़ लेने के नाम पर श्रवण कुमार बन जाते हैं और सर झुकाए कहते हैं,"'हमें तो कुछ नहीं चाहिए,माता-पिता जानें".
    एक दम खरी और सटीक बात कह दी आपने... सिक्षा का आभाव ,जातिवाद ये सब हमारे समाज का सच है आज भी ...सार्थक लेख.

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  5. जागरूकता पैदा करती रचना...आज भी विवाह के समय लडके वाले अपने को भगवान् मनाने लगते हैं और
    जिस घटना का ज़िक्र रचना में आया है - बहुत अफ़सोस की बात है कि लड़का स्वयं पर किये गए एहसानों को इतनी जल्दी भूल गया.

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  6. मुझे तो लगता है कि इन सबका का मूल कारण अशिक्षा ही है , जब तक हमारे समाज में अशिक्षा व्याप्त रहेगी अधंविश्वास या जाति प्रथा को रोकना बहुत ही मुश्किल प्रतित होगा । हर बार की तरह इस बार भी जागरुक करती पोस्ट पढकर अच्छा लगा ।

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  7. कितने ही बदलावों की हर स्तर पर जरुरत है..मिथलेश से सहमत..अशिक्षा ही इन बातों के मूल में हैं जो लोग इसमें फंसे हैं...

    बेहतरीन आलेख!!

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  8. काश शिव के पास दिव्य ज्योति भी होती...

    इतना ही कहूंगा...जात न पूछो साधु की...

    जय हिंद...

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  9. हिन्दू समाज के एकजुट नहीं होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण जाति प्रथा ही है..
    मगर इसे दूर करने के जो प्रयास सरकारों और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा किये जा रहे हैं ..वे अंततः जातिगत कट्टरता को बढ़ावा देने का कार्य ही कर रहे हैं और ये सब लोग भली भांति शिक्षित हैं ...
    इसलिए यह कहना कि सिर्फ अशिक्षा ही जिम्मेदार है , सही नहीं है ...
    जिम्मेदार है लालसा, लालच , भौतिकवादी मानसिकता और वोट बैंक राजनीति ....जो इस खाई को पाटने का भ्रम दिखाते हुए इसे बढाने का कार्य ही कर रही हैं ...!!

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  10. janm ke adhaar par jaati paat sabhy maanav par ek kalank hai
    maarmik

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  11. नमस्कार रश्मि जी समाज की दुखद नब्ज कुरेदती हुई रचना ,,, सबसे पहले मै संगीता जी की बात से सहमत होते हुए ये कहना चाहूँगा की जाति का निर्धारण अगर कर्म या पेशा है (जो आज कल अशिक्षा की वजह से नहीं होता है )तो जाति प्रथा एक दम ठीक है क्यों की समान पेशे के लोगो में सम्बन्ध जुड़ना और सहूलियत की बात है ,,,मगर आज कल जाति का निर्धारण कर्म नहीं जन्म हो गया है जिसके लिए अशिक्षा और अज्ञान जिम्मेदार है अतः अगर हमें समाज ये या येसी और समस्याए हटानी है तो समाज को जागरूक करने की आवश्यकता है जो शिक्षा के द्वारा ही संभव है ,,, और वाणी गीत जी बात एक दम बचकाना है की जाति प्रथा समाज को तोड़ने का काम करती है जबकि जाति प्रथा ही वास्तव में समाज को जोड़ने का काम करती है बस उसके सही स्वरूप को समझने ( की जाति जन्म से नहीं कर्म से होती है ) की आवश्यकता है जो विना शिक्षा के नहीं आ सकती,, और वाणी गीत जी का यह कहना की जिन समाजिक संगठनों या राज नैतिक संगठनों के द्वारा जाति व्यस्था का समर्थन किया जाता है और जाति की मनगढ़ंत व्यख्याये की जाती है सही है मगर प्रभावित लोग कौन है जाहिर है वही लोग इससे जयादा प्रभावित होते है जिनमे जागरूकता नहीं और अशिक्षाआईटी है ( यहाँ शिक्षा का मेरा पैमाना डिग्रिया नहीं है समाजिक व्यस्था और समाज की समझ को मै शिक्षा मानता हूँ )
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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  12. @ प्रवीण शुक्ल जी ,
    अशिक्षा से मेरा मतलब डिग्री धारियों से ही था ...बस आपकी तरह मैंने इसकी अलग से व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं समझी ...
    और जाति इस देश में तो जन्म से ही तय की जाती हैं ...कम से कम अपने आस पास तो मैं यही देखती रही हूँ ...मैंने ब्राह्मण के घर में जन्म लिया है इसलिए ही ब्राह्मण कहलाती हूँ ....यदि देश के किसी भी प्रान्त , शहर , कसबे , गाँव में जाति का निर्धारण कर्म पर आधारित हो तो मुझे इसकी सूचना अवश्य दे ....मेरे बचकाने ज्ञान में कुछ बढ़ोतरी हो सकेगी ...आभार ...!!

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  13. @ प्रवीण शुक्ल
    और जातिगत एकता का राजनीति के अलावा और कही उपयोग हो रहा हो या इससे देश का कुछ भला होता भी नजर आया हो तो वह उदहारण भी जरुर पेश करें ....

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  14. aaj main bhi jaati dharm se judi rachna apne blog par daali hoon aur yahan aakar isi vishya se judi kahani padhne ko mili .bahut khoob ,kahani bahut hi shaandaar rahi .

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  15. @प्रवीण शुक्ल जी,
    जरा इस मुद्दे को स्पष्ट करना चाहूंगी...वाणी ने बचकानी नहीं सही बात कही है...
    जाति का निर्धारण जन्म से ही होता है...और इस बात में आज के अशिक्षा का कोई लेना-देना नहीं है....यह आज से नहीं हज़ारों साल पहले से ऐसा ही होता रहा है......ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण....
    रामायण देख लीजिये या महाभारत....
    राम ने जब भीलनी शबरी के बेर खाए तो लक्ष्मण नाराज़ हुए क्यूँ ...क्योंकि वह नीची जाति की थी...
    गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शिक्षा देने से इनकार कर दिया था ...क्योंकि उसकी जाति क्षत्रीय नहीं थी....
    कर्ण को कोई पाना नहीं पाया था ..जब भी कि वो कुंती का पुत्र थे लेकिन उनका लालन-पालन गरीब सारथि अधिरथ और राधा ने किया था....उन्हें भी सम्मान नहीं मिला था...
    क्या होना चाहिए था...वो अलग बात है ...लेकिन जो होता है वह यही है...
    अगर आप ब्राह्मण परिवार में जन्म लेते हैं तो ब्राह्मण कहलाते हैं...शुद्र घर में जन्म लेते हैं तो शुद्र....
    अभी तक तो यही देखा है...कि अगर आप कि जाति नीची है ...परन्तु आप बहुत काबिल हैं...आपने अपनी काबिलियत के बल पर बहुत अच्छी डिग्री हासिल कर ली है...तो आप बहुत अच्छी जगह पर बहुत अच्छी नौकरी के हकदार हो जायेंगे...नौकरी आपको मिल जायेगी...लेकिन किसी भी कीमत पर आप किसी मंदिर के पुजारी नहीं बन पायेंगे.....कुछ काम आज भी जातिगत श्रेणी में रखे गए हैं और उनका पालन भी दृढ़ता से किया जाता है....
    जातिवाद भारत में ख़त्म कहाँ हुई है ..अब इसने कुछ और ही रूप इख्तियार कर लिया है...सरकार खुद इसे बढ़ावा देती है...अगर ऐसा नहीं है तो फिर नौकरी में आरक्षण क्या है...यह भी तो बार-बार जातिवाद को बढ़ावा देता है..बेशक इसका उद्देश्य जो भी हो....अपने जाति भूलने कहाँ देते हैं ये विज्ञापन....!!

    हाँ यह ज़रूर है की अब सोच बदली चाहिए और इसमें सरकार को सबसे पहले अपना रवैय्या बदलना चाहिए...आरक्षण हटाना चाहिए...सबको सामान अवसर मिलना चाहिए...तभी ये सही होगा...वर्ना जैसे थे ...
    एक ज्वलंत मगर राख में दबी सी समस्या को उकेर गयी यह रचना...

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  16. वाणी गीत जी पूर्वाग्रह किसी समस्या का समाधान नहीं होने देता समस्या को समस्या के रूप में देखना ही चाहिए मगर अकारण अनावश्यक समस्या नहीं खड़ी करनी चाहिए ,,आप ने मेरी तिपद्दी सायद नहीं पढ़ी आप ने प्रश्न कियाहै की कही जाति अगर कर्म के आधार पर निर्धारित होती हो तो मै आप को आप को उसका उदहारण दूँ मै आप की इस बात से सहमत हूँ की जयादातर( आप के अनुसार हर जगह ) जगह पर आज कल जाति जन्म के आधार पर ही निर्धारित होती है , मगर मै इसमें ये जोड़ना चाहूँगा की ये जाति व्यस्था का विक्रत रूप है इसी को सुधारने की आवश्यकता है न की जाति व्यस्था को ही ख़त्म करने की आप को ये समझना होगा की जाति व्यस्था के बिना समाज व्यस्था नहीं चल सकती है सो जाति व्यस्था के इस बिगड़े रूप को सुधारने के लिए ही तो शिक्सा (जागरूकता ) आवश्यकता है ,, और आप ने कहाँ की आप ने ब्राह्मण के घर जन्मी है सो आप ब्राह्मण है और समाज आप को ब्राह्मण मानता है मगर मै (माफ़ करना मै व्यक्तिगत तिपद्दी नहीं कर रहा केवल विषय अनुसार यह लिख रहा हूँ )आप को तब तक ब्राह्मण नहीं मानता जब तक आप ब्राह्मण के लिए बताये गए कर्मो को नहीं करती और वो कर्म काया है इसे मै अगली जी की टीपड़ी में लिखूंगा

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  17. अदाजीऔर वाणी गीत ये लम्बा जबाब आप लोगो के लिए ही है और मेरी पिच्छली पोस्ट का अंश है

    सबसे पहले हम बात करते है ----वर्णाश्रम व्यवस्था की आवश्यकता की वर्णाश्रम व्यवस्था की आबश्यकता ही क्यूँ है? और अगर है तो इसका आरोही या अवरोही क्रम क्यूँ है,?, आखिर वर्णाश्रम व्यवस्था में सब को समानता क्यूँ नहीं ? कोई एक वर्ग उंचा और दूसरा वर्ग नीचा क्यूँ ?और किसी वर्ग के उच्च या निम्न होने के माप दंड क्या है ?,,,

    शुरू करते है आबश्यकता से----- ,,, किसी भी रास्ट्र ,समाज या परिवार ,को सुचारू रूप से चलने के लिए कुछ नियम या व्यवस्थाये परिवार समाज या रास्ट्र के लोगो द्वारा निर्धारित की जाती है------ जो लचीली और लोचबान होती है----- जो समय के साथ परिवर्तित होती रहती है----- इनका मकसद केवल व्यवस्था कायम करना होता है बंधन बनाना नहीं------ ठीक उसी तरह की व्यवस्था जाति व्यवस्था भी है-----,,, इसे एक परिवार से शुरू करते है----- हम सभी जानते है कि भारतीय परिवार व्यवस्था विश्व की शीर्ष परिवार व्यवस्था है ------अब एक परिवार को ठीक और सुचारू रूप से चलाने के लिए परिवार के प्रतेक सदस्य का कार्य निर्धारित होता है------ जो परिवार के मुखिया के द्वारा उसकी योग्यता के हिसाब से उसे दिया जाता है -----,, जैसे प्रत्येक घर में कोई बुजुर्ग व्यक्ति (दादा या दादी जो भी हो )जिन्हें जीवन का गहन अनुभव होता है ------वे अपने अनुभव परिवार के सभी सदस्यों के साथ बाटते है +----अतः वो ब्रह्मण का कार्य करते है------ ,,,दूसरी श्रेणी में वो लोग आते हैजो अनुभव में अभी पूर्ण रूप से नहीं पगे है-----परन्तु बलिस्ट और जोशीले है ------अतः वो परिवार की मान्यताओं की रक्षा के लिए नियुक्त होते है ------और उनके मन में परिवार के प्रत्येक सदस्य के प्रति कर्तव्य बोध होता है---- और वो परिवार के प्रत्येक सदस्य के पालन पोषण के लिए जिम्मेदार भी होते है----- ,,,ऐसे सदस्य दूसरी श्रेणी में आते है इनमे (पिता या चाचा आदि ) इन्हें क्षत्रिय कह सकते है ----तीसरी श्रेणी में घर की महिलाए आती है जिनके हाथो में प्रबंधन का काम होता है------ अन्न भण्डारण का काम होता है---वस्तु के विनमय(पास पड़ोस से वस्तुओ के आदान प्रदान की जिम्मेदारी ) का काम होता है------ और परिवार के अर्थ को भी नियंत्रित करती है -----इन्हें हम वैश कह सकते है ,-----, चौथी श्रेणी में घर के बच्चे या द्वितीय श्रेणी की महिलाए (पुत्र बधुये ,, )और पुत्र और पौत्र इत्यादि------ जिनके जिम्मे घर की साफ़ सफाई और उपरोक्त तीनो श्रेणी के सदस्यों की आज्ञा पालन का कार्य आता है ------उन्हें हम सूद्र कह सकते है---- ,,, अब घर में चारो वर्णों के होते हुए भी घर का क्या कोई सदस्य आपस में वैर करता है------ सभी मिल जुल के रहते है और सबको समान अधिकार प्राप्त है -----और उनके कार्य क्षेत्र योग्यता के अनुसार परिवर्तित भी होते रहते है----- या हम यूँ कह सकते है जाति योग्यता के हिसाब से बदलती भी रहती है----- जो बच्चे अभी सूद्र है वो बड़े हो कर क्षत्रिय या ब्रह्मण बन सकते है -----,,,, ठीक इसी तरह समाज में भी जाति व्यवस्था (वर्णाश्रम व्यवस्था )को हम देख सकते है -----समाज का वो वर्ग जो बुद्धि जीवी है तीव्र ज्ञान रखता है (अध्यापक ,वैज्ञानिक डॉ ,,ज्योत्षी )ब्राहमण है----- दूसरा वर्ग जो समाज की स्तिथि और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है (राजनेता सैनिक और पत्रकार आदि ) क्षत्रिय है--- त्रतीय बर्ग जो समाज की अर्थ व्यस्था और उपभोगीता के लिए जिम्मेदार है (व्यपारी ) उन्हें हम वैश कह सकते है----- ,,,, चतुर्थ वर्ग उन लोगो का है जो समाज के मेहनतकस लोग (सभी प्रकार के श्रमिक किशान इत्यादी )है जो समाज की जड़ का पर्याय है जिनके बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है------ उन्हें हम सूद्र कह सकते है ------ ,,, अब कौन व्यक्ति इस वर्ण व्यवस्था पर उंगली उठाये गा और कहेगा की ये गलत है-----,,,, फिर वर्णव्यवस्था की बुराई क्यूँ ,?,,, बुराई वहा से सुरु होती है -----जब ये वर्ण व्यवस्था कर्म के हिसाब से ना हो कर जन्म के हिसाब से हो जाती-----

    (जैसे की आज कल है ब्राह्मण का लड़का ब्राह्मण होताहै -----क्षत्रिय का क्षत्रिय भले ही भले ही उनके अन्दर ब्राह्मणोचित या क्षत्रियोचित गुण ना हो )है बस यही से बुराई की जड़ सुरु होती है------ और वर्णव्यवस्था का विरोध भी ,,,, तो आवश्यकता है सही सोच विकशित करने की ------और यह समझने की वर्ण व्यवस्था जन्म परक नहीं कर्म परक है----- कुछ तथा कथित जाति वादी (जिनमे भगवान् मनु का विरोध करने वाले राजनेता है )इसका विरोध कर सकते है----- और धर्म ग्रंथो का गलत हवाला दे सकते है (की वर्ण व्यवस्था जन्म परक है )परन्तु यहाँ पर मै उन्हें उनकी जबान में उत्तर दूंगा और धर्म ग्रंथो के रहस्य खोलूँगा------ ,,,,

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  18. शुरु करते है भगवान् गणेश द्बारा लिखित पवित्र ग्रन्थ महाभारत से जिसमे जिसमे धर्म राज युधिस्ठर स्वयं मेरी बात का समर्थन(कि जाति जन्म से नहीं कर्म से निर्धारित होती है और कर्म के अनुसार जाति बदली भी जा सकती है ) करते है --------

    वे कहते है ,,,,

    श्रणु यक्ष कुतं तात् ,न स्वध्यायोन न श्रतम |

    कारणम् हि द्विजत्वे च व्रतमेव न संशयः ||

    (महाभारत वन पर्व )

    अर्थात :कोई केवल वेद पाठन या कुल में जन्म लेने से ब्राह्मण नहीं बनता बल्कि अपने कर्मो से ब्राह्मण बनता है

    इतना ही नहीं हमारे धार्मिक ग्रन्थ भरे पड़े है उन उदाहरणों से जिनसे यह सिद्ध होता है की जाति जन्म से नहीं कर्म से होती है और योग्यता बर्धन के साथ जाती बदली भी जा सकती है ,, और ये भी हो सकता है की माता पिता दोनों ब्राहमण हो और पुत्र सूद्र हो जाए या फिर इसका उल्टा हो (अर्थात माता पिता दोनों सूद्र हो और पुत्र ब्राहमण या क्षत्रिय ये उसकी योग्यता पर निर्भर है कुछ उदहारण देखते है ,,,,

    अत्री मुनि (ब्राहमण )की दस पत्निया भद्रा अभद्रा आदि जो की रजा भाद्र्श्वराज (जो की क्षत्रिय थे ) की कन्याये थी और उन कन्याओं की माँ अप्सरा (नर्तकी )थी ,, दतात्रेय दुर्वाषा अत्री मुनि के पुत्र थे जो की ब्राह्मण हुए ||
    (लिंग पुराण अध्याय ६३ )
    अब आप कहेगे की जाती तो पिता से निर्धारित होती है अगर पिता ब्रह्मण है तो पुत्र तो स्वभाविक रूप से ब्रह्मण होगे ही ,,,नहीं नहीं ऐसा नहीं है वो अपनी योग्यता से ब्राह्मण हुए थे आगे देखे ,,,
    १-मातंग ऋषि जो की ब्रह्मण थे ,, एक ब्राह्मणी के गर्भ से चांडाल नाई के द्बारा उत्पन्न हुए थे ||
    (महाभारत अनुपर्व अध्याय २२ )
    २-ऋषभ देव राजा नाभि (जो कि क्षत्रिय ) के पुत्र थे इनसे सौ पुत्र हुय्र जिनमे से इक्यासी ब्राह्मण हुए
    (देवी भागवत स्कन्द ४ )
    ३-राजा नीव (क्षत्रिय )ने शुक्र (ब्राह्मण ) कि कन्या से विवाह किया इनके कुल में मुदगल ,अवनीर, व्रह्द्र्थ ,काम्पिल्य और संजय हुए मुदगल से ब्राह्मणों का मौदगल्य गोत्र चला
    (भागवत स्कंध ९ अध्याय २१ )

    इतना ही नहीं मै अन्य अनेक और उदहारण दे सकता हूँ जिनसे ये सिद्ध होता है कि जाति जन्म से नहीं कर्म से निर्धारित होती थी , ये उदहारण ये भी सिद्ध करते है कि विजातीय विवाह प्रचलित थे और मान्य थे एक और उदाहरण महा ऋषि काक्षिवान का
    महाऋषि काक्षिवान (ब्राह्मण ) के पिता दीर्घतमा क्षत्रिय थे और ये उनके द्बारा एक शूद्रा के गर्भ से उत्पन्न

    भगवान् मनु जिन्हें कथित प्रगति वादी वर्णाश्रम व्यवस्था के लिए पानी पी पी कर कोसते है , ने मनु स्म्रति में स्पस्ट कहा है कि जाति कर्म से निर्धारित होती है जन्म से नहीं और क्रम के अनुसार जाति बदली भी जा सकती है ,,
    भगवान् मनु कहते है ,,,
    शुद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैती शूद्र्ताम |
    क्षत्रिय यज्जन में वन्तु विधाद्वैश्याप्तथैव च//|

    (मनु स्मरति अध्याय १० श्लोक ६५ )
    अर्थात : शुद्र ब्राह्मणता को प्राप्त होता है , और ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त होता है इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश कुल में जन्म्लेने बालो को जानो |
    इससे स्पस्ट है कि जाति जन्म से नहीं थी योग्य शूद्र ब्राह्मण हो सकता था और अयोग्य ब्राह्मण शूद्र ,, इतना ही नहीं भगवान् मनु ने कर्म पर बहुत जोर दिया है वे कहते है अपनी अपनी जाति बनाये रखने के लिए या जाति को उच्च बनाने के लिए विहित कर्मो का करना आवश्यक है इस श्लोक में --

    भगवान् मनु कहते है--

    योSनधीत्य द्विजो वेद मन्यन्त्र कुरुते श्रमम|
    स जीवन्नेव शुद्र्त्वमाशु गच्छति सन्वया ||
    (मनु स्म्रति अध्याय २१ श्लोक १६८ )
    अर्थात : जो द्विज वेद को छोड़ कर अन्यंत्र टक्करे मारता है वह जीता हुआ सपरिवार शूद्र्त्व को प्राप्त होता है |
    इतना ही नहीं वर्णाश्रम व्यवस्था बनाये रखना राज धर्म होता था और उनकी शुद्धता और स्पष्टता का भी आकलन होता था योगता में गिरने पर उच्च जाति छीन ली जाति थी , और योग्य होने पर जाति प्रदान भी कि जाती थी,,,,
    न तिष्ठति तू यः पूर्व नोपास्ते यास्तु पश्चिमाम |
    स शूद्रव्र्द्वहिस्काय्य्र : सर्वस्माद्रद्विज कर्मणा ||

    (मनु स्मरति अध्याय २२ श्लोक १०३ )
    अर्थात : जो मनुष्य प्रातः वा सायं संध्या नहीं करता वह शूद्र है और उसे समस्त द्विज कर्मो से बाहर कर देना चाहिए

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  19. इतना ही नहीं उस समय के अनेक अन्य निति कारो ने भी इसी चीज कि व्याख्या अपने अपने निति शास्त्रों में कीअगर सभी का उदारहण लेने बैठ गए तो बात बहुत लम्बी खिच जाए गी वैसे पर्याप्त तथ्य तो हम दे ही चुके है जो तर्क शील व्यक्ति की जिज्ञासा शांत करने के लिए काफी है और कुतर्की को हजार तर्क भी अगर और दूँ तो ना काफी है फिर दोवैराग अन्य निति कारो की स्म्र्तिया (निति ग्रन्थ ,कानून की पुस्तके ) तो देख ही लूँ
    देखिये कर्म की व्याख्या करते हुए भगवान् पराशर क्या कहते है ----

    अग्निकाययित्परिभ्रस्टा : सध्योपासन : वर्जिता |
    वेदं चैवसधियान :सर्वे ते वृषला स्मर्ता||
    (पराशर स्म्रति अध्याय १२ श्लोक २९)
    अर्थात :हवन वा संध्या से रहित वेदों को न पढने वाला ब्राह्मण , ब्राह्मण नहीं शूद्र है|
    बिलकुल यही बात शंख स्म्रति भी दोहराती है देखे ---
    व्रत्या शूद्रसमास्तावद्विजेयास्ते विच्क्षणे |
    याव द्वेदे न जायन्ते द्विजा जेयास्त्वा परम |
    (शंख स्म्रति अध्याय १ श्लोक ८ )
    अब मुझे लगता है मैंने काफी उदहारण दे दिए और ये काफी है है मुझे अपनी बात सिद्ध करने के लिए और भारतीय संस्क्रती कि अमूल्य निधि को कुरीति समझ कर उसे छोड़ रही आधुनिक पीढी के सामने उसके महत्त्व को स्पस्ट करने के लिए ,,,,,,

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  20. आदरणीय अदा जी अब आप के बचकाने( यहाँ पर मेरा बचकाना कहना कोई अपमान नहीं दर्शाता है बल्कि केवल ये दरसता है की यदि कोई व्यक्ति बच्चो जैसी हठता पूर्वाग्रह रखे भले ही कितना भी ग्यानी क्यूँ न हो मै तो बच्चा ही कहूँगा हहह्हः हः हः हाँ वैसे उम्र में मै आप के साम,ने बच्चा ) हूँ सबालो का जबाब आप की तिपद्दी से ही सुरु करताहूँ
    रामायण देख लीजिये या महाभारत....
    राम ने जब भीलनी शबरी के बेर खाए तो लक्ष्मण नाराज़ हुए क्यूँ ...क्योंकि वह नीची जाति की थी...
    गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शिक्षा देने से इनकार कर दिया था ...क्योंकि उसकी जाति क्षत्रीय नहीं थी....
    कर्ण को कोई पाना नहीं पाया था ..जब भी कि वो कुंती का पुत्र थे लेकिन उनका लालन-पालन गरीब सारथि अधिरथ और राधा ने किया था....उन्हें भी सम्मान नहीं मिला था...
    राम ने भीलनी के बेर खाए और लाक्स्मन ने मन किया सच है सीधा जबाब है राम राज कुमार थे और भीलनी आम नागरिक भगवान् राम विशेष व्यक्ति और भीलनी आम व्यक्ति तो कुछ विशेष नियम थे जैसे आज कल विशेष व्यक्तियों के परिवारों और के लिए होते है मगर राम ने वो विशेष नियम तोड़े और बेर खाए यहाँ जाति प्रथा नहीं थी और एक बात ध्यान रखना की राम राजा थे इसलिए क्षत्रिय थे ,, राम क्षत्रिय थे इसलिए राजा नहीं थे ,,,क्यूँ की जाति कर्म से है
    यही बात द्रोना चार्य के लिए लागू होती है द्रोणाचार्य राज गुरु थे इसीलिए उन्होंने एकलव्य को शिक्सा देने से मना किया
    और यही बात कर्ण के लिए भी कही जासकती है
    सादर
    बाकी कर्म के अनुसार जाति निर्धारण के और उदाहरन मै ऊपर दे चुका हूँ
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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  21. तीव्र नगरीकरण और औद्योगीकरण अंतत: जाति व्यवस्था को समाप्त कर देंगे लेकिन अभी समय लगेगा। एक पीढ़ी पहले तक उच्च वर्ण विवाह तय करते समय 'उपजाति' का भी ध्यान रखते थे अब कोई नहीं देखता।
    कुछ कट्टर जातियों को छोड़ दें तो अब गोत्र की बात भी नहीं होती।
    यह भी सच है कि राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी और अवसरवादी राजनीति ने समाप्त होती जाति व्यवस्था को सम्बल दिया है लेकिन कितने दिन...?
    वैसे भी समाज संघटन जटिल है। कोई नहीं जानता कि कल को एक अलग तरह की जाति यवस्था ही डेवलप हो जाय। भारत में कुछ भी सम्भव है :)

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  22. अरे बाप रे चर्चा बहुत गंभीर हो गयी.इसमें यह बात तो कहीं खो गयी की पोस्ट कितनी अच्छी है.बहुत बढ़िया लेख.बधाई हो इसके लिए और नए ब्लॉग के लिए.

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  23. अरे बाप रे चर्चा बहुत गंभीर हो गयी.इसमें यह बात तो कहीं खो गयी की पोस्ट कितनी अच्छी है.बहुत बढ़िया लेख.बधाई हो इसके लिए और नए ब्लॉग के लिए.

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  24. suppoort@ rao

    तीव्र नगरीकरण और औद्योगीकरण अंतत: जाति व्यवस्था को समाप्त कर देंगे लेकिन अभी समय लगेगा।

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  25. Aisa bhi hota hai apne Hindustaan me... sahi sansmaran saamne laayeen aap..
    Jai Hind

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  26. @ प्रवीण शुक्ल जी ,
    वेदों और जाति व्यवस्था के बारे में आपका समुचित ज्ञान मात्राओं की भारी अशुद्धि के बावजूद बहुत प्रभावित कर रहा है ....ये तो सभी जानते हैं कि पुराने समय में वर्ण व्यवस्था व्यक्ति के कर्म पर ही आधारित होती थी ...लेकिन धीरे धीरे यह व्यवस्था जन्म पर ही मान्य होती गयी और आज हमारे समाज में जो जाति व्यवस्था है ...वह जन्म पर ही आधारित है ...

    बिलकुल मैं यही चाहती हूँ और मैं क्या ...देश का भला चाहने वाला हर नागरिक यही चाहेगा कि यह समाज व्यक्तियों का निर्धारण उसके कर्म पर करे..मगर मैं ऐसा कर नहीं सकती क्यूंकि मुझे जातिगत व्यवस्था वाले इस समाज में ही रहना है..जिस दिन फिर से देश में व्यक्तियों के कर्मों पर उनका वर्ण निर्धारित हो सकेगा..स्वर्णिम युग कह लाएगा इस देश के लिए.. मगर ऐसा होता मुझे तो दूर दूर तक नजर नहीं आता...अभी तो यह सब ख्याली पुलाव पकाने जैसा ही है..ख्वाब देखने में बुरा भी क्या है..कभी सच भी होंगे..आमीन ...!!

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  27. मैं सिर्फ इतना कहूँगा की जाती प्रथा हिन्दू समाज का कोढ़ है .यही हमारी पराजय और पतन का कारन भी .वर्ण व्यवस्था का आधार जो भी रहा लेकिन वह बहुजन की गुलामी और मानसिक अंधकार में बदल गयी .उसके पीछे ' शश्त्र , शाश्त्र और संपत्ति ' की दुरभिसंधि साफ़ है.

    दुर्भाग्य से गांधी भी संस्कार से वर्ण व्यवस्था को ही हिंदुत्व का आधार मानते रहे. इसीलिये आम्बेडकर और सावरकर जैसे क्रांतिकारी सोच रखने वालों को साथ न रख सके. लोहिया ने भी जाती को ही तमाम बुराईयों की जड़ पाया और जाती तोड़ो का संघर्ष भी किया . आज तो सिर्फ जाती की राजनीती से भारत पहले मुक्त हो तभी 'शिव ' साधा जा सकता है . और भले राजनैतिक षड्यंत्र के तहत कुछ देर चले पर जाती व्यवस्था का नाश निश्चित है . वह स्वर्णिम दिन देखने का ज्यादा इंतज़ार भी नहीं करना होगा .मेरा तो यही विश्वास है .

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  28. मनुष्य का गुण है कि बिना सेग्रेगेशन के रह ही नहीं सकता। वर्ण-जाति की एक व्यवस्था जायेगी तो वैक्यूम भरने के लिये दूसरा उसका स्थान ले लेगी। वह व्यवस्था चाहे जन्मना हो, या आर्थिक सामाजिक रसूख के आधार पर!

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  29. मैँ भी इस जातिवाद दीवार के बारे मे खुब सोचता हुँ कि ये मेरे देश से कब निकलेगी
    और ये भेदभाव

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  30. मैँ भी इस जातिवाद दीवार के बारे मे खुब सोचता हुँ कि ये मेरे देश से कब निकलेगी
    और ये भेदभाव

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